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| == द्वितीयोऽध्यायः ==
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitabhashya#BGB_C02]] |
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| | title = द्वितीयोऽध्यायः
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| | verse_line1 = तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
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| | verse_line2 = विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः॥१ ॥
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| | verse_line1 = कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
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| | verse_line2 = अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥
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| | verse_line1 = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।
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| | verse_line2 = क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥
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| | verse_line1 = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
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| | verse_line2 = इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥
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| | verse_line1 = गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
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| | verse_line2 = हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५ ॥
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| | verse_line1 = न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
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| | verse_line2 = यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥
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| | verse_line1 = कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
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| | verse_line2 = यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥
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| | verse_line1 = न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् ।
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| | verse_line2 = अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥
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| | verse_line1 = एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।
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| | verse_line2 = न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥
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| | verse_line1 = तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
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| | verse_line2 = सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥
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| | verse_line1 = अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
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| | verse_line2 = गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥
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| ( भगवता गीतोपदेशारम्भः )
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| ज्ञानिनो अर्जुनस्येषन्मोहप्रकारनिरूपणम्
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| प्रज्ञावादान् स्वमनीषोत्थवचनानि । कथमशोच्याः? गतासून्॥११ ॥
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| | verse_line1 = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
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| | verse_line2 = न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥
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| ( ईश्वरनित्यत्वसमर्थनम् )
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| किमिति? न त्वेवाहम् ॥ ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद् दृष्टान्तत्वेनाह –न त्वेति ॥ यथाऽहं नित्यः सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धः; एवं त्वमेते जनाधिपाश्च नित्याः ॥ १२ ॥
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| | verse_line1 = देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
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| | verse_line2 = तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| ( देहानित्यत्वे दृष्टान्तः )
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| (देहातिरिक्तात्मसाधनम् )
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| ( देहातिरिक्तात्मसद्भावे अनुभवप्रमाणम् )
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| ( जडस्य, सङ्गात-प्राणादिचैतन्ययोश्च ईक्षितृत्वनिषेधः )
| |
| }}
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| |
| (मनो न ज्ञाता, किन्त्वात्मैव )
| |
| }}
| |
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| |
| (बौद्ध-चार्वाकौ प्रति वेदप्रामाण्यसमर्थनम् )
| |
| }}
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| ( धर्मादिसिद्धावपौरुषेयवाक्यमेव मानम् )
| |
| }}
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| |
| (धर्मादौ सर्वाभिमतिरेव प्रमाणम् )
| |
| }}
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| (अनुमानस्याप्रामाणिकत्वे वाचनिकव्यवहारासिद्धिः )
| |
| }}
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| ( चार्वाकशास्त्रस्य प्रयोजनादिनिराकरणम् )
| |
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| (न पौरुषेयवाक्येण धर्मादिसिद्धिः )
| |
| }}
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| (मरणे शोकः न कार्यः )
| |
| }}
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| |
| | text =
| |
| देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- देहिनोऽस्मिन् ॥ यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् ।
| |
| }}
| |
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| | text =
| |
| न हि जडस्य शरीरस्य कौमाराद्यनुभवः सम्भवति, मृतस्यादर्शनात् । मृतस्य वाय्वाद्यपगमाद् अनुभवाभावः, ‘अहं मनुष्यः’ इत्याद्यनुभवाच्चैतत् सिद्धमिति चेद्, न । सत्येवाविशेषे देहे सुप्त्यादौ ज्ञानादिविशेषादर्शनात् ।
| |
| }}
| |
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| |
| समश्चाभिमानो मनसि । काष्ठादिवच्च ।
| |
| }}
| |
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| | text =
| |
| श्रुतेश्च । प्रामाण्यं च प्रत्यक्षादिवत् । न च बौद्धादिवत् । अपौरुषेयत्वात्। न ह्यपौरुषेये पौरुषेयाज्ञानादयः कल्पयितुं शक्याः । विना च कस्यचिद् वाक्यस्यापौरुषेयत्वं सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धिः । यश्च तौ नाङ्गीकुरुते नासौ समयी, अप्रयोजकत्वात् ।
| |
| }}
| |
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| |
| माऽस्तु धर्मोऽनिरूप्यत्वाद् इति चेद्, न । सर्वाभिमतस्य प्रमाणं विना निषेद्धुमशक्यत्वात् । न च सिद्धिरप्रामाणिकस्येति चेत् - न । सर्वाभिमतेरेव प्रमाणत्वात् ।
| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| अन्यथा सर्ववाचिकव्यवहारासिद्धेश्च । न च ‘मया श्रुतम्’ इति तव ज्ञातुं शक्यम् । अन्यथा वा प्रत्युत्तरं स्यात् । भ्रान्तिर्वा तव स्यात् ।
| |
| }}
| |
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| सर्वदुःखकारणत्वं वा स्यात् । एको वाऽन्यथा स्यात् ।
| |
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| रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य कर्तुरज्ञानादिदोषशङ्का स्यात् । न चादोषत्वं स्ववाक्येनैव सिध्यति ।
| |
| }}
| |
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| न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
| |
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| |
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| |
| अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह –न त्वेवेति ॥
| |
| }}
| |
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| नापि देहनाशमित्याह – देहिन इति ॥ यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
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| | verse_line2 = आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitabhashya
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| }}
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| |
| ( सुखदुःखादौ मनसो विषयसम्बन्ध एव कारणम् )
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| ( आत्मनो विषयेन्द्रियसन्निकर्षमात्रेण दुःखादिर्नास्ति )
| |
| }}
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| ( अभिमान एव सुखदुःखादिकारणम् )
| |
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| (आत्मनः सुखादीनां च विषयविषयिभावसम्बन्धः )
| |
| }}
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| ( द्विविधम् आगमापायित्वम् )
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| }}
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| |
| ( देहाद्यात्मभ्रम एव दुःखकारणम् )
| |
| }}
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| |
| तथाऽपि तद्दर्शनाभावादिना शोक इति चेद्? नेत्याह – मात्रास्पर्शा इति ॥ मीयन्त इति मात्राः = विषयाः, तेषां स्पर्शाः = सम्बन्धाः । त एव शीतोष्णसुखदुःखदाः। देहे शीतोष्णादिसम्बन्धाद्धि शीतोष्णाद्यनुभव आत्मनः। ततश्च सुखदुःखे । नह्यात्मनः स्वतो दुःखादिः सम्भवति । कुतः? आगमापायित्वात् । यद्यात्मनः स्वतः स्युः सुप्तावपि स्युः । अतो ‘यतो मात्रास्पर्शा जाग्रदादावेव ते सन्ति; नान्यदा’ इति तदन्वयव्यतिरेकित्वात् तन्निमित्ता एव, नात्मनः स्वतः ।
| |
| }}
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| |
| आत्मनश्च तैर्विषयविषयिभावसम्बन्धाद् अन्यः सम्बन्धो नास्ति । न चाऽगमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणापि नित्यत्वमस्ति । सुप्तिप्रलयादावभावाद् इत्याह – अनित्या इति ॥
| |
| }}
| |
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| | text =
| |
| अत आत्मनो देहाद्यात्मभ्रम एव सुखदुःखकारणम् । अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं न संभवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य तान् शीतोष्णादीन् तितिक्षस्व ॥ १४ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
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| |
| अतः प्रयोजनमाह – यं हीति ॥ यम् एते मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति। पुरि शयमेव सन्तम् । शरीरसम्बन्धाभावे सर्वेषामपि व्यथाभावात् पुरुषम् इति विशेषणम् । कथं न व्यथयन्ति? समदुःखसुखत्वात् । तत् कथम् ? धैर्येण ॥ १५ ॥
| |
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| | verse_line1 = नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
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| |
| ‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – नासत इति ॥ असतः कारणस्य सतः ब्रह्मणश्च अभावो न विद्यते।
| |
| }}
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| |
| ‘प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।’ इति वचनात् श्रीविष्णुपुराणे । पृथग् ‘विद्यते’ इत्यादरार्थः ॥
| |
| }}
| |
| | |
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| | id = BGB_C02_V16_B03
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| असतः कारणत्वं च – ‘सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः’ (भाग.१.२.३१) इति भागवते । ‘असतः सदजायत’ (ऋ.१०.७२.२) इति च । अव्यक्तेश्च । सम्प्रदायतश्चैतत् सिद्धम् इत्याह – उभयोरपीति ॥ अन्तो निर्णयः॥१६ ॥
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| | verse_line1 = अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
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| | verse_line2 = विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥
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| किं बहुना ! यद् देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव, वेदाद्यन्यदपीत्याह – अविनाशीति ॥ नापि शापादिना विनाश इत्याह – विनाशमिति ॥ अव्ययं च तद् ॥ १७ ॥
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| | verse_line1 = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
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| ( देहः अनित्यः )
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| ( द्विविधोपाधिविचारः )
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| |
| भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वम् इति । नेत्याह – अन्तवन्त इति ॥अस्तु तर्हि दर्पणनाशात् प्रतिबिम्बनाशवत् आत्मनाशः ? इत्यत आह – नित्यस्येति ॥ ‘शरीरिणः’ इति ईश्वरव्यावृत्तये । न च नैमित्तिकनाश इत्याह – अनाशिन इति ॥ कुतः ? अप्रमेयेश्वरसरूपत्वात् । न ह्युपाधिबिम्बसन्निध्यनाशे प्रतिबिम्बनाशः, सति च प्रदर्शके । स्वयमेवात्र प्रदर्शकः, चित्त्वात् । नित्यश्चोपाधिः कश्चिदस्ति ॥
| |
| }}
| |
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| |
| ‘प्रतिपत्तौ विमोक्षस्य नित्योपाध्या स्वरूपया । चिद्रूपया युतो जीवः केशवप्रतिबिम्बकः ॥’ इति भगवद्वचनात् ॥१८ ॥
| |
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| | verse_line1 = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
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| | verse_line2 = उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥
| |
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| ( आत्मनाशव्यवहारः भ्रान्तिमूलः )
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| ( प्रतिबिम्बस्य न स्वतः क्रिया )
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| व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह – य एनमिति ॥ कुतः? उक्तहेतुभ्यो नायं हन्ति, न हन्यते ।
| |
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| | text =
| |
| न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया । स हि बिम्बक्रिययैव क्रियावान् ।‘ध्यायतीव’ (बृ.उ.६.३.७) इति श्रुतेश्च ॥ १९ ॥
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| | verse_line1 = न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
| |
| | verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥
| |
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| }}
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| ( जीवनित्यत्वे मन्त्रवर्णः )
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| | text =
| |
| अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – न जायत इति ॥ न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – ‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३) । ‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः ।अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् ।
| |
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| |
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| | text =
| |
| कुतः? अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात् । शाश्वतः सदैकरूपः । पुरं = देहम् अणतीति पुराणः। तथाऽपि न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥२० ॥
| |
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| | verse_line1 = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
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| | verse_line2 = कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥
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| |
| अतो य एवं वेद स कथं कं घातयति, हन्ति वा ? अविनाशिनं नैमित्तिकनाशरहितम् । नित्यं स्वाभाविकनाशरहितम् । अथवा- अविनाशिनं दोषयोगरहितम्, नित्यं सदा भाविनम् इति सर्वत्र विवेकः । दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात् ॥ २१ ॥
| |
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| | verse_line1 = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
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| | verse_line2 = तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥
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| देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह – वासांसीति ॥ २२ ॥
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| | verse_line1 = नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
| |
| | verse_line2 = नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥
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| }}
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| ( विशेषनिमित्तैरपि जीवो न विनश्यति )
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| स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिद् निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदवत्, इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति – नैनमिति ॥२३ ॥
| |
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| | verse_line1 = अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
| |
| | verse_line2 = नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥
| |
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| ( आत्मनो छेदादियोग्यतैव नास्ति )
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| (अंशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तविचारः )
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| (भगवति कर्तृत्वस्थाणुत्वयोरविरोधसमर्थनम्)
| |
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| ( मोक्षो महापुरुषार्थः )
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| ( मोक्षो विष्णुप्रसादैकसाध्यः )
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| (सर्वागमानां भगवद्गुणोत्कर्षे महातात्पर्यम् )
| |
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| |
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| |
| ( भगवत इन्द्रादीनां च विद्यमानाऽन्तर्यवर्णनम्)
| |
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| |
| | |
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| ( वेदव्याख्या इतिहासानुरोधेन कर्तव्या )
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| |
| | |
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| |
| (ईश्वरधर्मा न मायामयाः )
| |
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| |
| | |
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| | text =
| |
| वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – अच्छेद्य इति ॥ वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । ‘शाश्वतः’ इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे ।
| |
| }}
| |
| | |
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| |
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| |
| | text =
| |
| तत्ता च -‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.६.४७.१८), ‘आभास एव च’ ( ब्र.सू.२.३.५०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धा । न चांशत्वविरोधः । तस्यैवांशत्वात् । न चैकरूपैवांशता । प्रमाणं चोभयविधवचनमेव । न चांशस्य प्रतिबिम्बत्वं कल्प्यम्, गाध्यादिष्वपि अंशबाहुरूप्यदृष्टेः, इतरत्रादृष्टेः ।
| |
| स्थाणुत्वेऽपि ‘ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३) इत्याद्यविरुद्धम् ईश्वरस्य । उभयविधवाक्याद् , अचिन्त्यशक्तेश्च । न च माययैकम् । ‘त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते’ (भाग.१०.४.१९), ‘न योगित्वाद् ईश्वरत्वाद्’ (बृ.उ.भा.५.८.१२.उ. वाराहवचनम् ), ‘चित्रं न चैतत् त्वयि कार्यकारणे’ (भाग. ५.१८.५.) इत्याद्यैश्वर्येणैव विरुद्धधर्माविरोधोक्तेः ।
| |
| }}
| |
| | |
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| |
| महातात्पर्याच्च । मोक्षो हि महापुरुषार्थः। ‘तत्रापि मोक्ष एवार्थः’ । ‘अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे ।अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमन्तयोः ॥’(म.भा.१२.३१७.३४) ‘पुण्यचितो लोकः क्षीयते’"(छा.उ. ८.१.६) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स च विष्णुप्रसादादेव सिध्यति ।‘वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्नुयात्।’(विष्णु.१.४.१८), ‘तुष्टे तु तत्र किमलभ्यमनन्त ईशे’ (भाग.७.६.२५),‘तत्प्रसादाद् अवाप्नोति परां सिद्धिं न संशयः।’, ‘येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः सर्वात्मना श्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् ।ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥’ (भाग.२. ७ .४२),‘तस्मिन् प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते’‘ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवाः तापत्रयेणोपहता न शर्म ।आत्मन् लभन्ते भगवन् तवाङ्घ्रिच्छायांशविद्यामत आश्रयेम॥’ (भाग.३.६.१८), ‘ऋते भवत्प्रसादाद्धि कस्य मोक्षो भवेदिह ।’‘तमेवं विद्वान्.....’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स चोत्कर्षज्ञानादेव भवति । लोकप्रसिद्धेः । लोकसिद्धमविरुद्धम् अत्राप्यङ्गीकार्यम् ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
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| |
| | text =
| |
| ‘अहल्याजारत्वाद्यपि दोषकृतोऽपि ते बहुतरो लेपो नासीद्’ इत्युत्कर्षमेव वक्ति । बहुनरकफलो ह्यसौ । ‘तस्य न लोम च न क्षीयते(मीयते)’(कौ.उ.३.२) इति श्रुत्यन्तराच्च । ‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्’ (१५.१९) इति तदुक्तेश्च ।
| |
| }}
| |
| | |
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| |
| ‘सत्यं सत्यं पुनस्सत्यं शपथैश्चापि कोटिभिः । विष्णुमाहात्म्यलेशस्य विभक्तस्य च कोटिधा ॥ पुनश्चानन्तधा तस्य पुनश्चापि ह्यनन्तधा ।नैकांशसममाहात्म्याः श्रीशेषब्रह्मशङ्कराः ॥’ इति नारदीये । अन्योत्कर्ष ऐक्यं च -‘तथैव सर्वशास्त्रेषु महाभारतमुत्तमम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत् ॥’(वि.पु.३.४.५) इत्यादिग्रन्थान्तरसिद्धोत्कर्षमहाभारतविरुद्धम् । तत्र हि -‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥’(म.भा.१.१.१८),‘यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ।’ (म.भा.१२.३४१.१२),‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः’ (११.४३) इत्यादिषु साधारणप्रश्नावसर एव महान्तम् उत्कर्षं विष्णोर्वक्ति । अन्यत्र यत्किञ्चिदुक्तावप्यसाधारण एवावसरे । तद्धि अग्न्यादेरपि वेदादावस्ति- ‘त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः’ (ऋ.२.१.३), ‘विश्वस्माद् इन्द्र उत्तरः’(ऋ.१०.८६.१) इत्यादिषु ।
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_id = BGB_C02_V24
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| | id = BGB_C02_V24_B06
| |
| | text =
| |
| तद्ग्रन्थविरोधाच्च । तथा हि स्कान्दे शैवे -‘यदन्तरं व्याघ्रहरीन्द्रयोर्वने यदन्तरं मेरुगिरीन्द्रविन्ध्ययोः ।यदन्तरं सूर्यसुरेड्यबिम्बयोस्तदन्तरं रुद्रमहेन्द्रयोरपि ॥यदन्तरं सिंहगजेन्द्रयोर्वने यदन्तरं सूर्यशशाङ्कयोर्दिवि ।यदन्तरं जाह्नविसूर्यकन्ययोः तदन्तरं ब्रह्मगिरीशयोरपि ॥यदन्तरं प्रलयजवारिविप्लुषोः यदन्तरं स्तम्बहिरण्यगर्भयोः ।स्फुलिङ्गसंवर्तकयोर्यदन्तरं तदन्तरं विष्णुहिरण्यगर्भयोः ॥अनन्तत्वान्महाविष्णोस्तदन्तरमनन्तकम् ।माहात्म्यसूचनार्थाय ह्युदारणमीरितम् ॥तत्समो ह्यधिको वाऽपि नास्ति कश्चित् कदाचन ।एतेन सत्यवाक्येन तमेव प्रविशाम्यहम् ॥’ इत्याद्याह । तत्रैव शिवं प्रति मार्कण्डेयवचनम् - ‘संसारार्णवनिर्मग्न इदानीं मुक्तिमेष्यसि।’ इत्यादि ।पाद्मे शैवे मार्कण्डेयकथाप्रबन्धे शिवान्निषिध्य विष्णोरेव मुक्तिमाह - ‘अहं भोगप्रदो वत्स मोक्षदस्तु जनार्दनः’ इत्यादि । समब्राह्मविरोधाच्च ।वेदश्च इतिहासाद्यविरोधेन योज्यः । ‘यदि विद्याद्’ इति वचनात् । अनिर्णयाच्चेन्द्रादिशङ्कयाऽन्यथा । तत्रापीष्टसिद्धिः । नामवैशेष्यात् । अतो भगवदुत्कर्ष एव सर्वागमानां महातात्पर्यम् ।
| |
| }}
| |
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| | verse_id = BGB_C02_V24
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| | id = BGB_C02_V24_B07
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| | text =
| |
| तथाऽपि स्वतः प्रामाण्यात् सन्नेवोच्यते । अविरोधात् । न च प्रमाणसिद्ध(दृष्ट)स्यान्यत्रादृष्ट्याऽपह्नवो युक्तः । धर्मवैचित्र्याद् अर्थानाम् । स्वतः प्रामाण्यानङ्गीकारे मानोक्तावप्यदोषत्वं च साधयेद् इत्यतिप्रसङ्गः ।अनन्यापेक्षया च तत्परत्वं सिद्धमागमानाम् । ‘नारायणपरा वेदाः’ (भाग.२.५.१५), ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ (कठ.२.१५), ‘वासुदेवपरा वेदाः’ (भाग.१.२.२९)इति । न चैतद् विरुद्धम् । ईश्वरनियमात् । अनादौ च तत् सिद्धं ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’ ( भाग.२.१०.१२)इत्यादौ । प्रयोजकत्वं तु पूर्वोक्तन्यायेन । अतः सिद्धमेतत् ।तच्चानन्यापेक्षा अचिन्त्यशक्तित्व एव युक्तम् । अतो न मायामयमेकम् ।
| |
| }}
| |
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| | text =
| |
| अचलत्वं तु ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’(म.भा.१२.१९१.८), ‘अदुःखमसुखम्’(म.भा.१२.२५६.२१), ‘(न)अप्रज्ञम्’ (माण्डूक-२.१), ‘असद्वा’ (तै.उ.२.७) इत्यादिवत् । क्रियादृष्टेः ।‘तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः’ (भाग.६.४.४६) इत्याद्युक्तेः । अतश्च न मायामयं सर्वम् । ऐश्वर्यादिवाचिभगशब्देनैव सम्बोधनाच्च ‘तं त्वा भग’( तै. उ.१.४) इत्यादौ । स्वरूपत्वान्न मायामयत्वं युक्तम् । ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’ ( भाग.३.१०.२४), ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’ (भाग.६.४.४८), ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’ ( श्वे.उ.६.८) इत्यादिवचनात् ॥२४ ॥
| |
| }}
| |
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| अत एवाव्यक्तादिरूपः ॥ २५ ॥
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| अस्त्वेवम् आत्मनो नित्यत्वम्; तथाऽपि देहसंयोगवियोगात्मक-जनिमृती स्त एव? इत्यत आह – अथ चेति ॥२६ ॥
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| | verse_line1 = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
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| कुतोऽशोकः ? नियतत्वादित्याह – जातस्येति ॥२७ ॥
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| तदेव स्पष्टयति – अव्यक्तादीनीति ॥ २८ ॥
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| | verse_line1 = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-
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| |
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| ‘देहयोगवियोगस्य नियतत्वाद्, आत्मनश्चेश्वरसरूपत्वात्, सर्वथाऽनाशाद् न शोकः कार्यः’ इत्युपसंहर्तुम् ऐश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति – आश्चर्यवदिति ॥ दुर्लभत्वेनेत्यर्थः । तद्धि आश्चर्यं लोके । दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चाऽऽत्मनस्तद्द्रष्टा॥२९-३० ॥
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| | verse_line1 = स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि ।
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| | verse_line1 = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् ।
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| | verse_line1 = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
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| | verse_line1 = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
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| | verse_line1 = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
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| | verse_line1 = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
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| | verse_line1 = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
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| | verse_line1 = सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
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| | verse_line1 = एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
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| | verse_line1 = नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
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| साङ्ख्यम् ज्ञानम् । ‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’ इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । योग उपायः । ‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३)इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति बुद्धिः । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् अभिहिता इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥
| |
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| | verse_line1 = व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
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| |
| ‘योग इमां बुद्धिं शृणु’ इत्युक्तम्; बह्व्यो हि बुद्धयो मतभेदात्; तत् कथम् एकत्र निष्ठां करोमि ? इत्यत आह – व्यवसायात्मिकेति ॥ सम्यग् युक्तिनिर्णीतानां मतानाम् ऐक्यमेव इत्यर्थः ॥ ४१ ॥
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| | verse_line1 = यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
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| | verse_line1 = कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
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| | verse_line2 = व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥
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| | text =
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| स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – यामिमामिति ॥ ‘यामाहुस्तया’ इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति। वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः; वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः । नान्यदस्तीति वादिनः । >,‘परोक्षविषया वेदाः’,‘परोक्षप्रिया इव हि देवाः’(ऐ.उ.३.१४), ‘मां विधत्तेऽभिधत्ते’(भाग.११.२१.४३) इत्यादिभिः पारोक्ष्येण हि प्रायो भगवन्तं वदन्ति । भोगैश्वर्यगतिं प्रति तत्प्राप्तिं प्रति । तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः । तेषां सम्यग् युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः समाधौ समाध्यर्थे न विधीयते । सम्यङ् निर्णीतार्थानां हीश्वरे मनःसमाधानं सम्यग् भवति । तद्धि मोक्षसाधनम् । उक्तं चैतदन्यत्र– >, ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३) इति ॥ ४२-४४ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
| |
| | verse_line2 = निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥
| |
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| }}
| |
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| |
| तां योगबुद्धिमाह - त्रैगुण्यविषया इत्यादिना इतरद् अपोद्य । वेदानां परोक्षार्थत्वात् त्रिगुणसम्बन्धि स्वर्गादि प्रतीतितोऽर्थ इव भाति (भवति) । ‘परोक्षवादी वेदोऽयम्’ इति ह्युक्तम् । अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुरु इत्यर्थः । ‘वादो विषयकत्वं (विषयकृत्त्वं) च मुखतो वचनं स्मृतम् ।’ इत्यभिधानम् । न तु वेदपक्षो निषिध्यते । ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते॥’(कल्कि.३५.३२), ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति.......।’(कठ.१.२.१५), ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥’(मनु.२.६), ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।(भाग.६.१.४०)’ इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेः । तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मत्वोक्तेः ॥ ४५ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
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| | verse_line2 = तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥
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| |
| तथाऽपि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेव? इत्यत आह – यावानर्थ इति ॥ यथा यावान् अर्थः प्रयोजनम् उदपाने कूपे भवति, तावान् सर्वतः सम्प्लुतोदके अन्तर्भवत्येव, एवं सर्वेषु वेदेषु यत् फलं तद् विजानतोऽपि ज्ञानिनो ब्राह्मणस्य फलेऽन्तर्भवति । ‘ब्रह्म अणति’ इति ब्राह्मणः =अपरोक्षज्ञानी । स हि ब्रह्म गच्छति । ‘विजानतः’ इति ज्ञानफलत्वं तस्य दर्शयति ॥ ४६ ॥
| |
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| | verse_line1 = कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
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| | verse_line2 = मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥
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| |
| कामात्मनां निन्दा कृता कथमेषाम् ? ‘स्वर्गकामो यजेत’इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वाद् इत्यत आह - कर्मण्येवेति ॥ ‘ते’ इत्युपलक्षणार्थम् । तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता; किम्वन्येषाम् ! न ‘त्वस्ति केषाञ्चिद्, न तेऽस्ति’ इति । स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च । मोहादिस्त्वभिभवादेः । यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानम्, क्व अन्येषाम् ? उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम् । ‘....पार्थार्ष्टिषेण....।’(भाग.२.७.४५)इत्यादिज्ञानिगणनाच्च । कामनिषेध एवात्र । फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति । न हि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतोऽपि भवन्ति । भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽपि अविरोधे ।
| |
| }}
| |
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| | text =
| |
| अतः कर्माकरणे एव प्रत्यवायः, न तु ज्ञानादिनाऽकामनया वा फलाप्राप्तौ । अतः कर्मण्येवाधिकारः । अतस्तदेव कार्यम्; न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः । कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम्- ‘रोचनार्थं फलश्रुतिः’(भाग.११.३.४७), ‘यथा भैषज्यरोचनम्’(भाग.११.२१.२३) इत्यादौ भागवते । अत एव ‘कामी यजेत’ इत्यर्थः; न तु ‘कामी भूत्वा’ इत्यर्थः । ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं च’(मनु.१२.८९) इति वचनात्, वक्ष्यमाणेभ्यश्च । ‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादिभ्यश्च । अतो मा कर्मफलहेतुर्भूः । कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः, स मा भूः । तर्हि न करोमि? इत्यत आह– मा त इति ॥ कर्माकरणे च स्नेहो माऽस्त्वित्यर्थः । अन्य(था)फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात् । इच्छा च तस्य युक्ता ‘वृणीमहे ते परितोषणाय’(भाग.४.३०.४०) इत्यादिमहदाचारात् । अनिन्दनात्, विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्– ‘सर्वान् आनय, नैकं मैत्रम्’ इत्यादौ । अतः - ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिद्.....’(भाग.३.२६.३४), ‘भक्तिमन्विच्छन्तः’, ‘ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र,सू.१.१.१), ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत.....’,(बृ.उ.६.४.२१), ‘द्रष्टव्यः.....’ इत्यादिवचनेभ्यः, स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः, ‘किं ददामि’ इत्युक्ते सेवादियाचकं प्रति बहुतरः स्नेह इति लौकिकन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिप्रार्थना कार्येति सिद्धम् ॥४७ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
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| | verse_line2 = सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥
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| }}
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| |
| पूर्वश्लोकोक्तं स्पष्टयति – योगस्थ इति ॥ योगस्थः उपायस्थः । सङ्गं फलस्नेहं त्यक्त्वा । तत एव सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा । स एव च मयोक्तो योगः ॥ ४८ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय ।
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| | verse_line2 = बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥
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| इतश्च योगाय युज्यस्व इत्याह – दूरेणेति ॥ बुद्धियोगाद् ज्ञानलक्षणाद् उपायाद् । दूरेण अतीव । अतो बुद्धौ शरणं ज्ञाने स्थितिम् । फलं कर्मकृतौ हेतुर्येषां ते फलहेतवः ॥ ४९ ॥
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| |
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| | verse_line1 = बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
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| ज्ञानफलमाह – बुद्धियुक्त इति ॥ सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति, न बृहत्फलमपि उपासनादिनिमित्तम् । ‘न हास्य (न तस्य)कर्म क्षीयते’(बृ.१.४.१५) , ‘अविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद् भवति’(बृ.३.८.१०)इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र । उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया । नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित् प्रयोजनम् । न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः । इष्टाश्च केचिद्विषयाः - ‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छां.उ.८.२.१), ‘प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम्’(छां.उ.८.४.१),‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’(छां.उ.८.१२.३), ‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृह. १.४.१५), ‘कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन्’(तै.उ. ३.१०.५),‘स एकधा भवति’(छां.उ.७.२६.२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात् कर्मसुखे न विरोधः । अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् । श्रुतेश्च । न च शरीरपातात् पूर्वमेतत् - ‘स तत्र पर्येति’(छां.८.१२.३), ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य’(तै.उ. ३.१०.५) इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात् ।
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| न चैकीभूत एव ब्रह्मणा सः । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने (परे ज्ञाने) किं नु दुःखतरं भवेत्’(म.भा.१२.२९०.७९) इत्यादिनिन्दनाद् मोक्षधर्मे । परिहारे पृथग् भोगाभिधानाच्च । शुकादीनां पृथग्दृष्टेश्च । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७)इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तेश्च । ‘इदं ज्ञानमु(म)पाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः’(१४.२) इति च । उपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य । न चैकीभूतस्य पृथग्ज्ञाने मानं पश्यामः । ‘आसं दुःखी, नाऽसम्’ इति ज्ञानविरोधाच्चेश्वरस्य । अनेन रूपेणेति च । भेदाभावात् ।
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| न च प्रतिबिम्बस्य बिम्बैक्यं लोके पश्यामः । उपाधिनाशे मानं वा । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने’ इति दुःखात्मकत्वोक्तेश्च । ‘यावदात्मभावित्वाद्’ इत्युपाधिनित्यताभिधानाच्च। अतोऽन्यवचनं प्रतीयमानमप्यौपचारिकम् ।
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| दृष्टाश्च ते भगवतो भिन्ना नारदेन । प्रतिशाखं च ‘स एकधा’(छा.उ.७.२६.८) इत्यादिषु भेदेन प्रतीयन्ते । विरोधे तु युक्तिमतामेव बलवत्त्वम् । युक्तयश्चात्रोक्ताः - ‘मग्नस्य हि’ इत्यादयः। अतो जले जलैकीभाववत् एकीभावः । उक्तं च - ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धम्’(कठ.उ.२.१.१५), ‘यथा नद्यः’(आथ.उ.३.२.८) इत्यादौ । तत्राऽप्यन्योन्यात्मकत्वे वृद्ध्यसम्भवः । अस्ति चेषत् समुद्रेऽपि द्वारि । महत्त्वाद् अन्यत्रादृष्टिः । ‘ता एवापो ददौ तस्य स ऋषिः शंसितव्रतः’ इति महाकौर्मे समर्थानां भेदज्ञानाच्च । ‘नैव तत् प्राप्नुवन्त्येते ब्रह्मेशानादयः सुराः । यत् ते पदं हि कैवल्यम्’ इति निषेधाच्च, नारदीये । सविचारश्च निर्णयः कृतो मोक्षधर्मेषु । बलवांश्च सविचारो निर्णयो वाक्यमात्रात् । अतो ‘यत्र नान्यत् पश्यति’(छां.७.२४.१) इत्याद्यपि तदधीनसत्तादिवाचि । अन्यथा कथम् ऐश्वर्यादि स्यात्? न च तन्मायामयम् इत्युक्तम् । अन्यथा कथं तत्रैव‘स एकधा’(छां.७.२६.२)इत्यादि ब्रूयात् ।
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| न च –‘न वै सशरीरस्य....’(छां.८.१२.१)इत्यादिविरोधः । वैलक्षण्यात् तच्छरीराणाम् । अभौतिकानि हि तानि नित्योपाधिविनिर्मितानीश्वरशक्त्या । तथाचोक्तम्– ‘शरीरं जायते तेषां षोडश्या कलयैव तु’ इत्यादि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । वदन्ति च लौकिकवैलक्षण्येऽभावशब्दम्- ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’, ‘सुखदुःखबाह्यः’ इत्यादिषु । निरुक्त्यभावाच्च न तानि शरीराणि । तथा हि श्रुतिः - ‘अशारीतीँ.... तच्छरीरमभवद्’इति । न हि तानि शीर्णानि भवन्ति । ‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते’(१४.२) इत्यादिवचनात् । साम्यात् प्रयोगः । प्रयोगाच्च - ‘अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः’(कुम्भ-म.भा.१२.३३६.२९), ‘देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम्’(भाग.७.१.३४) इत्यादि दृष्टदेहेष्वेव ।
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| न चैषाऽन्या गौणी मुक्तिः ।‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।योगी तावन्न मुक्तः स्याद् एष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इत्यादित्यपुराणे तदन्यमुक्तिनिषेधात् ।ये त्वत्रैव भगवन्तं प्रविशन्ति तेऽपि पश्चात् तत्रैव यान्ति । योग्यत्वं चात्र विवक्षितम् । युधिष्ठिरप्रश्न इतरनिन्दनाच्च । सायुज्यं च ग्रहवत् । तदुक्तेश्च - ‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । तथा मुक्तावुत्तमायां बाह्यान् भोगांस्तु भुञ्जते ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतोऽनिष्टस्यैव वियोगः ।
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| सोऽस्त्येव सर्वात्मना– ‘अदुःखम्’, ‘सर्वदुःखविवर्जिताः’, ‘अशोकमहिमम्’,‘यत्र गत्वा न शोचति’(ब्राह्म.२३७.११) इत्यादिभ्यः । विशेषवचनाभावाच्च । येषां त्वीषद् दृश्यते ते न सायुज्यं प्राप्ताः । सामीप्याद्येव तेषाम् । अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात् तद् भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति । तच्चोक्तम्- ‘सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकाराद् अनन्तरम् ।प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति व्यासयोगे । अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः । ‘परब्रह्मत्वमिच्छामि परमात्मन् (परब्रह्मन्)जनार्दन’। इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात् । ‘न मोक्षसदृशं किञ्चिद् अधिकं वा सुखं क्वचित् । ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् ॥’ इत्यादेश्च ब्रह्मादिपदादपि अधिकतमं सुखं च मोक्ष इति सिद्धम् । अतो योगाय युज्यस्व । ज्ञानोपायाय । तद्धि कर्मकौशलम् ॥ ५० ॥
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| | verse_line1 = कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
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| तदुपायमाह -कर्मजमिति ॥ कर्मजं फलं त्यक्त्वा, अकामनया ईश्वराय समर्प्य, बुद्धियुक्ताः सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा पदं गच्छन्ति । सयोगकर्म ज्ञानसाधनम् ; तन्मोक्षसाधनमिति भावः ॥ ५१ ॥
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| | verse_line1 = यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
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| कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- यदेति ॥ निर्वेदं नितरां लाभम् । प्रयोगात् - ‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१) इत्यादि ।न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति ।‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे ।कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’ इति वचनात् ।अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्-‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०) इत्यादिवचनात् ।तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् ।
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| तारतम्याधिगतेश्च । तथा हि- यदि तारतम्यं न स्यात्, ‘नाऽत्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादम्’(भाग.३.१६.४८), ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचित्’(भाग.३.२६.३४), ‘एकत्व(मित्युत)मप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति’(भाग.३.३०.१३) इति मुक्तिमप्यनिच्छतामपि मोक्ष एव फलम्, तमिच्छतामपि स (एव) भवति सुप्रतीकादीनामिति कथम् अनिच्छतां स्तुतिरुपपन्ना स्यात् ? वचनाच्च‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृश्यते पुरुषोत्तमे ।तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने ॥योगिनां भिन्नलिङ्गानाम् आविर्भूतस्वरूपिणाम् ।प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि ॥’ इति (इत्याद्युक्तेः )।‘न त्वाम् अतिशयिष्यन्ति मुक्तावपि कथञ्चन ।मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वान् अतिशयिष्यसि ॥’ इति च ।साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम्, दुःखाभावविषयं च । तच्चोक्तम्-‘दुःखाभावः परानन्दो लिङ्गभेदः समा(मो) मताः(तः) ।तथाऽपि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते ॥’इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे ।अतो न वैराग्यं श्रुतादौ अत्र विवक्षितम् । न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद् विद्यमान इतरत्र प्रयोगे । महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः ॥५२ ॥
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| | verse_line1 = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥
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| | verse_line2 = समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥
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| तदेव स्पष्टयति - श्रुतिविप्रतिपन्नेति ॥ पूर्वं श्रुतिभिः= वेदैर्विप्रतिपन्ना= विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि निश्चला भवति; ततश्च समाधावचला, ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्; तदा योगमवाप्स्यसि उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ॥ ५३ ॥
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| | verse_line1 = स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
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| स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति भाषा, लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - समाधिस्थस्येति ॥ कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् । ‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च ।सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ इति वचनान्तराच्च ।किमासीत ? किं प्रत्यासीत ? न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम् -‘जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव हि ।तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये ।न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’ इति वचनात् ॥५४ ॥
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| | verse_line1 = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
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| | verse_line2 = आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥
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| गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति ‘या निशा’ इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - प्रजहातीति ॥ एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् कामान् प्रजहाति । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । ‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्- ‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’ इति । अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् ।
| |
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| न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । ‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् । ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’ इति स्मृतेः । मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति -मनोगतानिति ॥ विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । आत्मना परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति ।‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः । देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’ इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥
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| तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः । एतान्येव ज्ञानोपायानि च । तच्चोक्तम् - ‘तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत्तु लक्षणम् ।’ इति । शोभनाध्यासो रागः ।‘रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास उच्यते ।’ इत्यभिधानम् ॥५६ ॥
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| | verse_line1 = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।
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| | verse_line1 = यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
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| सर्वत्रानभिस्नेहत्वात् शुभाशुभं प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि ॥५७, ५८॥
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| न चैतल्लक्षणं ज्ञानम् अयत्नतोऽपि भवतीत्याहोत्तर(त्तरैः)श्लोकैः । निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति । इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा । रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते । स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह - विषया इति ॥
| |
| ‘इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः ।वर्जयित्वा तु रसनाम् असौ रस्ये च वर्धते’॥(भाग.११.८.१९) इति वचनाद् भागवते । रसशब्दस्य रागवाचकत्वाच्च ॥५९ ॥
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| अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्ति इन्द्रियाणि । पुरुषस्य शरीराभिमानिनः । को दोषस्ततः ? प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि पुरुषस्य ॥ ६० ॥
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| | verse_line1 = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
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| | verse_line2 = वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥
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| तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह - तानीति ॥ बहुयत्नवतः शक्यानि । अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः । युक्तो मयि मनोयुक्तः । अहमेव परः= सर्वस्माद् उत्कृष्टो यस्य स मत्परः । फलमाह - वशे हीति ॥६१॥
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| रागादिदोषकारणमाह परिहाराय श्लोकद्वयेन
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| | verse_line1 = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
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| | verse_line2 = सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥
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| | verse_line1 = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।
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| | verse_line2 = स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥
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| | text =
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| सम्मोहः अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - ‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’ इति । तथा चान्यत्र - ‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’ इति । स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् -‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा ।दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’ इति ॥ ६२, ६३ ॥
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| | |
| इन्द्रियजयफलमाहोत्तराभ्यां श्लोकाभ्याम् ।
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| | verse_line1 = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् ।
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| | verse_line2 = आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥
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| विषयान् अनुभवन्नपि विधेय आत्मा= मनो यस्य सः, जितात्मेत्यर्थः । प्रसादं मनःप्रसादम् ॥ ६४ ॥
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| | verse_line1 = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
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| | verse_line2 = प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥
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| कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥
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| | verse_line1 = नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
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| | verse_line2 = न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥
| |
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| |
| | |
| प्रसादाभावे दोषमाहोत्तरश्लोकाभ्याम् ।
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| | text =
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| न हि प्रसादाभावे युक्तिः = चित्तनिरोधः । अयुक्तस्य च बुद्धिः सम्यग्ज्ञानं नास्ति । तदेवोपपादयति - न चायुक्तस्येति ॥ शान्तिः मुक्तिः । ‘शान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम्’ इत्यभिधानात् ॥ ६६ ॥
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| | verse_line1 = इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
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| | verse_line2 = तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥
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| कथम् अयुक्तस्य भावना न भवति ? आह - इन्द्रियाणामिति ॥ अनुविधीयते क्रियते ननु ; ईश्वरेण इन्द्रियाणाम् अनु ! ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’ इत्यादि वक्ष्यमाणत्वात् । प्रज्ञां प्रज्ञानम् । उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः । उत्पन्नस्याऽप्यभिभवो भवति ॥ ६७ ॥
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| | verse_line1 = तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
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| तस्मात् सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति - तस्मादिति ॥ ६८ ॥
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| | verse_line1 = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
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| | verse_line2 = यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥
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| उक्तलक्षणं पिण्डीकृत्याऽह - या निशेति ॥ या सर्वभूतानां निशा परमेश्वरस्वरूपलक्षणा, यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति, तस्याम् इन्द्रियसंयमयुक्तो ज्ञानी जागर्ति । सम्यग्= आपरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः । यस्यां विषयलक्षणायां भूतानि जाग्रति तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति । मत्तादिवत् गमनादिप्रवृत्तिः । तदुक्तम् - ‘देहं तु तं न चरमम्’, ‘देहोऽपि दैववशगः’(भाग.३.२९.३७) इति श्लोकाभ्याम् । मननयुक्तो मुनिः । ‘पश्यत’ इति अस्य साधनमाह ॥ ६९ ॥
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| | verse_line1 = आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।
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| | verse_line2 = तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥
| |
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| |
| तेन विषयानुभवप्रकारमाह - आपूर्यमाणमिति ॥ यो विषयैरापूर्यमाणोऽपि अचलप्रतिष्ठो भवति= नोत्सेकं प्राप्नोति, न च प्रयत्नं करोति, न चाभावे शुष्यति । न हि समुद्रः सरित्प्रवेश-अप्रवेशनिमित्तवृद्धि-शोषौ बहुतरौ प्राप्नोति, प्रयत्नं वा करोति, स मुक्तिम् आप्नोति इत्यर्थः ॥ ७० ॥
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| | verse_line1 = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
| |
| | verse_line2 = निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥
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| एतदेव प्रपञ्चयति - विहायेति ॥ कामान् विषयान् निःस्पृहतया विहाय यश्चरति भक्षयति । ‘भक्षयामि’इत्य(त्याद्य)हङ्कारममकारवर्जितश्च । स हि पुमान् । स एव च मुक्तिम् अधिगच्छति इत्यर्थः ॥ ७१ ॥
| |
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| | verse_line1 = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
| |
| | verse_line2 = स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥
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| |
| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे साङ्ख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥
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| |
| उपसंहरति - एषेति ॥ ब्राह्मी स्थितिः ब्रह्मविषया स्थितिः = लक्षणम् । अन्तकालेऽपि अस्यां स्थित्वा एव ब्रह्म गच्छति । अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति । ‘यं यं वाऽपि’(भ.गी.८.६) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम् । ‘भोगेन त्वितरे’(ब्र.सू.४.१.१९) इति ह्युक्तम् । सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित् । ‘सप्तजन्मनि विप्रः स्याद्’ इत्यादेः । दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः । तथा ह्युक्तम् - ‘स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं ततः ।साङ्कर्षणं ततो मुक्तिम् अगाद् विष्णुप्रसादतः॥’ इति गारुडे । ‘महादेव परे जन्मंस्तव मुक्तिर्निरूप्यते’। इति नारदीये ।निश्चितफलं च ज्ञानम् - ‘तस्य तावदेव चिरम्’(छां.उ.६.१४.२), ‘यदु(दि) च नार्चिषमेवाभिसम्भवति’(छां.उ.४.१५.५) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
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| }}
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| | |
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| | text =
| |
| न च कायव्यूहापेक्षा । ‘तद्यथैषीकातूलम्’(छां.उ.५.२४.३), ‘तद्यथा(तद्वक्ष्यामि यथा) पुष्करपलाशे’(छां.उ.४.१४.३), ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि’(४.३७) इत्यादिवचनेभ्यः । प्रारब्धे त्वविरोधः । प्रमाणाभावाच्च । न च तत् शास्त्रं प्रमाणम्-‘अक्षपादकणादानां साङ्ख्ययोगजटाभृताम् । मतमालम्ब्य ये वेदं दूषयन्त्यल्पचेतसः ॥’ इति निन्दनात् । यत्र तु स्तुतिस्तत्र शिवभक्तानां स्तुतिपरत्वमेव ; न सत्यत्वम् । न हि तेषामपि इतरग्रन्थविरुद्धार्थे प्रामाण्यम् । तथा ह्युक्तम्- ‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति । त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय । अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज । प्रकाशं कुरु चात्मानम् अप्रकाशं च मां कुरु ॥’ इति वाराहे । ‘कुत्सितानि च मिश्राणि रुद्रो विष्णुप्रचोदितः । चकार शास्त्राणि विभुर्ऋषयस्तत्प्रचोदिताः । दधीच्याद्याः पुराणानि तच्छास्त्रसमयेन तु । चक्रुर्वेदैस्तु ब्राह्माणि वैष्णवान् विष्णुवेदतः । पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा । तथा पुराणं भागवतं विष्णुवेद इतीरितः । अतः शैवपुराणानि योग्यान्यन्याविरोधतः॥’ इति च नारदीये ।अतो ज्ञानिनां भवत्येव मुक्तिः । भीष्मादीनां तु तस्मिन् क्षणे मुक्त्यभावः । ‘स्मरंस्त्यजति’ इति वर्तमानापदेशो हि कृतः ।तच्चोक्तम्-‘ज्ञानिनां कर्मयुक्तानां कायत्यागक्षणो यदा ।विष्णुमाया तदा तेषां मनो बाह्यं करोति हि ॥’इति गारुडे ।नचान्येषां तदा स्मृतिर्भवति -‘बहुजन्मविपाकेन भक्तिज्ञानेन ये हरिम् ।भजन्ति तत्स्मृतिं त्वन्ते देवो याति न चान्यथा ॥’इत्युक्तेर्ब्रह्मवैवर्ते ।
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| | |
| {{Bhashyam
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| | verse_id = BGB_C02_V72
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| | text =
| |
| निर्बाणम् अशरीरम् । ‘कायो बाणं शरीरं च’ इत्यभिधानात् । ‘एतद्बाणमवष्टभ्य’इति प्रयोगाच्च । निर्बाणशब्दप्रतिपादनम्- ‘अनिन्द्रियाः’ इत्यादिवत् । कथम् अन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाकृतिर्भगवत उपपद्येत ? न चान्यद् भगवत उत्तमं ब्रह्म - ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११) इति भागवते । ‘भगवन्तं परं ब्रह्म’(भाग.३.२५.१०), ‘परं ब्रह्म जनार्दनः’, ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(म.भा.१३..९), ‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः’(१५.१८), ‘योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः’(म.स्मृ.१.१), ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति’(गरुड.३,१.१८), ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(११.४३) इत्यादिभ्यः । न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वाद् एतत् कल्प्यम् । तस्यापि शरीरश्रवणात्- ‘आनन्दरूपममृतम्’(आथ.४.१०,मु.उ.२.२.८), ‘सुवर्णज्योतीः’(भृगुवल्लि.१५,तै.उ.३.१०.६), ‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’(छां.उ.८.१.२) इत्यादिषु । यदि रूपं न स्यात्, ‘आनन्दम्’ इत्येव स्यात् ; न तु ‘आनन्दरूपम्’ इति । कथं च सुवर्णरूपत्वं स्याद् अरूपस्य ? कथं च दहरत्वम्? दहरस्थश्च- ‘केचित् स्वदेहे’ इत्यादौ रूपवान् उच्यते । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’(ऋ.सं,मं.१०.सू.९०.मं.१), ‘रुग्मवर्णं कर्तारम्’(मु.उ.३.१.३), ‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’(श्वे.उ.३.८), ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(श्वे.उ.३.१६), ‘विश्वतश्चक्षुरुत’(श्वे.उ.३.३)इत्यादिवचनाद्, विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवान् अवसीयते।
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| }}
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| | id = BGB_C02_V72_B04
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| |
| अतिपरिपूर्णतम-ज्ञान-ऐश्वर्य-वीर्य-आनन्द-श्री-शक्त्यादिमांश्च भगवान् । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।’(श्वे.उ.६.८), ‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.९,मु.उ.१.१.९), ‘आनन्दं ब्रह्मणः’(तै.उ.ब्रह्मवल्लि.९), ‘एतस्यैवाऽनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उपजीवन्ति’ (बृह. ४,३.३२), ‘अनादिमध्यान्तम् अनन्तवीर्यम्’, ‘सहस्रलक्षामितकान्तिकान्तम्’, ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’(भाग.६.५,४८), ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’(भाग.०३.१०.२४),‘तुर्यं (तु) तत् सर्वदृक् सदा’(माण्डूक्य.उ.२.४), ‘आत्मानम् अन्यं च स वेद विद्वान्’(भाग.११.११.७), ‘अन्यतमो मुकुन्दात् को नाम लोके भगवत्पदार्थः’(भाग.१.१८.२१), ‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य’(बृहन्नारदीय.१,४६.१७)।‘अतीव परिपूर्णं ते सुखं ज्ञानं च सौभगम् ।यच्चात्ययुक्तं स्मर्तुं वा शक्तः कर्तुमतः परः ॥’इत्यादिभ्यः ।
| |
| }}
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| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = BGB_C02_V72
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| | text =
| |
| तानि च सर्वाण्यन्योन्यस्वरूपाणि -‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५),‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६.१,भृगुवल्लि.२), ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२), ‘यस्य ज्ञानमयं तपः’(आथ.१.९), ‘समा भग प्रविश स्वाहा’(तै.उ.१.४.२,शिक्षावल्लि.११) ।‘न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा ।न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥’, ‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः ॥’इति पैङ्गिखिलेषु ।‘देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः ।परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते ।तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया । ‘न च गर्भेऽवसद् देव्या न चापि वसुदेवतः ।न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः ।नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडतेऽमोघदर्शनः ॥’ इति पाद्मे ।‘न वै स आत्माऽऽत्मवताम् अधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः’ ।‘सर्गादेरीशिताऽजः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽप्यबोधम् । लोकानां दर्शयन् यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम॥’ ‘स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय (नरवत् प्रलापी) स्त्रीसङ्गिनाम् इति रतिं प्रथयंश्चचार।’ ‘पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम् ।रुद्रवाक्यम् ऋतं कर्तुम् अजितो जितवत् स्थितः ॥योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह ।न चाम्बा ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः ॥’ इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे ।न तत्र संसारसमानधर्मा निरूप्याः ।यत्र च परावरभेदोऽवगम्यते तत्र अज्ञबुद्धिम् अपेक्ष्य अवरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र ।तच्चोक्तम् - ‘परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः ।तथाऽप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वाम् ऋषयोऽपि हि ।परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् (ने) ॥’ इति गारुडे ।न चात्र किञ्चिदुपचारादिति(चरितादि) वाच्यम् । अचिन्त्यशक्तेः, पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम् ।‘कृष्णरामादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा ।न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाऽप्यस्मान् विमोहसि ॥’ इत्यादेश्च नारदीये ।तस्मात् सर्वदा सर्वरूपेषु अपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्म अपरोक्षज्ञानी ऋच्छति इति सिद्धम् ॥७२ ॥
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| }}
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| [[Category:Bhagavadgitabhashya]] | |