Jump to content

Brahmasutra/C4/S2: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 1: Line 1:
__TOC__
<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
{{Adhyaya
| document_id  = BS
| document_id  = BS
Line 12: Line 14:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॥ 01-504
| verse_line1  = (504)ओं वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ओम् 04-02-01 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 20: Line 22:
| id      = BS_C04_S02_V01_B1
| id      = BS_C04_S02_V01_B1
| text    =
| text    =
वागभिमानिन्युमा मनोऽभिमानिनि रुद्रे विलीयते । वाचो मनोवशत्वदर्शनात् ।‘तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते’ इति शब्दाच्च ।
वागभिमानिन्युमा मनोऽभिमानिनि रुद्रे विलीयते । वाचो मनोवशत्वदर्शनात् ।‘तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते’(छां.उ.६.१५.१) इति शब्दाच्च ।
}}
}}


Line 27: Line 29:
| id      = BS_C04_S02_V01_B2
| id      = BS_C04_S02_V01_B2
| text    =
| text    =
‘उमा वै वाक् समुद्दिष्टा मनो रुद्र उदाहृतः ।तदेतन्मिथुनं ज्ञात्वा न दाम्पत्याद्विहीयते’ इति स्कान्दे ॥ 01 ॥
‘उमा वै वाक् समुद्दिष्टा मनो रुद्र उदाहृतः ।तदेतन्मिथुनं ज्ञात्वा न दाम्पत्याद् विहीयते’ इति स्कान्दे ॥ 01 ॥
}}
}}


Line 35: Line 37:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अत एव च सर्वाण्यनु ॥ 02-505
| verse_line1  = (505)ओम् अत एव च सर्वाण्यनु ओम् 04-02-02
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V02
| id      = BS_C04_S02_V02_author-note
| text    =
॥ इति वाङ्मनसाधिकरणम् ॥ 01 ॥
}}
}}


Line 67: Line 62:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥ 03-506
| verse_line1  = (506)ओं तन्मनः प्राण उत्तरात् ओम् 04-02-03 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V03
| id      = BS_C04_S02_V03_author-note
| text    =
॥ इति मनोऽधिकरणम् ॥ 02 ॥
}}
}}


Line 82: Line 70:
| id      = BS_C04_S02_V03_B1
| id      = BS_C04_S02_V03_B1
| text    =
| text    =
‘मनः प्राण’ इत्युत्तराद्वचनान्मनोभिमानी रुद्रः प्राणे वायौ विलीयते ।
‘मनः प्राणे’(छां.उ.६.१५.१) इत्युत्तराद् वचनान्मनोऽभिमानी रुद्रः प्राणे वायौ विलीयते ।
}}
}}


Line 99: Line 87:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ 04-507
| verse_line1  = (507)ओं सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ओम् ॥ 04-02-04
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V04
| id      = BS_C04_S02_V04_author-note
| text    =
॥ इति अध्यक्षाधिकरणम् ॥ 03 ॥
}}
}}


Line 121: Line 102:
| id      = BS_C04_S02_V04_B2
| id      = BS_C04_S02_V04_B2
| text    =
| text    =
‘सर्वे प्राणमुपगच्छन्ति प्राणः परमुपगच्छति प्राणं देवा अनुप्राणन्ति प्राणः परमानुप्राणिति तस्मादाहुः प्राणस्य प्राण इति’
‘सर्वे प्राणमुपगच्छन्ति प्राणः परममुपगच्छति प्राणं देवा अनुप्राणन्ति प्राणः परमानुप्राणिति तस्मादाहुः प्राणस्य प्राण इति’,‘प्राणः परस्यां देवतायाम्’ ।
‘प्राणः परस्यां देवतायाम्’ ।
}}
}}


Line 129: Line 109:
| id      = BS_C04_S02_V04_B4
| id      = BS_C04_S02_V04_B4
| text    =
| text    =
‘मुक्ताः सन्तोऽग्निमाविश्य देवाः सर्वेऽपि भुञ्जते
‘मुक्ताः सन्तोऽग्निमाविश्य देवाः सर्वेऽपि भुञ्जते ।अग्निरिन्द्रं तथेन्द्रश्च वायुमाविश्य सोऽपि तु ।आविश्य परमात्मानं भुङ्क्ते भोगांस्तु बाह्यकान् ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V04
| id      = BS_C04_S02_V04_B5
| text    =
‘अग्निरिन्द्रं तथेन्द्रश्च वायुमाविस्य सोऽपि तु
आविश्य परमात्मानं भङ्क्ते भोगांस्तु बाह्यकान् ॥
}}
}}


Line 144: Line 116:
| id      = BS_C04_S02_V04_B7
| id      = BS_C04_S02_V04_B7
| text    =
| text    =
ह्यानन्दो निजस्तेषां परैर्लभ्यः कथञ्चन
‘न ह्यानन्दो निजस्तेषां परैर्लभ्यः कथञ्चन ।किमु विष्णोः परानन्दो न ते विष्णुविति श्रुतेः ॥’
किमु विष्णोः परानन्दो न ते विष्णुविति श्रुतेः
}}
}}


Line 152: Line 123:
| id      = BS_C04_S02_V04_B9
| id      = BS_C04_S02_V04_B9
| text    =
| text    =
प्राणस्य तेजसि लयो मार्गमात्रमुदाहृतम्
प्राणस्य तेजसि लयो मार्गमात्रमुदाहृतम् ।सर्वेशितुश्च सर्वादेस्तस्यान्यत्र लयः कथम्’ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ॥ 04 ॥
सर्वेशितुश्च सर्वादेस्तस्यान्यत्र लयः कथम्’ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ॥ 04 ॥
}}
}}


Line 163: Line 133:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = भूतेषु तच्छ्रुतेः ॥ 05-508
| verse_line1  = (508)ओं भूतेषु तच्छ्रुतेः ओम् 04-02-05 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V05
| id      = BS_C04_S02_V05_author-note
| text    =
॥ इति भूताधिकरणम् ॥ 04 ॥
}}
}}


Line 178: Line 141:
| id      = BS_C04_S02_V05_B1
| id      = BS_C04_S02_V05_B1
| text    =
| text    =
भेतेष्वन्येषां देवानां लयः ।
भेतेष्वन्येषां देवानां लयः । ‘भूतेषु देवा विलीयन्ते भूतानि परे न पर उदेति  नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता’ इति बृहच्छ्रुतेः ॥ 05 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V05
| id      = BS_C04_S02_V05_B2
| text    =
भूतेषु देवा विलीयन्ते भूतानि परे न पर उदेति  नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता’ इति बृहच्छ्रुतेः ॥ 05 ॥
}}
}}


Line 195: Line 151:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नैकस्मिन् दर्शयतो हि ॥ 06-509
| verse_line1  = (509)ओं नैकस्मिन् दर्शयतो हि ओम् 04-02-06 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 201: Line 157:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V06
| verse_id = BS_C04_S02_V06
| id      = BS_C04_S02_V06_author-note
| id      = BS_C04_S02_V06_B1
| text    =
| text    =
इति अनेकलयाधिकरणम् (नैकस्मिन्नधिकरणम्) ॥ 05 ॥
नैकस्मिन् भूते सर्वेषां देवानां लयः ।‘पृथिव्यामृभवॊ विलीयन्ते मरुणेऽश्विनावग्नावग्नयो वायविन्द्रः सोम आदित्यो बृहस्पतिरित्याकाश एव साध्या विलीयन्ते’, ‘मृत्यवः पृथिव्यां वरुण आपोऽग्नयस्तेजसि मरुतो मारुत आकाशे विनायका विलीयन्ते’ इति महोपनिषत्, चतुर्वेदशिखा च दर्शयतः ।
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V06
| verse_id = BS_C04_S02_V06
| id      = BS_C04_S02_V06_B1
| id      = BS_C04_S02_V06_B2
| text    =
| text    =
नैकस्मिन् भूते सर्वेषां देवानां लयः ।‘पृथिव्यामृभवॊ विलीयन्ते मरुणेऽश्विनावग्नावग्नयो वायविन्द्रः सोम आदित्यो बृहस्पतिरित्याकाश एव साध्या विलीयन्ते । मृत्यवः पृथिव्यां वरुण आपोऽग्नयस्तेजसि मरुतो मारुत आकाशे विनायका विलीयन्ते’ इति महोपनिषच्चतुर्वेदशिखा च दर्शयतः । अतोऽग्नौ देवा विलीयते इत्यत्र निर्दिष्टानामेव ॥ 06 ॥
अतो ‘अग्नौ देवा विलीयन्ते’ इति तत्र निर्दिष्टानामेव ॥ 06 ॥
}}
}}


Line 220: Line 176:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = समना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ॥ 07-510
| verse_line1  = (510)ओं समना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ओम् 04-02-07 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 228: Line 184:
| id      = BS_C04_S02_V07_B1
| id      = BS_C04_S02_V07_B1
| text    =
| text    =
देशतः कालतश्च व्याप्त्या समो ना परमपुरुषो यस्याः सा समना । संसारानुपक्रमात् स्वतः एवामृतत्वं तस्याः । बृहच्छ्रुतिश्च –
देशतः कालतश्च व्याप्त्या समो ना परमपुरुषो यस्याः सा समना । संसारानुपक्रमात् स्वतः एवामृतत्वं तस्याः ।
}}
}}


Line 235: Line 191:
| id      = BS_C04_S02_V07_B2
| id      = BS_C04_S02_V07_B2
| text    =
| text    =
‘द्वौवाव सृत्यनुपक्रमौ प्रकृतिश्च परमश्च द्वावेतौ नित्यमुक्तौ नित्यौ च सर्वगतौ चैतौ ज्ञात्वा विमुच्यते’ इति । नैतावता साम्यम् ॥ 07 ॥
बृहच्छ्रुतिश्च –‘द्वौवाव सृत्यनुपक्रमौ प्रकृतिश्च परमश्च द्वावेतौ नित्यमुक्तौ नित्यौ च सर्वगतौ चैतौ ज्ञात्वा विमुच्यते’ इति । नैतावता साम्यम् ॥ 07 ॥
}}
}}


Line 243: Line 199:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तदपीतेः संसारव्यपदेशात् ॥ 08-511
| verse_line1  = (511)ओं तदपीतेः संसारव्यपदेशात् ओम् 04-02-08 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 259: Line 215:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्देः ॐ ॥ 09-512
| verse_line1  = (512)ओं सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ओम् 04-02-09 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 282: Line 238:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नोपमर्देनातः ॥ 10-513
| verse_line1  = (513)ओं नोपमर्देनातः ओम् 04-02-10 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 290: Line 246:
| id      = BS_C04_S02_V10_B1
| id      = BS_C04_S02_V10_B1
| text    =
| text    =
अतस्तस्ये यो विशेषगुणास्तेषामनुपमर्देनैव साम्यम् ।
अतस्तस्य ये विशेषगुणास्तेषामनुपमर्देनैव साम्यम् ।
}}
}}


Line 297: Line 253:
| id      = BS_C04_S02_V10_B2
| id      = BS_C04_S02_V10_B2
| text    =
| text    =
‘देशतः कालतश्चैव समा प्रकृतिरीश्वरे
‘देशतः कालतश्चैव समा प्रकृतिरीश्वरे ।उभयोरप्यबद्धत्वं तदबन्धः परात्मनः ।स्वत एव परेशस्य सा चोपास्ते सदा हरिम् ॥प्रकृतेः प्राकृतस्यापि ये गुणास्ते तु विष्णुना ।नियता नैव केनापि नियता हि हरेर्गुणाः’इति हि भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥
उभयोरप्यबद्धत्वं तदबन्धः परात्मनः
स्वत एव परेशस्य सा चोपास्ते सदा हरिम्
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V10
| id      = BS_C04_S02_V10_B5
| text    =
प्रकृतेः प्राकृतस्यापि ये गुणास्ते तु विष्णुना ।नियता नैव केनापि नियता हि हरेर्गुणाः’प् इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥
}}
}}


Line 314: Line 261:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अस्यैव चोपपत्तेरूष्मा ॥ 11-514
| verse_line1  = (514)ओम् अस्यैव चोपपत्तेरूष्मा ओम् 04-02-11 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 322: Line 269:
| id      = BS_C04_S02_V11_B1
| id      = BS_C04_S02_V11_B1
| text    =
| text    =
‘द्विधा हीदमवदृष्यते ऊष्मावदनूष्मावच्च । तत्रोष्मावत्परं ब्रह्म यन्न जिघ्रन्ति न पश्यन्ति न शृण्वन्ति न विजानन्ति । अथानूष्मावत्प्रकृतिश्च प्राकृतं च यन्न जिघ्रन्ति जिघ्रन्ति च यन्न पश्यन्ति पश्यन्ति च यन्न शृण्वन्ति शृण्वन्ति च यन्न जानन्ति जानन्ति च’ इति सौपर्णश्रुतेः किञ्चित्साम्योपपत्ते ॥ 11 ॥
‘द्विधा हीदमवदृष्यते ऊष्मावदनूष्मावच्च । तत्रोष्मावत् परं ब्रह्म यन्न जिघ्रन्ति न पश्यन्ति न शृण्वन्ति न विजानन्ति । अथानूष्मावत् प्रकृतिश्च प्राकृतं च यन्न जिघ्रन्ति जिघ्रन्ति च यन्न पश्यन्ति पश्यन्ति च यन्न शृण्वन्ति शृण्वन्ति च यन्न जानन्ति जानन्ति च’ इति सौपर्णश्रुतेः किञ्चित् साम्योपपत्तेः ॥ 11 ॥
}}
}}


Line 330: Line 277:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ॥ 12-515
| verse_line1  = (515)ओं प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ओम् 04-02-12 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 338: Line 285:
| id      = BS_C04_S02_V12_B1
| id      = BS_C04_S02_V12_B1
| text    =
| text    =
‘असमो वा एष परो न हि कश्चिदेवं दृश्यते सर्वे ह्येतेऽणवो जायन्ते च म्रियन्ते च छिद्रा ह्येते भवन्ति । अथ परो न जायते न म्रियते पूर्णश्चैष भवति’ इति चतुर्वेदशिखायां साम्यप्रतिषेधान्नेति चेन्न । शरीराद्धि साम्यं प्रतिषिध्यते ॥ 12 ॥
‘असमो वा एष परो नहि कश्चिदेवं दृश्यते सर्वे ह्येतेऽणवो जायन्ते च म्रियन्ते च छिद्रा ह्येते भवन्त्यथ परो न जायते न म्रियते पूर्णश्चैष भवति’ इति चतुर्वेदशिखायां साम्यप्रतिषेधान्नेति चेत्,
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V12
| id      = BS_C04_S02_V12_B2
| text    =
। शरीराद्धि साम्यं प्रतिषिध्यते ॥ 12 ॥
}}
}}


Line 346: Line 300:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स्पष्टो ह्येकेषाम् ॥ 13-516
| verse_line1  = (516)ओं स्पष्टो ह्येकेषाम् ओम् 04-02-13 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 361: Line 315:
| id      = BS_C04_S02_V13_B1
| id      = BS_C04_S02_V13_B1
| text    =
| text    =
‘अथातः समाश्चासमाश्चाभिधीयन्ते समासमाश्चाथ समानि ब्रह्मणो रूपाणि यैरुत्पत्तिः स्थितिर्लयो नियतिरायतिश्चैकं ह्येवैतद्भवत्यथासमा ब्रह्मेन्द्रो रुद्रः प्रजापतिर्बृहस्पतिर्ये के च देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरोऽसुरा यत्किञ्चेदं चरमचरं चाथ समाऽसमा प्रकृतिर्वाव समाऽसमैषा हि नित्याऽजरा तद्वशा च’
‘अथातः समाश्चासमाश्चाभिधीयन्ते समासमाश्चाथ समानि ब्रह्मणो रूपाणि यैरुत्पत्तिः स्थितिर्लयो नियतिरायतिश्च । एकं ह्येवैतद् भवत्यथासमा ब्रह्मेन्द्रो रुद्रः प्रजापतिर्बृहस्पतिर्येके च देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरोऽसुरा यत् किञ्चेदं चरमचरं चाथ समाऽसमा प्रकृतिर्वाव समाऽसमा । एषा हि नित्याऽजरा तद्वशा च’ इति स्पष्टो हि माध्यन्दिनायनानां समादिवादः ॥ 13 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V13
| id      = BS_C04_S02_V13_B2
| text    =
इति स्पष्टो हि माध्यन्दिनायानानां समाधिवादः ॥ 13 ॥
}}
}}


Line 376: Line 323:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = स्मर्यते च ॥ 14-517
| verse_line1  = (517)ओं स्मर्यते च ओम् 04-02-14 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V14
| id      = BS_C04_S02_V14_author-note
| text    =
॥ इति समनाधिकरणम् ॥ 06 ॥
}}
}}


Line 401: Line 341:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तानि परे तथा ह्याह ॥ 15-518
| verse_line1  = (518)ओं तानि परे तथा ह्याह ओम् 04-02-15 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V15
| id      = BS_C04_S02_V15_author-note
| text    =
॥ परा(लया)धिकरणम् ॥ 07 ॥
}}
}}


Line 423: Line 356:
| id      = BS_C04_S02_V15_B2
| id      = BS_C04_S02_V15_B2
| text    =
| text    =
‘सर्वे देवाः प्राणमाविष्य देवे मुक्तालयं परमे यान्त्यचिन्त्ये’ इति कौषारवश्रुतिः ॥ 15 ॥
‘सर्वे देवाः प्राणमाविष्य देवे मुक्ता लयं परमे यान्त्यचिन्त्ये’ इति हि कौषारवश्रुतिः ॥ 15 ॥
}}
}}


Line 433: Line 366:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अविभागो वचनात् ॥ 16-519
| verse_line1  = (519)ओम् अविभागो वचनात् ओम् 04-02-16 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V16
| id      = BS_C04_S02_V16_author-note
| text    =
॥ अविभागाधिकरणम् ॥ 08 ॥
}}
}}


Line 448: Line 374:
| id      = BS_C04_S02_V16_B1
| id      = BS_C04_S02_V16_B1
| text    =
| text    =
‘एते देवा एतमात्मानमनुविश्य सत्याः सत्यकामाः सत्यसङ्कल्पा यथानिकाममन्तर्बहिः परिचरन्ति’ इति गौपवनश्रुतिः ।
‘एते देवा एतमात्मानमनुविश्य सत्याः सत्यकामाः सत्यसङ्कल्पा यथानिकाममन्तर्बहिः परिचरन्ति’ इति गौपवनश्रुतिः । तत् परमेश्वरकामाद्यविभागेनैव तेषां सत्यकामत्वम् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V16
| id      = BS_C04_S02_V16_B2
| text    =
तत्परमेश्वरकामाद्यविभागेनैव तेषां सत्यकामत्वम् ।
}}
}}


Line 462: Line 381:
| id      = BS_C04_S02_V16_B3
| id      = BS_C04_S02_V16_B3
| text    =
| text    =
‘कामेन मे काम आगाद्धृदयाद्धृदयं मृत्योः’ इति वचनात् ।
‘कामेन मे काम आगाद्धृदयाद्धृदयं मृत्योः’(तै.आ.३.१५.४) इति वचनात् ।
}}
}}


Line 479: Line 398:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ॥ 17-520
| verse_line1  = (520)ओं तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ओम् 04-02-17 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 487: Line 406:
| id      = BS_C04_S02_V17_B1
| id      = BS_C04_S02_V17_B1
| text    =
| text    =
उत्क्रान्तिकाले हृदयस्याग्र ज्वलनं भवति।‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते’ इति श्रुतेः ।
उत्क्रान्तिकाले हृदयस्याग्रे ज्वलनं भवति।‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते’(बृ.उ.६.४.२) इति श्रुतेः ।
}}
}}


Line 501: Line 420:
| id      = BS_C04_S02_V17_B4
| id      = BS_C04_S02_V17_B4
| text    =
| text    =
‘यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्
‘यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः’(भ.गी.८.६) ॥इति स्मृतेर्विद्याशेषगत्यनुस्मरणयोगाच्च।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः’
इति स्मृतेर्विद्याशेषगत्यनुस्मरणयोगाच्च।
}}
}}


Line 510: Line 427:
| id      = BS_C04_S02_V17_B7
| id      = BS_C04_S02_V17_B7
| text    =
| text    =
‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’ इति हि लिङ्गम् ।
‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’(छां.उ.४.१४.१) इति हि लिङ्गम् ।
}}
}}


Line 517: Line 434:
| id      = BS_C04_S02_V17_B8
| id      = BS_C04_S02_V17_B8
| text    =
| text    =
‘हृदिस्थेनैव हरिणा तस्यैवानुग्रहेण तु ।उत्क्रान्तिर्ब्रह्मरन्द्रेण तमोवोपासतो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ।
‘हृदिस्थेनैव हरिणा तस्यैवानुग्रहेण तु ।उत्क्रान्तिर्ब्रह्मरन्ध्रेण तमोवोपासतो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ।
}}
}}


Line 524: Line 441:
| id      = BS_C04_S02_V17_B10
| id      = BS_C04_S02_V17_B10
| text    =
| text    =
‘शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका
‘शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।तयोर्ध्वमायान्नमृतत्वमेति विष्वङ्गन्या उत्क्रमणे भवन्ति’(क.उ.२.६.१६) इति च ॥ 17 ॥
तयोर्ध्वमायान्नमृतत्वमेति विष्वङ्गन्या उत्क्रमणे भवन्ति’ इति च ॥ 17 ॥
}}
}}


Line 533: Line 449:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = रश्म्यनुसारी ॥ 18-521
| verse_line1  = (521)ओं रश्म्यनुसारी ओम् 04-02-18 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 556: Line 472:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = निशि नेति चेन्न सम्बन्धात् ॥ 19-522
| verse_line1  = (522)ओं निशि नेति चेन्न सम्बन्धात् ओम् 04-02-19 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 564: Line 480:
| id      = BS_C04_S02_V19_B1
| id      = BS_C04_S02_V19_B1
| text    =
| text    =
रश्म्यभावान्निशि ज्ञानिना उत्क्रमणं न युक्तमिति चेन्न। सर्वदा सम्बन्धाद्रश्मीनाम् ॥ 19 ॥
रश्म्यभावान्निशि ज्ञानिन उत्क्रमणं न युक्तमिति चेत्,
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V19
| id      = BS_C04_S02_V19_B2
| text    =
न । सर्वदा सम्बन्धाद् रश्मीनाम् ॥ 19 ॥
}}
}}


Line 572: Line 495:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च ॥ 20-523
| verse_line1  = (523)ओं यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च ओम् 04-02-20 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 587: Line 510:
| id      = BS_C04_S02_V20_B1
| id      = BS_C04_S02_V20_B1
| text    =
| text    =
यावद्देहो विद्यते तावद्रश्मिसम्बन्धोऽस्त्येव
यावद् देहो विद्यते तावद् रश्मिसम्बन्धोऽस्त्येव
}}
}}


Line 594: Line 517:
| id      = BS_C04_S02_V20_B2
| id      = BS_C04_S02_V20_B2
| text    =
| text    =
‘संसृष्टा वा एते रश्मयश्च नाड्यश्च नैषां वियोगो यावदिदं शरीरमत एतैः पश्यत्येतैरुत्क्रामत्येतैः प्रवर्तते’ इति हि माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ 20 ॥
‘संसृष्टा वा एते रश्मयश्च नाड्यश्च नैषां वियोगो यावदिदं शरीरमत एतैः पश्यत्येतैरुत् क्रामत्येतैः प्रवर्तते’ इति हि माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ 20 ॥
}}
}}


Line 602: Line 525:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे ॥ 21-524
| verse_line1  = (524)ओम् अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे ओम् 04-02-21 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V21
| id      = BS_C04_S02_V21_author-note
| text    =
॥ इति हृदयाग्रज्वलना(तदोकोऽ)धिकरणम् ॥ 09 ॥
}}
}}


Line 617: Line 533:
| id      = BS_C04_S02_V21_B1
| id      = BS_C04_S02_V21_B1
| text    =
| text    =
‘दक्षिणे मरणाद्याति स्वर्गं ब्रहमोत्तरायणे’ इत्युक्तेऽपि ज्ञानिनो दक्षिणायनोत्क्रान्तिर्युज्यते
‘दक्षिणे मरणाद्याति स्वर्गं ब्रहमोत्तरायणे’ इत्युक्तेऽपि ज्ञानिनो दक्षिणायनोत्क्रान्तिर्युज्यते ॥’
}}
}}


Line 624: Line 540:
| id      = BS_C04_S02_V21_B3
| id      = BS_C04_S02_V21_B3
| text    =
| text    =
‘शतं पञ्चैव सूर्यस्य दक्षिणायनरश्मयः
‘शतं पञ्चैव सूर्यस्य दक्षिणायनरश्मयः ।तावन्त एव निर्दिष्टा उत्तरायणरश्मयः ॥ते सर्वे देहसम्बद्धाः सर्वदा सर्वदेहिनाम् ।महर्लोकादिगन्तरा उत्तरायणरश्मिभिः ।निर्गच्छन्तीतरैश्चापि यैरेष्टव्येतरा गतिः ॥उत्तरं दक्षिणमिति त एव तु निगद्यते ।न तु कालविशेषोऽस्ति ज्ञानिनां नियमात् फलम् ॥ददाति कालेऽनुगुणे फलं किञ्चिद्विशिष्यते ।अत्युत्तमानां केषाञ्चिन्न विशेषोऽस्ति कालतः’इति नारायणाध्यात्मे ॥ 21
तावन्त् एव निर्दिष्टा उत्तरायणरश्मयः ॥
}}
}}


{{Bhashyam
=== प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योगिनोऽधिकरणम्/योग्यधिकरणम्) ===
| verse_id = BS_C04_S02_V21
| id      = BS_C04_S02_V21_B5
| text    =
ते सर्वे देहसम्बद्दा सर्वदा सर्वदेहिनाम् ।
महर्लोकादिगन्तरा उत्तरायणरश्मिभिः ।
निर्गच्छन्तीतरैश्चापि यैरेष्टव्येतरा गतिः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V21
| id      = BS_C04_S02_V21_B8
| text    =
उत्तरं दक्षिणमिति त एव तु निगद्यते ।
न तु कालविशेषोऽस्ति ज्ञानिनां नियमात् फलम् ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V21
| id      = BS_C04_S02_V21_B10
| text    =
ददाति कालेऽनुगुणे फलं किञ्चिद्विशिष्यते ।अत्युत्तमानां केषाञ्चिन्न विशेषोऽस्ति कालतः’इति नारायणाध्यात्मे ॥ 21 ॥
}}
 
=== प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योग्यधिकरणम्) ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 659: Line 550:
| chapter_id    = BS_C04
| chapter_id    = BS_C04
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ॥ 22-525
| verse_line1  = (525)ओं योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ओम् 04-02-22 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V22
| id      = BS_C04_S02_V22_author-note
| text    =
॥ इति प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योग्यधिकरणम्) ॥ 10 ॥
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V22
| id      = BS_C04_S02_V22_author-note
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 04-02 ॥
}}
}}


Line 681: Line 558:
| id      = BS_C04_S02_V22_B1
| id      = BS_C04_S02_V22_B1
| text    =
| text    =
न केवलं कालादिकृते ब्रह्मचन्द्रगती स्मर्येते । किन्तु ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च ।
न केवलं कालादिकृते ब्रह्मचन्द्रगती स्मर्येते । किन्तु ? ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च ।
}}
}}


Line 688: Line 565:
| id      = BS_C04_S02_V22_B2
| id      = BS_C04_S02_V22_B2
| text    =
| text    =
‘अग्निर्ज्येतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्
‘अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।तत्र चान्द्रमासं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते’(भ.गी.८.२४-२५)
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्मब्रह्मविदो जनाः
इत्यत्र ‘योगी’ ति विशेषणात् स्मरणनिमित्ते चैते गती ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C04_S02_V22
| id      = BS_C04_S02_V22_B4
| text    =
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासादक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमासं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते’
इत्यत्र योगीति विशेषणात् स्मरणनिमित्ते चैते गती ।
}}
}}


Line 705: Line 573:
| id      = BS_C04_S02_V22_B7
| id      = BS_C04_S02_V22_B7
| text    =
| text    =
‘गत्यनुस्मरणाद्ब्रह्म चन्द्रं वा गच्छति ध्रुवम् ।अननुस्मरतः काले स्मरणं प्राप्य वैगतिः’इति हि आध्यात्मे ॥ 22 ॥
‘गत्यनुस्मरणाद् ब्रह्म चन्द्रं वा गच्छति ध्रुवम् ।अननुस्मरतः काले स्मरणं प्राप्य वैगतिः’इति (हि) अध्यात्मे ॥ 22 ॥
}}
}}




[[Category:Brahmasutra]]
[[Category:Brahmasutra]]

Revision as of 09:39, 10 April 2026

देवानां मोक्ष उत्क्रान्तिश्चास्मिन् पाद उच्यते –

वाङ्मनसाधिकरणम्

(504)ओं वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ओम् ॥ 04-02-01 ॥


वागभिमानिन्युमा मनोऽभिमानिनि रुद्रे विलीयते । वाचो मनोवशत्वदर्शनात् ।‘तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते’(छां.उ.६.१५.१) इति शब्दाच्च ।
‘उमा वै वाक् समुद्दिष्टा मनो रुद्र उदाहृतः ।तदेतन्मिथुनं ज्ञात्वा न दाम्पत्याद् विहीयते’ इति स्कान्दे ॥ 01 ॥
(505)ओम् अत एव च सर्वाण्यनु ओम् ॥ 04-02-02 ॥


अत एव चशब्दात् सर्वाणि दैवतानि यथानुकूलं विलीयन्ते ।
‘अग्नौ सर्वे देवा विलीयन्तेऽग्निरिन्द्रे इन्द्र उमायामुमा रुद्रे विलीयते एवमन्यानि दैवतानि यथाऽनुकूलम्’ इति गौपवनश्रुतिः ॥ 02 ॥

मनोऽधिकरणम्

(506)ओं तन्मनः प्राण उत्तरात् ओम् ॥ 04-02-03 ॥


‘मनः प्राणे’(छां.उ.६.१५.१) इत्युत्तराद् वचनान्मनोऽभिमानी रुद्रः प्राणे वायौ विलीयते ।
‘वायोर्वाव रुद्र उदेति वायौ विलीयते तस्मादाहुर्वायुर्देवानां श्रेष्ठः’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 03 ॥

अध्यक्षाधिकरणम्

(507)ओं सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ओम् ॥ 04-02-04 ॥


स प्राणः परमात्मनि विलीयते ।
‘सर्वे प्राणमुपगच्छन्ति प्राणः परममुपगच्छति प्राणं देवा अनुप्राणन्ति प्राणः परमानुप्राणिति तस्मादाहुः प्राणस्य प्राण इति’,‘प्राणः परस्यां देवतायाम्’ ।
‘मुक्ताः सन्तोऽग्निमाविश्य देवाः सर्वेऽपि भुञ्जते ।अग्निरिन्द्रं तथेन्द्रश्च वायुमाविश्य सोऽपि तु ।आविश्य परमात्मानं भुङ्क्ते भोगांस्तु बाह्यकान् ॥
‘न ह्यानन्दो निजस्तेषां परैर्लभ्यः कथञ्चन ।किमु विष्णोः परानन्दो न ते विष्णुविति श्रुतेः ॥’
प्राणस्य तेजसि लयो मार्गमात्रमुदाहृतम् ।सर्वेशितुश्च सर्वादेस्तस्यान्यत्र लयः कथम्’ ॥ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ॥ 04 ॥

भूताधिकरणम्

(508)ओं भूतेषु तच्छ्रुतेः ओम् ॥ 04-02-05 ॥


भेतेष्वन्येषां देवानां लयः । ‘भूतेषु देवा विलीयन्ते भूतानि परे न पर उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता’ इति बृहच्छ्रुतेः ॥ 05 ॥

अनेकलयाधिकरणम् (नैकस्मिन्नधिकरणम्)

(509)ओं नैकस्मिन् दर्शयतो हि ओम् ॥ 04-02-06 ॥


नैकस्मिन् भूते सर्वेषां देवानां लयः ।‘पृथिव्यामृभवॊ विलीयन्ते मरुणेऽश्विनावग्नावग्नयो वायविन्द्रः सोम आदित्यो बृहस्पतिरित्याकाश एव साध्या विलीयन्ते’, ‘मृत्यवः पृथिव्यां वरुण आपोऽग्नयस्तेजसि मरुतो मारुत आकाशे विनायका विलीयन्ते’ इति महोपनिषत्, चतुर्वेदशिखा च दर्शयतः ।
अतो ‘अग्नौ देवा विलीयन्ते’ इति तत्र निर्दिष्टानामेव ॥ 06 ॥

समनाधिकरणम्

(510)ओं समना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ओम् ॥ 04-02-07 ॥


देशतः कालतश्च व्याप्त्या समो ना परमपुरुषो यस्याः सा समना । संसारानुपक्रमात् स्वतः एवामृतत्वं तस्याः ।
बृहच्छ्रुतिश्च –‘द्वौवाव सृत्यनुपक्रमौ प्रकृतिश्च परमश्च द्वावेतौ नित्यमुक्तौ नित्यौ च सर्वगतौ चैतौ ज्ञात्वा विमुच्यते’ इति । नैतावता साम्यम् ॥ 07 ॥
(511)ओं तदपीतेः संसारव्यपदेशात् ओम् ॥ 04-02-08 ॥


‘समावेतौ प्रकृतिश्च परमश्च नित्यौ सर्वगतौ नित्यमुक्तावसमावेतौ प्रकृतिश्च परमश्च विलीनो हि प्रकृतौ संसारमेति विलीनः परमे ह्यमृतत्वमेति’ इति सौपर्णश्रुतेः ॥ 08 ॥
(512)ओं सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ओम् ॥ 04-02-09 ॥


सूक्ष्मत्वं चाधिकं ब्रह्मणः प्रकृतेः । ज्ञानानन्दैश्वर्यादिप्रमाणाधिक्यं च ।
‘सर्वतः प्रकृतिः सूक्ष्मा प्रकृतेः परमेश्वरः ।ज्ञानानन्दौ तथैश्वर्यं गुणाश्चान्येऽधिकाः प्रभोः’ इति च तुरश्रुतिः ॥ 09॥
(513)ओं नोपमर्देनातः ओम् ॥ 04-02-10 ॥


अतस्तस्य ये विशेषगुणास्तेषामनुपमर्देनैव साम्यम् ।
‘देशतः कालतश्चैव समा प्रकृतिरीश्वरे ।उभयोरप्यबद्धत्वं तदबन्धः परात्मनः ।स्वत एव परेशस्य सा चोपास्ते सदा हरिम् ॥प्रकृतेः प्राकृतस्यापि ये गुणास्ते तु विष्णुना ।नियता नैव केनापि नियता हि हरेर्गुणाः’इति हि भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥
(514)ओम् अस्यैव चोपपत्तेरूष्मा ओम् ॥ 04-02-11 ॥


‘द्विधा हीदमवदृष्यते ऊष्मावदनूष्मावच्च । तत्रोष्मावत् परं ब्रह्म यन्न जिघ्रन्ति न पश्यन्ति न शृण्वन्ति न विजानन्ति । अथानूष्मावत् प्रकृतिश्च प्राकृतं च यन्न जिघ्रन्ति जिघ्रन्ति च यन्न पश्यन्ति पश्यन्ति च यन्न शृण्वन्ति शृण्वन्ति च यन्न जानन्ति जानन्ति च’ इति सौपर्णश्रुतेः किञ्चित् साम्योपपत्तेः ॥ 11 ॥
(515)ओं प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ओम् ॥ 04-02-12 ॥


‘असमो वा एष परो नहि कश्चिदेवं दृश्यते सर्वे ह्येतेऽणवो जायन्ते च म्रियन्ते च छिद्रा ह्येते भवन्त्यथ परो न जायते न म्रियते पूर्णश्चैष भवति’ इति चतुर्वेदशिखायां साम्यप्रतिषेधान्नेति चेत्,
न । शरीराद्धि साम्यं प्रतिषिध्यते ॥ 12 ॥
(516)ओं स्पष्टो ह्येकेषाम् ओम् ॥ 04-02-13 ॥


कुतः ? –
‘अथातः समाश्चासमाश्चाभिधीयन्ते समासमाश्चाथ समानि ब्रह्मणो रूपाणि यैरुत्पत्तिः स्थितिर्लयो नियतिरायतिश्च । एकं ह्येवैतद् भवत्यथासमा ब्रह्मेन्द्रो रुद्रः प्रजापतिर्बृहस्पतिर्येके च देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरोऽसुरा यत् किञ्चेदं चरमचरं चाथ समाऽसमा प्रकृतिर्वाव समाऽसमा । एषा हि नित्याऽजरा तद्वशा च’ इति स्पष्टो हि माध्यन्दिनायनानां समादिवादः ॥ 13 ॥
(517)ओं स्मर्यते च ओम् ॥ 04-02-14 ॥


‘मत्स्यकूर्मवाराहाद्याः समा विष्णोरभेदतः ।ब्रह्माद्यास्त्वमाः प्रोक्ताः प्रकृतिश्च समासमा’ इति च वाराहे ॥ 14 ॥

परा(लया)धिकरणम्

(518)ओं तानि परे तथा ह्याह ओम् ॥ 04-02-15 ॥


प्राणद्वारेण सर्वाणि दैवतानि परमात्मनि विलीयन्ते ।
‘सर्वे देवाः प्राणमाविष्य देवे मुक्ता लयं परमे यान्त्यचिन्त्ये’ इति हि कौषारवश्रुतिः ॥ 15 ॥

अविभागाधिकरणम्

(519)ओम् अविभागो वचनात् ओम् ॥ 04-02-16 ॥


‘एते देवा एतमात्मानमनुविश्य सत्याः सत्यकामाः सत्यसङ्कल्पा यथानिकाममन्तर्बहिः परिचरन्ति’ इति गौपवनश्रुतिः । तत् परमेश्वरकामाद्यविभागेनैव तेषां सत्यकामत्वम् ।
‘कामेन मे काम आगाद्धृदयाद्धृदयं मृत्योः’(तै.आ.३.१५.४) इति वचनात् ।
‘मुक्तानां सत्यकामत्वं सामर्थ्यं च परस्य तु ।कामानुकूलकामत्वं नान्यत् तेषां विधीयते’ इति ब्राह्मे ॥ 16 ॥

हृदयाग्रज्वलना(तदोकोऽ)धिकरणम्

(520)ओं तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ओम् ॥ 04-02-17 ॥


उत्क्रान्तिकाले हृदयस्याग्रे ज्वलनं भवति।‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते’(बृ.उ.६.४.२) इति श्रुतेः ।
तत्प्रकाशितद्वारो निष्क्रामति । विद्यासामर्थ्यात् ।
‘यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः’(भ.गी.८.६) ॥इति स्मृतेर्विद्याशेषगत्यनुस्मरणयोगाच्च।
‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’(छां.उ.४.१४.१) इति हि लिङ्गम् ।
‘हृदिस्थेनैव हरिणा तस्यैवानुग्रहेण तु ।उत्क्रान्तिर्ब्रह्मरन्ध्रेण तमोवोपासतो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ।
‘शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।तयोर्ध्वमायान्नमृतत्वमेति विष्वङ्गन्या उत्क्रमणे भवन्ति’(क.उ.२.६.१६) इति च ॥ 17 ॥
(521)ओं रश्म्यनुसारी ओम् ॥ 04-02-18 ॥


निष्क्रामति ।
‘सहस्रं वा आदित्यस्य रश्मय आसु नाडीष्वाततास्तत्र श्वेतः सुषुम्नो ब्रह्मयानः सुषुम्नायामाततस्तत्प्रकाशेनैष निर्गच्छति’ इति हि पौत्रायणश्रुतिः ॥ 18 ॥
(522)ओं निशि नेति चेन्न सम्बन्धात् ओम् ॥ 04-02-19 ॥


रश्म्यभावान्निशि ज्ञानिन उत्क्रमणं न युक्तमिति चेत्,
न । सर्वदा सम्बन्धाद् रश्मीनाम् ॥ 19 ॥
(523)ओं यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च ओम् ॥ 04-02-20 ॥


कियत्कालम् ? –
यावद् देहो विद्यते तावद् रश्मिसम्बन्धोऽस्त्येव ।
‘संसृष्टा वा एते रश्मयश्च नाड्यश्च नैषां वियोगो यावदिदं शरीरमत एतैः पश्यत्येतैरुत् क्रामत्येतैः प्रवर्तते’ ॥ इति हि माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ 20 ॥
(524)ओम् अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे ओम् ॥ 04-02-21 ॥


‘दक्षिणे मरणाद्याति स्वर्गं ब्रहमोत्तरायणे’ । इत्युक्तेऽपि ज्ञानिनो दक्षिणायनोत्क्रान्तिर्युज्यते ॥’
‘शतं पञ्चैव सूर्यस्य दक्षिणायनरश्मयः ।तावन्त एव निर्दिष्टा उत्तरायणरश्मयः ॥ते सर्वे देहसम्बद्धाः सर्वदा सर्वदेहिनाम् ।महर्लोकादिगन्तरा उत्तरायणरश्मिभिः ।निर्गच्छन्तीतरैश्चापि यैरेष्टव्येतरा गतिः ॥उत्तरं दक्षिणमिति त एव तु निगद्यते ।न तु कालविशेषोऽस्ति ज्ञानिनां नियमात् फलम् ॥ददाति कालेऽनुगुणे फलं किञ्चिद्विशिष्यते ।अत्युत्तमानां केषाञ्चिन्न विशेषोऽस्ति कालतः’इति नारायणाध्यात्मे ॥ 21 ॥

प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योगिनोऽधिकरणम्/योग्यधिकरणम्)

(525)ओं योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ओम् ॥ 04-02-22 ॥


न केवलं कालादिकृते ब्रह्मचन्द्रगती स्मर्येते । किन्तु ? ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च ।
‘अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।तत्र चान्द्रमासं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते’(भ.गी.८.२४-२५) इत्यत्र ‘योगी’ ति विशेषणात् । स्मरणनिमित्ते चैते गती ।
‘गत्यनुस्मरणाद् ब्रह्म चन्द्रं वा गच्छति ध्रुवम् ।अननुस्मरतः काले स्मरणं प्राप्य वैगतिः’इति (हि) अध्यात्मे ॥ 22 ॥