Brahmasutra/C1/S1: Difference between revisions
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<div class="gr-page-nav">[[Brahmasutra|ब्रह्मसूत्रभाष्यम्]] · [[Brahmasutra/Toc|अनुक्रमणिका]]</div> | |||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
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| chapter_num = 1 | | chapter_num = 1 | ||
| title = प्रथमः पादः | | title = प्रथमः पादः | ||
}}नारायणं गुणैः सर्वैरुदीर्णं दोषवर्जितम् | }}नारायणं गुणैः सर्वैरुदीर्णं दोषवर्जितम् ।ज्ञेयं गम्यं गुरूंश्चापि नत्वा सूत्रार्थ उच्यते ॥ | ||
द्वापरे सर्वत्र ज्ञान आकुलीभूते तन्निर्णयाय ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो भगवान् नारायणो व्यासत्वेनावततार । अथेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छूनां तद्योगमविजानतां तज्ज्ञापनार्थं वेदमुत्सन्नं व्यञ्जयंश्चतुर्धा व्यभजत्। चतुर्विंशतिधैकशतधा सहस्रधा द्वादशधा च । तदर्थनिर्णयाय ब्रह्मसूत्राणि चकार । | द्वापरे सर्वत्र ज्ञान आकुलीभूते तन्निर्णयाय ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो भगवान् नारायणो व्यासत्वेनावततार । अथेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छूनां तद्योगमविजानतां तज्ज्ञापनार्थं वेदमुत्सन्नं व्यञ्जयंश्चतुर्धा व्यभजत्। चतुर्विंशतिधैकशतधा सहस्रधा द्वादशधा च । तदर्थनिर्णयाय ब्रह्मसूत्राणि चकार । | ||
तच्चोक्तं स्कान्दे – | तच्चोक्तं स्कान्दे – | ||
नारायणाद्विनिष्पन्नं ज्ञानं कृतयुगे स्थितम् ।किञ्चित् तदन्यथा जातं त्रेतायां द्वापरेऽखिलम् ॥गौतमस्य ऋषेः शापार्ज्ज्ञाने त्वज्ञानतां गते ।सङ्कीर्णबुद्धयो देवा ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ॥शरण्यं शरणं जग्मुर्नारायणमनामयम् ।तैर्विज्ञापितकार्यस्तु भगवान् पुरुषोत्तमः॥अवतीर्णो महायोगी सत्यवत्यां पराशरात् ।उत्सन्नान् भगवान् वेदानुज्जहार हरिः स्वयम् ॥चतुर्धा व्यभजत् तांश्च चतुर्विंशतिधा पुनः ।शतधा चैकधा चैव तथैव च सहस्रधा ॥कृष्णो द्वादशधा चैव पुनस्तस्यार्थवित्तये ।चकार ब्रह्मसूत्राणि येषां सूत्रत्वमञ्जसा ॥ | |||
अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम् ।अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥ | |||
अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम् | |||
निर्विशेषितसूत्रत्वं ब्रह्मसूत्रस्य चाप्यतः ।यथा व्यासत्वमेकस्य कृष्णस्यान्ये विशेषणात् ॥ | |||
सविशेषणसूत्राणि ह्यपराणि विदो विदुः ।मुख्यस्य निर्विशेषेण शब्दोऽन्येषां विशेषतः ॥ | |||
इति वेदविदः प्राहुः शब्दतत्त्वार्थवेदिनः ।सूत्रेषु येषु सर्वेऽपि निर्णयाः समुदीरिताः ॥ | |||
शब्दजातस्य सर्वस्य यत्प्रमाणश्च निर्णयः ।एवं विधानि सूत्राणि कृत्वा व्यासो महायशाः ॥ | |||
ब्रह्मरुद्रादिदेवेषु मनुष्यपितृपक्षिषु ।ज्ञानं संस्थाप्य भगवान् क्रीडते पुरुषोत्तमः ॥ इत्यादि । | |||
शब्दजातस्य सर्वस्य यत्प्रमाणश्च निर्णयः | |||
ब्रह्मरुद्रादिदेवेषु मनुष्यपितृपक्षिषु | |||
=== जिज्ञासाधिकरणम् === | === जिज्ञासाधिकरणम् === | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् ओम् अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ओम् ॥ 01-01-01 ॥ | ||
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‘अथ’ शब्दो मङ्गलार्थोऽधिकारानन्तर्यार्थश्च । ‘अतः’ शब्दो हेत्वर्थः। | ‘अथ’ शब्दो मङ्गलार्थोऽधिकारानन्तर्यार्थश्च । ‘अतः’ शब्दो हेत्वर्थः। | ||
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उक्तं च गारुडे | उक्तं च गारुडे –अथातः शब्दपूर्वाणि सूत्राणि निखिलान्यपि ।प्रारभन्ते नियत्यैव तत् किमत्र नियामकम् ॥कश्चार्थस्तु तयोर्विद्वन् कथमुत्तमता तयोः ।एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् यथा ज्ञास्यामि तत्त्वतः ॥ | ||
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एवमुक्तो नारदेन ब्रह्मा प्रोवाच सत्तमः ।आनन्तर्येऽधिकारस्य मङ्गलार्थे तथैव च ॥अतशब्दस्त्वतः शब्दो हेत्वर्थे समुदीरितः ।परस्य ब्रह्मणो विष्णोः प्रसादादिति वा भवेत् ॥स हि सर्वमनोवृत्तिप्रेरकः समुदाहृतः ।सिसृक्षोः परमाद्विष्णोः प्रथमं द्वौ विनिःसृतौ ॥ओङ्कारश्चाथशब्दश्च तस्मात् प्राथमिकौ क्रमात् ।तद्धेतुत्वं वदंश्चापि तृतीयोऽत उदाहृतः॥ | |||
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अकारः सर्ववागात्मा परब्रह्माभिधायकः ।तथौ प्राणात्मकौ प्रोक्तौ व्याप्तिस्थितिविधायकौ ॥अतश्च पूर्वमुच्चार्याः सर्व एते सतां मताः ।अथातःशब्दयोरेवं वीर्यमाज्ञाय तत्त्वतः ॥सूत्रेषु तु महाप्राज्ञास्तावेवादौ प्रयुञ्जते ॥ इति। | |||
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अधिकारश्चोक्तो भागवततन्त्रे – | |||
मन्दमध्योत्तमत्वेन त्रिविधा ह्यधिकारिणः ।तत्र मन्दा मनुष्येषु य उत्तमगणा मताः ॥मध्यमा ऋषिगन्धर्वा देवास्तत्रोत्तमा मताः ।इति जातिकृतो भेदस्तथाऽन्यो गुणपूर्वकः ॥भक्तिमान् परमे विष्णौ यस्त्वध्ययनवान् नरः ।अधमः शमादिसंयुक्तो मध्यमः समुदाहृतः ॥आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमसारं चाप्यनित्यकम् ।विज्ञाय जातवैराग्यो विष्णुपादैकसंश्रयः ॥स उत्तमोऽधिकारी स्यात् सन्न्यस्ताखिलकर्मवान् इति । | |||
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‘अध्ययनमात्रवतः’(ब्र.सू.३.४.१२)‘नाविशेषात्’(ब्र.सू.३.४.१३) इति चोपरि । | |||
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स | ‘शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवाऽत्मानं पश्येत्’(बृ.उ.४.४.२३)।‘परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् । नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।”(मुण्डक.उ.१.२.१२)‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ।’(क.उ.२.२३) | ||
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“ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।तस्यैते कथिता(तस्यैतेऽकथिता) ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥”(श्वे.उ.६.२३) | |||
इत्यादि श्रुतिभ्यश्च ॥ | |||
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व्योमसंहितायां च – | |||
‘अन्त्यजा अपि ये भक्ता नामज्ञानाधिकारिणः ।स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां तन्त्रज्ञानेऽधिकारिता ॥ | |||
एकदेशे परोक्ते तु न तु ग्रन्थपुरस्सरे ।त्रैवर्णिकानां वेदोक्ते सम्यग्भक्तिमतां हरौ ॥ | |||
आहुरप्युत्तमस्त्रीणामधिकारं तु वैदिके ।यथोर्वशी यमी चैव शच्याद्याश्च तथाऽपरा ॥’ इति ॥तथाऽऽपराः मुनिस्त्रियः नरादिकुलजाश्च । | |||
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यतो नारायणप्रसादम् ऋते न मोक्षः, न च ज्ञानं विना अत्यर्थप्रसादः, अतो ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्या । | |||
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‘यत्रानवसरोऽन्यत्र पदं तत्र प्रतिष्ठितम् ।वाक्यं वेति सतां नीतिः सावकाशे न तद्भवेत्॥’इति बृहत्संहितायाम् । | |||
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‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति । नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥’(तै.आ.३.१२) | |||
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‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।’(भ.गी.७.१७) | |||
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‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः ।’(क.उ.२.२३) | |||
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‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः।’(बृ.उ.६.५.६) | |||
इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । | |||
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‘कर्मणात्वधमः प्रोक्तः प्रसादः, श्रवणादिभिः । मध्यमो, ज्ञानसम्पत्त्या प्रसादस्तूत्तमो मतः ॥प्रसादात्त्वधमाद्विष्णोः स्वर्गलोकः प्रकीर्तितः । मध्यमाज्जनलोकादिः, उत्तमस्त्वेव मुक्तिदः ॥ | |||
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श्रवणं मननं चैव ध्यानं भक्तिस्तथैव च । साधनं ज्ञानसम्पत्तौ प्रधानं नान्यदिष्यते ॥न चैतानि विना कश्चिज्ज्ञानमाप कुतश्चन’। इति नारदीये । | |||
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ब्रह्मशब्दश्च विष्ण्वावेव | |||
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‘यमन्तः समुद्रे कवयोऽवयन्ति तदक्षरे परमे प्रजाः ।यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान्व्यससर्ज भूम्याम्’(म.ना.उ.१.३)इत्युक्त्वा‘तदेवर्तं तदु सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.१.६) इति हि शृतिः ॥ | |||
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‘तन्नो विष्णुः’(म.ना.उ.३.१६) इति वचनाद्विष्णुरेव हि तत्रोच्यते ॥ न चेतरशब्दात् तत्प्राप्तिः | |||
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‘नामानि विश्वाऽभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतिः | |||
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‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या’(ऋ.सं.१०.८२.३) इत्येवशब्दान्नान्येषां सर्वनामता । | |||
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‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः’(ऋ.सं.१०.८२.६) इति विष्णोर्हि लिङ्गम् । | |||
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न च प्रसिद्धार्थं विनाऽन्योऽर्थो युज्यते ॥ | न च प्रसिद्धार्थं विनाऽन्योऽर्थो युज्यते ॥ | ||
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‘‘अजस्य नाभौ’ इति, यस्य नाभेरभूच्छ्रुतेः पुष्करं लोकसारम् । तस्मै नमो व्यस्तसमस्तविश्वविभूतये विष्णवे लोककर्त्रे’’ इति स्कान्दे । | |||
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‘परो दिवा पर एना पृथिव्या’ इति समाख्याश्रुतौ ॥ | ‘परो दिवा पर एना पृथिव्या’(ऋ.सं.१०.८२.५) इति समाख्याश्रुतौ ॥ | ||
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‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’ इत्युक्त्वा ‘मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे’ इत्याह । | ‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’(ऋ.सं.१०.१२५.५) इत्युक्त्वा ‘मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे’(ऋ.सं.१०.१२५.७) इत्याह । | ||
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उग्रो रुद्रः । समुद्रेऽन्तर्नारायणः । प्रसिद्धत्वात् सूचितत्वाच्चास्यार्थस्य । न चाविरोधे प्रसिद्धः परित्यज्यते । उक्तान्यायेन च श्रुतय एतमेव वदन्ति । | उग्रो रुद्रः । समुद्रेऽन्तर्नारायणः । प्रसिद्धत्वात्, सूचितत्वाच्चास्यार्थस्य । न चाविरोधे प्रसिद्धः परित्यज्यते । उक्तान्यायेन च श्रुतय एतमेव वदन्ति । | ||
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‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते’ इति हरिवंशेषु ॥ | ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते’ इति हरिवंशेषु ॥ | ||
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न चेतरग्रन्थविरोधः | न चेतरग्रन्थविरोधः | ||
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‘एषं मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति ।त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय ॥अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज ।प्रकाशं कुरु चात्मानामप्रकाशं च मां कुरु’ इति वाराह वचनात् ॥ | |||
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शैव च स्कान्दे – | शैव च स्कान्दे – | ||
‘श्वपचादपि कष्टत्वं ब्रह्मेशानादयः सुराः ।तदैवाच्युत यान्त्येव यदैव त्वं पराङ्मुखः॥’ इति ॥ | |||
‘श्वपचादपि कष्टत्वं ब्रह्मेशानादयः सुराः | |||
ब्राह्मे च ब्रह्मवैवर्ते – | ब्राह्मे च ब्रह्मवैवर्ते – | ||
‘नाहं न च शिवोऽन्ये च तच्छक्त्येकांशभागिनः ।बालः क्रीडनकैर्यद्वत् क्रीडतेऽस्माभिरच्युतः’ इति ॥ | |||
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न च वैष्णवेषु तथा । तच्च ‘एष मोहम्’ इत्युक्तम् ॥ | न च वैष्णवेषु तथा । तच्च ‘एष मोहम्’ इत्युक्तम् ॥ | ||
इति जिज्ञासाधिकरणम् ॥ | |||
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ब्रह्मणो लक्षणमाह – | |||
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सृष्टि-स्थिति-संहार-नियमन-ज्ञान-अज्ञान-बन्ध-मोक्षाः यतः । | |||
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‘उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिर्ज्ञानमावृतिः । बन्धमोक्षौ च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट्’ इति स्कान्दे । | |||
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‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्म’(तै.उ.३.१) इति । | |||
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‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा ।’(ऋ.सं.१.१५४.४) | |||
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‘चतुर्भिस्साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तिं व्यतीरँवीविपत् ।’(ऋ.सं.१.१५५.६) | |||
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‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।’(ऋ.सं.७.९९.१) | |||
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‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप।’(ऋ.सं.७.९९.२) | |||
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‘यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा’(ऋ.सं.१०.८२.३) इत्यादि च ॥02॥॥ इति जन्माधिकरणम् ॥ | |||
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| Line 623: | Line 354: | ||
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‘नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं सर्वानुभूमात्मानं साम्पराये’ ॥ | ‘नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं सर्वानुभूमात्मानं साम्पराये’ ॥(तै.ब्रा.३.१२.९) | ||
‘औपनिषदः पुरुषः’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ | ‘औपनिषदः पुरुषः’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ | ||
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न चानुमानस्य नियतप्रामाण्यम् ॥ | न चानुमानस्य नियतप्रामाण्यम् ॥ | ||
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‘श्रुतिसाहाय्यरहितमनुमानं न कुत्रचित् | ‘श्रुतिसाहाय्यरहितमनुमानं न कुत्रचित् ।निश्चयात् साधयेदर्थं प्रमाणान्तरमेव च ॥ | ||
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श्रुतिस्मृतिसहायं यत् प्रमाणान्तरमुत्तमम् | श्रुतिस्मृतिसहायं यत् प्रमाणान्तरमुत्तमम् ।प्रमाणपदवीं गच्छेन्नात्र कार्याविचारणा ॥ | ||
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पूर्वोत्तराविरोधेन कोऽत्रार्थोऽभिमतो भवेत् ।इत्याद्यमूहनं तर्कः शुष्कतर्कं तु वर्जयेत्’ इत्यादि कौर्मे॥ | पूर्वोत्तराविरोधेन कोऽत्रार्थोऽभिमतो भवेत् ।इत्याद्यमूहनं तर्कः शुष्कतर्कं तु वर्जयेत्’ इत्यादि कौर्मे॥ | ||
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शक्यत्वाच्चानुमानानां सर्वत्र । | शक्यत्वाच्चानुमानानां सर्वत्र । | ||
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‘सर्वत्र शक्यते कर्तुमागमं हि विनाऽनुमा ।तस्मान्न सा शक्तिमती विनागममुदीक्षितुम् ।’ इति वाराहे । | ‘सर्वत्र शक्यते कर्तुमागमं हि विनाऽनुमा ।तस्मान्न सा शक्तिमती विनागममुदीक्षितुम् ।’ इति वाराहे । | ||
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‘रेतो धातुर्वटकणिका घृतधूमाधिवासनम् | ‘रेतो धातुर्वटकणिका घृतधूमाधिवासनम् ।जातिस्मृतिरयस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम् ॥ | ||
प्रेत्य भूताप्ययश्चैव देवताभ्युपयाचनम् ।मृते कर्मनिवृत्तिश्च प्रमाणमिति निश्चयः ॥’(म.भा.१२.२२०.३०-३१) | |||
इति मोक्षधर्मवचनान्न नास्तिक्यवादो युज्यते । | |||
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दर्शनाच्च तप आधिफलस्य ॥ | दर्शनाच्च तप आधिफलस्य ॥ | ||
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‘ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्। मूलरामायणं चैव शास्त्रमित्यभिदीयते ॥यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम् । अतोऽन्यो ग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत्’॥इति स्कान्दे ॥ | ‘ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्। मूलरामायणं चैव शास्त्रमित्यभिदीयते ॥यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम् । अतोऽन्यो ग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत्’॥इति स्कान्दे ॥ | ||
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॥ इति शास्त्रयोनित्वाधिकरणम् ॥ 03 ॥ | ‘साङ्ख्यं योगः पाशुपतं वेदारण्यकमेव च’। इत्यारभ्य, वेदपञ्चरात्रयोरैक्याभिप्रायेण पञ्चरात्रस्यैव प्रामाण्यमुक्तम्, इतरेषां भिन्नमतत्वं प्रदर्श्य मोक्षधर्मेष्वपि । ‘शास्त्रं योनिः= प्रमाणमस्य’ इति शास्त्रयोनि ॥ 03 ॥ | ||
इति शास्त्रयोनित्वाधिकरणम् ॥ 03 ॥ | |||
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| Line 745: | Line 453: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं तत्तु समन्वयात् ओम् ॥ 01-01-04 ॥ | ||
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| Line 767: | Line 475: | ||
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| text = | | text = | ||
‘उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् ।अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये॥’ इति ॥ | |||
‘उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् | |||
}} | }} | ||
| Line 782: | Line 482: | ||
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उपक्रमादितात्पर्यलिङ्गैः सम्यङ् निरूप्यमाणे तदेव शास्त्रगम्यम् । | |||
}} | }} | ||
| Line 789: | Line 489: | ||
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| text = | | text = | ||
‘मां विधत्तेऽभिदत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य इत्यहम् ।इत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन’ इति भागवते ॥ 04 | ‘मां विधत्तेऽभिदत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य इत्यहम् ।इत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन’(भाग.११.२१.४३) इति भागवते ॥ 04 ॥॥ इति समन्वयाधिकरणम् ॥ 04 ॥ | ||
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| Line 806: | Line 499: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् ईक्षतेर्नाशब्दम् ओम् ॥ 01-01-05 ॥ | ||
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ननु‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’(तै.उ.२.४.२२) , ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्’(क.उ.१.३.१५) ,‘अवचनेनैव प्रोवाच’(बाष्कलश्रुति) , ‘यद्वाचाऽनभ्युदितम् । येन वागभ्युद्यते । यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्’(क.उ.१) इत्यादिभिर्न तच्छब्दगोचरम् । नेत्याह – | |||
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| Line 821: | Line 509: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स | ‘स एतस्मात् जीवघनात् परात् परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते’(प्र.उ.५.५),‘आत्मन्येवात्मनं पश्येत्’(बृ.उ.६.४.२३), ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत’(बृ.उ.६.४.२१) इत्यादिवचनैः ईक्षणीयत्वाद् वाच्यमेव । औपनिषदत्वात् न अवचनेनेक्षणम् ॥ | ||
‘आत्मन्येवात्मनं पश्येत्’ ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत’ | |||
}} | }} | ||
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‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति’ ॥ | ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति’(कठ.२.१५), ‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम्’(भ.गी.१५.१५) इत्यादिशृतिस्मृतिभ्यश्च ॥ | ||
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अवाच्यत्वादिकं त्वप्रसिद्धत्वात् । | |||
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‘न तदीदृगिति ज्ञेयं न वाच्यं न च तर्क्यते । पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति मेरो रूपं विपश्चितः’ | ‘न तदीदृगिति ज्ञेयं न वाच्यं न च तर्क्यते । पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति मेरो रूपं विपश्चितः’ इति वत् ॥ अप्रसिद्धेरवाच्यं तद्वाच्यं सर्वागमोक्तितः । अतर्क्यं तर्क्यमज्ञेयं ज्ञेयमेवं परं स्मृतम्॥’ इति गारुडे ॥ | ||
}} | }} | ||
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न चाशब्दत्वमितरसिद्धम् ॥05॥ | न चाशब्दत्वमितरसिद्धम् ॥05॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 875: | Line 553: | ||
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न च गौण आत्मा दृश्यो वाच्यश्च न निर्गुण इति युक्तम् । | न च गौण आत्मा दृश्यो वाच्यश्च, न निर्गुण इति युक्तम् । आत्मशब्दात्। | ||
}} | }} | ||
| Line 882: | Line 560: | ||
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| text = | | text = | ||
‘यो गुणैः सर्वतोहीनो यश्च दोषविवर्जितः । हेयोपादेयरहितः स आत्मेत्यभिधीयते ॥ एतदन्यस्वभावो यः सोऽनात्मेति सतां मतम् ॥ अनात्मन्यात्मशब्दस्तु सोपचारः | ‘यो गुणैः सर्वतोहीनो यश्च दोषविवर्जितः । हेयोपादेयरहितः स आत्मेत्यभिधीयते ॥ एतदन्यस्वभावो यः सोऽनात्मेति सतां मतम् ॥ अनात्मन्यात्मशब्दस्तु सोपचारः प्रयुज्यते॥’ इति वामने ॥ | ||
}} | }} | ||
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‘द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे आत्मा | ‘द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे-आत्मा चैव अनात्मा च । तत्र यः स आत्मा स नित्यः शुद्धः केवलो निर्गुणश्च । अथ ह योऽनीदृशः सोऽनात्मा’इति तलवकारब्राह्मणम् । | ||
}} | }} | ||
| Line 896: | Line 574: | ||
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न च मुख्ये | न च मुख्ये सति अमुख्यं युज्यते ॥ 06 ॥ | ||
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‘यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन् सन्दोहे गहने प्रविष्टः | ‘यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन् सन्दोहे गहने प्रविष्टः ।स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव’(बृ.उ.६.४.१३) | ||
इत्यात्मनिष्ठस्य मोक्ष उपदिश्यते । | इत्यात्मनिष्ठस्य मोक्ष उपदिश्यते । | ||
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‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति | ‘अयमात्मा ब्रह्म॥’(बृ.उ.४.५.१९,माण्डूक्य.उ.१.२), ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११), ‘दत्तं दूर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्’(भाग.३.१.१५)॥ | ||
‘चेतनस्तु द्विधा प्रोक्तो जीव आत्मेति च प्रभो ।जीवा ब्रह्मादयः प्रोक्ता आत्मैकस्तु जनार्दनः ॥इतरेष्वात्मशब्दस्तु सोपचारः प्रयुज्यते(रोऽभिधीयते) ॥तस्यात्मनो निर्गुणस्य ज्ञानान्मोक्ष उदाहृतः ॥ | |||
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‘सगुणास्त्वपरे प्रोक्तास्तज्ज्ञानान्नैव मुच्यते ।परो हि पुरुषो विष्णुः तस्मान्मोक्षस्ततः स्मृतः’ इति पाद्मे ॥ 07 ॥ | |||
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‘तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ । अमृतस्यैष सेतुः’ | ‘तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ । अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.२.२.५) इति अन्येषां हेयत्ववचनात्, अस्य अहेयत्ववचनात् न गौण आत्मा ॥ 08 ॥ | ||
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‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते | ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’(बृ.उ.५.१.१) | ||
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‘स आत्मन | ‘स आत्मन आत्मानमुद्धृत्य आत्मन्येव विलापयति, अथ आत्मैव भवति’। | ||
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‘स देवो बहुधा भूत्वा निर्गुणः पुरुषोत्तमः।एकीभूय पुनः शेते निर्दोषो हरिरादिकृत्॥’इति स्वस्यैव स्वस्मिन्नप्ययवचनात् । | |||
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न हि गौणात्मनि निर्दोषस्य लयः ॥ 09 ॥ | न हि गौणात्मनि निर्दोषस्य लयः ॥ 09 ॥ | ||
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न च | न च कासुचित् शाखासु अन्यथा उच्यते । | ||
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‘सर्वे वेदा युक्तयः सुप्रमाणा ब्राह्मं ज्ञानं परमं त्वेकमेव ।प्रकाशयन्ते न विरोधः | ‘सर्वे वेदा युक्तयः सुप्रमाणा ब्राह्मं ज्ञानं परमं त्वेकमेव ।प्रकाशयन्ते न विरोधः कुतश्चिद् वेदेषु सर्वेषु तथेतिहासे॥’इति पैङ्गिश्रुतेः, गतेः= ज्ञानस्य साम्यमेव ॥ 10 ॥ | ||
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| chapter_id = BS_C01 | | chapter_id = BS_C01 | ||
| verse_type = sutra | | verse_type = sutra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं श्रुतत्वाच्च ओम् ॥ 01-01-11 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,067: | Line 705: | ||
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| text = | | text = | ||
‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा | ‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥’(श्वे.उ१.१) इति ॥ | ||
}} | |||
{{Bhashyam | |||
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न हि अशब्दः श्रूयते । | |||
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न चाप्रसिद्धं कल्प्यम् । | |||
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| Line 1,081: | Line 725: | ||
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सर्वशब्दावाच्यस्य लक्षणाऽयुक्तेः ॥ 11 ॥ | |||
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॥ इति ईक्षत्यधिकरणम् ॥ | ॥ इति ईक्षत्यधिकरणम् ॥ | ||
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‘ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्या’ इत्युक्तम् । तच्च ब्रह्म ‘ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा’(तै.उ.२.५.२) इत्यानन्दमयावयवरूपं प्रतीयते । | |||
}} | |||
=== आनन्दमयाधिकरणम् === | === आनन्दमयाधिकरणम् === | ||
| Line 1,092: | Line 751: | ||
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| Line 1,098: | Line 757: | ||
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आनन्दमयो ब्रह्मादिः, प्रकृतिः,विष्णुः वा ? | |||
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ब्रह्मशब्दात् हिरण्यगर्भस्य प्राप्तिः, शतानन्दनाम्ना च । अष्टमूर्तित्वात्, सूर्ये प्रोक्तत्वाच्च रुद्रस्य । एवमन्येषामपि।‘मम योनिर्महद्ब्रह्म’(भ.गी.१४.३) इति ब्रह्मशब्दात्, बहुभावाच्च प्रकृतेः । ‘बृह= जाति-जीव-कमलासन-शब्दराशिषु’ इति ब्रह्मशब्दादेव सर्वजीवानाम्, अन्नमयत्वादेश्च । | |||
}} | }} | ||
| Line 1,116: | Line 773: | ||
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| text = | | text = | ||
तथाऽपि न त आनन्दमयशब्देनोच्यन्ते | तथाऽपि न त आनन्दमयशब्देनोच्यन्ते, किन्तु विष्णुरेव । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,123: | Line 780: | ||
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| text = | | text = | ||
‘तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.१.६),‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’(ऐ.आ.३.२.३.१२),‘ब्रह्मशब्दः परे विष्णौ नान्यत्र क्वचिदिष्यते ।असम्पूर्णाः परे यस्माद् उपचारेण वा भवेत्॥’‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११),‘वासुदेवात्मकं ब्रह्म मूलमन्त्रेण वा यतिः’(व्या.स्मृ.) इत्यादिषु तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दाभ्यासात् ॥ 12 ॥ | |||
‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ | }} | ||
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| verse_line1 = ओं विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ओम् ॥ 01-01-13 ॥ | |||
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विकारात्मकत्वात् तदभिमानित्वाच्च युज्यते प्रकृत्यादीनां मयट् शब्दः । न तु परमात्मन इति मा भूत् । प्रचुरानन्दत्वाद्धि आनन्दमयः । न तु तद्विकारत्वात् ॥ | |||
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अन्नादीनां च प्राचुर्यमेव ॥ | |||
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‘अद्यतेऽत्ति च’(तै.उ.२.२) इति व्याखानात् तत्प्राचुर्यं च युज्यते ॥ | |||
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उपजीव्यत्वमेव आद्यत्वम् ।‘स वा एषः’(तै.उ.२.२)इत्यन्यप्रारम्भात् ॥ | |||
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‘येऽन्नं ब्रह्मोपासते’(तै.उ.२.२)इत्यादिब्रह्मशब्दाद् बहुरूपत्त्वाच्च न विकारित्वमविरोधश्च । | |||
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न च पृथक्कल्पना युक्ता । | |||
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स्वरूपे च युज्यते प्रचुरप्रकाशो रविरितिवत् ॥13॥ | |||
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‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’ इति ॥14॥ | ‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’(तै.उ.२.७) इति ॥14॥ | ||
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| Line 1,200: | Line 862: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ओम् ॥ 01-01-15 ॥ | ||
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| Line 1,208: | Line 870: | ||
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| text = | | text = | ||
‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इति सूचयित्वा‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इति मन्त्रवर्णलक्षितं परमेव | ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’(तै.उ.२.१) इति सूचयित्वा‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१) इति मन्त्रवर्णलक्षितं परमेव ब्रह्म शब्दानुसन्धानाद् गीयते । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,215: | Line 877: | ||
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| text = | | text = | ||
‘स शिरः स दक्षिणः पक्षः स उत्तरः पक्षः स आत्मा स | न चावयवत्वविरोधः । ‘स शिरः स दक्षिणः पक्षः स उत्तरः पक्षः स आत्मा स पुच्छम्’इति तस्यैवावयवत्वोक्तेश्चतुर्वेदशिखायाम् | ||
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‘शिरो नारायणः पक्षो दक्षिणः सव्य एव च ।प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च सन्दोहो वासुदेवकः ॥नारायणोऽथ सन्दोहो वासुदेवः शिरोऽपि वा ।पुच्छं सङ्कर्षणः प्रोक्त एक एव तु पञ्चधा ॥अङ्गाङ्गित्वेन भगवान् क्रीडते पुरुषोत्तमः ।ऐश्वर्यान्न विरोधश्च चिन्त्यस्तस्मिन् जनार्दने ॥अतर्क्ये हि कुतस्तर्कस्त्वप्रमेये कुतः प्रमा’इति बृहत्संहितायाम् ॥ | |||
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रसशब्देन विशेषणात् तत्सारभूतं चिन्मात्रमेवोच्यते । | |||
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इदमिति च दृश्यमानसन्निहितत्वात् । | |||
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‘अनन्योऽप्यन्यशब्देन तथैको बहुरूपवान् ।प्रोच्यते भगवान् विष्णुरैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः॥’ इति ब्रह्माण्डे । | |||
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न चोक्तप्राप्त्या विरिञ्चादिरुच्यते ॥ 15 ॥ | न चोक्तप्राप्त्या विरिञ्चादिरुच्यते ॥ 15 ॥ | ||
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न ह्यन्यज्ञानान्मोक्ष उपपद्यते । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति ह्युक्तम् ॥16॥ | न ह्यन्यज्ञानान्मोक्ष उपपद्यते । | ||
}} | |||
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‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७) इति ह्युक्तम् ॥16॥ | |||
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| text = | | text = | ||
‘ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः’ | ‘ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः’(तै.उ.२.२०(२८)),‘अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते अथ सोऽभयं गतो भवति’(तै.आ.२.१६) | ||
‘अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां | ‘स यश्चायं पुरुषे’(तै.उ.२.२१(२७)) इत्यादिभेदव्यपदेशात् । | ||
‘स यश्चायं पुरुषे’ इत्यादिभेदव्यपदेशात् । | |||
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न | न च‘तत्त्वमसि’(छा.उ.६.८)‘अहं ब्रह्मास्मि’(बृ.उ.३.५.४) इत्यादिश्रुतिविरोधः ॥ ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’ इति तत्तच्छब्दवाच्यत्वोक्तेः ॥ | ||
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‘इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः’ | ‘इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः’(भाग.१.५.२०) | ||
‘असर्वः सर्व इत्यपि’, | ‘असर्वः सर्व इत्यपि’,‘विद्याऽऽत्मनि भिदाभोधः’(भाग.११.१९.३९),‘भेददृष्ट्वाऽभिमानेन निस्सङ्गेनापि कर्मणा’(भाग.३.३.१२)‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ।’(मु.उ.३.१.२) | ||
‘भेददृष्ट्वाऽभिमानेन निस्सङ्गेनापि कर्मणा’ | |||
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‘असर्वः सर्व इवात्मैव सन्ननात्मेव प्रत्यङ् पराङ् वैक ईयते बहुधेयते’,‘स पुरुषः’, ‘स ईश्वरः’, ‘स ब्रह्म’ । | |||
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‘सर्वान्तर्यामको विष्णुः सर्वनाम्नाऽभिधीयते ।एषोऽहं त्वमसौ चेति न तु सर्वस्वरूपतः’॥ | |||
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‘नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह’(म.भा.१२.३६०.२) इत्यादेश्च । | |||
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उक्ता च प्राप्तिः ।‘ब्रह्मैव सन्’(बृ.उ.६.४) इत्यपि जीव एव ब्रह्मशब्दः । | |||
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उपपद्यते च विरोधे । प्रमादात्मकत्वाद्बन्धस्य विमुक्तत्वं च युज्यते । | उपपद्यते च विरोधे । प्रमादात्मकत्वाद्बन्धस्य विमुक्तत्वं च युज्यते । | ||
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‘मुक्तिर्हित्वाऽन्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः’ इति हि भागवते ॥17॥ | ‘मुक्तिर्हित्वाऽन्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः’(भाग.२.१०.६) इति हि भागवते ॥17॥ | ||
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| Line 1,371: | Line 1,017: | ||
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यथाकामं ह्यनुमातुं शक्यते । अतो न तत्त्वे पृथगनुमानमपेक्ष्यते । | यथाकामं ह्यनुमातुं शक्यते । अतो न तत्त्वे पृथगनुमानमपेक्ष्यते । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,393: | Line 1,039: | ||
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उक्तं च स्कान्दे –‘यथाकामाऽनुमा यस्मात् तस्मात् साऽनपगा श्रुतेः ।पूर्वापराविरोधाय(पूर्वोत्तराविरोधाय) चेष्यते नान्यथा क्वचित्’ इति ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,400: | Line 1,046: | ||
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| text = | | text = | ||
‘नैषा तर्केण मतिराऽऽपनेया’(कठ.उ.२.९) इति च ॥ 18 ॥ | |||
‘नैषा तर्केण | |||
}} | }} | ||
| Line 1,415: | Line 1,054: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ओम् ॥ 01-01-19 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,430: | Line 1,069: | ||
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| text = | | text = | ||
‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ , | ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’(तै.उ.२.१) ,‘अनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते’(तै.उ.२.७) ,‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’(तै.उ.२.८) इत्यादि ॥19॥ | ||
‘अनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते’ , | |||
}} | }} | ||
=== अन्तःस्थत्वाधिकरणम् === | |||
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| Line 1,449: | Line 1,079: | ||
| chapter_id = BS_C01 | | chapter_id = BS_C01 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ओम् ॥ 01-01-20 ॥ | ||
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}} | }} | ||
| Line 1,457: | Line 1,087: | ||
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| text = | | text = | ||
‘अदृश्येऽनात्म्ये’ इत्युक्तम् । तच्चादृष्यत्वम्,‘अन्तः प्रविष्टं | ‘अदृश्येऽनात्म्ये’(तै.उ.२.७.१) इत्युक्तम् । तच्चादृष्यत्वम्,‘अन्तः प्रविष्टं कर्तारमेतम् । अन्तश्चन्द्रमसि मनसा चरन्ततम् । सहैव सन्तं न विजानन्ति देवाः’(तै.आ.३.११) इत्यन्तःस्थस्य कस्यचिदुच्यते । | ||
स | स च‘इन्द्रो राजा’(तै.आ.३.११.६),‘सप्तयुञ्जन्ति’(तै.आ.३.११.८) इत्यादिभिरन्यः प्रतीयते । तस्मात् स एवानन्दमय इति न मन्तव्यम् । | ||
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‘अन्तः | ‘अन्तः समुद्रे मनसा चरन्तम् ब्रह्मान्वविन्दद्दशहोतारमर्णे’(तै.उ.३.११.१) । | ||
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‘समुद्रेऽन्तः कवयो विचक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः’ | ‘समुद्रेऽन्तः कवयो विचक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः’(तै.आ.३.११.११) | ||
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‘यस्याण्डकोशं शुष्ममाहुः’(तै.आ.३.११.४) इत्यादि तद्धर्मोपदेशात् । | |||
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‘सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः | ‘सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् ।यस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः’ इति व्यासस्मृतौ ।‘अहं तत्तेजो रश्मीन्नारायणम् पुरुषं जातमग्रतः । पुरुषात् प्रकृतिर्जगदण्डम्’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 20 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः ओम् ॥ 01-01-21 ॥ | ||
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| text = | | text = | ||
‘इन्द्रस्यात्मानिहितः पञ्च होता’ , | ‘इन्द्रस्यात्मानिहितः पञ्च होता’ ,‘वायोरात्मानं कवयो निचिक्युः’(तै.आ.३.११),‘अन्तरादित्ये मनसा चरन्तम्’(तै.आ.३.११),‘देवानां हृदयं ब्रह्मान्वविन्दत्(तै.आ.३.११)’ इत्यादिभेदव्यपदेशात् ॥ 21 ॥ | ||
‘वायोरात्मानं कवयो निचिक्युः’, | ॥इति अन्तस्थत्वाधिकरणम् ॥ 07 ॥ | ||
॥इति | |||
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‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न | ‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’(तै.उ.२.१५) इति आकाशस्यऽऽनन्दमयत्वे हेतुरुक्तः, न तु विष्णोः । इति न मन्तव्यम् । यतः – | ||
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| text = | | text = | ||
‘अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच’ इत्यत्र भूताकाशस्य प्राप्तिः । न चासौ युज्यते, किन्तु विष्णुरेव । | ‘अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच’(छा.उ.१.९) इत्यत्र भूताकाशस्य प्राप्तिः । न चासौ युज्यते, किन्तु विष्णुरेव । | ||
}} | }} | ||
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‘स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः’ इत्यादि तल्लिङ्गात् । | ‘स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः’(छा.उ.१.९) इत्यादि तल्लिङ्गात् । | ||
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‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रोवोचं यः पार्थिवानि विममे | ‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रोवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि’(ऋ.सं.१.१५४.१),परो मात्रया तन्वा वृधान’(ऋ.सं.७.९९.१) इत्यादिना तस्यैव(तस्य) तल्लिङ्गम् । | ||
परो मात्रया तन्वा वृधान’ इत्यादिना तस्यैव | |||
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‘अनन्तो भगवान् ब्रह्म आनन्देत्यादिभिः पदैः ।प्रोच्यते विष्णुरेवैकः परेषामुपचारतः’ इति ब्राह्मे । | ‘अनन्तो भगवान् ब्रह्म आनन्देत्यादिभिः पदैः ।प्रोच्यते विष्णुरेवैकः परेषामुपचारतः’ इति ब्राह्मे । | ||
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॥ इति आकाशाधिकरणम् ॥ | ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’ इति चोक्तम् ॥ 22 ॥॥ इति आकाशाधिकरणम् ॥ | ||
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‘‘तद्वैत्वं प्राणो अभवः महान् भोगः प्रजापतेः ।भुजः करिष्यमाणः यद्देवान् प्राणयो न व ॥’(तै.आ.३.१४) | |||
इति महाभोगशब्देन परमानन्दत्वं प्राणस्योक्तम् । स च प्राणः प्रसिद्धेर्वायुरित्यापतति । न चैवं यतो विष्णुरेव प्राणः । | इति महाभोगशब्देन परमानन्दत्वं प्राणस्योक्तम् । स च प्राणः प्रसिद्धेर्वायुरित्यापतति । न चैवं यतो विष्णुरेव प्राणः । | ||
अत एव ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ अहोरात्रे पार्श्वे’ इत्यादि तल्लिङ्गादेव ॥ 23 ॥ | अत एव ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ अहोरात्रे पार्श्वे’(तै.आ.३.१३) इत्यादि तल्लिङ्गादेव ॥ 23 ॥ | ||
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‘यो वेद | ‘यो वेद निहितं गुहायाम्’(तै.उ.२.१) इत्युक्तम् । तच्च गुहानिहितम् ‘वि मे कर्णा पतयतो विचक्षुर्वीदं ज्योतिर्हृदय आहितं यत् । विमे मनश्चरति दूर आधीः किं स्विद् वक्ष्यामि किमु नो मनिष्ये’(ऋ.सं.६.९.६) इति ज्योतिरुक्तम् । तच्च ज्योतिरग्निसूक्तत्वात् प्रसिद्धेश्चाग्निरेवेति प्राप्तम् । अत आह – | ||
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| text = | | text = | ||
विष्णुरेव ज्योतिः । कर्णादीनां विचरणाभिधानात् । स हि ‘परो मात्रया तन्वावृधान’ इत्यादिना कर्णादिविदूरः ॥ 24 | विष्णुरेव ज्योतिः । कर्णादीनां विचरणाभिधानात् । स हि ‘परो मात्रया तन्वावृधान’(ऋ.सं.७.९९.१) इत्यादिना कर्णादिविदूरः ॥ 24 ॥॥ इति ज्योतिरधिकरणम् ॥ 10 ॥ | ||
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‘अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते’ इत्युक्तस्य | ‘अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते’(छा.उ.३.१३.७) इत्युक्तस्य ज्योतिषो ‘गायत्री वा इदं सर्वम्’(छा.उ.३.१२.१) इति गायत्र्या समारम्भः कृतः । तस्मान्न विष्णुरिति चेन्न । | ||
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तथा | तथा चेतोऽर्पणार्थं हि निगद्यते । अग्नि गायत्र्यादिशब्दार्थरूपोऽसाविति चेतोऽर्पणार्थं हि निगद्यते । तथा हि दर्शनं ‘गायति त्रायति च’(छा.उ.३.१२.१) इत्यादि । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,703: | Line 1,284: | ||
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‘सर्वच्छन्दोऽभिधो ह्येष सर्वदेवाभिधोऽह्यसौ(प्यसौ) । सर्वलोकाभिधोऽह्येषः तेषां तदुपचारतः’ इति वामने ॥ 25 ॥ | |||
‘सर्वच्छन्दोऽभिधो | |||
}} | }} | ||
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‘तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुषः । | ‘तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुषः ।पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि’(छा.उ.३.१२.६) इति । | ||
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‘सुवर्णं कोशं रजसा परीवृतम् देवानां वसुधानीं विराजम् । अमृतस्य पूर्णां तामु कलां वि चक्षते । पादं षड्ढोतुर्न किलाविवित्से’(तै.आ.३.१.१) इति श्रुतेः पाद इति एकदेशपरिमितं, चतुर्भागबल इतिवद् भिन्नं च शब्दात् । | |||
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स हि पुरुषसूक्ताभिधेयः‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त’(तै.आ.३.१२) इति यज्ञशब्दात् । | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = | ||
‘यज्ञो विष्णुर्देवता’ इति हि श्रुतिः ।तस्मिन् काले महाराज राम एवाभिधीयते । यथा हि पौरुषे सूक्ते | ‘यज्ञो(वै) विष्णुर्देवता’ इति हि श्रुतिः ।तस्मिन् काले महाराज राम एवाभिधीयते । यथा हि पौरुषे सूक्ते विष्णुरेवाभिधीयते’।इति च स्कान्दे ॥ 26 ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,755: | Line 1,329: | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम् उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ओम् ॥ 01-01-27॥ | ||
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| text = | | text = | ||
‘त्रिपादस्यामृतं दिवि’(छा.उ.३.१२.६) इति पूर्वोपदेशः । | |||
‘परो दिवः’ इति पञ्चम्यन्तः पश्चिमः । तस्मान्नैकं वस्त्वत्रोच्यत इति चेन्न । | ‘परो दिवः’(छा.उ.३.१३.७) इति पञ्चम्यन्तः पश्चिमः । तस्मान्नैकं वस्त्वत्रोच्यत इति चेन्न । त्रिसप्तलोकापेक्षयोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ 27 ॥ | ||
त्रिसप्तलोकापेक्षयोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ 27 | |||
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=== | === अन्तिमप्राणाधिकरणम् === | ||
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प्राणो विष्णुरित्युक्तम् । तत्र‘ता वा एताः शीर्षन् श्रियः श्रिताश्चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् प्राणः’(ऐ.आ.२.१.४) इत्यत्र प्राणस्य विष्णुत्वं न युज्यते(विद्यते) । इन्द्रियैः सहाभिधानादित्यत आह- | |||
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‘तं देवाः प्राणयन्त’ ‘स एषोऽसुः स एष प्राणः’ ‘प्राण ऋच इत्येव विद्यात्’ ,’तदयं प्राणोऽधिष्ठति’ | ‘तं देवाः प्राणयन्त’(ऐ.आ.२.१.५)‘स एषोऽसुः स एष प्राणः’(ऐ.आ.२.१.५) ‘प्राण ऋच इत्येव विद्यात्’(ऐ.आ.२.२.२) ,’तदयं प्राणोऽधिष्ठति’(ऐ.आ.२.३.८) इत्याद्यनुगमादत्रापि प्राणो विष्णुरेव । | ||
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‘विष्णुमेवानयन् देवा विष्णुं भूतिमुपासते । स एव सर्ववेदोक्तस्तद्रथो देह उच्यते’ इति स्कान्दे । ब्रह्मशब्दानुगमाच्च ॥ 28 ॥ | ‘विष्णुमेवानयन् देवा विष्णुं भूतिमुपासते । स एव सर्ववेदोक्तस्तद्रथो देह उच्यते’ इति स्कान्दे । ब्रह्मशब्दानुगमाच्च ॥ 28 ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओं न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् ओम् ॥ 01-01-29 ॥ | ||
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‘प्राणो वा | ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’(ऐ.आ.२.२.३) इति वक्तुरात्मोपदेशादिन्द्र एवेति चेन्न । ‘प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि’(ऐ.आ.२.२.३) इति बह्वध्यात्मसम्बन्धो ह्यत्र विद्यते ॥ 29 ॥ | ||
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शास्त्रमन्तर्यामी ‘संविच्छास्त्रं परं पदम्’ इति हि भागवते । | |||
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‘तत्तन्नाम्नोच्यते विष्णुः सर्वशास्त्रत्वहेतुतः ।न क्वापि किञ्चिन्नामास्ति तमृते पुरुषोत्तमम्’इति पाद्मे । | ‘तत्तन्नाम्नोच्यते विष्णुः सर्वशास्त्रत्वहेतुतः ।न क्वापि किञ्चिन्नामास्ति तमृते पुरुषोत्तमम्’इति(च) पाद्मे । | ||
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‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ इत्यादिवत् ॥ 30 ॥ | ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’(ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् ॥ 30 ॥ | ||
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‘तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति’(ऐ.आ.२.२.४) इति जीवलिङ्गम् । प्राणसंवादादि मुख्यप्राणलिङ्गम् । तस्मान्नेति चेन्न । अन्तर्बहिः सर्वगतत्वेनेत्युपासात्रैविध्यादिहाश्रितत्वाच्च । | |||
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‘स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत’ | ‘स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत’(ऐ.आ.२.४.३) | ||
‘स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्’ | ‘स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्’(ऐ.आ.२.४.३) | ||
‘एतद्धस्म वै तद्विद् विद्वानाह महिदास ऐतरेयः’(ऐ.आ.२.१.८) इत्यादिना । | |||
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‘महिदासाभिधो जज्ञे इतरायास्तपोबलात् ।साक्षात् स भगवान् विष्णुर्यस्तन्त्रं वैष्णवं व्यधात्’ इति ब्रह्माण्डे । | ‘महिदासाभिधो जज्ञे इतरायास्तपोबलात् ।साक्षात् स भगवान् विष्णुर्यस्तन्त्रं वैष्णवं व्यधात्’ इति ब्रह्माण्डे । | ||
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तत्तदुपासनायोग्यतया च पुरुषाणाम् ।‘केषाञ्चित् सर्वगत्वेन केषाञ्चिद्धृदये हरिः ।केषाञ्चिद्बहिरेवासावुपास्यः पुरुषोत्तमः’ इति ब्राह्मे ॥‘अग्नौ क्रियावतां विष्णुर्योगिनां हृदये हरिः ।प्रतिमास्वप्रबुद्धानां सर्वत्र विदितत्मानाम्’ इति च ॥ 31 ॥॥ इति पादान्त्यप्राणाधिकरणम् ॥ 12 ॥ | |||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥01-01 ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥01-01 ॥ | ||
Revision as of 09:38, 10 April 2026
नारायणं गुणैः सर्वैरुदीर्णं दोषवर्जितम् ।ज्ञेयं गम्यं गुरूंश्चापि नत्वा सूत्रार्थ उच्यते ॥
द्वापरे सर्वत्र ज्ञान आकुलीभूते तन्निर्णयाय ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो भगवान् नारायणो व्यासत्वेनावततार । अथेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छूनां तद्योगमविजानतां तज्ज्ञापनार्थं वेदमुत्सन्नं व्यञ्जयंश्चतुर्धा व्यभजत्। चतुर्विंशतिधैकशतधा सहस्रधा द्वादशधा च । तदर्थनिर्णयाय ब्रह्मसूत्राणि चकार ।
तच्चोक्तं स्कान्दे – नारायणाद्विनिष्पन्नं ज्ञानं कृतयुगे स्थितम् ।किञ्चित् तदन्यथा जातं त्रेतायां द्वापरेऽखिलम् ॥गौतमस्य ऋषेः शापार्ज्ज्ञाने त्वज्ञानतां गते ।सङ्कीर्णबुद्धयो देवा ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ॥शरण्यं शरणं जग्मुर्नारायणमनामयम् ।तैर्विज्ञापितकार्यस्तु भगवान् पुरुषोत्तमः॥अवतीर्णो महायोगी सत्यवत्यां पराशरात् ।उत्सन्नान् भगवान् वेदानुज्जहार हरिः स्वयम् ॥चतुर्धा व्यभजत् तांश्च चतुर्विंशतिधा पुनः ।शतधा चैकधा चैव तथैव च सहस्रधा ॥कृष्णो द्वादशधा चैव पुनस्तस्यार्थवित्तये ।चकार ब्रह्मसूत्राणि येषां सूत्रत्वमञ्जसा ॥
अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम् ।अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥
निर्विशेषितसूत्रत्वं ब्रह्मसूत्रस्य चाप्यतः ।यथा व्यासत्वमेकस्य कृष्णस्यान्ये विशेषणात् ॥ सविशेषणसूत्राणि ह्यपराणि विदो विदुः ।मुख्यस्य निर्विशेषेण शब्दोऽन्येषां विशेषतः ॥ इति वेदविदः प्राहुः शब्दतत्त्वार्थवेदिनः ।सूत्रेषु येषु सर्वेऽपि निर्णयाः समुदीरिताः ॥
शब्दजातस्य सर्वस्य यत्प्रमाणश्च निर्णयः ।एवं विधानि सूत्राणि कृत्वा व्यासो महायशाः ॥ ब्रह्मरुद्रादिदेवेषु मनुष्यपितृपक्षिषु ।ज्ञानं संस्थाप्य भगवान् क्रीडते पुरुषोत्तमः ॥ इत्यादि ।
जिज्ञासाधिकरणम्
‘अन्त्यजा अपि ये भक्ता नामज्ञानाधिकारिणः ।स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां तन्त्रज्ञानेऽधिकारिता ॥ एकदेशे परोक्ते तु न तु ग्रन्थपुरस्सरे ।त्रैवर्णिकानां वेदोक्ते सम्यग्भक्तिमतां हरौ ॥
आहुरप्युत्तमस्त्रीणामधिकारं तु वैदिके ।यथोर्वशी यमी चैव शच्याद्याश्च तथाऽपरा ॥’ इति ॥तथाऽऽपराः मुनिस्त्रियः नरादिकुलजाश्च ।‘श्वपचादपि कष्टत्वं ब्रह्मेशानादयः सुराः ।तदैवाच्युत यान्त्येव यदैव त्वं पराङ्मुखः॥’ इति ॥ ब्राह्मे च ब्रह्मवैवर्ते –
‘नाहं न च शिवोऽन्ये च तच्छक्त्येकांशभागिनः ।बालः क्रीडनकैर्यद्वत् क्रीडतेऽस्माभिरच्युतः’ इति ॥जन्माधिकरणम्
शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्
प्रेत्य भूताप्ययश्चैव देवताभ्युपयाचनम् ।मृते कर्मनिवृत्तिश्च प्रमाणमिति निश्चयः ॥’(म.भा.१२.२२०.३०-३१)
इति मोक्षधर्मवचनान्न नास्तिक्यवादो युज्यते ।समन्वयाधिकरणम्
ईक्षत्यधिकरणम्
ननु‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’(तै.उ.२.४.२२) , ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्’(क.उ.१.३.१५) ,‘अवचनेनैव प्रोवाच’(बाष्कलश्रुति) , ‘यद्वाचाऽनभ्युदितम् । येन वागभ्युद्यते । यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्’(क.उ.१) इत्यादिभिर्न तच्छब्दगोचरम् । नेत्याह –
आनन्दमयाधिकरणम्
अन्तःस्थत्वाधिकरणम्
आकाशाधिकरणम्
प्राणाधिकरणम्
इति महाभोगशब्देन परमानन्दत्वं प्राणस्योक्तम् । स च प्राणः प्रसिद्धेर्वायुरित्यापतति । न चैवं यतो विष्णुरेव प्राणः ।
अत एव ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ अहोरात्रे पार्श्वे’(तै.आ.३.१३) इत्यादि तल्लिङ्गादेव ॥ 23 ॥ज्योतिरधिकरणम्
गायत्र्यधिकरणम्
अन्तिमप्राणाधिकरणम्
‘स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्’(ऐ.आ.२.४.३)
‘एतद्धस्म वै तद्विद् विद्वानाह महिदास ऐतरेयः’(ऐ.आ.२.१.८) इत्यादिना ।