Brahmasutra/C4/S2: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (504)ओं वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ओम् ॥ 04-02-01 ॥ | ||
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वागभिमानिन्युमा मनोऽभिमानिनि रुद्रे विलीयते । वाचो मनोवशत्वदर्शनात् ।‘तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते’ इति शब्दाच्च । | वागभिमानिन्युमा मनोऽभिमानिनि रुद्रे विलीयते । वाचो मनोवशत्वदर्शनात् ।‘तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते’(छां.उ.६.१५.१) इति शब्दाच्च । | ||
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‘उमा वै वाक् समुद्दिष्टा मनो रुद्र उदाहृतः ।तदेतन्मिथुनं ज्ञात्वा न | ‘उमा वै वाक् समुद्दिष्टा मनो रुद्र उदाहृतः ।तदेतन्मिथुनं ज्ञात्वा न दाम्पत्याद् विहीयते’ इति स्कान्दे ॥ 01 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (505)ओम् अत एव च सर्वाण्यनु ओम् ॥ 04-02-02 ॥ | ||
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‘मनः | ‘मनः प्राणे’(छां.उ.६.१५.१) इत्युत्तराद् वचनान्मनोऽभिमानी रुद्रः प्राणे वायौ विलीयते । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (507)ओं सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ओम् ॥ 04-02-04 ॥ | ||
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‘सर्वे प्राणमुपगच्छन्ति प्राणः | ‘सर्वे प्राणमुपगच्छन्ति प्राणः परममुपगच्छति प्राणं देवा अनुप्राणन्ति प्राणः परमानुप्राणिति तस्मादाहुः प्राणस्य प्राण इति’,‘प्राणः परस्यां देवतायाम्’ । | ||
‘प्राणः परस्यां देवतायाम्’ । | |||
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‘मुक्ताः सन्तोऽग्निमाविश्य देवाः सर्वेऽपि भुञ्जते | ‘मुक्ताः सन्तोऽग्निमाविश्य देवाः सर्वेऽपि भुञ्जते ।अग्निरिन्द्रं तथेन्द्रश्च वायुमाविश्य सोऽपि तु ।आविश्य परमात्मानं भुङ्क्ते भोगांस्तु बाह्यकान् ॥ | ||
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‘न ह्यानन्दो निजस्तेषां परैर्लभ्यः कथञ्चन ।किमु विष्णोः परानन्दो न ते विष्णुविति श्रुतेः ॥’ | |||
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प्राणस्य तेजसि लयो मार्गमात्रमुदाहृतम् | प्राणस्य तेजसि लयो मार्गमात्रमुदाहृतम् ।सर्वेशितुश्च सर्वादेस्तस्यान्यत्र लयः कथम्’ ॥ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ॥ 04 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (508)ओं भूतेषु तच्छ्रुतेः ओम् ॥ 04-02-05 ॥ | ||
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भेतेष्वन्येषां देवानां लयः । | भेतेष्वन्येषां देवानां लयः । ‘भूतेषु देवा विलीयन्ते भूतानि परे न पर उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता’ इति बृहच्छ्रुतेः ॥ 05 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (509)ओं नैकस्मिन् दर्शयतो हि ओम् ॥ 04-02-06 ॥ | ||
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नैकस्मिन् भूते सर्वेषां देवानां लयः ।‘पृथिव्यामृभवॊ विलीयन्ते मरुणेऽश्विनावग्नावग्नयो वायविन्द्रः सोम आदित्यो बृहस्पतिरित्याकाश एव साध्या विलीयन्ते’, ‘मृत्यवः पृथिव्यां वरुण आपोऽग्नयस्तेजसि मरुतो मारुत आकाशे विनायका विलीयन्ते’ इति महोपनिषत्, चतुर्वेदशिखा च दर्शयतः । | |||
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अतो ‘अग्नौ देवा विलीयन्ते’ इति तत्र निर्दिष्टानामेव ॥ 06 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (510)ओं समना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ओम् ॥ 04-02-07 ॥ | ||
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देशतः कालतश्च व्याप्त्या समो ना परमपुरुषो यस्याः सा समना । संसारानुपक्रमात् स्वतः एवामृतत्वं तस्याः । | देशतः कालतश्च व्याप्त्या समो ना परमपुरुषो यस्याः सा समना । संसारानुपक्रमात् स्वतः एवामृतत्वं तस्याः । | ||
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बृहच्छ्रुतिश्च –‘द्वौवाव सृत्यनुपक्रमौ प्रकृतिश्च परमश्च द्वावेतौ नित्यमुक्तौ नित्यौ च सर्वगतौ चैतौ ज्ञात्वा विमुच्यते’ इति । नैतावता साम्यम् ॥ 07 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (512)ओं सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ओम् ॥ 04-02-09 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (513)ओं नोपमर्देनातः ओम् ॥ 04-02-10 ॥ | ||
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अतस्तस्य ये विशेषगुणास्तेषामनुपमर्देनैव साम्यम् । | |||
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‘देशतः कालतश्चैव समा प्रकृतिरीश्वरे | ‘देशतः कालतश्चैव समा प्रकृतिरीश्वरे ।उभयोरप्यबद्धत्वं तदबन्धः परात्मनः ।स्वत एव परेशस्य सा चोपास्ते सदा हरिम् ॥प्रकृतेः प्राकृतस्यापि ये गुणास्ते तु विष्णुना ।नियता नैव केनापि नियता हि हरेर्गुणाः’इति हि भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥ | ||
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| Line 314: | Line 261: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (514)ओम् अस्यैव चोपपत्तेरूष्मा ओम् ॥ 04-02-11 ॥ | ||
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| Line 322: | Line 269: | ||
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‘द्विधा हीदमवदृष्यते ऊष्मावदनूष्मावच्च । | ‘द्विधा हीदमवदृष्यते ऊष्मावदनूष्मावच्च । तत्रोष्मावत् परं ब्रह्म यन्न जिघ्रन्ति न पश्यन्ति न शृण्वन्ति न विजानन्ति । अथानूष्मावत् प्रकृतिश्च प्राकृतं च यन्न जिघ्रन्ति जिघ्रन्ति च यन्न पश्यन्ति पश्यन्ति च यन्न शृण्वन्ति शृण्वन्ति च यन्न जानन्ति जानन्ति च’ इति सौपर्णश्रुतेः किञ्चित् साम्योपपत्तेः ॥ 11 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (515)ओं प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ओम् ॥ 04-02-12 ॥ | ||
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‘असमो वा एष परो | ‘असमो वा एष परो नहि कश्चिदेवं दृश्यते सर्वे ह्येतेऽणवो जायन्ते च म्रियन्ते च छिद्रा ह्येते भवन्त्यथ परो न जायते न म्रियते पूर्णश्चैष भवति’ इति चतुर्वेदशिखायां साम्यप्रतिषेधान्नेति चेत्, | ||
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न । शरीराद्धि साम्यं प्रतिषिध्यते ॥ 12 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (516)ओं स्पष्टो ह्येकेषाम् ओम् ॥ 04-02-13 ॥ | ||
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‘अथातः समाश्चासमाश्चाभिधीयन्ते समासमाश्चाथ समानि ब्रह्मणो रूपाणि यैरुत्पत्तिः स्थितिर्लयो | ‘अथातः समाश्चासमाश्चाभिधीयन्ते समासमाश्चाथ समानि ब्रह्मणो रूपाणि यैरुत्पत्तिः स्थितिर्लयो नियतिरायतिश्च । एकं ह्येवैतद् भवत्यथासमा ब्रह्मेन्द्रो रुद्रः प्रजापतिर्बृहस्पतिर्येके च देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरोऽसुरा यत् किञ्चेदं चरमचरं चाथ समाऽसमा प्रकृतिर्वाव समाऽसमा । एषा हि नित्याऽजरा तद्वशा च’ इति स्पष्टो हि माध्यन्दिनायनानां समादिवादः ॥ 13 ॥ | ||
इति स्पष्टो हि | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (517)ओं स्मर्यते च ओम् ॥ 04-02-14 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (518)ओं तानि परे तथा ह्याह ओम् ॥ 04-02-15 ॥ | ||
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‘सर्वे देवाः प्राणमाविष्य देवे | ‘सर्वे देवाः प्राणमाविष्य देवे मुक्ता लयं परमे यान्त्यचिन्त्ये’ इति हि कौषारवश्रुतिः ॥ 15 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 433: | Line 366: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (519)ओम् अविभागो वचनात् ओम् ॥ 04-02-16 ॥ | ||
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| Line 448: | Line 374: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एते देवा एतमात्मानमनुविश्य सत्याः सत्यकामाः सत्यसङ्कल्पा यथानिकाममन्तर्बहिः परिचरन्ति’ इति गौपवनश्रुतिः । | ‘एते देवा एतमात्मानमनुविश्य सत्याः सत्यकामाः सत्यसङ्कल्पा यथानिकाममन्तर्बहिः परिचरन्ति’ इति गौपवनश्रुतिः । तत् परमेश्वरकामाद्यविभागेनैव तेषां सत्यकामत्वम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 462: | Line 381: | ||
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| text = | | text = | ||
‘कामेन मे काम आगाद्धृदयाद्धृदयं मृत्योः’ इति वचनात् । | ‘कामेन मे काम आगाद्धृदयाद्धृदयं मृत्योः’(तै.आ.३.१५.४) इति वचनात् । | ||
}} | }} | ||
| Line 479: | Line 398: | ||
| chapter_id = BS_C04 | | chapter_id = BS_C04 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (520)ओं तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ओम् ॥ 04-02-17 ॥ | ||
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| Line 487: | Line 406: | ||
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उत्क्रान्तिकाले | उत्क्रान्तिकाले हृदयस्याग्रे ज्वलनं भवति।‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते’(बृ.उ.६.४.२) इति श्रुतेः । | ||
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| Line 501: | Line 420: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् | ‘यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः’(भ.गी.८.६) ॥इति स्मृतेर्विद्याशेषगत्यनुस्मरणयोगाच्च। | ||
}} | }} | ||
| Line 510: | Line 427: | ||
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| text = | | text = | ||
‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’ इति हि लिङ्गम् । | ‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’(छां.उ.४.१४.१) इति हि लिङ्गम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 517: | Line 434: | ||
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| text = | | text = | ||
‘हृदिस्थेनैव हरिणा तस्यैवानुग्रहेण तु | ‘हृदिस्थेनैव हरिणा तस्यैवानुग्रहेण तु ।उत्क्रान्तिर्ब्रह्मरन्ध्रेण तमोवोपासतो भवेत्’ इति चाध्यात्मे । | ||
}} | }} | ||
| Line 524: | Line 441: | ||
| id = BS_C04_S02_V17_B10 | | id = BS_C04_S02_V17_B10 | ||
| text = | | text = | ||
‘शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका | ‘शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।तयोर्ध्वमायान्नमृतत्वमेति विष्वङ्गन्या उत्क्रमणे भवन्ति’(क.उ.२.६.१६) इति च ॥ 17 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 533: | Line 449: | ||
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| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (521)ओं रश्म्यनुसारी ओम् ॥ 04-02-18 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
}} | }} | ||
| Line 556: | Line 472: | ||
| chapter_id = BS_C04 | | chapter_id = BS_C04 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = (522)ओं निशि नेति चेन्न सम्बन्धात् ओम् ॥ 04-02-19 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 564: | Line 480: | ||
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रश्म्यभावान्निशि | रश्म्यभावान्निशि ज्ञानिन उत्क्रमणं न युक्तमिति चेत्, | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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न । सर्वदा सम्बन्धाद् रश्मीनाम् ॥ 19 ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (523)ओं यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च ओम् ॥ 04-02-20 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 587: | Line 510: | ||
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यावद् देहो विद्यते तावद् रश्मिसम्बन्धोऽस्त्येव । | |||
}} | }} | ||
| Line 594: | Line 517: | ||
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‘संसृष्टा वा एते रश्मयश्च नाड्यश्च नैषां वियोगो | ‘संसृष्टा वा एते रश्मयश्च नाड्यश्च नैषां वियोगो यावदिदं शरीरमत एतैः पश्यत्येतैरुत् क्रामत्येतैः प्रवर्तते’ ॥ इति हि माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ 20 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 602: | Line 525: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (524)ओम् अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे ओम् ॥ 04-02-21 ॥ | ||
| commentary1 = brahmasutra | | commentary1 = brahmasutra | ||
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‘दक्षिणे मरणाद्याति स्वर्गं ब्रहमोत्तरायणे’ इत्युक्तेऽपि ज्ञानिनो दक्षिणायनोत्क्रान्तिर्युज्यते | ‘दक्षिणे मरणाद्याति स्वर्गं ब्रहमोत्तरायणे’ । इत्युक्तेऽपि ज्ञानिनो दक्षिणायनोत्क्रान्तिर्युज्यते ॥’ | ||
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‘शतं पञ्चैव सूर्यस्य दक्षिणायनरश्मयः | ‘शतं पञ्चैव सूर्यस्य दक्षिणायनरश्मयः ।तावन्त एव निर्दिष्टा उत्तरायणरश्मयः ॥ते सर्वे देहसम्बद्धाः सर्वदा सर्वदेहिनाम् ।महर्लोकादिगन्तरा उत्तरायणरश्मिभिः ।निर्गच्छन्तीतरैश्चापि यैरेष्टव्येतरा गतिः ॥उत्तरं दक्षिणमिति त एव तु निगद्यते ।न तु कालविशेषोऽस्ति ज्ञानिनां नियमात् फलम् ॥ददाति कालेऽनुगुणे फलं किञ्चिद्विशिष्यते ।अत्युत्तमानां केषाञ्चिन्न विशेषोऽस्ति कालतः’इति नारायणाध्यात्मे ॥ 21 ॥ | ||
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=== प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योगिनोऽधिकरणम्/योग्यधिकरणम्) === | |||
=== प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योग्यधिकरणम्) === | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = (525)ओं योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ओम् ॥ 04-02-22 ॥ | ||
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न केवलं कालादिकृते ब्रह्मचन्द्रगती स्मर्येते । किन्तु ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च । | न केवलं कालादिकृते ब्रह्मचन्द्रगती स्मर्येते । किन्तु ? ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च । | ||
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‘अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।तत्र चान्द्रमासं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते’(भ.गी.८.२४-२५) | |||
इत्यत्र ‘योगी’ ति विशेषणात् । स्मरणनिमित्ते चैते गती । | |||
इत्यत्र | |||
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‘गत्यनुस्मरणाद् ब्रह्म चन्द्रं वा गच्छति ध्रुवम् ।अननुस्मरतः काले स्मरणं प्राप्य वैगतिः’इति (हि) अध्यात्मे ॥ 22 ॥ | |||
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Revision as of 09:39, 10 April 2026
देवानां मोक्ष उत्क्रान्तिश्चास्मिन् पाद उच्यते –
वाङ्मनसाधिकरणम्
(504)ओं वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ओम् ॥ 04-02-01 ॥
वागभिमानिन्युमा मनोऽभिमानिनि रुद्रे विलीयते । वाचो मनोवशत्वदर्शनात् ।‘तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते’(छां.उ.६.१५.१) इति शब्दाच्च ।
‘उमा वै वाक् समुद्दिष्टा मनो रुद्र उदाहृतः ।तदेतन्मिथुनं ज्ञात्वा न दाम्पत्याद् विहीयते’ इति स्कान्दे ॥ 01 ॥
(505)ओम् अत एव च सर्वाण्यनु ओम् ॥ 04-02-02 ॥
अत एव चशब्दात् सर्वाणि दैवतानि यथानुकूलं विलीयन्ते ।
‘अग्नौ सर्वे देवा विलीयन्तेऽग्निरिन्द्रे इन्द्र उमायामुमा रुद्रे विलीयते एवमन्यानि दैवतानि यथाऽनुकूलम्’ इति गौपवनश्रुतिः ॥ 02 ॥
मनोऽधिकरणम्
(506)ओं तन्मनः प्राण उत्तरात् ओम् ॥ 04-02-03 ॥
‘मनः प्राणे’(छां.उ.६.१५.१) इत्युत्तराद् वचनान्मनोऽभिमानी रुद्रः प्राणे वायौ विलीयते ।
‘वायोर्वाव रुद्र उदेति वायौ विलीयते तस्मादाहुर्वायुर्देवानां श्रेष्ठः’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 03 ॥
अध्यक्षाधिकरणम्
(507)ओं सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ओम् ॥ 04-02-04 ॥
स प्राणः परमात्मनि विलीयते ।
‘सर्वे प्राणमुपगच्छन्ति प्राणः परममुपगच्छति प्राणं देवा अनुप्राणन्ति प्राणः परमानुप्राणिति तस्मादाहुः प्राणस्य प्राण इति’,‘प्राणः परस्यां देवतायाम्’ ।
‘मुक्ताः सन्तोऽग्निमाविश्य देवाः सर्वेऽपि भुञ्जते ।अग्निरिन्द्रं तथेन्द्रश्च वायुमाविश्य सोऽपि तु ।आविश्य परमात्मानं भुङ्क्ते भोगांस्तु बाह्यकान् ॥
‘न ह्यानन्दो निजस्तेषां परैर्लभ्यः कथञ्चन ।किमु विष्णोः परानन्दो न ते विष्णुविति श्रुतेः ॥’
प्राणस्य तेजसि लयो मार्गमात्रमुदाहृतम् ।सर्वेशितुश्च सर्वादेस्तस्यान्यत्र लयः कथम्’ ॥ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ॥ 04 ॥
भूताधिकरणम्
(508)ओं भूतेषु तच्छ्रुतेः ओम् ॥ 04-02-05 ॥
भेतेष्वन्येषां देवानां लयः । ‘भूतेषु देवा विलीयन्ते भूतानि परे न पर उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता’ इति बृहच्छ्रुतेः ॥ 05 ॥
अनेकलयाधिकरणम् (नैकस्मिन्नधिकरणम्)
(509)ओं नैकस्मिन् दर्शयतो हि ओम् ॥ 04-02-06 ॥
नैकस्मिन् भूते सर्वेषां देवानां लयः ।‘पृथिव्यामृभवॊ विलीयन्ते मरुणेऽश्विनावग्नावग्नयो वायविन्द्रः सोम आदित्यो बृहस्पतिरित्याकाश एव साध्या विलीयन्ते’, ‘मृत्यवः पृथिव्यां वरुण आपोऽग्नयस्तेजसि मरुतो मारुत आकाशे विनायका विलीयन्ते’ इति महोपनिषत्, चतुर्वेदशिखा च दर्शयतः ।
अतो ‘अग्नौ देवा विलीयन्ते’ इति तत्र निर्दिष्टानामेव ॥ 06 ॥
समनाधिकरणम्
(510)ओं समना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ओम् ॥ 04-02-07 ॥
देशतः कालतश्च व्याप्त्या समो ना परमपुरुषो यस्याः सा समना । संसारानुपक्रमात् स्वतः एवामृतत्वं तस्याः ।
बृहच्छ्रुतिश्च –‘द्वौवाव सृत्यनुपक्रमौ प्रकृतिश्च परमश्च द्वावेतौ नित्यमुक्तौ नित्यौ च सर्वगतौ चैतौ ज्ञात्वा विमुच्यते’ इति । नैतावता साम्यम् ॥ 07 ॥
(511)ओं तदपीतेः संसारव्यपदेशात् ओम् ॥ 04-02-08 ॥
‘समावेतौ प्रकृतिश्च परमश्च नित्यौ सर्वगतौ नित्यमुक्तावसमावेतौ प्रकृतिश्च परमश्च विलीनो हि प्रकृतौ संसारमेति विलीनः परमे ह्यमृतत्वमेति’ इति सौपर्णश्रुतेः ॥ 08 ॥
(512)ओं सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्धेः ओम् ॥ 04-02-09 ॥
सूक्ष्मत्वं चाधिकं ब्रह्मणः प्रकृतेः । ज्ञानानन्दैश्वर्यादिप्रमाणाधिक्यं च ।
‘सर्वतः प्रकृतिः सूक्ष्मा प्रकृतेः परमेश्वरः ।ज्ञानानन्दौ तथैश्वर्यं गुणाश्चान्येऽधिकाः प्रभोः’ इति च तुरश्रुतिः ॥ 09॥
(513)ओं नोपमर्देनातः ओम् ॥ 04-02-10 ॥
अतस्तस्य ये विशेषगुणास्तेषामनुपमर्देनैव साम्यम् ।
‘देशतः कालतश्चैव समा प्रकृतिरीश्वरे ।उभयोरप्यबद्धत्वं तदबन्धः परात्मनः ।स्वत एव परेशस्य सा चोपास्ते सदा हरिम् ॥प्रकृतेः प्राकृतस्यापि ये गुणास्ते तु विष्णुना ।नियता नैव केनापि नियता हि हरेर्गुणाः’इति हि भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥
(514)ओम् अस्यैव चोपपत्तेरूष्मा ओम् ॥ 04-02-11 ॥
‘द्विधा हीदमवदृष्यते ऊष्मावदनूष्मावच्च । तत्रोष्मावत् परं ब्रह्म यन्न जिघ्रन्ति न पश्यन्ति न शृण्वन्ति न विजानन्ति । अथानूष्मावत् प्रकृतिश्च प्राकृतं च यन्न जिघ्रन्ति जिघ्रन्ति च यन्न पश्यन्ति पश्यन्ति च यन्न शृण्वन्ति शृण्वन्ति च यन्न जानन्ति जानन्ति च’ इति सौपर्णश्रुतेः किञ्चित् साम्योपपत्तेः ॥ 11 ॥
(515)ओं प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ओम् ॥ 04-02-12 ॥
‘असमो वा एष परो नहि कश्चिदेवं दृश्यते सर्वे ह्येतेऽणवो जायन्ते च म्रियन्ते च छिद्रा ह्येते भवन्त्यथ परो न जायते न म्रियते पूर्णश्चैष भवति’ इति चतुर्वेदशिखायां साम्यप्रतिषेधान्नेति चेत्,
न । शरीराद्धि साम्यं प्रतिषिध्यते ॥ 12 ॥
(516)ओं स्पष्टो ह्येकेषाम् ओम् ॥ 04-02-13 ॥
कुतः ? –
‘अथातः समाश्चासमाश्चाभिधीयन्ते समासमाश्चाथ समानि ब्रह्मणो रूपाणि यैरुत्पत्तिः स्थितिर्लयो नियतिरायतिश्च । एकं ह्येवैतद् भवत्यथासमा ब्रह्मेन्द्रो रुद्रः प्रजापतिर्बृहस्पतिर्येके च देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरोऽसुरा यत् किञ्चेदं चरमचरं चाथ समाऽसमा प्रकृतिर्वाव समाऽसमा । एषा हि नित्याऽजरा तद्वशा च’ इति स्पष्टो हि माध्यन्दिनायनानां समादिवादः ॥ 13 ॥
(517)ओं स्मर्यते च ओम् ॥ 04-02-14 ॥
‘मत्स्यकूर्मवाराहाद्याः समा विष्णोरभेदतः ।ब्रह्माद्यास्त्वमाः प्रोक्ताः प्रकृतिश्च समासमा’ इति च वाराहे ॥ 14 ॥
परा(लया)धिकरणम्
(518)ओं तानि परे तथा ह्याह ओम् ॥ 04-02-15 ॥
प्राणद्वारेण सर्वाणि दैवतानि परमात्मनि विलीयन्ते ।
‘सर्वे देवाः प्राणमाविष्य देवे मुक्ता लयं परमे यान्त्यचिन्त्ये’ इति हि कौषारवश्रुतिः ॥ 15 ॥
अविभागाधिकरणम्
(519)ओम् अविभागो वचनात् ओम् ॥ 04-02-16 ॥
‘एते देवा एतमात्मानमनुविश्य सत्याः सत्यकामाः सत्यसङ्कल्पा यथानिकाममन्तर्बहिः परिचरन्ति’ इति गौपवनश्रुतिः । तत् परमेश्वरकामाद्यविभागेनैव तेषां सत्यकामत्वम् ।
‘कामेन मे काम आगाद्धृदयाद्धृदयं मृत्योः’(तै.आ.३.१५.४) इति वचनात् ।
‘मुक्तानां सत्यकामत्वं सामर्थ्यं च परस्य तु ।कामानुकूलकामत्वं नान्यत् तेषां विधीयते’ इति ब्राह्मे ॥ 16 ॥
हृदयाग्रज्वलना(तदोकोऽ)धिकरणम्
(520)ओं तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ओम् ॥ 04-02-17 ॥
उत्क्रान्तिकाले हृदयस्याग्रे ज्वलनं भवति।‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते’(बृ.उ.६.४.२) इति श्रुतेः ।
तत्प्रकाशितद्वारो निष्क्रामति । विद्यासामर्थ्यात् ।
‘यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः’(भ.गी.८.६) ॥इति स्मृतेर्विद्याशेषगत्यनुस्मरणयोगाच्च।
‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’(छां.उ.४.१४.१) इति हि लिङ्गम् ।
‘हृदिस्थेनैव हरिणा तस्यैवानुग्रहेण तु ।उत्क्रान्तिर्ब्रह्मरन्ध्रेण तमोवोपासतो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ।
‘शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।तयोर्ध्वमायान्नमृतत्वमेति विष्वङ्गन्या उत्क्रमणे भवन्ति’(क.उ.२.६.१६) इति च ॥ 17 ॥
(521)ओं रश्म्यनुसारी ओम् ॥ 04-02-18 ॥
निष्क्रामति ।
‘सहस्रं वा आदित्यस्य रश्मय आसु नाडीष्वाततास्तत्र श्वेतः सुषुम्नो ब्रह्मयानः सुषुम्नायामाततस्तत्प्रकाशेनैष निर्गच्छति’ इति हि पौत्रायणश्रुतिः ॥ 18 ॥
(522)ओं निशि नेति चेन्न सम्बन्धात् ओम् ॥ 04-02-19 ॥
रश्म्यभावान्निशि ज्ञानिन उत्क्रमणं न युक्तमिति चेत्,
न । सर्वदा सम्बन्धाद् रश्मीनाम् ॥ 19 ॥
(523)ओं यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च ओम् ॥ 04-02-20 ॥
कियत्कालम् ? –
यावद् देहो विद्यते तावद् रश्मिसम्बन्धोऽस्त्येव ।
‘संसृष्टा वा एते रश्मयश्च नाड्यश्च नैषां वियोगो यावदिदं शरीरमत एतैः पश्यत्येतैरुत् क्रामत्येतैः प्रवर्तते’ ॥ इति हि माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ 20 ॥
(524)ओम् अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे ओम् ॥ 04-02-21 ॥
‘दक्षिणे मरणाद्याति स्वर्गं ब्रहमोत्तरायणे’ । इत्युक्तेऽपि ज्ञानिनो दक्षिणायनोत्क्रान्तिर्युज्यते ॥’
‘शतं पञ्चैव सूर्यस्य दक्षिणायनरश्मयः ।तावन्त एव निर्दिष्टा उत्तरायणरश्मयः ॥ते सर्वे देहसम्बद्धाः सर्वदा सर्वदेहिनाम् ।महर्लोकादिगन्तरा उत्तरायणरश्मिभिः ।निर्गच्छन्तीतरैश्चापि यैरेष्टव्येतरा गतिः ॥उत्तरं दक्षिणमिति त एव तु निगद्यते ।न तु कालविशेषोऽस्ति ज्ञानिनां नियमात् फलम् ॥ददाति कालेऽनुगुणे फलं किञ्चिद्विशिष्यते ।अत्युत्तमानां केषाञ्चिन्न विशेषोऽस्ति कालतः’इति नारायणाध्यात्मे ॥ 21 ॥
प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योगिनोऽधिकरणम्/योग्यधिकरणम्)
(525)ओं योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ओम् ॥ 04-02-22 ॥
न केवलं कालादिकृते ब्रह्मचन्द्रगती स्मर्येते । किन्तु ? ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च ।
‘अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।तत्र चान्द्रमासं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते’(भ.गी.८.२४-२५)
इत्यत्र ‘योगी’ ति विशेषणात् । स्मरणनिमित्ते चैते गती ।
‘गत्यनुस्मरणाद् ब्रह्म चन्द्रं वा गच्छति ध्रुवम् ।अननुस्मरतः काले स्मरणं प्राप्य वैगतिः’इति (हि) अध्यात्मे ॥ 22 ॥