Bruhadaranyaka/C4/S4: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 12: | Line 12: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V01 | | verse_id = BR_C04_S04_V01 | ||
| id = BR_C04_S04_V01_B1 | | id = BR_C04_S04_V01_B1 | ||
| text = | | text = | ||
सर्वेषां बलकारित्वाद् बल्यो विष्णुः प्रकीर्तितः । | सर्वेषां बलकारित्वाद् बल्यो विष्णुः प्रकीर्तितः । | ||
| Line 24: | Line 23: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V01 | | verse_id = BR_C04_S04_V01 | ||
| id = BR_C04_S04_V01_B1 | | id = BR_C04_S04_V01_B1 | ||
| text = | | text = | ||
एनं बल्यमभिसमायान्ति । पराक् स्थितश्चाक्षुषो भगवान् प्रत्यक्परावर्तते । | एनं बल्यमभिसमायान्ति । पराक् स्थितश्चाक्षुषो भगवान् प्रत्यक्परावर्तते । | ||
| Line 42: | Line 40: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V02 | | verse_id = BR_C04_S04_V02 | ||
| id = BR_C04_S04_V02_B1 | | id = BR_C04_S04_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
हृदये संस्थितो जीवो विशेषेण हरिस्तथा । | हृदये संस्थितो जीवो विशेषेण हरिस्तथा । | ||
| Line 57: | Line 54: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V02 | | verse_id = BR_C04_S04_V02 | ||
| id = BR_C04_S04_V02_B1 | | id = BR_C04_S04_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
कर्माभिमानी गरुडो ब्रह्मा ज्ञानाभिमानवान् । | कर्माभिमानी गरुडो ब्रह्मा ज्ञानाभिमानवान् । | ||
| Line 68: | Line 64: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V02 | | verse_id = BR_C04_S04_V02 | ||
| id = BR_C04_S04_V02_B1 | | id = BR_C04_S04_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
देवलोके चिरं रत्वा यस्तु मुक्तिं व्रजिष्यति । | देवलोके चिरं रत्वा यस्तु मुक्तिं व्रजिष्यति । | ||
| Line 79: | Line 74: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V02 | | verse_id = BR_C04_S04_V02 | ||
| id = BR_C04_S04_V02_B1 | | id = BR_C04_S04_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
सविज्ञानो भवति । जीवेन सहितो भवति । सविज्ञानं जीवमेवान्ववक्रामति । जीवमारुह्य गच्छति भगवान् प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ इति ह्युक्तम् । यो विज्ञाने तिष्ठन् य आत्मनि तिष्ठन् इत्युभयोर्जीवाभिप्रायेण हि पाठः । शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते इति भगवद्वचनम् । विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र इति च ॥ | सविज्ञानो भवति । जीवेन सहितो भवति । सविज्ञानं जीवमेवान्ववक्रामति । जीवमारुह्य गच्छति भगवान् प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ इति ह्युक्तम् । यो विज्ञाने तिष्ठन् य आत्मनि तिष्ठन् इत्युभयोर्जीवाभिप्रायेण हि पाठः । शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते इति भगवद्वचनम् । विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र इति च ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V02 | | verse_id = BR_C04_S04_V02 | ||
| id = BR_C04_S04_V02_B1 | | id = BR_C04_S04_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
एष आत्मा निष्क्रामतीति जीवांगीकारे शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते इत्यादिकमयुक्तं स्यात् । न हि जीवः शरीरं निहत्याविद्यां गमयति रूपान्तरं वा करोति । न च सर्वमयत्वं जीवस्य । ब्रह्मेति विशेषणाच्च ॥ | एष आत्मा निष्क्रामतीति जीवांगीकारे शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते इत्यादिकमयुक्तं स्यात् । न हि जीवः शरीरं निहत्याविद्यां गमयति रूपान्तरं वा करोति । न च सर्वमयत्वं जीवस्य । ब्रह्मेति विशेषणाच्च ॥ | ||
| Line 104: | Line 97: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V03 | | verse_id = BR_C04_S04_V03 | ||
| id = BR_C04_S04_V03_B1 | | id = BR_C04_S04_V03_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यथा तृणजलूकैवं भगवान् पुरुषोत्तमः । | यथा तृणजलूकैवं भगवान् पुरुषोत्तमः । | ||
| Line 124: | Line 116: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
स्वर्णकारो यथा स्वर्णमलमग्नौ निहत्य च । | स्वर्णकारो यथा स्वर्णमलमग्नौ निहत्य च । | ||
| Line 144: | Line 135: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न ह्यमुक्तानां कल्याणतरत्वम् । न च मृगादीनां कल्याणत्वमपि । मरणमात्रं चेदत्रोच्यते तदा कल्याणतरमिति विशेषणं व्यर्थमेव स्यात् । पूर्वोक्तश्रोत्रियावृजिनाकामहतदेवादीनां चात्रोक्तिः । पूर्वाननुभूतत्वान्नवतरं च भवति । | न ह्यमुक्तानां कल्याणतरत्वम् । न च मृगादीनां कल्याणत्वमपि । मरणमात्रं चेदत्रोच्यते तदा कल्याणतरमिति विशेषणं व्यर्थमेव स्यात् । पूर्वोक्तश्रोत्रियावृजिनाकामहतदेवादीनां चात्रोक्तिः । पूर्वाननुभूतत्वान्नवतरं च भवति । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अल्पतेजस्तथैवाल्पं जीवरूपं हि संसृतौ । | अल्पतेजस्तथैवाल्पं जीवरूपं हि संसृतौ । | ||
| Line 162: | Line 151: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
मयं तु मानुषं स्वर्णं पीतं गान्धर्वमेव च । | मयं तु मानुषं स्वर्णं पीतं गान्धर्वमेव च । | ||
| Line 177: | Line 165: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
स यत्राणिमानं न्येति तस्य ह वै तस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वा विमुक्ताः तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैजसश्च इत्येवमादेश्च मुक्तविषयमेवैतत् । मुक्तविषयत्वेन चैतत्प्रकरणं सूत्रयामास भगवान् । तदोकोग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् इत्यादिना । | स यत्राणिमानं न्येति तस्य ह वै तस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वा विमुक्ताः तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैजसश्च इत्येवमादेश्च मुक्तविषयमेवैतत् । मुक्तविषयत्वेन चैतत्प्रकरणं सूत्रयामास भगवान् । तदोकोग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् इत्यादिना । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न चान्या मुक्तिरस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् ब्रह्मणा विपश्चिता । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स य एवंविदेवं पश्यन्नेवं मन्वानस्तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति स एकधा भवति त्रिधा भवति | न चान्या मुक्तिरस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् ब्रह्मणा विपश्चिता । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स य एवंविदेवं पश्यन्नेवं मन्वानस्तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति स एकधा भवति त्रिधा भवति | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
पञ्चधा सप्तधा पुनश्चैकादश स्मृतः | पञ्चधा सप्तधा पुनश्चैकादश स्मृतः | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते | न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । | यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । | ||
| Line 218: | Line 201: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति | तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
परं भूयःप्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । | परं भूयःप्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । | ||
| Line 235: | Line 216: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | ||
| Line 244: | Line 224: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । | न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । | ||
| Line 253: | Line 232: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशंगवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ॥ | श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशंगवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
इत्यादिश्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु तेषां निर्गुणमुक्तिविषयत्वेन प्रसिद्धेष्वेव स्थलेषु मुक्त्यनन्तरं भोगोक्तेश्च । | इत्यादिश्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु तेषां निर्गुणमुक्तिविषयत्वेन प्रसिद्धेष्वेव स्थलेषु मुक्त्यनन्तरं भोगोक्तेश्च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V04 | | verse_id = BR_C04_S04_V04 | ||
| id = BR_C04_S04_V04_B1 | | id = BR_C04_S04_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अशरीरक्रिया गौणदेहादेस्ते ह्यभावतः । | अशरीरक्रिया गौणदेहादेस्ते ह्यभावतः । | ||
| Line 288: | Line 264: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V05 | | verse_id = BR_C04_S04_V05 | ||
| id = BR_C04_S04_V05_B1 | | id = BR_C04_S04_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
मयट् प्राचुर्ये स्वरूपे च । | मयट् प्राचुर्ये स्वरूपे च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V05 | | verse_id = BR_C04_S04_V05 | ||
| id = BR_C04_S04_V05_B1 | | id = BR_C04_S04_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
आत्माऽयमाततत्वाद्धि ब्रह्म पूर्णगुणत्वतः । | आत्माऽयमाततत्वाद्धि ब्रह्म पूर्णगुणत्वतः । | ||
| Line 334: | Line 308: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V05 | | verse_id = BR_C04_S04_V05 | ||
| id = BR_C04_S04_V05_B1 | | id = BR_C04_S04_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
वर्तमानं यतो विष्णोर्वशे तस्मादिदम्मयः । | वर्तमानं यतो विष्णोर्वशे तस्मादिदम्मयः । | ||
| Line 346: | Line 319: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V05 | | verse_id = BR_C04_S04_V05 | ||
| id = BR_C04_S04_V05_B1 | | id = BR_C04_S04_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यथा पूर्वं तथेदानीमिति विष्णुस्तदुच्यते । | यथा पूर्वं तथेदानीमिति विष्णुस्तदुच्यते । | ||
| Line 367: | Line 339: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V05 | | verse_id = BR_C04_S04_V05 | ||
| id = BR_C04_S04_V05_B1 | | id = BR_C04_S04_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
जीवेश्वराभेदांगीकारे सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन इति सूत्रविरोधः । प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः इत्यादि श्रुतिविरोधश्च । न च व्यावहारिकभेदो नाम कश्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । भ्रान्तिभेदत्वे श्रुतिसिद्धत्वमेव न स्यात् । न हि निर्दोषश्रुतिवाक्यसिद्धं भ्रान्तमिति युक्तम् । उन्मत्तवाक्यवत् सर्ववेदस्याप्रामाण्यप्रसक्तेः । न च स्वविषयस्य भ्रमत्वादन्यदप्रामाण्यं नाम किञ्चित् । तन्मते ह्युन्मत्तवाक्यविषयस्याप्यनिर्वचनीयत्वमेव | जीवेश्वराभेदांगीकारे सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन इति सूत्रविरोधः । प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तः इत्यादि श्रुतिविरोधश्च । न च व्यावहारिकभेदो नाम कश्चिदस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । भ्रान्तिभेदत्वे श्रुतिसिद्धत्वमेव न स्यात् । न हि निर्दोषश्रुतिवाक्यसिद्धं भ्रान्तमिति युक्तम् । उन्मत्तवाक्यवत् सर्ववेदस्याप्रामाण्यप्रसक्तेः । न च स्वविषयस्य भ्रमत्वादन्यदप्रामाण्यं नाम किञ्चित् । तन्मते ह्युन्मत्तवाक्यविषयस्याप्यनिर्वचनीयत्वमेव | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V05 | | verse_id = BR_C04_S04_V05 | ||
| id = BR_C04_S04_V05_B1 | | id = BR_C04_S04_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवः । त एते सत्याः कामाः इत्यादिश्रुतिभिर्भगवद्गुणानां सत्यत्वमेव ज्ञायते । सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः इति सर्वजीवानां भगवदनुजीवनं च सत्यमित्येवोच्यते । तदा कथं जीवभेदस्यासत्यता । न च सर्वविध्यर्थक्रियासिद्धस्य कुत्रचिद् बाधो दृष्टः । न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते इति मुक्त्यनन्तरमपि तदधीनत्वप्रतीतेश्च । न भेदस्यासत्यता । न हि संसारावस्थायामक्षीणकर्मता भवति । न च मुख्यार्थं परित्यज्यामुख्यो युक्तः । अतः सत्य एव भेदः । स भगवान् यथाकारी तथा कारयति यथाचारी यथा चारयति तथा भवति । स भगवान् यथा कामो भवति तथा कामो जीवो भवति । इत्थं कामोऽस्य भूयादिति भगवदिच्छावशादस्य कामो भवतीत्यर्थः । क्रतुरितीत्थं करिष्याम्येवेति निश्चयरूपः कामः । स भगवदिच्छया हि भवति । कामेन मे काम आगात् इति च श्रुतिः ॥ | सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवः । त एते सत्याः कामाः इत्यादिश्रुतिभिर्भगवद्गुणानां सत्यत्वमेव ज्ञायते । सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः इति सर्वजीवानां भगवदनुजीवनं च सत्यमित्येवोच्यते । तदा कथं जीवभेदस्यासत्यता । न च सर्वविध्यर्थक्रियासिद्धस्य कुत्रचिद् बाधो दृष्टः । न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत्सृजते इति मुक्त्यनन्तरमपि तदधीनत्वप्रतीतेश्च । न भेदस्यासत्यता । न हि संसारावस्थायामक्षीणकर्मता भवति । न च मुख्यार्थं परित्यज्यामुख्यो युक्तः । अतः सत्य एव भेदः । स भगवान् यथाकारी तथा कारयति यथाचारी यथा चारयति तथा भवति । स भगवान् यथा कामो भवति तथा कामो जीवो भवति । इत्थं कामोऽस्य भूयादिति भगवदिच्छावशादस्य कामो भवतीत्यर्थः । क्रतुरितीत्थं करिष्याम्येवेति निश्चयरूपः कामः । स भगवदिच्छया हि भवति । कामेन मे काम आगात् इति च श्रुतिः ॥ | ||
| Line 395: | Line 365: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V06 | | verse_id = BR_C04_S04_V06 | ||
| id = BR_C04_S04_V06_B1 | | id = BR_C04_S04_V06_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अयोग्यकामराहित्यान्मुक्तो निष्काम उच्यते । | अयोग्यकामराहित्यान्मुक्तो निष्काम उच्यते । | ||
| Line 414: | Line 383: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V06 | | verse_id = BR_C04_S04_V06 | ||
| id = BR_C04_S04_V06_B2 | | id = BR_C04_S04_V06_B2 | ||
| text = | | text = | ||
न चामुक्तस्य कथञ्चिदाप्तकामता मुख्यतः ।ब्रह्माप्येतीतिवचनात् पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव । यद्यज्ञाननाशात् परिज्ञानमात्रं तदा स्वस्य ब्रह्मतां विजानातीत्येव स्यात् । न तु ब्रह्माप्येतीति । न हि राजपुत्रः पूर्वमात्मानमजानन् पश्चाद् राजपुत्र इति विज्ञाय राजपुत्रमप्येतीत्युच्यते । किन्तु राजपुत्रत्वेनात्मानं व्यजानादित्येवोच्यते । विस्मृतकण्ठमणिरपि विज्ञात इत्येवोच्यते न तु प्राप्त इति । अतः पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव ॥ | न चामुक्तस्य कथञ्चिदाप्तकामता मुख्यतः ।ब्रह्माप्येतीतिवचनात् पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव । यद्यज्ञाननाशात् परिज्ञानमात्रं तदा स्वस्य ब्रह्मतां विजानातीत्येव स्यात् । न तु ब्रह्माप्येतीति । न हि राजपुत्रः पूर्वमात्मानमजानन् पश्चाद् राजपुत्र इति विज्ञाय राजपुत्रमप्येतीत्युच्यते । किन्तु राजपुत्रत्वेनात्मानं व्यजानादित्येवोच्यते । विस्मृतकण्ठमणिरपि विज्ञात इत्येवोच्यते न तु प्राप्त इति । अतः पूर्वब्रह्मशब्दो जीववाच्येव ॥ | ||
| Line 434: | Line 402: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V07 | | verse_id = BR_C04_S04_V07 | ||
| id = BR_C04_S04_V07_B1 | | id = BR_C04_S04_V07_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अथ मर्त्योऽमृतो भवति । अथ मुक्त्यनन्तरं न कदाचिन्मृतिरस्य भविष्यतीत्यर्थः । मुक्त एव परे ब्रह्मणीच्छया प्रविशति निःसरति च । दर्शनादीन् ब्रह्मणो भोगांश्च करोति । स्वरूपभूताः कामा मुक्तानां भवन्तीत्यतो हृदि श्रिता इति विशेषणम् । हृदयस्यैव मोचनात् तत्स्थाः कामा मुक्तानामपगच्छन्तीति युक्तमेव । न ह्यमुक्तस्य कदाचित् सर्वे कामा मुच्यन्ते । सुप्त्यादावप्यभिभव एव वासनाया विद्यमानत्वात् । वासनाया हि पुनरुद्भवः ॥ | अथ मर्त्योऽमृतो भवति । अथ मुक्त्यनन्तरं न कदाचिन्मृतिरस्य भविष्यतीत्यर्थः । मुक्त एव परे ब्रह्मणीच्छया प्रविशति निःसरति च । दर्शनादीन् ब्रह्मणो भोगांश्च करोति । स्वरूपभूताः कामा मुक्तानां भवन्तीत्यतो हृदि श्रिता इति विशेषणम् । हृदयस्यैव मोचनात् तत्स्थाः कामा मुक्तानामपगच्छन्तीति युक्तमेव । न ह्यमुक्तस्य कदाचित् सर्वे कामा मुच्यन्ते । सुप्त्यादावप्यभिभव एव वासनाया विद्यमानत्वात् । वासनाया हि पुनरुद्भवः ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V07 | | verse_id = BR_C04_S04_V07 | ||
| id = BR_C04_S04_V07_B1 | | id = BR_C04_S04_V07_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यावद्विमुच्येत् पुरुषस्तावत् कामा हृदि श्रिताः । चित्ताभावाद्विमुक्तस्य स्युः कामास्तद्गताः कुतः ॥ | यावद्विमुच्येत् पुरुषस्तावत् कामा हृदि श्रिताः । चित्ताभावाद्विमुक्तस्य स्युः कामास्तद्गताः कुतः ॥ | ||
| Line 452: | Line 418: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V07 | | verse_id = BR_C04_S04_V07 | ||
| id = BR_C04_S04_V07_B1 | | id = BR_C04_S04_V07_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अयं जीवोऽथ मुक्त्यनन्तरमेवाशरीरो भवति । अमृतः कदाऽपि न मृतः । प्राणाख्यं परब्रह्मैव । कतम एको देव इति प्राण इति । स ब्रह्मेत्याचक्षते इत्यादिश्रुतेः । तेज एव च । तेज इति श्रीः ॥ | अयं जीवोऽथ मुक्त्यनन्तरमेवाशरीरो भवति । अमृतः कदाऽपि न मृतः । प्राणाख्यं परब्रह्मैव । कतम एको देव इति प्राण इति । स ब्रह्मेत्याचक्षते इत्यादिश्रुतेः । तेज एव च । तेज इति श्रीः ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V07 | | verse_id = BR_C04_S04_V07 | ||
| id = BR_C04_S04_V07_B1 | | id = BR_C04_S04_V07_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अन्येषाममृतत्वं तु भवेद् विष्णोः प्रसादतः । | अन्येषाममृतत्वं तु भवेद् विष्णोः प्रसादतः । | ||
| Line 470: | Line 434: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V07 | | verse_id = BR_C04_S04_V07 | ||
| id = BR_C04_S04_V07_B1 | | id = BR_C04_S04_V07_B1 | ||
| text = | | text = | ||
प्राणस्तु भगवान् विष्णुः सर्वनेतृत्वतो विभुः । | प्राणस्तु भगवान् विष्णुः सर्वनेतृत्वतो विभुः । | ||
| Line 490: | Line 453: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V08 | | verse_id = BR_C04_S04_V08 | ||
| id = BR_C04_S04_V08_B1 | | id = BR_C04_S04_V08_B1 | ||
| text = | | text = | ||
तत्प्राप्तेः सुखहेतुत्वात् पन्था इति हरिः श्रुतः । | तत्प्राप्तेः सुखहेतुत्वात् पन्था इति हरिः श्रुतः । | ||
| Line 512: | Line 474: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V09 | | verse_id = BR_C04_S04_V09 | ||
| id = BR_C04_S04_V09_B1 | | id = BR_C04_S04_V09_B1 | ||
| text = | | text = | ||
रूपमाहुः पञ्चविधं तस्य विष्णोर्महात्मनः ॥ | रूपमाहुः पञ्चविधं तस्य विष्णोर्महात्मनः ॥ | ||
| Line 543: | Line 504: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V10 | | verse_id = BR_C04_S04_V10 | ||
| id = BR_C04_S04_V10_B1 | | id = BR_C04_S04_V10_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अन्यथोपासका येऽस्य ते यान्ति ह्यधरं तमः ॥ | अन्यथोपासका येऽस्य ते यान्ति ह्यधरं तमः ॥ | ||
| Line 565: | Line 525: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V11 | | verse_id = BR_C04_S04_V11 | ||
| id = BR_C04_S04_V11_B1 | | id = BR_C04_S04_V11_B1 | ||
| text = | | text = | ||
नित्यदुःखस्वरूपत्वादनन्दं तत्तमो मतम् । | नित्यदुःखस्वरूपत्वादनन्दं तत्तमो मतम् । | ||
| Line 575: | Line 534: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V11 | | verse_id = BR_C04_S04_V11 | ||
| id = BR_C04_S04_V11_B1 | | id = BR_C04_S04_V11_B1 | ||
| text = | | text = | ||
बुधः सकाशेऽप्यविद्वांस इत्यर्थः । | बुधः सकाशेऽप्यविद्वांस इत्यर्थः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V11 | | verse_id = BR_C04_S04_V11 | ||
| id = BR_C04_S04_V11_B1 | | id = BR_C04_S04_V11_B1 | ||
| text = | | text = | ||
बोधनाज्ज्ञानवान् भुत् स्यात् तत्सकाशाच्च ये हरिम् । | बोधनाज्ज्ञानवान् भुत् स्यात् तत्सकाशाच्च ये हरिम् । | ||
| Line 602: | Line 559: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V12 | | verse_id = BR_C04_S04_V12 | ||
| id = BR_C04_S04_V12_B1 | | id = BR_C04_S04_V12_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यदि जीवः परात्मानमयमस्मीति वेदितुम् । | यदि जीवः परात्मानमयमस्मीति वेदितुम् । | ||
| Line 627: | Line 583: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V13 | | verse_id = BR_C04_S04_V13 | ||
| id = BR_C04_S04_V13_B1 | | id = BR_C04_S04_V13_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यस्य ज्ञातो नित्यबुद्धो भगवान् पुरुषोत्तमः । | यस्य ज्ञातो नित्यबुद्धो भगवान् पुरुषोत्तमः । | ||
| Line 669: | Line 624: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V16 | | verse_id = BR_C04_S04_V16 | ||
| id = BR_C04_S04_V16_B1 | | id = BR_C04_S04_V16_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न वत्सराश्च नाहानि यस्य नित्याविकारतः ॥ | न वत्सराश्च नाहानि यस्य नित्याविकारतः ॥ | ||
| Line 688: | Line 642: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V17 | | verse_id = BR_C04_S04_V17 | ||
| id = BR_C04_S04_V17_B1 | | id = BR_C04_S04_V17_B1 | ||
| text = | | text = | ||
प्राणश्चक्षुस्तथैवान्नं मनः श्रोत्रं च पञ्चमम् ॥ | प्राणश्चक्षुस्तथैवान्नं मनः श्रोत्रं च पञ्चमम् ॥ | ||
| Line 716: | Line 669: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V19 | | verse_id = BR_C04_S04_V19 | ||
| id = BR_C04_S04_V19_B1 | | id = BR_C04_S04_V19_B1 | ||
| text = | | text = | ||
तस्य रूपगुणाद्येषु न कश्चिद्भेद इष्यते ॥ | तस्य रूपगुणाद्येषु न कश्चिद्भेद इष्यते ॥ | ||
| Line 744: | Line 696: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V21 | | verse_id = BR_C04_S04_V21 | ||
| id = BR_C04_S04_V21_B1 | | id = BR_C04_S04_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
तस्मादेकप्रकारेण द्रष्टव्यो भगवान् हरिः ॥ | तस्मादेकप्रकारेण द्रष्टव्यो भगवान् हरिः ॥ | ||
| Line 753: | Line 704: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V21 | | verse_id = BR_C04_S04_V21 | ||
| id = BR_C04_S04_V21_B1 | | id = BR_C04_S04_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
इत्यादिवचनादप्रमेयत्वमवाच्यत्वममनोविषयत्वं च सर्वात्मना न । मनसैवानुद्रष्टव्यमित्युक्तत्वात् । | इत्यादिवचनादप्रमेयत्वमवाच्यत्वममनोविषयत्वं च सर्वात्मना न । मनसैवानुद्रष्टव्यमित्युक्तत्वात् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V21 | | verse_id = BR_C04_S04_V21 | ||
| id = BR_C04_S04_V21_B1 | | id = BR_C04_S04_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न च केनाप्यवाच्यस्य लक्षणा दृष्टा । क्षीरमाधुर्यविशेषादेरपि तत्तच्छब्देनैव वाच्यत्वात् । | न च केनाप्यवाच्यस्य लक्षणा दृष्टा । क्षीरमाधुर्यविशेषादेरपि तत्तच्छब्देनैव वाच्यत्वात् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V21 | | verse_id = BR_C04_S04_V21 | ||
| id = BR_C04_S04_V21_B1 | | id = BR_C04_S04_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
विशदं क्षीरमाधुर्यं गुडे तीक्ष्णं घृते स्थिरम् इत्यादि च ॥ | विशदं क्षीरमाधुर्यं गुडे तीक्ष्णं घृते स्थिरम् इत्यादि च ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V21 | | verse_id = BR_C04_S04_V21 | ||
| id = BR_C04_S04_V21_B1 | | id = BR_C04_S04_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न च निर्गुणस्य सत्वमेवास्ति । गुणभेदादीनामपि सन्त्येव गुणाः । न चानवस्था स्वनिर्वाहकत्वात् ॥ | न च निर्गुणस्य सत्वमेवास्ति । गुणभेदादीनामपि सन्त्येव गुणाः । न चानवस्था स्वनिर्वाहकत्वात् ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V21 | | verse_id = BR_C04_S04_V21 | ||
| id = BR_C04_S04_V21_B1 | | id = BR_C04_S04_V21_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अवाच्यममनोगम्यमगुणं चेत् कुतोऽस्ति तत् । | अवाच्यममनोगम्यमगुणं चेत् कुतोऽस्ति तत् । | ||
| Line 804: | Line 750: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V22 | | verse_id = BR_C04_S04_V22 | ||
| id = BR_C04_S04_V22_B1 | | id = BR_C04_S04_V22_B1 | ||
| text = | | text = | ||
सर्वमस्य वशे यस्माद्धरिः सर्ववशी ततः । | सर्वमस्य वशे यस्माद्धरिः सर्ववशी ततः । | ||
| Line 814: | Line 759: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V22 | | verse_id = BR_C04_S04_V22 | ||
| id = BR_C04_S04_V22_B2 | | id = BR_C04_S04_V22_B2 | ||
| text = | | text = | ||
भूत एवाधिपतिर्नास्याधिपत्यमादिमत् । | भूत एवाधिपतिर्नास्याधिपत्यमादिमत् । | ||
| Line 846: | Line 790: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V23 | | verse_id = BR_C04_S04_V23 | ||
| id = BR_C04_S04_V23_B1 | | id = BR_C04_S04_V23_B1 | ||
| text = | | text = | ||
शान्तिस्तु भगवन्निष्ठा दमो मदविनिग्रहः । | शान्तिस्तु भगवन्निष्ठा दमो मदविनिग्रहः । | ||
| Line 856: | Line 799: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V23 | | verse_id = BR_C04_S04_V23 | ||
| id = BR_C04_S04_V23_B1 | | id = BR_C04_S04_V23_B1 | ||
| text = | | text = | ||
सर्वः पूर्णः समुद्दिष्टस्तथा ज्ञेयो जनार्दनः । | सर्वः पूर्णः समुद्दिष्टस्तथा ज्ञेयो जनार्दनः । | ||
| Line 884: | Line 826: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V25 | | verse_id = BR_C04_S04_V25 | ||
| id = BR_C04_S04_V25_author-note | | id = BR_C04_S04_V25_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति शारीरब्राह्मणम् ॥ ६४ ॥ | ॥ इति शारीरब्राह्मणम् ॥ ६४ ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V25 | | verse_id = BR_C04_S04_V25 | ||
| id = BR_C04_S04_V25_B1 | | id = BR_C04_S04_V25_B1 | ||
| text = | | text = | ||
न मरिष्यतीति ह्यमरो न मृतो यत्ततोऽमृतः ॥ | न मरिष्यतीति ह्यमरो न मृतो यत्ततोऽमृतः ॥ | ||
| Line 902: | Line 842: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V25 | | verse_id = BR_C04_S04_V25 | ||
| id = BR_C04_S04_V25_B1 | | id = BR_C04_S04_V25_B1 | ||
| text = | | text = | ||
परमार्थेऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवतीति नित्यमेव तथा भवतीत्यर्थः । | परमार्थेऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवतीति नित्यमेव तथा भवतीत्यर्थः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BR_C04_S04_V25 | | verse_id = BR_C04_S04_V25 | ||
| id = BR_C04_S04_V25_B1 | | id = BR_C04_S04_V25_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अभूद्भविष्यति भवत्येवमाद्यपदानि तु । | अभूद्भविष्यति भवत्येवमाद्यपदानि तु । | ||
Revision as of 09:03, 10 April 2026
तं यदा प्राप्य जीवात्मा मृतेः पूर्वं विमुग्धताम् ॥ याति विष्णुं तदा देवा यान्ति तेजःस्वरूपिणः । तानादाय हरिश्चक्षुःस्थानाद्धृदयमाव्रजेत् ॥
तदा न किञ्चिज्जानाति जीवो ब्रह्मसमाश्रितः ॥ इति च ॥
चक्षुरादिषु रूपाणि जाग्रत्काले तयोः सदा ॥ बहूनि सन्ति तान्येव यदैकीभावमाप्नुयुः । हृदयस्थेन रूपेण तदा जीवो न किञ्चन ॥ जानातीति विदुः प्राज्ञास्तदा विष्णोः स्वतेजसा । द्योतते हृदयाग्रं च तेन द्वारेण केशवः ॥ निष्क्रामेज्जीवमादाय प्राण एनमनुव्रजेत् ।
प्राणमन्ये तथा देवा विद्या कर्म च योग्यता ॥ इति महामीमांसायाम् ॥पूर्वप्रज्ञा योग्यता स्याद्रमा तदभिमानिनी ॥ एतेऽपि विष्णुं गच्छन्तमनुयान्ति सदैव हि ।
वायुर्ज्ञानात्मकश्चैव प्राणात्मक इति द्विधा ॥अनुयाति हृषीकेशं सर्वैर्देवैः समन्वितः ॥ इति च ॥स तु तद्देवताद्वारेणोत्क्रामति न संशयः ॥ विष्णोर्लोकं परं गच्छन्नुत्क्रामेन्मूर्ध्न एव तु ।
तथैव ब्रह्मणो लोकं सुषुम्नाया विभेदतः ॥ इत्यध्यात्मे ॥
जीवस्य सूक्ष्मरूपं तु प्राप्य स्थूलं परित्यजेत् ॥ इदं शरीरं भूतेषु विलापयति केशवः ।
अविद्यां चैव जीवस्य गमयेज्ज्ञानसर्जनात् ॥
शुद्धेन तेन चात्मेष्टं कुरुते रूपमंजसा ॥ एवं स भगवान् विष्णुर्जीवस्वर्णस्य यन्मलम् । अविद्याकामकर्माद्यमात्माग्नौ नाश्य सर्वकृत् ॥ स्वेच्छया कुरुते रूपं यद्योग्यं तस्य मुक्तिगम् । पितृजीवस्य पित्र्यं स गान्धर्वं तस्य चैव हि ॥ दैवं तु देवजीवस्य प्राजापत्यं प्रजापतेः । ब्रह्मणो ब्राह्ममेवेति नित्यानन्दस्वरूपकम् ॥ न योग्यतां विना क्वापि पूर्वप्रज्ञाश्रुतेः क्वचित् । यदा मुक्तो भवेद् ब्रह्मा तदा ब्रह्मा स मुख्यतः ॥ एवं प्रजापतिश्चैव तथैवान्येऽपि सर्वशः । यथा हि स्वर्णरूप्याद्यं मलहानौ हि तद्भवेत् ॥
पूर्वं तु योग्यतामात्रं द्विजत्वं बालके यथा ॥ इत्यादि च ।तथैव सुमहत्तेजः करोति भगवान् महत् ॥
अतो नवतरं चैतद्ब्रह्मादीनां करोत्यजः ॥ अन्येषां वा भूतानां मनुष्यादीनाम् । नासुरादीनां भविष्यतीति च ।इंद्रगोपनिभं नाम्ना जाम्बूनदमिति स्मृतम् ॥ दैवं चामीकरं नाम प्रोद्यदादित्यसन्निभम् । नैजो विशेषः स्वर्णानामेतेषां सर्वदैव च ॥ नाग्न्यादिनापि समतां यान्ति तानि कथञ्चन । एवं मानुषगन्धर्वपितृदेवाः प्रजापतिः ॥ ब्रह्मेति क्रमशो जीवा विशिष्टा उत्तरोत्तरम् ।
स्वभावेनैव मुक्तानां स्वभावो व्यक्तिमाव्रजेत् ॥ इत्यादि च ।चिदानन्दशरीरादेः सदेहाद्या विमोक्षिणः ॥
अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दा सुगंधिनः ॥ इत्यादेश्च ।
दूरस्थत्वात् स इत्युक्तः समीपस्थो ह्ययं स्मृतः ॥ पूर्णज्ञानस्वरूपत्वाद् विज्ञानमय ईर्यते । सर्वमन्तृस्वरूपत्वात् स एवोक्तो मनोमयः ॥ बलपूर्णस्वरूपत्वात् स प्राणमय ईरितः । सर्वद्रष्टृस्वरूपत्वाच्चक्षुर्मय इतीर्यते ॥ सर्वश्रोतृस्वरूपत्वात् स श्रोत्रमय ईरितः । सर्वाधारात् सुगन्धत्वात् पृथिवीमय उच्यते ॥ सर्वतृप्तिकरत्वाच्च विष्णुरापोमयः स्मृतः । सर्वकर्तृस्वरूपत्वाच्छ्रुतो वायुमयो हरिः ॥ अवकाशप्रदातृत्वादाकाशमय ईर्यते । पूर्णतेजःस्वरूपत्वात् तेजोमय उदाहृतः ॥ सृष्ट्यादीच्छास्वरूपत्वात् स्मृतः काममयो हरिः । सर्वदुष्टप्रतीपत्वात् स हि क्रोधमयो मतः ॥ सुखादिधर्मरूपत्वाज्ज्ञेयो धर्ममयः प्रभुः । अप्राकृतस्वरूपत्वादनेतन्मय एव च ॥ अपार्थिवो हरेर्गन्धो न तृप्तिश्चाप्यबात्मिका । नाग्नेयं तस्य तेजोऽपि न च वायुर्बलं हरेः ॥ श्रोत्राद्या नास्य चाकाशो मनस्तत्त्वं न तन्मनः । बुद्धितत्त्वं न तद्बुद्धिर्नाहमस्याहमुच्यते ॥ महदात्मकं न तच्चितं प्रकृतिर्नास्य चेतना । प्रकृत्यादिगुणा यस्मात् तद्गुणप्रतिबिम्बकाः ॥ अतः सर्वमयो विष्णुः सर्वाद्यत्वादतन्मयः । चिदानन्दात्मकास्तस्य गुणाः सर्वगुणात्मकाः ॥ सर्वदाऽतः सर्ववैलक्षण्यमेषां प्रकीर्तितम् । क्रोधः क्षमात्मको यस्य चिदानन्दात्मकस्तथा ॥ अन्यक्रोधसमः क्रोधस्तस्य विष्णोः कथं भवेत् । एवं सर्वगुणास्तस्य सर्वेभ्योऽपि विलक्षणाः ॥ पूर्वप्रज्ञानुसारेण विमुक्तस्तमुपेष्यति । अनादिकालसम्बद्धा या प्रज्ञा विष्णुसंश्रया ॥
पूर्वप्रज्ञेति सा प्रोक्ता ब्रह्मादेस्तारतम्यतः ॥ इत्यादि महामीमांसायाम् ।अतीतानागतं यस्मात् तद्वशेऽतो ह्यदोमयः ॥ प्राधान्ये च मयट् प्रोक्तः स्वरूपे च यतो भवेत् । इदंरूपोऽप्यदोरूपस्ततो नित्यत्वतो हरिः ॥
अस्य तस्य प्रधानस्य नित्यपूर्णबलत्वतः ॥ इत्यादि च ।यथा बाह्ये तथैवान्ते ततो यदिति चोच्यते ॥ यथेदानीं तथा नित्यं यस्मादेष भविष्यति । अत एतदिति प्रोक्तो वासुदेवो जगत्पतिः ॥ स यथा करोति पुरुषं तथैवायं भविष्यति । साधुर्भवति साधुं चेत् करोति पुरुषोत्तमः ॥ पापो भवति पापं चेत् स करोति जनार्दनः । तत्प्रेरितेन पुण्येन पुण्यो भवति मानवः ॥ तत्प्रेरितेन पापेन तथा पापः पुमान् भवेत् । आहुश्च तत्कामाधीनं जीवमेनं सदैव हि ॥ तत्कामादस्य कामः स्याद्यथाकामस्तथा भवेत् । कामानुसारिणी निष्ठा कर्मनिष्ठानुसारतः ॥ फलं कर्मानुसारेण विष्णोः काममयस्ततः ।
जीवोऽयं सर्वदैव स्यान्नान्यथा तु कथञ्चन ॥ इत्यादि च ।
अ इत्युक्तः परो विष्णुस्तत्कामोऽकाम ईरितः ॥ तथा कामयमानः स योग्यकामस्य चापि तु । कादाचित्कसमुद्भूतेर्भगवत्कामनां विना ॥ कामितस्याखिलस्याप्तेराप्तकामश्च मुक्तिगः । चिदानन्दात्मकं रूपं कामत्वेन भविष्यति ॥ यतस्तेनैवाप्तकाम इति मुक्तोऽभिधीयते । मुक्तस्य न पुनः प्राणा उत्क्रामन्ति कदाचन ॥ जीवोऽपि ब्रह्मशब्दोक्तो जडाद्गुणबृहत्वतः । प्राप्नोति परमं ब्रह्म प्रलये प्रलये सदा ॥ मअन्यदा स्वेच्छया विष्णोः स्वरूपाद् बहिरेष्यति ।
स्वेच्छयाऽन्तर्बहिर्वैवं रमते मुक्त आत्मवान् ॥ इत्यादि च ।
स्वरूपभूतचित्तेन कामाद्याः स्युः सुखात्मकाः ।
दुःखात्मकाः प्राकृता वा मुक्तानां न कथञ्चन ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥नित्यामृतः स भगवान् श्रीश्च नान्यः कथञ्चन ॥
इति नारदीये ॥
अणुश्च विततश्चासौ यतोऽन्तर्बहिरेव च ॥ श्रिया स्पृष्टः श्रीपतित्वादनु वित्तस्तथैव च । तस्य प्रसादात् संयान्ति तल्लोकं सर्वमोक्षिणः ॥
ऊर्ध्वः स भगवान् सर्वविशिष्टो यत्सदैव हि ॥
शुक्लं तु वासुदेवाख्यमनिरुद्धं तु नीलकम् । संकर्षणं पिंगलं च प्रद्युम्नं हरितं स्मृतम् ॥ नारायणं लोहितं स्यात् पञ्चरूपाण्यजे हरौ । पञ्चभेदविभिन्नो यस्त्वभिन्नोऽपि स्वरूपतः ॥ स पन्था ब्रह्मणा ज्ञातः पद्मजेनैव सन्ततम् । परब्रह्मस्वरूपज्ञो महातेजः श्रियस्तथा ॥ सम्यक्स्वरूपविज्ञानात् तैजसत्वेन कीर्तितः । भगवत्कर्मकर्तृत्वात् पुण्यकृच्चाभिधीयते ॥ एवंविधोऽपि तस्यैव प्रसादाद्याति तां गतिम् । अतः पन्थास्समुद्दिष्टो भगवान् केशवः स्वयम् ॥ स्वगताखिलभेदेन विहीनोऽपि स सर्वदा । सर्वेषां व्यवहाराणां भेदोत्थानां स ईश्वरः ॥
अभिन्नोऽपि ह्यतो भिन्नः पञ्चभेदादिना मृषा ॥
ततः किञ्चिद्विशेषेण दुर्ज्ञानस्याविनिन्दकाः । सम्यगाचार्यवचनमवज्ञाय विरोधिनि ॥ सत्वबुद्धिं यतः कुर्युरतस्तेऽधिकपापिनः ।
अप्राप्तत्यागिनः प्राप्तनिष्ठाहीनो हि दोषवान् ॥
बोधके विद्यमानेऽपि ये विदुर्न परं हरिम् ॥
तेऽपि यान्ति तमो घोरं नित्योद्रिक्तासुखात्मकम् ॥ इत्यादि च ।
योग्यः शरीरच्छेदादेः कथं दुःखी तदा भवेत् ॥ दुःखी शरीरसम्बन्धाज्जीवो विष्णोः प्रसादतः । अदुःखी विप्लुडानन्दं मुक्त एव च भोक्ष्यति ॥ नित्यमुक्तः पूर्णसुखः स्वतंत्रः पुरुषोत्तमः । परतंत्रः कथं जीवो योग्यः सोऽस्मीति वेदितुम् ॥ तस्मात् सोऽस्मीति नैवायं विजानीयात् कदाचन ।
तदीयोऽस्मीति जानीयात् सर्वदैव बुधस्ततः ॥ इति च ॥
तस्य लोकः स एवैको यो लोकः परमात्मनः ॥ स हि विष्णुः परो वायोरपि कर्ता प्रकीर्तितः । विश्वो वायुः समुद्दिष्टः पूर्णत्वाज्जीवसङ्घतः ॥ तदन्यस्यापि सर्वस्य कर्तैको विष्णुरेव हि । प्रविष्टो गहने देहमध्ये सन्दोहनामनि ॥
तज्ज्ञानी याति तं लोकं तत्प्रसादाच्च वर्तते ॥
तस्मादेवं वदन् वस्तुशून्यतामर्थतो वदेत् ॥
गुणाश्च गुणिनः सर्वे स्वेनैव गुणिनो गुणाः ॥" इत्यादि च ।
सर्वस्य ब्रह्मरुद्रादेरन ईशान एव च ॥
गुणाधिकः पालकश्चेत्यतोऽधिपतिरीरितः ॥ "इति च ॥नित्यबोधात्मकत्वाद्यो मुनिः प्रोक्तो जनार्दनः । तं विद्वांश्च मुनिर्नाम बोधस्तस्याप्यमुख्यतः । यं विदित्वा विमुक्ताश्चायुक्तकामविवर्जिताः ॥ उत्पत्तिलयहीनाश्च नित्यानन्दैकभोगिनः । आनन्दभिक्षां विष्णूत्थां चरन्त्यज्ञानवर्जिताः ॥ स एष मोक्षदो विष्णुर्यत्कल्याणं कृतं मया। पापं कृतं मयेत्येतन्न कदाचित् करिष्यति ॥ कृते मया पुण्यपापे इति यच्चेतनात्मनाम् ।तत्सर्वमत एवोक्तं विष्णोः सर्वेश्वरेश्वरात् ॥ तीर्णो हि वर्तते नित्यं पुण्यपापे जनार्दनः ।
नैनं कदाचित् तपतः पुण्यपापे जनार्दनम् ॥ इति च ॥
हृदिस्थविष्णौ सन्तोषः सदैवोपरमः स्मृतः ॥
तितिक्षा द्वन्द्वसहता क्षमा क्रोधासमुत्थितिः ॥इति शब्दनिर्णये ॥रागसन्देहपापानि तथा जानंस्तरिष्यति ॥ नित्यं हि रागपापादेर्मुक्तो यत्पुरुषोत्तमः । वेदाख्यब्रह्मणान्यत्वाद्विष्णुर्ब्राह्मण उच्यते ॥
पूर्णत्वाज्ज्ञानरूपत्वाद् ब्रह्मलोकश्च स प्रभुः ॥
ब्रह्मायमाप्तकामत्वादेवं यो वेद तं परम् ।
आप्तकामोऽभयश्चैव भवेद् विष्णोरनुग्रहात् ॥ इति च ।