Bhagavatatatparyanirnaya/C12/S5: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वादशस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वादशस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ||
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॥ द्वादशः स्कन्धः समाप्तः ॥ | ॥ द्वादशः स्कन्धः समाप्तः ॥ | ||
Revision as of 09:03, 10 April 2026
इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः ।बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥
तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् ।विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥
'स्वसन्तानोद्भवं कीर्त्या योजयन् जनमेजयम् ।
शक्तोऽप्यशक्तवद्यष्टुरिन्द्र आसीदुपेक्षकः । एवमेव ऋषीणां च कीर्तिं योजयताऽमुना ॥ कृतोपेक्षा महेन्द्रेण किमु विष्णुः परात्परः । तस्माद्विष्णोरशक्यं न भूतभव्यभवत्स्वपि ॥
न चानिष्टं गुणैरेष पूर्णो नारायणः सदा॥ इति वामने ॥ २२-२३ ॥नित्यादोषस्वरूपाय गुणपूर्णाय सर्वदा ।नारायणाय हरये नमः प्रेष्ठतमाय मे ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वादशस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥
॥ द्वादशः स्कन्धः समाप्तः ॥