Jump to content

Bhagavadgitabhashya/C13: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Tag: New redirect
 
Line 1: Line 1:
== त्रयोदशोऽध्यायः ==
#REDIRECT [[Bhagavadgitabhashya#BGB_C13]]
{{Adhyaya
| document_id  = BGB
| chapter_num  = 13
| title        = त्रयोदशोऽध्यायः
}}
पूर्वोक्तज्ञान-ज्ञेय-क्षेत्र-पुरुषान् पिण्डीकृत्य विविच्य दर्शयत्यनेनाध्यायेन । (सर्वार्थसङ्क्षेपोऽयम् )॥ १ -३॥
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V01
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
| verse_line2  = एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥
}}
 
{{Uvacha|अर्जुन उवाच}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V02
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
| verse_line2  = एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥
}}
 
{{Uvacha|श्रीभगवानुवाच}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V03
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
| verse_line2  = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V04
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।
| verse_line2  = स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V04
| id      = BGB_C13_V04_B01
| text    =
‘यद्विकारि’ येन विकारेण युक्तम् । यतश्च यत् यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । यतश्च यत् इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । स च य इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V05
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
| verse_line2  = ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V05
| id      = BGB_C13_V05_B01
| text    =
ब्रह्मसूत्राणि =शारीरकम्  ॥ ५ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V06
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
| verse_line2  = इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V07
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
| verse_line2  = एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V07
| id      = BGB_C13_V07_B01
| text    =
इच्छादयो विकाराः ॥ ६-७ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V08
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
| verse_line2  = आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V08
| id      = BGB_C13_V08_B01
| text    =
‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- अमानित्वमित्यादिना ॥ आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः ।‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् । आर्जवं मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V09
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च ।
| verse_line2  = जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V10
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
| verse_line2  = नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V10
| id      = BGB_C13_V10_B01
| text    =
सक्तिः = स्नेहः । स एवातिपक्वः= अभिष्वङ्गः । ‘स्नेहः सक्तिः स एवातिपक्वो(क्तो)भिष्वङ्ग उच्यते।’ इति ह्यभिधानम् ॥ १०॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V11
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
| verse_line2  = विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V12
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
| verse_line2  = एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् अज्ञानं यदतोऽन्यथा॥१२ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V12
| id      = BGB_C13_V12_B01
| text    =
तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V13
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।
| verse_line2  = अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V13
| id      = BGB_C13_V13_B01
| text    =
‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् अनादिमत् । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् ।
॥ १३ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V14
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
| verse_line2  = सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V15
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं ।
| verse_line2  = असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V15
| id      = BGB_C13_V15_B01
| text    =
सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति सर्वेन्द्रियगुणाभासम् । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् ।
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V16
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च ।
| verse_line2  = सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V17
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
| verse_line2  = भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V18
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
| verse_line2  = ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V19
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
| verse_line2  = मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V19
| id      = BGB_C13_V19_B01
| text    =
विकारान्तर्भावाज्ज्ञानसाधनं प्रथमत उक्तम् । बहुत्वात् साधनात्युपयोगात् प्रभावः ॥ १९ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V20
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
| verse_line2  = विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V20
| id      = BGB_C13_V20_B01
| text    =
‘यतश्च यत्’ इति वक्तुं प्रकृति-विकार-पुरुषान् सङ्क्षिप्याह- प्रकृतिमिति ॥ गुणाः सत्त्वादयः । तेषामत्यल्पो(ऽपि) विशेषो लयात् सर्गे इति विकाराः पृथगुक्ताः ।‘कार्याकार्यगुणास्तिस्रः यतः स्वल्पोद्भवो जनौ’ ।इति (हि) माधुच्छन्दसशाखायाम् ॥२० ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V21
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
| verse_line2  = पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V21
| id      = BGB_C13_V21_B01
| text    =
कार्यं शरीरम् । ‘शरीरं कार्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । करणानि इन्द्रियाणि । भोगः अनुभवः । स हि चिद्रूपत्वाद् अनुभवति । प्रकृतिश्च जडत्वात् परिणामिनी । ‘कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः ।भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥’(भाग.३.२७.९)इति (हि) भागवते ॥२१ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V22
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।
| verse_line2  = कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V23
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
| verse_line2  = परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V23
| id      = BGB_C13_V23_B01
| text    =
‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - उपद्रष्टेति ॥ अनुमन्ता अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V24
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
| verse_line2  = सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V24
| id      = BGB_C13_V24_B01
| text    =
‘पुरुषः सुखदुःखानाम्’(१३.२१) इति जीव उक्तः । ‘पुरुषं प्रकृतिं च’ इति जीवेश्वरौ सहैवोच्येते । अन्यत्र महातात्पर्यविरोधः । उत्कर्षे हि महातात्पर्यम् । । तथाहि सौकरायणश्रुतिः- ‘अवाच्योत्कर्षे महत्त्वात् सर्ववाचां सर्वन्यायानां च महत्तत्परत्वम् । विष्णोरनन्तस्य परात्परस्य तच्चापि ह्यस्त्येव न चात्र शङ्का ।अतो विरुद्धं तु यदत्र मानं तदक्षजादावथवाऽपि युक्तिः ।न तत् प्रमाणं कवयो वदन्ति न चापि युक्तिर्ह्यूनमतिर्हि दृष्टेः ॥’ इति ।अतो युक्तिभिरप्येतदपलापो न युक्तः । अतो यया युक्त्याऽविद्यमानत्वादि कल्पयति साऽप्याभासरूपेति सदेव माहात्म्यं वेदैरुच्यत इति सिध्यति ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V24
| id      = BGB_C13_V24_B02
| text    =
अवान्तरं च तात्पर्यं तत्रास्ति । उक्तं च तत्रैव- ‘अवान्तरं तत्परत्वं च सत्त्वे, महद्वाऽप्येकत्वात् (तु) तयोरनन्ते’ । इति । श्यामत्वाद्यभिधानाच्च । युक्तं च पुरुषमतिकल्पितयुक्त्यादेराभासत्वम् । अज्ञानसम्भवात् । न तु स्वतः प्रमाणस्य वेदस्याऽभासत्वम् । अदर्शनं च सम्भवत्येव । पुंसां बहूनामप्यज्ञानात् । तर्ह्यस्मदनधीतश्रुत्यादौ विपर्ययोऽपि स्यादिति च न वाच्यम् । यतस्तत्रैवाह-‘नैतद्विरुद्धा वाचो नैतद्विरुद्धा युक्तयः इति ह प्रजापतिरुवाच (प्रजापतिरुवाच)’ इति ।तद्विरुद्धं च जीवसाम्यम् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V24
| id      = BGB_C13_V24_B03
| text    =
‘आभास एव च’(ब्र.सू.२.३.५०) इति चोक्तम् । ‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन् उताहो एक एव तु ।को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ।श्रीवैशंपायन उवाच-नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्भव ।बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥तथा त्वं पुरुषं विश्वं आख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१-३) इति च मोक्षधर्मे ।न च तत् सर्वं स्वप्नेन्द्रजाल(लादि)वत् ।  ‘वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत्’(ब्र.सू.२.२.२९) इति हि भगवद्वचनम् । न च स्वप्नवत् एकजीवकल्पितत्वे मानं पश्यामः । विपर्यये माश्चोक्ता द्वितीये । उक्तं चायास्यशाखायाम्- ‘स्वप्नो ह वा अयं चञ्चलत्वान्न च स्वप्नो न हि विच्छेद एतदिति।’इति ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V24
| id      = BGB_C13_V24_B04
| text    =
नायं दोषः । न हीश्वरस्य जीवैक्यमुच्यते । जीवस्य हीश्वरैक्यं ध्येयम् । तदपि न निरुपाधिकम् । अतो न प्रतिबिम्बत्वविरोधि ऐक्यम् । तथा च माधुच्छन्दसश्रुतिः- ‘ऐक्यं चापि प्रातिबिम्ब्येन विष्णोः जीवस्यैतद्ध्यृषयो वदन्ति’ इति । अहङ्ग्रहोपासने च फलाधिक्यम् अ(आ)ग्निवेश्यश्रुतिसिद्धम्- ‘अहङ्ग्रहोपासकस्तस्य साम्यम् अभ्याशो ह वा अश्नुते नात्र शङ्का ।’ इति ।‘तदीयोऽहमिति ज्ञानम् अहङ्ग्रह इतीरितः ।’इति वामने ।‘तद्वशत्वात्तु सोऽस्मीति भृत्यैरेव न तु स्वतः’ इति च ।‘प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मि भृत्यश्च’ इति भावना । तथा हि आयास्यशाखायाम्- ‘भृत्यश्चाहं प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मीत्येवं ह्युपास्यः परमः पुमान् सः ।’ इति । प्रातिबिम्ब्यं च तत्साम्य(सादृश्य)मेव ॥ २४ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V25
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
| verse_line2  = अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V26
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।
| verse_line2  = तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V26
| id      = BGB_C13_V26_B01
| text    =
साङ्ख्येन वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- ‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति ।श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति ।अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’  इति ।‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V27
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
| verse_line2  = क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V28
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
| verse_line2  = विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V29
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
| verse_line2  = न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V29
| id      = BGB_C13_V29_B01
| text    =
पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- यावदित्यादिना ॥ २७-२९ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V30
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
| verse_line2  = यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V30
| id      = BGB_C13_V30_B01
| text    =
आत्मानं चाकर्तारं पश्यति स पश्यति ॥ ३० ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V31
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति ।
| verse_line2  = तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V31
| id      = BGB_C13_V31_B01
| text    =
एकस्थम् एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । तत एव च विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V32
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः ।
| verse_line2  = शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V32
| id      = BGB_C13_V32_B01
| text    =
न च व्ययादिस्तस्येत्याह - अनादित्वादिति ॥ सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो ‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१) इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V33
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते ।
| verse_line2  = सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V34
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
| verse_line2  = क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGB_C13_V35
| document_id  = BGB
| chapter_id    = BGB_C13
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
| verse_line2  = भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥
| commentary1  = bhagavadgitabhashya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V35
| id      = BGB_C13_V35_author-note
| text    =
॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V35
| id      = BGB_C13_V35_B01
| text    =
भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षसाधनम् अमानित्वादिकम् ॥ ३५ ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGB_C13_V35
| id      = BGB_C13_V35_author-note
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥
}}
 
 
[[Category:Bhagavadgitabhashya]]

Latest revision as of 06:41, 13 April 2026