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| == षष्ठोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitabhashya#BGB_C06]] |
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| | title = षष्ठोऽध्यायः
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| ज्ञानान्तरङ्गं समाधियोगमाहानेनाऽध्यायेन ।
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| | verse_line1 = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
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| | verse_line2 = स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥
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| विवक्षितं संन्यासमाह योगेन सह - अनाश्रित इति ॥ चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्ता ‘दैवमेव’(४.२५) इत्यादौ । ‘अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता’ । इति च । तस्माद् निरग्निरक्रियः संन्यासी योगी च न भवत्येव ॥१ ॥
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| | verse_line1 = यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
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| | verse_line2 = न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥
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| | text =
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| संन्यासोऽपि योगान्तर्भूत इत्याह - यं संन्यासमिति ॥ कामसङ्कल्पाद्यपरित्यागे कथमुपायवान् स्यादित्याशयः ॥ २ ॥
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| | verse_line1 = आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
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| | verse_line2 = योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥
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| कियत्कालं कर्म कर्तव्यम् ? इत्यत आह - आरुरुक्षोर्मुनेरिति ॥ योगमारुरुक्षोः उपायसम्पूर्तिमिच्छोः । योगारूढस्य सम्पूर्णोपायस्य । अपरोक्षज्ञानिन इत्यर्थः । कारणं परमसुखकारणम् । अपरोक्षज्ञानिनोऽपि समाध्यादिफलमुक्तम् । तस्य सर्वोपशमेन समाधिरेव कारणं प्राधान्येनेत्यर्थः । तथाऽपि यदा भोक्तव्योपरमः तदैव सम्यगसम्प्रज्ञातसमाधिर्जायते । अन्यदा तु भगवच्चरितादौ स्थितिः । तच्चोक्तम्-‘ये त्वां पश्यन्ति भगवंस्त एव सुखिनः परम् । तेषामेव तु(च) सम्यक् च(तु) समाधिर्जायते नृणाम् । भोक्तव्यकर्मण्यक्षीणे जपेन कथयाऽपि वा । वर्तयन्ति महात्मानसः त्वद्भक्ताः तत्परायणाः ॥’ इति ॥३ ॥
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| | verse_line1 = यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
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| | verse_line2 = सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥
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| | text =
| |
| योगारूढस्य लक्षणमाह - यदेति ॥ सम्यगननुषङ्गः तस्यैव भवति । उक्तं च -‘स्वतो दोषलयो दृष्ट्या त्वितरेषां प्रयत्नतः’ । इति ॥ ४ ॥
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| | verse_line1 = उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् ।
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| | verse_line2 = आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥
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| स च योगारोहः प्रयत्नेन कर्तव्य इत्याह - उद्धरेदित्यादिना ॥ ५ ॥
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| | verse_line1 = बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः ।
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| | verse_line2 = अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥
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| | text =
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| कस्य बन्धुरात्मा इत्यत आह- बन्धुरात्मेति ॥ आत्मा मनः । आत्मनः जीवस्य । आत्मना मनसा । आत्मानं जीवम् । आत्मैव मनः । आत्मना बुद्ध्या, जीवेनैव वा । स हि बुद्ध्या विजयति । उक्तं च- ‘मनः परं कारणमामनन्ति’(भाग.११.२३.४३), ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’(वि.पु.६.७.२८) ‘उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत् ।जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः ॥’ ‘जीवेन बुध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य ।ततो जयेद् बुद्धिबलो नरस्तद् देवे च भक्त्या मधुकैटभारौ ॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । अनात्मनः अजितात्मनः पुरुषस्य, अजितमनस्कस्य । सदपि मनोऽनुपकारि इत्यनात्मा । सन्नपि भृत्यो यस्य न भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः । तस्यात्मा= मन एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तते ॥ ६ ॥
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| | verse_line1 = जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
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| | verse_line2 = शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥
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| | verse_line1 = ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः ।
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| | verse_line2 = युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥
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| | text =
| |
| जितात्मनः फलमाह - जितात्मन इति ॥ जितात्मा हि प्रशान्तो भवति । न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति । तदा च परमात्मा सम्यग् हृदि आहितः सन्निहितो भवति, अपरोक्षज्ञानी स भवतीत्यर्थः । अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति - शीतोष्णेत्यादिना ॥ शीतोष्णादिषु कूटस्थः । ‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’, ‘विजितेन्द्रियः’ इति कूटस्थत्वे हेतुः । विज्ञानं विशेषज्ञानम् । अपरोक्षज्ञानं वा । तच्चोक्तम्- ‘सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः ।देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ॥’ ‘श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते । तज्ज्ञानं, दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत् । विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा ॥’ इत्यादि । कूटस्थः निर्विकारः । कूटवत् स्थित इति व्युत्पत्तेः । कूटम् = आकाशः । ‘कूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते’ । इत्यभिधानात् । योगी योगं कुर्वन् । युक्तः योगसम्पूर्णः । एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥
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| | verse_line1 = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
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| | verse_line2 = साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| | text =
| |
| स एव च सर्वस्माद् विशिष्यते, साधुपापादिषु समबुद्धिः । जीवचितः परमात्मनः सर्वस्य तन्निमित्तकत्वस्य च सर्वत्रैकरूप्येण । चिद्रूपा एव हि जीवाः । विशेषस्त्वन्तःकरणकृतः । सर्वेषां च साधुत्वादिकं सर्वमीश्वरकृतमेव, स्वतो न किञ्चिदपि । उक्तं चैतत् सर्वम्- ‘स्वतः सर्वेऽपि चिद्रूपाः सर्वदोषविवर्जिताः ।जीवास्तेषां तु ये दोषास्त उपाधिकृता मताः ॥ सर्वं चेश्वरतस्तेषां न किञ्चित् स्वत एव तु । समा एव ह्यतः सर्वे वैषम्यं भ्रान्तिसम्भवम् ॥ एवं समा नृजीवास्तु विशेषो देवतादिषु । स्वाभाविकस्तु नियमादत एव सनातनः (नियमाद्धरेरेव सदा(ना)तनः) ॥असुरादेस्तथा दोषा नित्याः स्वाभाविका अपि । गुणदोषौ मनुष्याणां (मानुषाणां) नित्यौ स्वाभाविकौ मतौ । गुणैकमात्ररूपास्तु देवा एव सदा मताः ॥’ इति ब्राह्मे ।
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| | text =
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| न तु साधुपापादीनां पूजासाम्यम् । तत्र दोषस्मृतेः । ‘समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा । क्रियते येन देवोऽपि स पदाद् भ्रश्यते पुमान् ॥’ इति ब्राह्मे (पाद्मे) । ‘वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।एतानि मान्यस्थानानि गरीयो (यद्यदुत्तरम्) ह्युत्तरोत्तरम् ॥(म.स्मृ.२.१३६) इति मानवे(वामने) । ‘गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः । सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति ।वैषम्यमुत्तमत्वं तु ददाति नरसञ्चयात् । पूजा या विषमा दृष्टिः समा साम्यं विदुःखजम् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । सुहृदादिषु शास्त्रोक्तपूजादिकृतिः अन्यूनाधिका या साऽपि समा। तदप्याह- ‘यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृशत्रुसुतेषु च ।तथा करोति पूजादि समबुद्धिः स उच्यते ॥’ इति गारुडे।
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| }}
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| | text =
| |
| प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत् सुहृत् । क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति स मित्रम् । अरिः वधादिकर्ता(कृत्) । कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स उदासीनः । कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स मध्यमः(स्थः) । अवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) द्वेष्यः । आह चैतत्- ‘द्वेष्योऽवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) कार्यमात्रकारी तु मध्यमः ।प्रियकृत् प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति ।स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत् ।यस्ततः स सुहृत् प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिति(कृत्) ॥’ इति ॥९ ॥
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| | verse_line1 = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
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| | verse_line2 = एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥
| |
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| | verse_line1 = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
| |
| | verse_line2 = नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| |
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| समाधियोगप्रकारमाह - योगी युञ्जीत इत्यादिना ॥ युञ्जीत समाधियोगयुक्तं कुर्यात् । आत्मानं मनः ॥ १०-११ ॥
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| | verse_line1 = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
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| | verse_line2 = उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥
| |
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| | verse_line1 = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
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| | verse_line2 = सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥
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| | verse_line1 = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
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| | verse_line2 = मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥
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| योगं समाधियोगं युञ्ज्यात् ॥ १२-१४ ॥
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| | verse_line1 = युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।
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| | verse_line2 = शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥
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| निर्वाणपरमां शरीरत्यागोत्तरकालीनाम् ॥ १५ ॥
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| | verse_line1 = नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
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| | verse_line2 = न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥
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| अनशनादिनिषेधोऽशक्तस्य । उक्तं हि- ‘निद्राशनभयश्वासचेष्टातन्द्रा(न्द्र्या)दिवर्जनम् ।कृत्वाऽऽनिमीलिताक्षस्तु शक्तो ध्यायन् (प्रसिध्यति) प्रसीदति॥’ इति नारदीये ॥ १६ ॥
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| | verse_line1 = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
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| | verse_line2 = युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥
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| युक्ताहारविहारस्य सोपायाहारादेः । यावता श्रमाद्यभावो भवति तावदाहारादेः इत्यर्थः ॥ १७ ॥
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| | verse_line1 = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
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| | verse_line2 = निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥
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| आत्मनि भगवति ॥ १८ ॥
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| | verse_line1 = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
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| | verse_line2 = योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥
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| आत्मनो योगं भगवद्विषयं योगम् ॥ १९ ॥
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| | verse_line1 = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
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| आत्मना मनसा । आत्मनि देहे । आत्मानं भगवन्तं पश्यन् ॥२०॥
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| तत्त्वतो भगवद्रूपात् ॥ २१ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| दुःखसंयोगो येन वियुज्यते स दुःखसंयोगवियोगः । न केवलमुत्पन्नं दुःखं नाशयति, उत्पत्तिमेव निवारयतीति दर्शयति संयोगशब्देन । निश्चयेन योक्तव्यः योक्तव्य एव (तद्) बुभूषुणेत्यर्थः ॥ २३ ॥
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| | verse_line1 = संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
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| | verse_line2 = मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥
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| सर्वान् सर्वविषयान् । अशेषतः, एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्य इत्यर्थः । मनसैव नियन्तुं शक्यते न अन्येन इति ‘एव’शब्दः ॥ २४ ॥
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| | verse_line1 = शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
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| | verse_line2 = आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥
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| बुद्धेः (क)कारणत्वं मनोनिग्रहे आत्मरमणे च ॥ २५ ॥
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| | verse_line1 = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
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| यतो यतः यत्र यत्र ।‘यतो यतो धावति’(भाग.१०.१.४२) इत्यादिप्रयोगात् । आत्मन्येव वशं नयेत् आत्मविषय एव वशीकुर्यादित्यर्थः ॥ २६ ॥
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| | verse_line1 = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
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| | verse_line1 = एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।
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| पूर्वश्लोकोक्तं प्रपञ्चयति - एवं युञ्जन्निति ॥ २८ ॥
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| | verse_line1 = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि ।
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| ध्येयमाह - सर्वभूतस्थमिति ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं परमेश्वरम् । सर्वभूतानि चाऽत्मनि परमेश्वरे । तं च परमेश्वरं ब्रह्म तृणादौ ऐश्वर्यादिना साम्येन पश्यति । तच्चोक्तम्- ‘आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् ।अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चाऽत्मनि ॥’(भाग.३.२५.४७) इति ।‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।’(१३.२८) इति च ॥२९ ॥
| |
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| | verse_line1 = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
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| | verse_line2 = तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥
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| | text =
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| फलमाह - यो मामिति॥ तस्याहं न प्रणश्यामीति॥ सर्वदा योगक्षेमवहः स्यामित्यर्थः । स च मे न प्रणश्यति सर्वदा मद्भक्तो भवति । सत्यपि स्वामिनि अरक्षति अनाथः, एवं भृत्येऽप्यभजति अभृत्य इति हि प्रसिद्धिः । उक्तं च-‘सर्वदा सर्वभूतेषु समं मां यः प्रपश्यति ।अचला तस्य भक्तिस्स्याद् योगक्षेमवहोप्यहम्’ । इति गारुडे ॥३० ॥
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| | verse_line1 = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
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| एतदेव स्पष्टयति - सर्वभूतस्थितमिति ॥ एकत्वमास्थितः सर्वत्रैक एवेश्वर इति स्थितः । सर्वप्रकारेण वर्तमानोऽपि मय्येव वर्तते । एवमपरोक्षं पश्यतो ज्ञानफलं नियतमित्यर्थः । तथाऽपि प्रायो नाधर्मं करोति । कुर्वतस्तु महच्चेद् दुःखसूचकं भवतीत्युक्तं पुरस्तात्(गी.भा.३.१८) । आह च- ‘कदाचिदपि नाधर्मे बुद्धिर्विष्णुदृशां भवेत् ।प्रमादात्तु कृतं पापं स्वल्पं भस्मीभविष्यति ।आदिराजैः तथा देवैर्ऋषिभिः क्रियते कियत् ।बाहुल्यात् कर्मणस्तेषां दुःखसूचकमेव तत् ॥’ इति ॥३१ ॥
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| | verse_line1 = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
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| साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे - आत्मौपम्येनेति ॥ ३२ ॥
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| | verse_line1 = योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
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| | verse_line2 = एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥
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| | verse_line1 = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
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| | verse_line1 = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
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| | text =
| |
| एतस्य योगस्य स्थिरां स्थितिं न पश्यामि । मनसः चञ्चलत्वात् । उक्तं च -‘मनसश्चञ्चलत्वाद्धि स्थितिर्योगस्य वै स्थिरा । विनाऽभ्यासं न शक्या स्याद् वैराग्याद्वा न संशयः ॥’ इति व्यासयोगे ॥ ३३, ३५ ॥
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| | verse_line1 = असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
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| | text =
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| न च कदाचित् स्वयमेव मनो नियम्यते । ‘शुभेच्छारहितानां च द्वेषिणां च रमापतौ ।नास्तिकानां च वै पुंसां सदा मुक्तिर्न जायते ॥’ इति निषेधाद् ब्राह्मे॥३६ ॥
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| | verse_line1 = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
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| | verse_line2 = अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥
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| अयतिः अप्रयत्नः ॥ ३७ ॥
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| | verse_line1 = कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
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| | verse_line1 = एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
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| | verse_line1 = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
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| | verse_line1 = तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
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| योगस्य जिज्ञासुरपि, ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि । शब्दब्रह्मातिवर्तते परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४४ ॥
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| नैकजन्मनीत्याह - प्रयत्नादिति ॥ जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्नं करोति । एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति । आह च- ‘अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः ।ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान् ।विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन॥’ इति नारदीये ॥४५ ॥
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे समाधियोगप्रपञ्चनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥
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| ज्ञानिभ्यः योगज्ञानिभ्यः । तपस्विभ्यः कृच्छ्रादिचारिभ्यः ।उक्तं च-‘कृच्छ्रादेरपि यज्ञादेर्ध्यानयोगो विशिष्यते ।तत्रापि शेषश्रीब्रह्मशिवादिध्यानतो हरेः ।ध्यानं कोटिगुणं प्रोक्तमधिकं वा मुमुक्षुणाम् ॥’ इति गारुडे ।‘अज्ञात्वा ध्यायिनो ध्यानात् ज्ञानमेव विशिष्यते ।ज्ञात्वा ध्यानं ज्ञानमात्राद् ध्यानादपि तु दर्शनम् ।दर्शनाच्चैव भक्तेश्च न किञ्चित् साधनाधिकम् ॥’ इति नारदीये ॥ ४६, ४७ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीताभाष्ये षष्ठोऽध्यायः ॥
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| [[Category:Bhagavadgitabhashya]] | |