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| == षष्ठोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C09_S06]] |
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| | title = षष्ठोऽध्यायः
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| | verse_line1 = एवंविधानेकगुणः स राजा
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| | verse_line2 = परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।
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| | verse_line3 = क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं
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| | verse_line4 = यया विरिञ्चादिमधश्चकार ॥ ८४ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये नवमस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥
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| 'ब्रह्मादिभक्तिकोट्यंशादंशो नैवाम्बरीषके ।
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| नैवान्यस्य च कस्यापि तथापि हरिरीश्वरः ॥
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| तात्कालिकोपचेयत्वात्तेषां यशस आदिराट् ।
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| ब्रह्मादयश्च तत्कीर्तिं व्यञ्जयामासुरुत्तमाम् ॥
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| मोहनाय च दैत्यानां ब्रह्मादेर्निन्दनाय च ।
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| अन्यार्थं च स्वयं विष्णुर्ब्रह्माद्याश्च निराशिषः ॥
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| मानुषेषूत्तमत्वाच्च तेषां भक्त्यादिभिर्गुणैः ।
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| ब्रह्मादेर्विष्ण्वधीनत्वज्ञापनाय च केवलम् ॥
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| दुर्वासाश्च स्वयं रुद्रस्तथाप्यन्याय्यमुक्तवान् ।
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| तस्याप्यनुग्रहार्थाय दर्पनाशार्थमेव च''॥ इति गारुडे ॥ ८४ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |