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Anubhashya/C3: Difference between revisions

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<div class="gr-page-nav">[[Anubhashya|ब्रह्मसूत्राणुभाष्यम्]] · [[Anubhashya/Toc|अनुक्रमणिका]]</div>
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| verse_line1  = गुणदोषैः सुखस्यापि वृद्धिह्रासौ विमुक्तिगौ।नृणां सुराणां मुक्तौ तु सुखं क्लृप्तं यथाक्रमम्‌॥ ७॥
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Revision as of 09:38, 10 April 2026

शुभेन कर्मणा स्वर्गं निरयं च विकर्मणा।मिथ्याज्ञानेन च तमो ज्ञानेनैव परं पदम्‌॥ १॥


याति तस्माद्विरक्तः सन्‌ ज्ञानमेव समाश्रयेत्‌।सर्वावस्थाप्रेरकश्च सर्वरूपेष्वभेदवान्‌॥ २॥


सर्वदेशेषु कालेषु स एकः परमेश्वरः।तद्भक्तितारतम्येन तारतम्यं विमुक्तिगम्‌॥ ३॥


सच्चिदानन्द आत्मेति मानुषैस्तु सुरेश्वरैः।यथाक्रमं बहुगुणैर्ब्रह्मणा त्वखिलैर्गुणैः॥ ४॥


उपास्यः सर्वदेवैश्च सर्वैरपि यथा बलम्‌।ज्ञेयो विष्णुर्विशेषस्तु ज्ञाने स्यादुत्तरोत्तरम्॥ ५॥


सर्वेऽपि पुरुषार्थास्युः ज्ञानादेव न संशयः।न लिप्यते ज्ञानावांश्च सर्वदोषैरपि क्वचित्‌॥ ६॥


गुणदोषैः सुखस्यापि वृद्धिह्रासौ विमुक्तिगौ।नृणां सुराणां मुक्तौ तु सुखं क्लृप्तं यथाक्रमम्‌॥ ७॥


॥ इति तृतीयोऽध्यायः॥