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Anubhashya/C2: Difference between revisions

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| verse_line1  = न तद्विरोधाद्वचनं वैदिकं शङ्क्यतां व्रजेत्‌।आकाशादिसमस्तं च तज्जं तेनैव लीयते॥ ५ ॥
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Revision as of 09:38, 10 April 2026

श्रौतस्मृतिविरुद्धत्वात्‌ स्मृतयो न गुणान् हरेः।निषेद्धुं शक्नुयुर्वेदा नित्यत्वान्मानमुत्तमम्‌॥ १॥


देवतावचनादापो वदन्तीत्यादिकं वचः ।नायुक्तवाद्यसन्नैव कारणं दृश्यते क्वचित् ॥ २॥


असज्जीवप्रधानादिशब्दा ब्रह्मैव नापरम्‌।वदन्ति कारणत्वेन क्वापि पूर्णगुणो हरिः॥ ३॥


स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वान्नायुक्तं तद्वदेच्छ्रुतिः।भ्रान्तिमूलतया सर्वसमयानामयुक्तितः॥४॥


न तद्विरोधाद्वचनं वैदिकं शङ्क्यतां व्रजेत्‌।आकाशादिसमस्तं च तज्जं तेनैव लीयते॥ ५ ॥


सोऽनुत्पत्तिलयः कर्ता जीवः तद्वशगः सदा।तदाभासो हरिः सर्वरूपेष्वपि समः सदा॥ .६॥


मुख्यप्राणश्चेन्द्रियाणि देहश्चैव तदुद्भवः।मुख्यप्राणवशे सर्वं स विष्णोर्वशगः सदा॥ ७॥


सर्वदोषोज्झितः तस्माद्‌ भगवान्‌ पुरुषोत्तमः।उक्ता गुणाश्चाविरुद्धास्तस्य वेदेषु सर्वशः॥ ८॥


॥ इति द्वितीयोऽध्यायः॥