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| == चतुर्थः पादः ==
| | #REDIRECT [[Nyayavivaranam#BSNV_C02_S04]] |
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| | title = चतुर्थः पादः
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| न च प्राणानामुत्पत्यङ्गीकारे,‘प्राणा एवानादयः’() इत्यादिस्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधः । ‘आत्मैवेदमग्र आसीत् स प्राणमसृजत, स प्राणान्’() इत्यादिवचनाद् अनादित्व एव (स्पष्टार्तश्रुति)स्पष्टार्थवद्विशेषश्रुतिविरोधात् । ‘इदं सर्वमसृजत’()इति सामान्यवचनस्याधिक्यं सिद्धान्ते । विशेषमात्रश्रुतेः सावकाशाया(सकाशाद् विशेषा) उभयश्रुतेः प्राबल्यात् ॥1॥
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| === तत्प्रागधिकरणम् ===
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| न च ‘नित्यं मनोऽनादित्वात्’() इति विशेषश्रुतिविरोधः । ‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति विशेषश्रुतेः ॥2॥
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| === तत्पूर्वकत्वाधिकरणम् ===
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| न च ‘वाग्वाव नित्या’()इति विशेषश्रुतिविरोधः, ‘मनसो वाव वागुत्पद्यते(वागुदपद्यत), वाचो व्याहरणम्’() इति विशेषश्रुतेः ॥3॥
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| === सप्तगत्यधिकरणम् ===
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| न च ‘दशेमे पुरुषे प्राणाः आत्मैकादशः’(), ‘सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’() इति सङ्ख्याविशेषश्रुत्योरेव (परस्परं)परस्परविरोधः । ‘गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त’() इति सप्तभावस्य बुद्धीन्द्रियविषयत्वेन विशेषितत्वात् सङ्ख्याश्रुत्योः विषयवैलक्षण्यात् ॥4॥
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| === अण्वधिकरणम् ===
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| | text =
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| न च ‘दिवीव चक्षुराततम्’() इति व्याप्त्याख्यविशेषवाचकश्रुतिविरोधः, ‘अणूनि वा इन्द्रियाणि तेषां प्रकाशो व्याततः’ इति ततोऽप्यणुत्ववाचकविशेषश्रुतिविरोधात् ॥5॥
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| === श्रेष्ठाधिकरणम् ===
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| न च ‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते ॥’ इत्यादिमाहात्म्यवचनात् मुख्यप्राणस्य नोत्पत्तिरिति वाच्यम् । ‘महत्वान्महतां विष्णुः कर्ता प्राणस्य चैकराट् । किं नाम न सृजेदेष येन शक्त्ये(क्ये)दमावृतम् ॥’ इति श्रुतेस्ततोऽपि माहात्म्याद् विष्णोः ॥6॥
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| === पञ्चवृत्त्यधिकरणम् ===
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| न च प्राणादिपञ्चस्य व्यक्तसद्गुणत्वान् मुख्यप्राणवृत्तित्वमेव । ‘अशेषगुणपूर्णानि मुख्यरूपाणि पञ्च च । तद्दासाः पञ्च चान्येऽपि प्राणाद्याः सद्गुणैर्युताः॥’इति श्रुतेः मुख्यप्राणस्य ततोऽपि व्यक्तसद्गुणत्वात् ॥8॥
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| === अण्वधिकरणम् ===
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| न चाणुत्वे प्राणस्य ‘महान् वै मुख्यप्राणो येन व्याप्तं चराचरम्’() इति दृष्टायुक्तिः । ‘अणुर्वै मुख्यप्राणो य उत्क्रामति नाडीभिः’() इति दृष्टायुक्तेरनणुत्वे(युक्तिरनणुत्वे) प्राणस्य ॥9॥
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| === ज्योतिरधिकरणम् ===
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| न चेन्द्रियाणां जीवाकरणत्वे दृष्टायुक्तिः । क्वचिदतद्वशत्वस्यापि दृष्टत्वात् । ‘यच्चक्षुषि तिष्ठन्’() इत्यादिदृष्टाऽत्युक्तेरीशाधीनत्वानङ्गीकारे । लौकिकदृष्टेस्त्वीशेनैव जीवानुसारित्वक्लृप्त्योपपत्तेः ॥10॥
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| === इन्द्रियाधिकरणम् ===
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| न च ईशवशत्वसाम्यात् मुख्यप्राणस्याप्यन्यसाम्यम् ;‘(यदस्मिन्)यस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्’(), ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम्’ इत्यादि श्रुतेरीशसाम्यस्यापि भावात् । ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः’ इति श्रुतेर्मध्यमत्वोपपत्तेः ॥11॥
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| === सञ्ज्ञाधिकरणम् ===
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| न च विरिञ्चस्यापि कर्तृत्वशक्तेः स एव शरीरादिस्रष्टा ।‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया । रूपापेक्षं तथा नाम व्यवहारस्तदात्मकः ॥ अतो रूपस्य नाम्नश्च व्यवहारस्य चैकराट् । हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः ॥’ इत्यादेस्तस्यैव कर्तृत्वशक्तेर्विरिञ्चस्य तु द्वारतयोपपत्तेः(द्वारतयैवोपपत्तेः) ॥12॥
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| === मांसाधिकरणम् ===
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| न च मिश्रत्वाद्(विमिश्रत्वाद्) भूतानां मिश्रतायाम्(विमिश्रितायाम्) अविशेषः । ‘अन्नमशितं त्रेधा विधीयते’() इत्यादिना मिश्रतायामपि विशेषोक्तेः ।‘सर्वं च भौतिकं मिश्रं मिश्रत्वेऽपि(मिश्रित्वे) विशेषतः । भौमं मांसमसृग्वारि तेजो मज्जा विशेषतः ॥’ इत्यादेश्च ॥13॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥
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| [[Category:Nyayavivaranam]] | |