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Tantrasarasangraha/C1: Difference between revisions

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__TOC__
== प्रथमाध्यायः ==
<div class="gr-page-nav">[[Tantrasarasangraha|यमकभारतम्]] · [[Tantrasarasangraha/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
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| verse_line1  = ध्यायेत् तं(ध्यायेत्) परमानन्दं यन्माता पतिमयदपरमानन्दम् ।उज्झितपरमानं दम्पत्याद्याद्याश्रमैः सदैव परमानन्दम् ॥१॥
| verse_line1  = जयत्यब्जभवेशेन्द्रवन्दितः कमलापतिः ।
| verse_line2  = अनन्तविभवानन्दशक्तिज्ञानादिसद्गुणः ॥1॥
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| verse_line1  = विधिं विधाय सर्गादौ तेन पृष्टोब्जलोचनः ।
| verse_line2  = आह देवो रमोत्सङ्गवलिसत्पादपल्लवः ॥2॥
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| verse_line1  = अहमेकोखलिगुणो वाचकः प्रणवो मम ।
| verse_line2  = अकाराद्यतिशान्तान्तः सोयमष्टाक्षरो मतः ॥3॥
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| verse_line1  = स विश्वतैजसप्राज्ञतुरीयात्मान्तरात्मनाम् ।
| verse_line2  = परमात्मज्ञानात्मयुजां मद्रूपाणां च वाचकः ॥4॥
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| verse_line1  = सोऽजनि देवक्यन्ते यस्मादनुकम्पनावदेव क्यन्ते ।अवदन् देव क्यं ते भुवनं हि सुराः सदैवदेऽव क्यन्ते ॥५॥
| verse_line1  = तद्रूपभेदाः पञ्चाशन्मूर्तयो मम चापराः ।
| verse_line2  = पञ्चाशद्वर्णवाच्यास्ता वर्णास्तारार्णभेदिताः ॥5॥
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| verse_line1  = नीतो वसुदेवेन स्वततेन स गोकुलं सुवसुदेवे न(सवसुदेवेन) ।तत्र यशोदा तनयं मेने कृष्णं स्वकीयमवदातनयम् ॥६॥
| verse_line1  = द्विरष्टपञ्चकचतुःपञ्चेत्येवाष्टवर्गगाः ।
| verse_line2  = अज आनन्द इन्द्रेशावुग्र ऊर्ज ऋतम्बरः ॥6॥
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| verse_line1  = ववृधे गोकुसमध्याद्यो(यो) देवो विश्वमद्भुताकुलमध्यात् ।तत्र च पूतनिकाया वधमकरोत् यन्निजाः सुपूतनिकायाः(पूतनिकायाः) ॥७॥
| verse_line1  = ऋॄघलृशौ लॄजिरैकत्मैर ओजोभृदौरसः ।
| verse_line2  = अन्तोर्धगर्भः कपलिः खपतिर्गरुडासनः ॥7॥
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| verse_line1  = अधुनोच्छकटं लोली पादाङ्गुष्ठेन वातपेशशकटं लोली ।अतनोद् रक्षामस्य स्वाज्ञानाद् गोपिका सदेरक्षामस्य ॥८॥
| verse_line1  = घर्मो ङसारस्चार्वाङ्गश्छन्दोगम्यो जनार्दनः ।
| verse_line2  = झटितारिर्ञमष्टङ्की ठलको डलको ढरी ॥8॥
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| verse_line1  = मुखलालनलोला तन्मुखगं जगदचष्ट सालनलोलातत् ।नाध्यैन्मायामस्य जगत्प्रभोः स्वधिकतततमायामस्य(स्वाधिकतततमायामस्य) ॥९॥
| verse_line1  = णात्मा तारस्थमो दण्डी धन्वी नम्यः परः फली ।
| verse_line2  = बली भगो मनुर्यज्ञो रामो लक्ष्मीपतिर्वरः ॥9॥
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| verse_line1  = तस्य सुशर्माण्यकरो दरिणो गर्गः सदुक्तिकर्माण्यकरोत् ।अवदन्नामानमयं जगदादि वासुदेवनामानमयम् ॥१०॥
| verse_line1  = शान्तसंवित् षड्गुणश्च सारात्मा हंसळाळुकौ ।
| verse_line2  = पञ्चाशन्मूर्तयस्त्वेता ममाकारादलिक्षकाः ॥10॥
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| verse_line1  = नारायणाष्टाक्षरश्च ताराष्टाक्षरभेदवान् ।
| verse_line2  = आद्यैस्तारचतुर्वणैर्भिन्ना व्याहृतयः क्रमात् ॥11॥
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| verse_line1  = अनिरुद्धादिकास्तासां देवता व्युत्क्रमेण वा ।
| verse_line2  = ताश्चतुर्मूर्तयस्त्वेव द्वादशार्णपदोदिताः ॥12॥
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| verse_line1  = नारायणाष्टाक्षराच्च व्याहृतिभ्यस्तथैव च ।
| verse_line2  = विभेदो द्वादशार्णानां केशवाद्याश्च देवताः ॥13॥
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| verse_line1  = तन्माता कोपमिता तमनुससारात्मवादवाकोपमिता(त्मवाकोपमिता) ।जगृहे सा नमनं तं देवं (तं चिन्तयैव)तच्चिन्तयैव सानमनन्तम् ॥१४॥
| verse_line1  = नारायणाष्टाक्षराच्च व्याहृतित्रिगुणात् पुनः ।
| verse_line2  = वेदमाता च गायत्री द्विगुणा द्वादशाक्षरात् ॥14॥
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| verse_line1  = अथ साऽन्तरिताऽमानं विष्णुं विश्वोद्भवं (तदाऽ)सदान्तरितामानम् ।अनयद् दामोदरतां योऽरमयत् सुन्दरीं निजामोदरताम् ॥१५॥
| verse_line1  = चतुर्विशन्मूतयोस्याः कथिता वर्णदेवताः ।
| verse_line2  = तद्भेदः पौरुषं सूक्तं वेदाः पुरुषसूक्तगाः ॥15॥
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| verse_line1  = चक्रे सोऽर्जुननाशं प्राप्नोति च (त)यत्स्मृतिः सदाऽर्जुनना शम् ।तौ गतौ निजमोकस्तेनैव नुतेन यन्निजो निजमोकः(यन्निजानिजमोकः) ॥१६॥
| verse_line1  = वैदिकास्सर्वशब्दाश्च तस्मात् सर्वाभिधोस्म्यहम् ।
| verse_line2  = पञ्चाशद्वर्णभिन्नाश्च सर्वशब्दा अतोपि ॥16॥
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| verse_line1  = अथ वृन्दावनवासं गोपाश्चक्रुर्जगत्क्षिताऽवनवासम् ।तत्र बकासुरमारः शौरिरभून्नित्यसंश्रितासुरमारः ॥१७॥
| verse_line1  = ऋषिश्च देवतैकोहं तारादीनां विशेषतः ।
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| verse_line1  = अहनद् वत्सतनूकं(वत्सतनुकं) योऽपाल्लोकं स्वयत्नवत्सतनूकम्(वत्सतनुकं) ।सोपाद् वत्सानमरः सहाग्रजो गोपवत्सवत्सानमरः(गोपवत् सुवत्सानमरः) ॥१८॥
| verse_line1  = उद्यद्भास्वत्समाभासश्चिदानन्दैकदेहवान् ।
| verse_line2  = चक्रशङ्खगदापद्मधरो ध्येयोहमीश्वरः ॥18॥
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| verse_line1  = सः विभुः श्रीमानहिके ननर्त यस्य श्रमानमा मा न हि के ।अकरोन्नद्युदकान्तं कान्तं नीत्वोरगं स नाद्युदकान्तम् ॥१९॥
| verse_line1  = लक्ष्मीधराभ्यामाश्लिष्टः स्वमूर्तिगणमध्यगः ।
| verse_line2  = ब्रह्मवायुशिवाहीशविपैः शक्रादिकैरपि ॥19॥
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| verse_line1  = हत्वा धेनुकमूढं बलात् प्रलम्बं च खेट् सधेनुकमूढम् ।व्रजमावीदमृताशः पीत्वा वह्निं चरस्थिरादमृताशः(चरस्थितादमृताशः) ॥२०॥
| verse_line1  = सेव्यमानोधिकं भक्त्या नित्यनिःशेषशक्तिमान् ।
| verse_line2  = मूर्तयोष्टावपि ध्येयाश्चक्रशङ्खवराभयैः ।
| verse_line3  = युक्ताः प्रदीपवर्णाश्च सर्वाभरणभूषिताः ॥20॥
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| verse_line1  = तादृग्रूपाश्च पञ्चाशज्ज्ञानमुद्राभयोद्यताः ।
| verse_line2  = टङ्की दण्डी च धन्वी च तत्तद्युक्तस्तु वामतः ॥21॥
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| verse_line1  = रेमे गोपीष्वरिहा स मन्मथाक्रान्तसुन्दरीपीष्वरिहा।पूर्णानन्दैकतनुः स विश्वरुक्पावनोऽप्यनन्दैकतनुः (प्यानन्दैकतनुः)॥२२॥
| verse_line1  = वासुदेवादिकाः शुक्लरक्तपीतासितोज्ज्वलाः ।
| verse_line2  = शङ्खचक्रगदाब्जेतः प्रथमो मुसली हली ॥22॥
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| verse_line1  = अथ हतयोर्गलिकेशयोः श्वफल्कजप्रापितः पुरीं गलिकेश्योः ।भङ्‍क्त्वा धनुराजवरं जघान तेनैव च स्वयं राजवरम् ॥२३॥
| verse_line1  = सशङ्खचक्रस्त्वपरस्तृतीयः शार्ङ्गबाणवान् ।
| verse_line2  = सशङ्खचक्रस्तुर्यस्तु चक्रशङ्खासिचर्मवान् ॥23॥
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| verse_line1  = मृत्नन्(मृद्गन्) गजमुग्रबलं सबऽलो रङ्गं विवेश सृतिमुग्रबऽम् ।हत्वा मल्लौ बलिनौ कंसं च विमोक्षितौ(विमोक्षिता) ततौ लौ बलिनौ(रौ बलिनौ) ॥२४॥
| verse_line1  = केशवो मधुसूदनः सङ्कर्षणदामोदरौ ।
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| verse_line1  = विष्णुमाधवानिरुद्धपुुरुषोत्तमाधोक्षजाः ।
| verse_line2  = जनार्दनश्च वामोच्चकरशङ्खिनः ॥25॥
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| verse_line1  = जित्वा मागधराजं तोषितमकरोत् सदात्मयोगधराजम् ।अनु कुर्वन् निजसदनं चक्रे रम्यां पुरीं(रम्यं पुरं) सुबोधनिजसदनम् ॥२६॥
| verse_line1  = गोविन्दश्च त्रिविक्रम्ूससश्रीधरहृषीकपाः ।
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| verse_line1  = हंसो (डिभि)डिभकश्चपलावमुना संसूदितौ यवनकश्च पला ।कीर्तिर्विमला विरता प्रतता विश्वाधिपावनीलाविरता ॥२८॥
| verse_line1  = शङ्खचक्रगदापद्मधराश्चैते हि सर्वशः ।
| verse_line2  = क्रमव्युत्क्रमपद्मादिगदादिव्युत्क्रमस्तथा ॥ अर्धक्रमः सान्तरश्च षट्सु षट्स्वरिपूर्विणाम् ॥28॥
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| verse_line1  = वर्णानां देवतानां च नित्यत्वाच्च क्रमः स्वतः ।
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| verse_line1  = येन हिडिम्बबकाद्या रक्षोधीशा निपातिता बबकाद्याः ।भीमे प्रीतिममेयां व्यञ्जयता तेनैव(तेन) शेषपाति ममे याम् ॥३१॥
| verse_line1  = क्रुद्धमहावीरद्युल्कसहस्रसहितोल्ककाः ।
| verse_line2  = चतुर्थ्यन्ताः हृदादीनि पृथग्रूपाणि तानि च ॥31॥
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| verse_line1  = अथ कृष्णावरणे तान् प्राप्तान् राज्ञोऽशृणोत् सदावरणेतान् ।द्रष्टुं यातः सबलस्तां चानैषीत् पृथासुतांस्ततः सबलः ॥३२॥
| verse_line1  = विष्णोरेवात्यभेदेपि तदैश्वर्यात् तदन्यवत् ।
| verse_line2  = चक्रशङ्खवराभीतिहस्तान्येतानि सर्वशः ॥32॥
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| verse_line1  = तानिन्द्रस्थलवासांश्चक्रे कृष्णः परो(पुरो) निजस्थलवासान् ।स्वबलोद्रेचितमानैर्जुगोप धर्मं च तैः पराचितमानैः(पराञ्चितमानैः) ॥३३॥
| verse_line1  = मूलरूपसवर्णानि कृष्णवर्णा शिखोच्यते ।
| verse_line2  = चतुर्विंशन्मूर्तयश्च मूलरूपसवर्णकाः ॥33॥
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| verse_line1  = आदिवर्णत्रयं नाभिहृच्छिरस्सु यथाक्रमम् ।
| verse_line2  = न्यसनीयं च तद्वर्णदेवताध्यानपूर्वकम् ॥34॥
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| verse_line1  = मातुः परिभवहान्यै राज्ञा द्युसदामितश्च परिभवहाऽन्यैः(न्यै) ।अभवन्नरकमुरारिर्योऽवासीदत्(योऽवात्सीदत्) समस्तनरकमुरारिः ॥३५॥
| verse_line1  = पज्जानुनाभिहृदयवाङ्नासानेत्रकेषु च ।
| verse_line2  = अष्टाक्षराणां न्यासः स्यात् व्याहृत्यादीनां प्रजापतिः ॥35॥
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| verse_line1  = मुनिश्छन्दस्तु गायत्री देवता भगवान् हरिः ।
| verse_line2  = उद्यदादित्यवर्णश्च ज्ञानमुद्राभयोद्यतः ॥36॥
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| verse_line1  = तारेण व्याहृतीभिश्च ज्ञेयान्यङ्गानि पञ्च च ।
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| verse_line1  = द्वादशार्णस्य जगती च्छन्दोन्यत्तारवत् स्मृतम् ।
| verse_line2  = अच्छवर्णोभयवरकरो ध्येयोमितद्युतिः ॥38॥
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| verse_line1  = शिवभक्तप्रवराद्यं पुमान् न सेहे गिरीशविप्रवराद्यम्(गिरिशविप्रवराद्यम्) ।तं स्वात्मेन्द्रवरेण व्यधुनोद् भीमेन धूतरुद्रवरेण ॥३९॥
| verse_line1  = पदैर्व्यस्तैः समस्तैश्च ज्ञेयान्यङ्गानि पञ्च च ।
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| verse_line1  = विश्वामित्रस्तु सन्ध्यार्थे तदन्यत्र प्रजापतिः ।
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| verse_line1  = प्रोद्यदादित्यवर्णश्च सूर्यमण्डलमध्यगः ।
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| verse_line1  = सताराश्च व्याहृतयो गायत्र्यङ्गानि पञ्च
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| verse_line1  = असृजज्ज्वरमुग्रतमःक्षयप्रदो लीलयाऽधिवरमुग्रतमः ।क्रीडामात्रं विश्वं प्रकाशयन्नात्मनः स विहरकमात्रं विश्वम् ॥४३॥
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| verse_line1  = तारवत् सर्वमस्यापि श्यामो ध्येयो हरिः स्वयम् ।
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| verse_line1  = यद्बलवान् क्रोधवशान्निनाय नाशं वृकोदरः क्रोधवशान् ।लेभे चान्यागम्यं स्थानं पुष्पाणि धाम चान्यागम्यम् ॥४६॥
| verse_line1  = पज्जानुनाभिहृन्नासाकेषु न्यासश्च वर्णशः ।
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| verse_line1  = न हि नहुषोऽलं नहितुं धर्मो द्रौणिस्तथेतरो(रे)ऽलं नहितुम् ।नो राट् कर्णो(र्णौ) ब्रह्मवरी येन ध्वस्तोस्त्रमग्रहीत् सुब्रह्म वरी(सब्रह्मवरी) ॥४८॥
| verse_line1  = पूज्यश्च भगवान् नित्यं चक्राब्जादिकमण्डले ।
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| verse_line1  = क्षात्रं धर्मं स्ववता गुरुवृत्त्यै केशवाज्ञया च मं (मे/मलं) स्ववता ।सर्वं सेहे मनसा भीमेनेशैकमानिना हेमनसा ॥४९॥
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| verse_line1  = पुनः सव्ये सर्वगुरूनाग्नेयादिषु च क्रमात् ।
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| verse_line1  = यां स्प्रष्टुमिच्छन्तमजातशत्रुं न्यवारयत् स्वस्थमजातशत्रुम् ।शंरूपाने नित्यरतेरियं श्रीरिति स्म देवेड्यदितेरियं श्रीः ॥५३॥
| verse_line1  = यमवायुशिवेन्द्राश्च ज्ञेया धर्मादिदेवताः ।
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| verse_line1  = तस्य रक्षा सुकृता जनार्दनेनेशशेषकेक्षासुकृता ।पार्थेषु प्रेमवता नित्यं भर्त्रासुतासुविप्रेमवता ॥६४॥
| verse_line1  = कोणेषु वीन्द्रवामे सौपर्णीं पूजयेदपि ।
| verse_line2  = इन्द्रादीन् शेषविध्यन्तान् सभार्यान् सपरिग्रहान् ॥64॥
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| verse_line1  = ज्ञानं परमं प्रादाद् भीष्मगतः सृतिविमोक्षचरमं प्रादात् ।पाण्डुसुतानामधिकं चक्रे वेदं गुणोत्तरं स्वनामधिकम् ॥६५॥
| verse_line1  = धूपदीपौ ततो दत्वा नैवेद्यं मूलमन्त्रतः ।
| verse_line2  = अनेन क्रमयोगेन जुहुयात् संस्कृतेनले ॥65॥
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| verse_line1  = तेनावापि सुजातैर्हरिमेधस्तुरगवर्तनेऽपि(तुरगावर्तनेऽपि) सुजातैः ।पाण्डुसुतैः (सवसूकैराप्तैर्व्यासात्मना)सवसूकैः प्राप्तैर्व्यासात्मना च सुसवसूकैः ॥६६॥
| verse_line1  = पुष्पाञ्जलिश्च होमश्च मूलेनाष्टोत्तरं शतम् ।
| verse_line2  = सकृत् सकृत् पुष्पमन्यैर्होमस्तस्य चतुर्गुणः ॥66॥
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| verse_line1  = तदनु स (सु)पाण्डुतनूजै रेमे क्ष्मां पालयन् सुपाण्डुतनूजैः ।अनुपमसुखरूपोऽजः परमः श्रीवल्लभः सति खरूपो जः(सुखरूपो जः/सति सुखरूपोजः) ॥६७॥
| verse_line1  = विसर्जयित्वा नैवेद्यं मूलेन त्रिः समर्च्य च ।
| verse_line2  = धूपदीपौ पुनर्दत्वा पुनर्मूलेन पूर्ववत् ॥67॥
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| verse_line1  = सुगतिं (पर)चरमामददान्निजयोग्यां ज्ञानिसुततिं(ति) परमामददात् ।पार्थानां सयदूनां स (परम)पितृप्रेष्यादिनामिनां सयदूनाम् ॥६८॥
| verse_line1  = अर्चयित्वा पुनर्ध्यात्वा जपेदष्टोत्तरं शतम् ।
| verse_line2  = पुनर्ध्यायेद्धरिं सर्वदेवदेवेश्वरं प्रभुम् ॥68॥
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| verse_line1  = रेमे तत्रापिसुखी परमोऽनन्तो ननन्द तत्रापि सुखी ।प्राणेनेन्दिरया च प्रयुतो नित्यं महागुणेन्दिरया च ॥६९॥
| verse_line1  = जपध्यानहुतार्चादीनेवं यः कुरुते सदा ।
| verse_line2  = धर्मार्थकाममोक्षाणां भाजनं स्यात् स एव हि ॥69॥
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| verse_line1  = एवं सर्वाणि हरे रूपाणि श्रीपतेः सुपर्वाणिहरेः ।पूर्णसुखानि सुभान्ति प्रततानि निरन्तराणि (नि)सुभान्ति ॥७०॥
| verse_line1  = सर्वोत्तमं हरिं ज्ञात्वा य एवं भक्तिपूर्वकम् ।
| verse_line2  = जपध्यानादिभिर्नित्यं पूजयेन्नास्य दुर्लभम् ॥70॥
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| verse_line1  = राम राम महाबाहो माया ते सुदुरासदा ।वाद सादद को लोके पादावेव तवासजेत् ॥७१॥
| verse_line1  = भक्तिं कृत्वान्यदेवेषु ब्रह्मरुद्रादिकेष्वपि ।
| verse_line2  = सर्वोत्कर्षमविज्ञाय विष्णोर्याति तमो ध्रुवम् ॥71॥
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| verse_line1  = जेत् सवातव वेदापाऽके लोकोदद सादवा ।दासरादुसुतेयामाहोवाहा मम राम रा(राः) ॥७२॥
| verse_line1  = न यज्ञा न च तीर्थानि नोपवासव्रतानि च ।
| verse_line2  = दैवतानि च सर्वाणि त्रातुं तं शक्नुयुः क्वचित् ॥72॥
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| verse_line1  = देवानां पतयो नित्यं मतं यस्य न जानते(नो मतं यस्य जानते) ।तस्मै देव नमस्तेऽहं भवतेऽसुरमारये ॥७३॥
| verse_line1  = हरिर्हि सर्वदेवानां परमः पूर्णशक्तिमान् ।
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| verse_line1  = समस्तदेवजनकवासुदेवपरामृत ।वासुदेव परामृत ज्ञानमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥७४॥
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| verse_line1  = कृष्णकथेयं यमिता (सुश)सुखतीर्थेनोदिताऽनने यं यमिता ।भक्तिमता परमेशे सर्वोद्रेका सदानुताऽप रमेशे ॥८०॥
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| verse_line1 = इति (नारायणनामाव कतीर्थं)नारायणनामा सुखतीर्थपूजितः सुरायणना मा ।पूर्ण गुणैर्धिक(गुणैरधिक) पूर्णज्ञानेच्छाभक्तिभिः(पूर्णज्ञानेच्छाशक्तिभिः) स्वधिकपूर्ण(र्णः) ॥८१॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं यमकभारतम्(महाभारततात्पर्यम्) ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते  तन्त्रसारसङ्ग्रहे प्रथमोध्यायः
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Revision as of 19:08, 10 April 2026

प्रथमाध्यायः

जयत्यब्जभवेशेन्द्रवन्दितः कमलापतिः ।अनन्तविभवानन्दशक्तिज्ञानादिसद्गुणः ॥1॥


विधिं विधाय सर्गादौ तेन पृष्टोब्जलोचनः ।आह देवो रमोत्सङ्गवलिसत्पादपल्लवः ॥2॥


अहमेकोखलिगुणो वाचकः प्रणवो मम ।अकाराद्यतिशान्तान्तः सोयमष्टाक्षरो मतः ॥3॥


स विश्वतैजसप्राज्ञतुरीयात्मान्तरात्मनाम् ।परमात्मज्ञानात्मयुजां मद्रूपाणां च वाचकः ॥4॥


तद्रूपभेदाः पञ्चाशन्मूर्तयो मम चापराः ।पञ्चाशद्वर्णवाच्यास्ता वर्णास्तारार्णभेदिताः ॥5॥


द्विरष्टपञ्चकचतुःपञ्चेत्येवाष्टवर्गगाः ।अज आनन्द इन्द्रेशावुग्र ऊर्ज ऋतम्बरः ॥6॥


ऋॄघलृशौ लॄजिरैकत्मैर ओजोभृदौरसः ।अन्तोर्धगर्भः कपलिः खपतिर्गरुडासनः ॥7॥


घर्मो ङसारस्चार्वाङ्गश्छन्दोगम्यो जनार्दनः ।झटितारिर्ञमष्टङ्की ठलको डलको ढरी ॥8॥


णात्मा तारस्थमो दण्डी धन्वी नम्यः परः फली ।बली भगो मनुर्यज्ञो रामो लक्ष्मीपतिर्वरः ॥9॥


शान्तसंवित् षड्गुणश्च सारात्मा हंसळाळुकौ ।पञ्चाशन्मूर्तयस्त्वेता ममाकारादलिक्षकाः ॥10॥


नारायणाष्टाक्षरश्च ताराष्टाक्षरभेदवान् ।आद्यैस्तारचतुर्वणैर्भिन्ना व्याहृतयः क्रमात् ॥11॥


अनिरुद्धादिकास्तासां देवता व्युत्क्रमेण वा ।ताश्चतुर्मूर्तयस्त्वेव द्वादशार्णपदोदिताः ॥12॥


नारायणाष्टाक्षराच्च व्याहृतिभ्यस्तथैव च ।विभेदो द्वादशार्णानां केशवाद्याश्च देवताः ॥13॥


नारायणाष्टाक्षराच्च व्याहृतित्रिगुणात् पुनः ।वेदमाता च गायत्री द्विगुणा द्वादशाक्षरात् ॥14॥


चतुर्विशन्मूतयोस्याः कथिता वर्णदेवताः ।तद्भेदः पौरुषं सूक्तं वेदाः पुरुषसूक्तगाः ॥15॥


वैदिकास्सर्वशब्दाश्च तस्मात् सर्वाभिधोस्म्यहम् ।पञ्चाशद्वर्णभिन्नाश्च सर्वशब्दा अतोपि च ॥16॥


ऋषिश्च देवतैकोहं तारादीनां विशेषतः ।छन्दो मदीया गायत्री ताराष्टाक्षरयोर्मता ॥17॥


उद्यद्भास्वत्समाभासश्चिदानन्दैकदेहवान् ।चक्रशङ्खगदापद्मधरो ध्येयोहमीश्वरः ॥18॥


लक्ष्मीधराभ्यामाश्लिष्टः स्वमूर्तिगणमध्यगः ।ब्रह्मवायुशिवाहीशविपैः शक्रादिकैरपि ॥19॥


सेव्यमानोधिकं भक्त्या नित्यनिःशेषशक्तिमान् ।मूर्तयोष्टावपि ध्येयाश्चक्रशङ्खवराभयैः ।


तादृग्रूपाश्च पञ्चाशज्ज्ञानमुद्राभयोद्यताः ।टङ्की दण्डी च धन्वी च तत्तद्युक्तस्तु वामतः ॥21॥


वासुदेवादिकाः शुक्लरक्तपीतासितोज्ज्वलाः ।शङ्खचक्रगदाब्जेतः प्रथमो मुसली हली ॥22॥


सशङ्खचक्रस्त्वपरस्तृतीयः शार्ङ्गबाणवान् ।सशङ्खचक्रस्तुर्यस्तु चक्रशङ्खासिचर्मवान् ॥23॥


केशवो मधुसूदनः सङ्कर्षणदामोदरौ ।सवासुदेवप्रद्युम्नाः दक्षोच्चकरशङ्खिनः ॥24॥


विष्णुमाधवानिरुद्धपुुरुषोत्तमाधोक्षजाः ।जनार्दनश्च वामोच्चकरशङ्खिनः ॥25॥


गोविन्दश्च त्रिविक्रम्ूससश्रीधरहृषीकपाः ।नृसिंहश्चाच्युतश्चैव वामाधःकरशङ्खिनः ॥26॥


वामनः सनारायणः पद्मनाभ उपेन्द्रकः ।हरिः कृष्णश्च दक्षाधःकरे शङ्खधरा मताः ॥27॥


शङ्खचक्रगदापद्मधराश्चैते हि सर्वशः ।क्रमव्युत्क्रमपद्मादिगदादिव्युत्क्रमस्तथा ॥ अर्धक्रमः सान्तरश्च षट्सु षट्स्वरिपूर्विणाम् ॥28॥


वर्णानां देवतानां च नित्यत्वाच्च क्रमः स्वतः ।व्यक्तिक्रमं ब्रह्मबुद्धावपेक्ष्य क्रम उच्यते ॥29॥


समासव्यासयोगेन व्याहृत्यादीनां चतुष्टयम् ।सत्यं चाङ्गानि तारस्य प्रोच्यन्तेष्टाक्षरस्य च ॥30॥


क्रुद्धमहावीरद्युल्कसहस्रसहितोल्ककाः ।चतुर्थ्यन्ताः हृदादीनि पृथग्रूपाणि तानि च ॥31॥


विष्णोरेवात्यभेदेपि तदैश्वर्यात् तदन्यवत् ।चक्रशङ्खवराभीतिहस्तान्येतानि सर्वशः ॥32॥


मूलरूपसवर्णानि कृष्णवर्णा शिखोच्यते ।चतुर्विंशन्मूर्तयश्च मूलरूपसवर्णकाः ॥33॥


आदिवर्णत्रयं नाभिहृच्छिरस्सु यथाक्रमम् ।न्यसनीयं च तद्वर्णदेवताध्यानपूर्वकम् ॥34॥


पज्जानुनाभिहृदयवाङ्नासानेत्रकेषु च ।अष्टाक्षराणां न्यासः स्यात् व्याहृत्यादीनां प्रजापतिः ॥35॥


मुनिश्छन्दस्तु गायत्री देवता भगवान् हरिः ।उद्यदादित्यवर्णश्च ज्ञानमुद्राभयोद्यतः ॥36॥


तारेण व्याहृतीभिश्च ज्ञेयान्यङ्गानि पञ्च च ।नाभिहृत्केषु सर्वेषु चतस्रो व्याहृतीर्न्यसेत् ॥37॥


द्वादशार्णस्य जगती च्छन्दोन्यत्तारवत् स्मृतम् ।अच्छवर्णोभयवरकरो ध्येयोमितद्युतिः ॥38॥


पदैर्व्यस्तैः समस्तैश्च ज्ञेयान्यङ्गानि पञ्च च ।अष्टाक्षराणां स्थानेषु बाह्वोरूर्वोश्च विन्यसेत् ॥39॥


विश्वामित्रस्तु सन्ध्यार्थे तदन्यत्र प्रजापतिः ।मुनिर्देवस्तु सवितृनामा स्रष्टृत्वतो हरिः ॥40॥


प्रोद्यदादित्यवर्णश्च सूर्यमण्डलमध्यगः ।चक्रशङ्खधरोङ्कस्थदोर्द्वयो ध्येय एव च ॥41॥


सताराश्च व्याहृतयो गायत्र्यङ्गानि पञ्च च ।दोःपत्सन्धिषु साग्रेषु नाभिहृन्मुखेषु च ॥42॥


वर्णन्यासश्च कर्तव्यस्तारवन्निखलिं स्मृतम् ।पञ्चाशदक्षराणां च पुंसूक्तस्यापि सर्वशः ॥43॥


अनुष्टुभश्च त्रिष्टुप् च छन्दोस्य त्रिष्टुभोपि वा ।विष्णुशब्दश्चतुर्थ्यन्तो हृदयेन षडक्षरः ॥44॥


तारवत् सर्वमस्यापि श्यामो ध्येयो हरिः स्वयम् ।वर्णा एव षडङ्गानि षणयोर्भेदयोगतः ॥45॥


पज्जानुनाभिहृन्नासाकेषु न्यासश्च वर्णशः ।एते तु सर्वमन्त्राणां मूलमन्त्रा विशेषतः ॥46॥


एतज्ज्ञानात् समस्तं च ज्ञानं स्याच्छब्दगोचरम् ।एतज्जपात् समस्तानां मन्त्राणां जापको भवेत् ॥47॥


पूज्यश्च भगवान् नित्यं चक्राब्जादिकमण्डले ।हृदये वा चले वापि जले वा केवले स्थले ॥48॥


अष्टाक्षरेण सम्पूज्य प्रथमं देवतां पराम् ।मध्ये सव्ये गुरूंश्चैव दक्षिणे सर्वदेवताः ॥49॥


पुनः सव्ये सर्वगुरूनाग्नेयादिषु च क्रमात् ।गरुडं व्यासदेवं च दुर्गां चैव सरस्वतीम् ॥50॥


धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चैव कोणगान् ।तदन्तः पूर्वदिक्पूर्वमधर्मादींश्च पूजयेत् ॥51॥


अपूजिता अधर्मादिदातारस्ते तथाभिधाः ।निर्ऋतिश्चैव दुर्गा च कामो रुद्रश्च देवताः ॥52॥


यमवायुशिवेन्द्राश्च ज्ञेया धर्मादिदेवताः ।परमः पुरुषो मध्ये शक्तिराधाररूपिणी ॥53॥


कूर्मोनन्तश्च पृथिवी क्षीरसागर एव च ।श्वेतद्वीपो मण्टपश्च दिव्यरत्नमयो महान् ॥54॥


पद्ममेतत्त्रयं देवी रमैव बहुरूपिणी ।सूर्यसोमहुताशाश्च पद्मे श्रीस्त्रिगुणात्मिका ॥55॥


आत्मान्तरात्मपरमज्ञानात्मानश्च मूर्तयः ।विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा तथैव च ॥56॥


प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहा चेति शक्तयः ।अष्टदिक्षु च मध्ये च स्वरूपाण्येव ता हरेः ॥57॥


ततोनन्तं योगपीठस्वरूपं पूजयेद्धरेः ।तत्रावाह्य हरिं चार्घ्यं पाद्यमाचमनीयकम् ॥58॥


मधुपर्कं पुनश्चाचां स्नानं वासो विभूषणम् ।उपवीतासने दत्वा गन्धपुष्पे तथैव च ॥59॥


लक्ष्मीधरे यजेत्तत्र पार्श्वयोरुभयोर्हरेः ।हृदयादींस्तथेन्द्रादिदिक्ष्वस्त्रं कोणकेषु च ॥60॥


वासुदेवादिकान् दिक्षु केशवादींस्ततः परम् ।मत्स्यं कूर्मं वराहं च नारसिंहं च वामनम् ॥61॥


भार्गवं राघवं कृष्णं बुद्धं कल्किनमेव च ।अनन्तं विश्वरूपं च तद्बहिः पूजयेत् क्रमात् ॥62॥


अनन्तब्रह्मवाय्वीशान् वीशं चाग्रे प्रपूजयेत् ।वारुणीं चैव गायत्रीं भारतीं गिरिजामपि ॥63॥


कोणेषु वीन्द्रवामे च सौपर्णीं पूजयेदपि ।इन्द्रादीन् शेषविध्यन्तान् सभार्यान् सपरिग्रहान् ॥64॥


धूपदीपौ ततो दत्वा नैवेद्यं मूलमन्त्रतः ।अनेन क्रमयोगेन जुहुयात् संस्कृतेनले ॥65॥


पुष्पाञ्जलिश्च होमश्च मूलेनाष्टोत्तरं शतम् ।सकृत् सकृत् पुष्पमन्यैर्होमस्तस्य चतुर्गुणः ॥66॥


विसर्जयित्वा नैवेद्यं मूलेन त्रिः समर्च्य च ।धूपदीपौ पुनर्दत्वा पुनर्मूलेन पूर्ववत् ॥67॥


अर्चयित्वा पुनर्ध्यात्वा जपेदष्टोत्तरं शतम् ।पुनर्ध्यायेद्धरिं सर्वदेवदेवेश्वरं प्रभुम् ॥68॥


जपध्यानहुतार्चादीनेवं यः कुरुते सदा ।धर्मार्थकाममोक्षाणां भाजनं स्यात् स एव हि ॥69॥


सर्वोत्तमं हरिं ज्ञात्वा य एवं भक्तिपूर्वकम् ।जपध्यानादिभिर्नित्यं पूजयेन्नास्य दुर्लभम् ॥70॥


भक्तिं कृत्वान्यदेवेषु ब्रह्मरुद्रादिकेष्वपि ।सर्वोत्कर्षमविज्ञाय विष्णोर्याति तमो ध्रुवम् ॥71॥


न यज्ञा न च तीर्थानि नोपवासव्रतानि च ।दैवतानि च सर्वाणि त्रातुं तं शक्नुयुः क्वचित् ॥72॥


हरिर्हि सर्वदेवानां परमः पूर्णशक्तिमान् ।स्वतन्त्रोन्ये तद्वशा हि सर्वेतः स जगद्गुरुः ॥73॥


ब्रह्मादयश्च तद्भक्त्या भागिनो भोगमोक्षयोः ।तस्माज्ज्ञेयश्च पूज्यश्च वन्द्यो ध्येयः सदा हरिः ॥74॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते तन्त्रसारसङ्ग्रहे प्रथमोध्यायः