Jump to content

Brahmasutra/C2/S2: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 1: Line 1:
__TOC__
<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
{{Adhyaya
{{Adhyaya
| document_id  = BS
| document_id  = BS
| chapter_num  = 2
| chapter_num  = 2
| title        = द्वितीयः पादः
| title        = द्वितीयः पादः
}}‘इतरेषां चानुपलब्धेः’ इति सामान्यतो निराकरणं समयानां कृतम्।विशेषतो निराकरोत्यस्मिन् पादे ।
}}‘इतरेषां चानुपलब्धेः’(ब्र.सू.२.१.२) इति सामान्यनिराकरणं समयानां कृतम्। विशेषतो निराकरोत्यस्मिन् पादे ।


अचेतनप्रवृत्तिमतं प्रथमतो निराकरोति –
अचेतनप्रवृत्तिमतं प्रथमतो निराकरोति –
Line 14: Line 16:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ॥ 01-174
| verse_line1  = (174)ओं रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ओम् 02-02-01 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 22: Line 24:
| id      = BS_C02_S02_V01_B1
| id      = BS_C02_S02_V01_B1
| text    =
| text    =
अचेतनस्य स्वतः प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्नानुमानपरिकल्पितं प्रधानं जगत्कर्तृ । चशब्देन प्रमाणाभावं दर्शयति ॥ 01 ॥
अचेतनस्य स्वतः प्रवृत्त्यनुपपत्तेः नानुमानपरिकल्पितं प्रधानं जगत्कर्तृ । चशब्देन प्रमाणाभावं दर्शयति ॥ 01 ॥
}}
}}


Line 30: Line 32:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = प्रवृत्तेश्च ॥ 02-175
| verse_line1  = (175)ओं प्रवृत्तेश्च ओम् ॥ 02-02-02
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 46: Line 48:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि 03-176 ॥
| verse_line1  = (176)ओं पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि ओम् 02-02-03॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 54: Line 56:
| id      = BS_C02_S02_V03_B1
| id      = BS_C02_S02_V03_B1
| text    =
| text    =
पयोऽम्बुवदचेतनस्यापि प्रवृत्तिर्युज्यत इति न युक्तम् ।
पयोऽम्बुवद् अचेतनस्यापि प्रवृत्तिर्युज्यते ? इति न युक्तम् ।
}}
}}


Line 61: Line 63:
| id      = BS_C02_S02_V03_B2
| id      = BS_C02_S02_V03_B2
| text    =
| text    =
‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते , याश्च श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां य दिशमनु’
‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते याश्च श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां य दिशमनु’(बृ.उ.५.८.१),‘एतेन ह वाव पयो मण्डं भवति’() इत्यादिना तत्रापीश्वरनिमित्तप्रवृत्तिश्रुतेः ॥ 03 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V03
| id      = BS_C02_S02_V03_B4
| text    =
‘एतेन ह वाव पयो मण्डं भवति’ इत्यादिना तत्रापीश्वरनिमित्तप्रवृत्तिश्रुतेः ॥ 03 ॥
}}
}}


Line 76: Line 71:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् ॥ 04-177
| verse_line1  = (177)ओं व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् ओम् 02-02-04 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V04
| id      = BS_C02_S02_V04_author-note
| text    =
॥ इति रचनानुपपत्त्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
}}
}}


Line 91: Line 79:
| id      = BS_C02_S02_V04_B1
| id      = BS_C02_S02_V04_B1
| text    =
| text    =
‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे’ इति तद्व्यतिरेकेण कस्यापि कर्मणोऽनवस्थितेरनपेक्षितमेवाचेतनवादिमतम् ॥ 04 ॥
‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे’(ऋ.सं.१०.११३.९) इति तद्व्यतिरेकेण कस्यापि कर्मणोऽनवस्थितेरनपेक्षितमेवाचेतनवादिमतम् ॥ 04 ॥
}}
}}


=== अन्यत्रभावाधिकरणम् ===
=== अन्यत्राभावाधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 101: Line 89:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॐ॥ 05-178
| verse_line1  = (178)ओम् अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ओं॥ 02-02-05 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 109: Line 97:
| id      = BS_C02_S02_V05_summary
| id      = BS_C02_S02_V05_summary
| text    =
| text    =
सेश्वरसाङ्ख्यमतं निराकरोति । यथा पृथिव्या एव पर्जन्यानुगृहीतं तृणादिकमुत्पद्यते, एवं प्रधानादीश्वरानुगृहीतं जगदित्यतो ब्रवीति-
सेश्वरसाङ्ख्यमतं निराकरोति । यथा पृथिव्या एव पर्जन्यानुगृहीतं तृणादिकम् उत्पद्यते, एवं प्रधानाद् ईश्वरानुगृहीतं जगदित्यतो ब्रवीति-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V05
| id      = BS_C02_S02_V05_author-note
| text    =
॥ इति अन्यत्रभावाधिकरणम् ॥ 02 ॥
}}
}}


Line 123: Line 104:
| id      = BS_C02_S02_V05_B1
| id      = BS_C02_S02_V05_B1
| text    =
| text    =
‘यच्च किञ्चित् जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा
‘यच्च किञ्चित् जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः’(नारायणसूक्तम्.५)
अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः’
}}
}}


Line 131: Line 111:
| id      = BS_C02_S02_V05_B3
| id      = BS_C02_S02_V05_B3
| text    =
| text    =
‘ब्रह्मण्येवेदमाविरासीद्ब्रह्मणि स्थितं ब्रह्मण्येव लयमभ्येति ।
‘ब्रह्मण्येव इदम् आविरासीद्, ब्रह्मणि स्थितं, ब्रह्मणि ब्रह्मन् लयमभ्युपैति’,ब्रह्मैवाधस्ताद्, ब्रह्मैवोपरिष्ठाद् ब्रह्ममध्यतो ब्रह्म सर्वतः’()
ब्रह्मैवाधस्ताद्ब्रह्मैवोपरिष्ठाद्ब्रह्म मध्यतो ब्रह्म सर्वतः’ ॥
}}
}}


Line 139: Line 118:
| id      = BS_C02_S02_V05_B5
| id      = BS_C02_S02_V05_B5
| text    =
| text    =
‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’ इत्यादिश्रुतिभ्योऽन्यत्र जगतोऽभावात् तृणादीनां पर्जन्यवन्नानुग्राहकत्वमात्रमीश्वरस्य
‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’(बृ.उ.४.५.१) इत्यादिश्रुतिभ्योऽन्यत्र जगतोऽभावात् तृणादीनां पर्जन्यवत् नानुग्राहकत्वमात्रमीश्वरस्य
}}
}}


Line 146: Line 125:
| id      = BS_C02_S02_V05_B7
| id      = BS_C02_S02_V05_B7
| text    =
| text    =
‘स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत्’इति भागवते
‘स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत्’इति भागवते ।चशब्देन प्रकृतिस्तादिप्रदत्वं चाङ्गीकृतम् ॥
}}
}}


Line 156: Line 135:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥ 06-179
| verse_line1  = (179)ओम् अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ओम् 02-02-06 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 164: Line 143:
| id      = BS_C02_S02_V06_summary
| id      = BS_C02_S02_V06_summary
| text    =
| text    =
लोकायतिकपक्षं निराकरोति
लोकायतिकपक्षं निराकरोति-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V06
| id      = BS_C02_S02_V06_author-note
| text    =
॥ इति अभ्युपगमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
}}
}}


Line 178: Line 150:
| id      = BS_C02_S02_V06_B1
| id      = BS_C02_S02_V06_B1
| text    =
| text    =
यस्य धर्माधर्मौ न स्तः तत्सिद्धान्ते किं प्रयोजनम् अतः स्वव्याहतेरेवोपेक्ष्यः ॥ 06 ॥
यस्य धर्माधर्मौ न स्तः तत्सिद्धान्ते किं प्रयोजनम् ? अतः स्वव्याहतेरेवोपेक्ष्यः ॥ 06 ॥
}}
}}


Line 188: Line 160:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = पुरुषाश्मवदिति चेत् तथाऽपि ॥ 07-180
| verse_line1  = (180)ओं पुरुषाश्मवदिति चेत् तथाऽपि ओम् 02-02-07 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 196: Line 168:
| id      = BS_C02_S02_V07_summary
| id      = BS_C02_S02_V07_summary
| text    =
| text    =
पुरुषोपसर्जनप्रकृतिकर्तृवादमपाकरोति
पुरुषोपसर्जनप्रकृतिकर्तृत्ववादमपाकरोति
}}
}}


Line 203: Line 175:
| id      = BS_C02_S02_V07_B1
| id      = BS_C02_S02_V07_B1
| text    =
| text    =
यथा चेतनसम्बन्धादचेतनमेव शरीरमश्मादिकमादाय गच्चति, एवमचेतनाऽपि प्रकृतिः पुरषसम्बन्धात् प्रवर्तत इति चेन्न । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’ इति तत्रापि तथात्वे दृष्टान्ताभावात् ॥ 07 ॥
यथा चेतनसम्बन्धादचेतनमेव शरीरमश्मादिकमादाय गच्छति । एवमचेतनाऽपि प्रकृतिः पुरषसम्बन्धात् प्रवर्तत इति चेत्, न । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’(ऋ.सं.१०.११३.९) इति तत्रापि तथात्वे दृष्टान्ताभावात् ॥ 07 ॥
}}
}}


Line 211: Line 183:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ अङ्गीत्वानुपपतेः ॐ ॥ 08-181
| verse_line1  = (181)ओम् अङ्गित्वानुपपतेः ओम् 02-02-08 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V08
| id      = BS_C02_S02_V08_author-note
| text    =
॥ इति पुरुषाश्माधिकरणम् ॥ 04 ॥
}}
}}


Line 226: Line 191:
| id      = BS_C02_S02_V08_B1
| id      = BS_C02_S02_V08_B1
| text    =
| text    =
शरीरप्रवृत्तौपुरषस्याङ्गित्वात् ।
शरीरप्रवृत्तौ पुरषस्याङ्गित्वात्-
}}
}}


Line 233: Line 198:
| id      = BS_C02_S02_V08_B2
| id      = BS_C02_S02_V08_B2
| text    =
| text    =
‘अङ्गमङ्गी समादाय यथाकार्यं करोत्यसौ’ इत्यङ्गित्वव्यवहारोऽनुपपन्न ॥ 08 ॥
‘अङ्गमङ्गी समादाय यथा कार्यं करोत्यसौ’(स्मृतिः) इत्यङ्गित्वव्यवहारोऽनुपपन्नः ॥ 08 ॥
}}
}}


Line 243: Line 208:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्यथाऽनुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ॥ 09-182
| verse_line1  = (182)ओम् अन्यथाऽनुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ओम् 02-02-09 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 251: Line 216:
| id      = BS_C02_S02_V09_summary
| id      = BS_C02_S02_V09_summary
| text    =
| text    =
प्रकृत्युपसर्जनपुरुषकर्तृवादमपाकरोति
प्रकृत्युपसर्जनपुरुषकर्तृत्ववादमपाकरोति
}}
}}


Line 258: Line 223:
| id      = BS_C02_S02_V09_B1
| id      = BS_C02_S02_V09_B1
| text    =
| text    =
शरीरसम्बन्धात् पुरुषः प्रवर्तत इत्यङ्गीकारेऽपि स्वतस्तस्यासामर्थ्याच्चरीरसम्बन्ध एवायुक्तः ॥ 09 ॥
शरीरसम्बन्धात् पुरुषः प्रवर्तत इत्यङ्गीकारेऽपि स्वतस्तस्यासामर्थ्याच्छरीरसम्बन्ध एवायुक्तः ॥ 09 ॥
}}
}}


Line 266: Line 231:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ॥ 10-183
| verse_line1  = (183)ओं विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ओम् 02-02-10 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V10
| id      = BS_C02_S02_V10_author-note
| text    =
॥ इति अन्यथानुमित्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
}}
}}


Line 281: Line 239:
| id      = BS_C02_S02_V10_B1
| id      = BS_C02_S02_V10_B1
| text    =
| text    =
सकलश्रुतिस्मृतियुक्तिविरुद्धत्वाच्चानीश्वरमतमसमञ्जसम्
सकलश्रुतिस्मृतियुक्तिविरुद्धत्वाच्चानीश्वरमतम् असमञ्जसम्
}}
}}


Line 288: Line 246:
| id      = BS_C02_S02_V10_B2
| id      = BS_C02_S02_V10_B2
| text    =
| text    =
‘श्रुतयः स्मृतयश्चैव युक्तयश्चेश्वरं परम्
‘श्रुतयः स्मृतयश्चैव युक्तयश्चेश्वरं परम् ।वदन्ति तद्विरुद्धं यो वदेत् तस्मान्न चाधमः’() इति पाद्मे ॥ 10 ॥
वदन्ति तद्विरुद्धं यो वदेत् तस्मान्न चाधमः’ इति पाद्मे ॥ 10 ॥
}}
}}


Line 299: Line 256:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् 11-184 ॥
| verse_line1  = (184)ओं महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ओम् 02-02-11॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 314: Line 271:
| id      = BS_C02_S02_V11_B1
| id      = BS_C02_S02_V11_B1
| text    =
| text    =
महत्त्वाद्दीर्घत्वाच्च यथा कार्यमुत्पद्यते, एवं ह्रस्वत्वाद् पारिमण्डल्याच्चोत्पद्येत । वाशब्दादन्यथैतयोरपि न स्यात्, विशेषकारणाभावात् ॥ 11 ॥
महत्त्वाद् दीर्घत्वाच्च यथा कार्यमुत्पद्यते, एवं ह्रस्वत्वात् पारिमण्डल्याच्चोत्पद्येत । वाशब्दादन्यथैतयोरपि न स्यात् विशेषकारणाभावात् ॥ 11 ॥
}}
}}


Line 322: Line 279:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उभयथाऽपि न कर्मातस्तदभावः 12-185 ॥
| verse_line1  = (185)ओम् उभयथाऽपि न कर्मातस्तदभावः ओम् 02-02-12॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 330: Line 287:
| id      = BS_C02_S02_V12_B1
| id      = BS_C02_S02_V12_B1
| text    =
| text    =
ईश्वरेच्छाया नित्यत्वे तद्भावेऽपि परमाणुकर्माभावान्नेदानीमपि स्यात् । अनित्यत्वे तत्कारणाभावात् । अतः परमाणुचेष्टाभावात् तत्कार्याभावः । वैदिकेश्वरस्य तु वेदेनैव सर्वशक्तित्वोक्तेः सर्वमुपपद्यते । स्वत एव काले विशेषाङ्गीकृतेश्च ॥ 12 ॥
ईश्वरेच्छाया नित्यत्वे तद्भावेऽपि परमाणुकर्माभावान्नेदानीमपि(तत्) स्यात् । अनित्यत्वे तत्कारणाभावात् । अतः परमाणुचेष्टाभावात् तत्कार्याभावः । वैदिकेश्वरस्य तु वेदेनैव सर्वशक्तित्वोक्तेः सर्वम् उपपद्यते । स्वत एव काले(विभेदा) विशेषाङ्गीकृतेश्च ॥ 12 ॥
}}
}}


Line 338: Line 295:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः 13-186 ॥
| verse_line1  = (186)ओं समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ओम् 02-02-13॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 346: Line 303:
| id      = BS_C02_S02_V13_B1
| id      = BS_C02_S02_V13_B1
| text    =
| text    =
कार्यकारणादीनां समवायसम्बन्दाङ्गीकारात् तस्य च भिन्नत्वसाम्यात् समवायान्तरापेक्षायामनवस्थितिः। न च तत्प्रमाणम् प्रथमसम्बन्धा सिद्धैव च तदसिद्धिः । स्वनिर्वाहकत्वे समवाय एव न स्यात् ॥ 13 ॥
कार्यकारणादीनां समवायसम्बन्धाङ्गीकारात् तस्य च भिन्नत्वसाम्यात् समवायान्तरापेक्षायाम् अनवस्थितेः(तिः)।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V13
| id      = BS_C02_S02_V13_B2
| text    =
न च तत् प्रमाणम् प्रथमसम्बन्धासिद्धैव च तदसिद्धिः । स्वनिर्वाहकत्वे समवाय एव न स्यात् ॥ 13 ॥
}}
}}


Line 354: Line 318:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नित्यमेव च भावात् ॥ 14-187
| verse_line1  = (187)ओं नित्यमेव च भावात् ओम् 02-02-14 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 362: Line 326:
| id      = BS_C02_S02_V14_B1
| id      = BS_C02_S02_V14_B1
| text    =
| text    =
नित्यत्वाच्च परमाणूनां समवायस्य च तस्यैव जनित्वाङ्गीकारान्नित्यमेव कार्यं स्यात् । अन्यथा न कदाचित् ॥ 14 ॥
नित्यत्वाच्च परमाणूनां समवायस्य च तस्यैव जनित्वाङ्गीकारात् नित्यमेव कार्यं स्यात् । अन्यथा न कदाचित् ॥ 14 ॥
}}
}}


Line 370: Line 334:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = रूपादिमत्त्वाच्चविपर्ययो दर्शनात् 15-188 ॥
| verse_line1  = (188)ओं रूपादिमत्त्वाच्चविपर्ययो दर्शनात् ओम् 02-02-15॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 386: Line 350:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उभयथा च दोषात् ॥ 16-189
| verse_line1  = (189)ओम् उभयथा च दोषात् ओम् 02-02-16 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 394: Line 358:
| id      = BS_C02_S02_V16_B1
| id      = BS_C02_S02_V16_B1
| text    =
| text    =
नित्यत्वे परमाणूनां तद्वत् सर्वनित्यत्वं स्यात् । विशेषप्रमाणाभावात् अनित्यत्वे कारणाभावात् तदुत्पत्त्यभावः ॥ 16 ॥
नित्यत्वे परमाणूनां तद्वत् सर्वनित्यत्वं स्यात् । विशेषप्रमाणाभावात् अनित्यत्वे कारणाभावात् तदुत्पत्त्यभावः ॥ 16 ॥
}}
}}


Line 402: Line 366:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ॥ 17-190
| verse_line1  = (190)ओम् अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ओम् 02-02-17 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V17
| id      = BS_C02_S02_V17_author-note
| text    =
॥ इति वैशेषिकाधिकरणम् ॥ 06 ॥
}}
}}


Line 417: Line 374:
| id      = BS_C02_S02_V17_B1
| id      = BS_C02_S02_V17_B1
| text    =
| text    =
सकलश्रुतिस्मृत्यपरिगृहीतत्वाच्चातिशयेनानपेक्षता
श्रुतिस्मृत्यपरिगृहीतत्वाच्चातिशयेनानपेक्ष(क्ष्य)ता
}}
}}


Line 424: Line 381:
| id      = BS_C02_S02_V17_B2
| id      = BS_C02_S02_V17_B2
| text    =
| text    =
‘आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थकम्’ इति मोक्षधर्मे ॥ 17 ॥
‘आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थकम्’() इति मोक्षधर्मे ॥ 17 ॥
}}
}}


Line 434: Line 391:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ॥ 18-191
| verse_line1  = (191)ओं समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ओम् 02-02-18 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 442: Line 399:
| id      = BS_C02_S02_V18_summary
| id      = BS_C02_S02_V18_summary
| text    =
| text    =
परमाणुपुञ्जवादिमतं निराकरोति-
परमाणुपुञ्जवादिमतं निरा(अपा)करोति-
}}
}}


Line 449: Line 406:
| id      = BS_C02_S02_V18_B1
| id      = BS_C02_S02_V18_B1
| text    =
| text    =
समुदायस्यैकहेतुकत्वं न युज्यते । उभयहेतुकेऽप्यन्योऽन्याश्रयात् तदप्राप्तिः । अन्यथा सर्वदा समुदायसत्त्वं स्यात् ॥ 18 ॥
समुदायस्यैकहेतुकत्वं न युज्यते । उभयहेतुकेऽप्यन्योऽन्याश्रयात् तदप्राप्तिः । अन्यथा सर्वदा समुदायसत्त्वं(समुदायत्वम्) स्यात् ॥ 18 ॥
}}
}}


Line 457: Line 414:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ इतरेतरप्रत्ययात्वादिति चेन्न उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ॥ 19-192
| verse_line1  = (192)ओम् इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्न उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ओम् 02-02-19 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 465: Line 422:
| id      = BS_C02_S02_V19_B1
| id      = BS_C02_S02_V19_B1
| text    =
| text    =
सर्वदा विद्यमानोऽपि समुदाय परस्परापेक्षया व्यवह्रियत इति चेन्न । एकं कार्यमुत्पाद्य तस्य विनष्टत्वात् परस्परप्रत्ययस्तदपेक्षया व्यवहार इति न युज्यते । कारणे सति कार्यं भवत्येवेति हि तस्य नियमः ॥ 19 ॥
सर्वदा विद्यमानोऽपि समुदायः परस्परापेक्षया व्यवह्रियत इति चेत्,
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V19
| id      = BS_C02_S02_V19_B2
| text    =
। एकं कार्यमुत्पाद्य तस्य विनष्टत्वात् परस्परप्रत्ययस्तदपेक्षया व्यवहार इति न युज्यते ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V19
| id      = BS_C02_S02_V19_B3
| text    =
कारणे सति कार्यं भवत्येवेति हि तस्य नियमः ॥ 19 ॥
}}
}}


Line 473: Line 444:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॥ 20-193
| verse_line1  = (193)ओम् उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ओम् 02-02-20 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 489: Line 460:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ॥ 21-194
| verse_line1  = (194)ओम् असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ओम् 02-02-21 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 497: Line 468:
| id      = BS_C02_S02_V21_B1
| id      = BS_C02_S02_V21_B1
| text    =
| text    =
कारणे विनष्टे कार्यमुत्पद्यते चेत् तत्कार्यमिति प्रतिज्ञाहानिः । तत्काले कारणमस्ति चेद्विनाशकारणाभावद्यौगपद्यं सर्वकार्याणाम् ॥ 21 ॥
कारणे विनष्टे कार्यमुत्पद्यते चेत् तत्कार्यमिति प्रतिज्ञाहानिः । तत्काले कारणमस्ति चेद् विनाशकारणाभावद् यौगपद्यं सर्वकार्याणाम् ॥ 21 ॥
}}
}}


Line 505: Line 476:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ प्रतिसङ्ख्याऽप्रतिसङ्ख्यानिरोधप्राप्तिरविच्छेदात् ॐ 22 -195 ॥
| verse_line1  = (195)ओं प्रतिसङ्ख्याऽप्रतिसङ्ख्यानिरोधाप्राप्तिरविच्छेदात् ओम् 02-02-22॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 521: Line 492:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उभयथा च दोषात् ॥ 23-196
| verse_line1  = (196)ओम् उभयथा च दोषात् ओम् 02-02-23 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 537: Line 508:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = आकाशे चाविशेषात् ॥ 24-197
| verse_line1  = (197)ओम् आकाशे चाविशेषात् ओम् 02-02-24 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 545: Line 516:
| id      = BS_C02_S02_V24_B1
| id      = BS_C02_S02_V24_B1
| text    =
| text    =
दीपादिषु विशेषदर्शनात् क्षणिकत्वेनान्यत्रापि क्षणिकत्वमनुमीयते चेदाकाशादिष्वविशेषदर्शनादन्यत्रापि तदनुमीयते ॥ 24 ॥
दीपादिषु विशेषदर्शनात् क्षणिकत्वेनान्यत्रापि क्षणिकत्वमनुमीयते चेदाकाशादिष्वविशेषदर्शनाद् अन्यत्रापि तदनुमीयेत ॥ 24 ॥
}}
}}


Line 553: Line 524:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अनुस्मृतेश्च 25-198 ॥
| verse_line1  = (198)ओम् अनुस्मृतेश्च ओम् 02-02-25॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V25
| id      = BS_C02_S02_V25_author-note
| text    =
॥ इति समुदायाधिकरणम् ॥ 07 ॥
}}
}}


Line 568: Line 532:
| id      = BS_C02_S02_V25_B1
| id      = BS_C02_S02_V25_B1
| text    =
| text    =
तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानाच्च । प्रत्यभिज्ञाय ब्रान्तित्वे विशेषदर्शनस्यापि ब्रान्तित्वम् ॥ 25 ॥
तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानाच्च । प्रत्यभिज्ञाया भ्रान्तित्वे विशेषदर्शनस्यापि भ्रान्तित्वम् ॥ 25 ॥
}}
}}


Line 578: Line 542:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नासतोऽदृष्टत्वात् ॥ 26-199
| verse_line1  = (199)ओं नासतोऽदृष्टत्वात् ओम् 02-02-26 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 601: Line 565:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ 27-200
| verse_line1  = (200)ओम् उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ओम् 02-02-27 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 609: Line 573:
| id      = BS_C02_S02_V27_B1
| id      = BS_C02_S02_V27_B1
| text    =
| text    =
असतः कारणत्वे उदासीनानां हेयोपादेयबुद्धिवर्जितानां खपुष्पादीनामपि सकाशात् कार्यसिद्धिः । चशब्दान्न चेदन्यत्रापि न स्यादविशेषात् ॥ 27 ॥
असतः कारणत्वे उदासीनानां हेयोपादेयबुद्धिवर्जितानां खपुष्पादीनामपि सकाशात् कार्यसिद्धिः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V27
| id      = BS_C02_S02_V27_B2
| text    =
चशब्दान्न चेदन्यत्रापि न स्यात्, अविशेषात् ॥ 27 ॥
}}
}}


Line 617: Line 588:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नाभाव उपलब्धेः ॥ 28-201
| verse_line1  = (201)ओं नाभाव उपलब्धेः ओम् 02-02-28 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 633: Line 604:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ॥ 29-202
| verse_line1  = (202)ओं वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ओम् 02-02-29 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V29
| id      = BS_C02_S02_V29_author-note
| text    =
॥ इति असदधिकरणम् ॥ 08 ॥
}}
}}


Line 648: Line 612:
| id      = BS_C02_S02_V29_B1
| id      = BS_C02_S02_V29_B1
| text    =
| text    =
न च दृष्टस्यापि स्वप्नादिवदभावः। तस्योत्तरकाले’स्वप्नोयं’,’नायं सर्पः’ इत्याद्यनुभवात् । न चात्र तादृशं प्रमाणमस्ति ॥ 29 ॥
न च दृष्टस्यापि स्वप्नादिवदभावः। तस्योत्तरकाले स्वप्नोयं नायं सर्प इत्याद्यनुभवात् । न चात्र तादृशं प्रमाणमस्ति ॥ 29 ॥
}}
}}


=== अनुपलब्द्यधिकरणम् ===
=== अनुपलब्ध्यधिकरणम् ===


{{VerseBlock
{{VerseBlock
Line 658: Line 622:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न भावोऽनुपलब्धेः ॥ 30-203
| verse_line1  = (203)ओं न भावोऽनुपलब्धेः ओम् 02-02-30 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 681: Line 645:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = क्षणिकत्वाच्च ॥ 31-204
| verse_line1  = (204)ओं क्षणिकत्वाच्च ओम् 02-02-31 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 689: Line 653:
| id      = BS_C02_S02_V31_B1
| id      = BS_C02_S02_V31_B1
| text    =
| text    =
ज्ञानं क्षणिकम् । अर्थानां च स्थायित्वमुक्तम् । आतश्च नैक्यम् ॥ 31 ॥
ज्ञानं क्षणिकम् । अर्थानां च स्थायित्वमुक्तम् । अतश्च नैक्यम् ॥ 31 ॥
}}
}}


Line 697: Line 661:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सर्वथाऽनुपपत्तेश्च ॥ 32-205
| verse_line1  = (205)ओं सर्वथाऽनुपपत्तेश्च ओम् 02-02-32 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V32
| id      = BS_C02_S02_V32_author-note
| text    =
॥ इति अनुपलब्द्यधिकरणम् ॥ 09 ॥
}}
}}


Line 722: Line 679:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = नैकस्मिन्नसम्भवात् ॥ 33-206
| verse_line1  = (206)ओं नैकस्मिन्नसम्भवात् ओम् 02-02-33 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 745: Line 702:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = एवञ्चात्माकार्त्स्न्यम् ॥ 34-207
| verse_line1  = (207)ओम् एवञ्चात्माकार्त्स्न्यम् ओम् 02-02-34 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 753: Line 710:
| id      = BS_C02_S02_V34_B1
| id      = BS_C02_S02_V34_B1
| text    =
| text    =
जीवस्य शरीरपरिमितत्वाङ्गीकारेऽण्वादिशरीरस्थस्य हस्तादिशरीरेऽकार्त्स्न्यं स्यात् ॥34॥
जीवस्य शरीरपरिमितत्वाङ्गीकारेऽण्वादिशरीरस्थस्य हस्त्यादिशरीरेऽकार्त्स्न्यं स्यात् ॥34॥
}}
}}


Line 761: Line 718:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः 35-208
| verse_line1  = (208)ओं न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ओम्॥ 02-02-35 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 769: Line 726:
| id      = BS_C02_S02_V35_B1
| id      = BS_C02_S02_V35_B1
| text    =
| text    =
तत्तच्छरीरस्थस्य तत्तत्परिमाणत्वमिति न मन्तव्यम् । विकारित्वादनित्यत्वप्रसक्तेः ॥ 35 ॥
तत्तच्छरीरस्थस्य तत्तत्परिमाणत्वमिति न मन्तव्यम्(वाच्यम्) । विकारित्वादनित्यत्वप्रसक्तेः ॥ 35 ॥
}}
}}


Line 777: Line 734:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषात् ॥ 36-209
| verse_line1  = (209)ओम् अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषात् ओम् 02-02-36 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V36
| id      = BS_C02_S02_V36_author-note
| text    =
॥ इति नैकस्मिन्नधिकरणम् (स्याद्वाद्यधिकरणम्) ॥10॥
}}
}}


Line 802: Line 752:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = पत्युरसामञ्जस्यात् ॥ 37-210
| verse_line1  = (210)ओं पत्युरसामञ्जस्यात् ओम् 02-02-37 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 810: Line 760:
| id      = BS_C02_S02_V37_summary
| id      = BS_C02_S02_V37_summary
| text    =
| text    =
पाशुपतपक्षमपाकरोति-
पाशुपतमतमपाकरोति-
}}
}}


Line 817: Line 767:
| id      = BS_C02_S02_V37_B1
| id      = BS_C02_S02_V37_B1
| text    =
| text    =
‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’
‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’(ऋ.सं.१०.१२५.५)
‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ’।
‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ’(ऋ.सं.१०.१२५.६)।
}}
}}


Line 825: Line 775:
| id      = BS_C02_S02_V37_B3
| id      = BS_C02_S02_V37_B3
| text    =
| text    =
‘अस्य देवस्य मील्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः
‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्’(ऋ.सं.७.४०.५।
विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्’।
}}
}}


Line 833: Line 782:
| id      = BS_C02_S02_V37_B5
| id      = BS_C02_S02_V37_B5
| text    =
| text    =
‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नाग्नीषोमौ’
‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नाग्नीषोमौ’(महोपनिषत्.१),इत्यादि श्रुतेः पारतन्त्र्येणासमञ्जसत्वान्न पतीरीश्वरनामा जगत्कर्ता ॥ 37 ॥
इत्यादि श्रुतेः पारतन्त्र्येणासमञ्जसत्वान्न पशुपतीरीश्वरो जगत्कर्ता ॥ 37 ॥
}}
}}


Line 842: Line 790:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ 38-211
| verse_line1  = (211)ओं सम्बन्धानुपपत्तेश्च ओम् 02-02-38 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 850: Line 798:
| id      = BS_C02_S02_V38_B1
| id      = BS_C02_S02_V38_B1
| text    =
| text    =
अशरीरत्वात् तस्य जगता सम्बन्धो न युज्यते कर्तृत्वेन मृतपुरुषवत् ॥38॥
अशरीरत्वात् तस्य जगता सम्बन्धो न युज्यते कर्तृत्वेन, मृतपुरुषवत् ॥38॥
}}
}}


Line 858: Line 806:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ 39-212
| verse_line1  = (212)ओम् अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ओम् 02-02-39 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 874: Line 822:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः 40-213 ॥
| verse_line1  = (213)ओं करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ओम् 02-02-40॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 882: Line 830:
| id      = BS_C02_S02_V40_B1
| id      = BS_C02_S02_V40_B1
| text    =
| text    =
इदमेव जगत् तस्य करणवदधिष्ठानादिरूपम् । नित्यस्यापि कस्यचिद्भावाद्युज्यत इति चेन्न भोगादिप्राप्तेः। उत्पत्तिविनाशौ सुखदुःखभोगाश्च प्राप्यन्ते तद्गताः ॥ 40 ॥
इदमेव जगत् तस्य करणवदधिष्ठानादिरूपं नित्यस्यापि कस्यचिद् भावाद् युज्यत इति चेत्, न । भोगादिप्राप्तेः।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V40
| id      = BS_C02_S02_V40_B2
| text    =
उत्पत्तिविनाशौ सुखदुःखभोगाश्च प्राप्यन्ते तद्गताः ॥ 40 ॥
}}
}}


Line 890: Line 845:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ॥ 41-214
| verse_line1  = (214)ओम् अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ओम् 02-02-41 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V41
| id      = BS_C02_S02_V41_author-note
| text    =
॥ इति पत्युरधिकरणम् (पशुपत्यधिकरणम्) ॥ 11 ॥
}}
}}


Line 905: Line 853:
| id      = BS_C02_S02_V41_B1
| id      = BS_C02_S02_V41_B1
| text    =
| text    =
देहवत्वेऽन्तवत्वम् । अन्यथा ज्ञानाभावः । शरीरिण एव हि ज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । विष्णोस्तु श्रुत्यैव सर्वे विरोधाः परिहृताः
देहवत्वेऽन्तवत्वम् । अन्यथा ज्ञानाभावः ।
}}
}}


Line 912: Line 860:
| id      = BS_C02_S02_V41_B2
| id      = BS_C02_S02_V41_B2
| text    =
| text    =
‘यदात्मको भगवांस्तदात्मिका व्यक्तिः ।
शरीरिण एव हि ज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा विष्णोस्तु श्रुत्यैव सर्वे विरोधाः परिहृताः-
किमात्मको भगवान् ज्ञानात्मक ऐश्वर्यात्मकः शक्त्यात्मकः’इति
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V41
| verse_id = BS_C02_S02_V41
| id      = BS_C02_S02_V41_B4
| id      = BS_C02_S02_V41_B3
| text    =
| text    =
‘बुद्धिमनोऽङ्गप्रत्यङ्गवत्तां भगवतो लक्षयामहे । बुद्धिमान् मनोवानङ्गप्रत्यङ्गवान्’ इति
‘यदात्मको भगवांस्तदात्मिकी(का) व्यक्तिः ।
}}
किमात्मको भगवान् ज्ञानात्मक ऐश्वर्यात्मकः शक्त्यात्मकः’इति,‘बुद्धिमनोऽङ्गप्रत्यङ्गवत्तां भगवतो लक्षयामहे । बुद्धिमान् मनोवानङ्गप्रत्यङ्गवानिति’,‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमाक्षरः’(पैङ्गिश्रुतिः) ॥ इत्यादिकया ॥ 41 ॥
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V41
| id      = BS_C02_S02_V41_B6
| text    =
‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः
ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमाक्षरः’ ॥ इत्यादिकया ॥ 41 ॥
}}
}}


Line 938: Line 878:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ उत्पत्यसम्भवात् ॐ ॥ 42-215
| verse_line1  = (215)ओम् उत्पत्त्यसम्भवात् ओम् 02-02-42 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 961: Line 901:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = न च कर्तुः करणम् ॥ 43-216
| verse_line1  = (216)ओं न च कर्तुः करणम् ओम् 02-02-43 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 969: Line 909:
| id      = BS_C02_S02_V43_B1
| id      = BS_C02_S02_V43_B1
| text    =
| text    =
यदि पुरुषोऽङ्गीक्रियेत तस्यापि करणाभावादनुपपत्तिः ॥ 43 ॥
यदि पुरुषोऽङ्गीक्रियेत तस्यापि करणाभावाद् अनुपपत्तिः ॥ 43 ॥
}}
}}


Line 977: Line 917:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः 44-217 ॥
| verse_line1  = (217)ओं विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ओम् 02-02-44॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 985: Line 925:
| id      = BS_C02_S02_V44_B1
| id      = BS_C02_S02_V44_B1
| text    =
| text    =
यदि विज्ञानादिकरणं तस्याङ्गीक्रियते तदा तत एव सृष्ट्याद्युपपत्तेरीश्वरवादान्तर्भावः ॥ 44 ॥
यदि विज्ञानादिकरणं तस्याङ्गीक्रियते तदा तत एव सृष्ट्याद्युपपत्तेरीश्वर-वादान्तर्भावः ॥ 44 ॥
}}
}}


Line 993: Line 933:
| chapter_id    = BS_C02
| chapter_id    = BS_C02
| verse_type    = sutra
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = विप्रतिषेधाच्च ॥ 45-218
| verse_line1  = (218)ओं विप्रतिषेधाच्च ओम् 02-02-45 ॥
| commentary1  = brahmasutra
| commentary1  = brahmasutra
}}
}}
Line 999: Line 939:
{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V45
| verse_id = BS_C02_S02_V45
| id      = BS_C02_S02_V45_author-note
| id      = BS_C02_S02_V45_B1
| text    =
| text    =
इति उत्पत्त्य(शक्त्य)धिकरणम् ॥ 12
सकलश्रुत्यादिविरुद्धत्वाच्चासमञ्जसम् 45
}}
}}


{{Bhashyam
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V45
| verse_id = BS_C02_S02
| id      = BS_C02_S02_V45_author-note
| id      = BS_C02_S02_author-note
| text    =
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 02-02 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 02-02 ॥
}}
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C02_S02_V45
| id      = BS_C02_S02_V45_B1
| text    =
सकलश्रुत्यादिविरुद्धत्वाच्चासमञ्जसम् ॥ 45 ॥
}}
}}




[[Category:Brahmasutra]]
[[Category:Brahmasutra]]

Revision as of 09:38, 10 April 2026

‘इतरेषां चानुपलब्धेः’(ब्र.सू.२.१.२) इति सामान्यनिराकरणं समयानां कृतम्। विशेषतो निराकरोत्यस्मिन् पादे ।

अचेतनप्रवृत्तिमतं प्रथमतो निराकरोति –

रचनानुपपत्त्यधिकरणम्

(174)ओं रचनानुपपत्तेश्च नानुमानम् ओम् ॥ 02-02-01 ॥


अचेतनस्य स्वतः प्रवृत्त्यनुपपत्तेः नानुमानपरिकल्पितं प्रधानं जगत्कर्तृ । चशब्देन प्रमाणाभावं दर्शयति ॥ 01 ॥
(175)ओं प्रवृत्तेश्च ओम् ॥ 02-02-02 ॥


चेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिदर्शनाच्च ॥ 02 ॥
(176)ओं पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि ओम् ॥ 02-02-03॥


पयोऽम्बुवद् अचेतनस्यापि प्रवृत्तिर्युज्यते ? इति न युक्तम् ।
‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते याश्च श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां यां य दिशमनु’(बृ.उ.५.८.१),‘एतेन ह वाव पयो मण्डं भवति’() इत्यादिना तत्रापीश्वरनिमित्तप्रवृत्तिश्रुतेः ॥ 03 ॥
(177)ओं व्यतिरेकानवस्थितेश्चानपेक्षत्वात् ओम् ॥ 02-02-04 ॥


‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे’(ऋ.सं.१०.११३.९) इति तद्व्यतिरेकेण कस्यापि कर्मणोऽनवस्थितेरनपेक्षितमेवाचेतनवादिमतम् ॥ 04 ॥

अन्यत्राभावाधिकरणम्

(178)ओम् अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ओं॥ 02-02-05 ॥


सेश्वरसाङ्ख्यमतं निराकरोति । यथा पृथिव्या एव पर्जन्यानुगृहीतं तृणादिकम् उत्पद्यते, एवं प्रधानाद् ईश्वरानुगृहीतं जगदित्यतो ब्रवीति-
‘यच्च किञ्चित् जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ।अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः’(नारायणसूक्तम्.५)
‘ब्रह्मण्येव इदम् आविरासीद्, ब्रह्मणि स्थितं, ब्रह्मणि ब्रह्मन् लयमभ्युपैति’,ब्रह्मैवाधस्ताद्, ब्रह्मैवोपरिष्ठाद् ब्रह्ममध्यतो ब्रह्म सर्वतः’() ॥
‘ब्रह्मैवेदं सर्वम्’(बृ.उ.४.५.१) इत्यादिश्रुतिभ्योऽन्यत्र जगतोऽभावात् तृणादीनां पर्जन्यवत् नानुग्राहकत्वमात्रमीश्वरस्य ।
‘स एव भूयो निजवीर्यचोदितां स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।अनामरूपात्मनि रूपनामनी विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत्’इति भागवते ।चशब्देन प्रकृतिस्तादिप्रदत्वं चाङ्गीकृतम् ॥

अभ्युपगमाधिकरणम्

(179)ओम् अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ओम् ॥ 02-02-06 ॥


लोकायतिकपक्षं निराकरोति-
यस्य धर्माधर्मौ न स्तः तत्सिद्धान्ते किं प्रयोजनम् ? अतः स्वव्याहतेरेवोपेक्ष्यः ॥ 06 ॥

पुरुषाश्माधिकरणम्

(180)ओं पुरुषाश्मवदिति चेत् तथाऽपि ओम् ॥ 02-02-07 ॥


पुरुषोपसर्जनप्रकृतिकर्तृत्ववादमपाकरोति –
यथा चेतनसम्बन्धादचेतनमेव शरीरमश्मादिकमादाय गच्छति । एवमचेतनाऽपि प्रकृतिः पुरषसम्बन्धात् प्रवर्तत इति चेत्, न । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’(ऋ.सं.१०.११३.९) इति तत्रापि तथात्वे दृष्टान्ताभावात् ॥ 07 ॥
(181)ओम् अङ्गित्वानुपपतेः ओम् ॥ 02-02-08 ॥


शरीरप्रवृत्तौ पुरषस्याङ्गित्वात्-
‘अङ्गमङ्गी समादाय यथा कार्यं करोत्यसौ’(स्मृतिः) इत्यङ्गित्वव्यवहारोऽनुपपन्नः ॥ 08 ॥

अन्यथानुमित्यधिकरणम्

(182)ओम् अन्यथाऽनुमितौ च ज्ञशक्तिवियोगात् ओम् ॥ 02-02-09 ॥


प्रकृत्युपसर्जनपुरुषकर्तृत्ववादमपाकरोति –
शरीरसम्बन्धात् पुरुषः प्रवर्तत इत्यङ्गीकारेऽपि स्वतस्तस्यासामर्थ्याच्छरीरसम्बन्ध एवायुक्तः ॥ 09 ॥
(183)ओं विप्रतिषेधाच्चासमञ्जसम् ओम् ॥ 02-02-10 ॥


सकलश्रुतिस्मृतियुक्तिविरुद्धत्वाच्चानीश्वरमतम् असमञ्जसम् ।
‘श्रुतयः स्मृतयश्चैव युक्तयश्चेश्वरं परम् ।वदन्ति तद्विरुद्धं यो वदेत् तस्मान्न चाधमः’() इति पाद्मे ॥ 10 ॥

वैशेषिकाधिकरणम्

(184)ओं महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ओम् ॥ 02-02-11॥


परमाण्वारम्भवादमपाकरोति –
महत्त्वाद् दीर्घत्वाच्च यथा कार्यमुत्पद्यते, एवं ह्रस्वत्वात् पारिमण्डल्याच्चोत्पद्येत । वाशब्दादन्यथैतयोरपि न स्यात् । विशेषकारणाभावात् ॥ 11 ॥
(185)ओम् उभयथाऽपि न कर्मातस्तदभावः ओम् ॥ 02-02-12॥


ईश्वरेच्छाया नित्यत्वे तद्भावेऽपि परमाणुकर्माभावान्नेदानीमपि(तत्) स्यात् । अनित्यत्वे तत्कारणाभावात् । अतः परमाणुचेष्टाभावात् तत्कार्याभावः । वैदिकेश्वरस्य तु वेदेनैव सर्वशक्तित्वोक्तेः सर्वम् उपपद्यते । स्वत एव काले(विभेदा) विशेषाङ्गीकृतेश्च ॥ 12 ॥
(186)ओं समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ओम् ॥ 02-02-13॥


कार्यकारणादीनां समवायसम्बन्धाङ्गीकारात् तस्य च भिन्नत्वसाम्यात् समवायान्तरापेक्षायाम् अनवस्थितेः(तिः)।
न च तत् प्रमाणम् । प्रथमसम्बन्धासिद्धैव च तदसिद्धिः । स्वनिर्वाहकत्वे समवाय एव न स्यात् ॥ 13 ॥
(187)ओं नित्यमेव च भावात् ओम् ॥ 02-02-14 ॥


नित्यत्वाच्च परमाणूनां समवायस्य च तस्यैव जनित्वाङ्गीकारात् नित्यमेव कार्यं स्यात् । अन्यथा न कदाचित् ॥ 14 ॥
(188)ओं रूपादिमत्त्वाच्चविपर्ययो दर्शनात् ओम् ॥ 02-02-15॥


रूपादिमत्त्वाच्च परमाणूनामनित्यत्वम् । तथा दृष्टत्वाल्लोके ॥ 15 ॥
(189)ओम् उभयथा च दोषात् ओम् ॥ 02-02-16 ॥


नित्यत्वे परमाणूनां तद्वत् सर्वनित्यत्वं स्यात् । विशेषप्रमाणाभावात् । अनित्यत्वे कारणाभावात् तदुत्पत्त्यभावः ॥ 16 ॥
(190)ओम् अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ओम् ॥ 02-02-17 ॥


श्रुतिस्मृत्यपरिगृहीतत्वाच्चातिशयेनानपेक्ष(क्ष्य)ता ।
‘आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थकम्’() इति च मोक्षधर्मे ॥ 17 ॥

समुदायाधिकरणम्

(191)ओं समुदाय उभयहेतुकेऽपि तदप्राप्तिः ओम् ॥ 02-02-18 ॥


परमाणुपुञ्जवादिमतं निरा(अपा)करोति-
समुदायस्यैकहेतुकत्वं न युज्यते । उभयहेतुकेऽप्यन्योऽन्याश्रयात् तदप्राप्तिः । अन्यथा सर्वदा समुदायसत्त्वं(समुदायत्वम्) स्यात् ॥ 18 ॥
(192)ओम् इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्न उत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ओम् ॥ 02-02-19 ॥


सर्वदा विद्यमानोऽपि समुदायः परस्परापेक्षया व्यवह्रियत इति चेत्,
न । एकं कार्यमुत्पाद्य तस्य विनष्टत्वात् परस्परप्रत्ययस्तदपेक्षया व्यवहार इति न युज्यते ।
कारणे सति कार्यं भवत्येवेति हि तस्य नियमः ॥ 19 ॥
(193)ओम् उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ओम् ॥ 02-02-20 ॥


कार्योत्पत्तावेव कारणस्य विनाशाच्च न विशेषकार्योत्पत्तिः ॥ 20 ॥
(194)ओम् असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्यमन्यथा ओम् ॥ 02-02-21 ॥


कारणे विनष्टे कार्यमुत्पद्यते चेत् तत्कार्यमिति प्रतिज्ञाहानिः । तत्काले कारणमस्ति चेद् विनाशकारणाभावद् यौगपद्यं सर्वकार्याणाम् ॥ 21 ॥
(195)ओं प्रतिसङ्ख्याऽप्रतिसङ्ख्यानिरोधाप्राप्तिरविच्छेदात् ओम् ॥ 02-02-22॥


कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमान्निस्सन्तानः ससन्तानश्च विनाशो न युज्यते ॥ 22 ॥
(196)ओम् उभयथा च दोषात् ओम् ॥ 02-02-23 ॥


कारणे सति कार्यं भवत्येवेति नियमे सर्वदा कार्यभावान्न कार्यकारणविशेषः । अनियमे कार्यानुत्पत्तिः ॥ 23 ॥
(197)ओम् आकाशे चाविशेषात् ओम् ॥ 02-02-24 ॥


दीपादिषु विशेषदर्शनात् क्षणिकत्वेनान्यत्रापि क्षणिकत्वमनुमीयते चेदाकाशादिष्वविशेषदर्शनाद् अन्यत्रापि तदनुमीयेत ॥ 24 ॥
(198)ओम् अनुस्मृतेश्च ओम् ॥ 02-02-25॥


तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानाच्च । प्रत्यभिज्ञाया भ्रान्तित्वे विशेषदर्शनस्यापि भ्रान्तित्वम् ॥ 25 ॥

असदधिकरणम्

(199)ओं नासतोऽदृष्टत्वात् ओम् ॥ 02-02-26 ॥


शून्यवादमपाकरोति-
अदृष्टत्वादसतः कारणत्वं न युज्यते ॥ 26 ॥
(200)ओम् उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ओम् ॥ 02-02-27 ॥


असतः कारणत्वे उदासीनानां हेयोपादेयबुद्धिवर्जितानां खपुष्पादीनामपि सकाशात् कार्यसिद्धिः ।
चशब्दान्न चेदन्यत्रापि न स्यात्, अविशेषात् ॥ 27 ॥
(201)ओं नाभाव उपलब्धेः ओम् ॥ 02-02-28 ॥


न च जगदेव शून्यमिति वाच्यम् । दृष्टत्वात् ॥28॥
(202)ओं वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् ओम् ॥ 02-02-29 ॥


न च दृष्टस्यापि स्वप्नादिवदभावः। तस्योत्तरकाले स्वप्नोयं नायं सर्प इत्याद्यनुभवात् । न चात्र तादृशं प्रमाणमस्ति ॥ 29 ॥

अनुपलब्ध्यधिकरणम्

(203)ओं न भावोऽनुपलब्धेः ओम् ॥ 02-02-30 ॥


विज्ञानवादमपाकरोति-
न विज्ञानमात्रं जगत् । तथाऽनुभवाभावात् ॥ 30 ॥
(204)ओं क्षणिकत्वाच्च ओम् ॥ 02-02-31 ॥


ज्ञानं क्षणिकम् । अर्थानां च स्थायित्वमुक्तम् । अतश्च नैक्यम् ॥ 31 ॥
(205)ओं सर्वथाऽनुपपत्तेश्च ओम् ॥ 02-02-32 ॥


प्रमाणाभावात् सर्वश्रुतिस्मृतिर्युक्तिविरुद्धत्वाच्च नैते पक्षा ग्राह्याः ॥ 32 ॥

नैकस्मिन्नधिकरणम्

(206)ओं नैकस्मिन्नसम्भवात् ओम् ॥ 02-02-33 ॥


स्याद्वादिमतं दूषयति-
सत् स्यादसत् स्यात् सदसत् स्यात् ततोऽन्यच्च स्यादित्येतन्नैकस्मिन् युज्यते । अदृष्टत्वेनासम्भवात् ॥ 33 ॥
(207)ओम् एवञ्चात्माकार्त्स्न्यम् ओम् ॥ 02-02-34 ॥


जीवस्य शरीरपरिमितत्वाङ्गीकारेऽण्वादिशरीरस्थस्य हस्त्यादिशरीरेऽकार्त्स्न्यं स्यात् ॥34॥
(208)ओं न च पर्यायादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ओम्॥ 02-02-35 ॥


तत्तच्छरीरस्थस्य तत्तत्परिमाणत्वमिति न मन्तव्यम्(वाच्यम्) । विकारित्वादनित्यत्वप्रसक्तेः ॥ 35 ॥
(209)ओम् अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वादविशेषात् ओम् ॥ 02-02-36 ॥


परिमाणाभावे स्वरूपाभावप्राप्त्याऽन्त्यपरिमाणस्थितेस्तदर्थत्वेन शरीरस्थितेरुभयनित्यत्वादविशेषेण सर्वशरीरनित्यत्वं स्यात् ॥ 36 ॥

पत्युरधिकरणम्(पशुपत्यधिकरणम्)

(210)ओं पत्युरसामञ्जस्यात् ओम् ॥ 02-02-37 ॥


पाशुपतमतमपाकरोति-
‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’(ऋ.सं.१०.१२५.५) ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ’(ऋ.सं.१०.१२५.६)।
‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।विदे हि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्’(ऋ.सं.७.४०.५।
‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो नाग्नीषोमौ’(महोपनिषत्.१),इत्यादि श्रुतेः पारतन्त्र्येणासमञ्जसत्वान्न पतीरीश्वरनामा जगत्कर्ता ॥ 37 ॥
(211)ओं सम्बन्धानुपपत्तेश्च ओम् ॥ 02-02-38 ॥


अशरीरत्वात् तस्य जगता सम्बन्धो न युज्यते कर्तृत्वेन, मृतपुरुषवत् ॥38॥
(212)ओम् अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ओम् ॥ 02-02-39 ॥


पृथिव्याद्यधिष्ठाने स्थितो हि कुलालादिः कार्यं करोति । न चास्य तदस्ति ॥ 39 ॥
(213)ओं करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ओम् ॥ 02-02-40॥


इदमेव जगत् तस्य करणवदधिष्ठानादिरूपं नित्यस्यापि कस्यचिद् भावाद् युज्यत इति चेत्, न । भोगादिप्राप्तेः।
उत्पत्तिविनाशौ सुखदुःखभोगाश्च प्राप्यन्ते तद्गताः ॥ 40 ॥
(214)ओम् अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ओम् ॥ 02-02-41 ॥


देहवत्वेऽन्तवत्वम् । अन्यथा ज्ञानाभावः ।
शरीरिण एव हि ज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । विष्णोस्तु श्रुत्यैव सर्वे विरोधाः परिहृताः-
‘यदात्मको भगवांस्तदात्मिकी(का) व्यक्तिः । किमात्मको भगवान् ज्ञानात्मक ऐश्वर्यात्मकः शक्त्यात्मकः’इति,‘बुद्धिमनोऽङ्गप्रत्यङ्गवत्तां भगवतो लक्षयामहे । बुद्धिमान् मनोवानङ्गप्रत्यङ्गवानिति’,‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः ।ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमाक्षरः’(पैङ्गिश्रुतिः) ॥ इत्यादिकया ॥ 41 ॥

उत्पत्त्य(शक्त्य)धिकरणम्

(215)ओम् उत्पत्त्यसम्भवात् ओम् ॥ 02-02-42 ॥


शक्तिपक्षं दूषयति-
न हि पुरुषाननुगृहीतस्त्रीभ्य उत्पत्तिर्दृश्यते ॥ 42 ॥
(216)ओं न च कर्तुः करणम् ओम् ॥ 02-02-43 ॥


यदि पुरुषोऽङ्गीक्रियेत तस्यापि करणाभावाद् अनुपपत्तिः ॥ 43 ॥
(217)ओं विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ओम् ॥ 02-02-44॥


यदि विज्ञानादिकरणं तस्याङ्गीक्रियते तदा तत एव सृष्ट्याद्युपपत्तेरीश्वर-वादान्तर्भावः ॥ 44 ॥
(218)ओं विप्रतिषेधाच्च ओम् ॥ 02-02-45 ॥


सकलश्रुत्यादिविरुद्धत्वाच्चासमञ्जसम् ॥ 45 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 02-02 ॥