Bruhadaranyaka/C5/S1: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 13: | Line 13: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C05_S01_V01 | | verse_id = BR_C05_S01_V01 | ||
| id = BR_C05_S01_V01_B01 | | id = BR_C05_S01_V01_B01 | ||
| text = | | text = | ||
अवतारा महाविष्णोः सर्वे पूर्णाः प्रकीर्तिताः । | अवतारा महाविष्णोः सर्वे पूर्णाः प्रकीर्तिताः । | ||
| Line 37: | Line 36: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C05_S01_V02 | | verse_id = BR_C05_S01_V02 | ||
| id = BR_C05_S01_V02_author-note | | id = BR_C05_S01_V02_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ | ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C05_S01_V02 | | verse_id = BR_C05_S01_V02 | ||
| id = BR_C05_S01_V02_author-note | | id = BR_C05_S01_V02_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति बृहद्भाष्ये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ | ॥ इति बृहद्भाष्ये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C05_S01_V02 | | verse_id = BR_C05_S01_V02 | ||
| id = BR_C05_S01_V02_B01 | | id = BR_C05_S01_V02_B01 | ||
| text = | | text = | ||
ओताः सर्वगुणाः यस्मादस्मिन्नों विष्णुरुच्यते । | ओताः सर्वगुणाः यस्मादस्मिन्नों विष्णुरुच्यते । | ||
| Line 67: | Line 63: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C05_S01_V02 | | verse_id = BR_C05_S01_V02 | ||
| id = BR_C05_S01_V02_B01 | | id = BR_C05_S01_V02_B01 | ||
| text = | | text = | ||
बाह्लीकसुता हि रोहिणी । अतो बलभद्रः कौरव्यायणीपुत्रः ॥ | बाह्लीकसुता हि रोहिणी । अतो बलभद्रः कौरव्यायणीपुत्रः ॥ | ||
Revision as of 09:03, 10 April 2026
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
अवतारा महाविष्णोः सर्वे पूर्णाः प्रकीर्तिताः ।
पूर्णं च तत्परं रूपं पूर्णात् पूर्णाः समुद्गताः ॥ परावरत्वं तेषां तु व्यक्तिमात्रविशेषतः । न देशकालसामथ्यैः पारावर्यं कथञ्चन ॥ पूर्वरूपस्य पूर्णस्य पूर्णं यदवतारगम् । रूपं तदात्मन्यादाय पूर्णमेवावतिष्ठते ॥ लौकिकव्यवहारो यो भूभारक्षपणादिकः ।
तददृष्टिं विना नान्यो लयः कृष्णादिनां क्वचित् ॥ॐ खं ब्रह्म खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदेनैन यद्वेदितव्यम् ॥
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
॥ इति बृहद्भाष्ये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ १ ॥
ओताः सर्वगुणाः यस्मादस्मिन्नों विष्णुरुच्यते ।
खं प्रकाशस्वरूपत्वात् ब्रह्मतद्व्याप्तरूपतः ॥ पुनः खं सुखरूपत्वम् पुराणं तदनादितः ॥ वायोश्च रतिदं यस्माद्वायुरं ब्रह्म तत्परम् । ख्यातत्वाच्चापि तत्खं स्याद्रौहिणेयस्तथाऽवदत् ॥ वेदोऽयं ज्ञानरूपत्वादिति यं ब्राह्मणा विदुः ।
निर्दोषत्वाद इत्युक्तस्तेन वेद्यं सदाऽखिलम् ॥ इति च ।बाह्लीकसुता हि रोहिणी । अतो बलभद्रः कौरव्यायणीपुत्रः ॥