Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S5: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ||
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क्व तदाऽऽत्ममानो मम ॥ | क्व तदाऽऽत्ममानो मम ॥ | ||
Revision as of 09:01, 10 April 2026
प्रह्लाद उवाच–परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः ।
स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।अन्य एष तथाऽन्योऽहमिति देहगताऽसती ॥ १२ ॥
'स्वातन्त्र्येणान्यसद्भावनिषेधाय श्रुतिस्त्वियम् ।
अन्योऽसावन्योऽहमि"ति पश्यन्नज्ञ इति स्म ह । आत्मानमन्तर्यमयेदिति भेदं स्वरूपतः । आह तद्ब्रह्मणोऽधीना भिन्ना जीवाः सदैव तु ॥ स्वरूपसत्ता कर्तृत्वं भोगो मोक्षस्तथैव च ।
मुक्तस्यावस्थितिश्चैव सर्वं विष्णोर्वशे सदा॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ ११-१२ ॥प्रह्लाद उवाच–श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
आत्मस्थत्वेन वेदनमात्मनिवेदनम् ।
'मुक्तस्यापि ममान्तस्थो नियन्तैव हरिः सदा ।
इति ज्ञानं समुद्दिष्टं सम्यगात्मनिवेदनम्॥ इति च ॥ २३ ॥गुरुपुत्र उवाच–न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥
क्व तदाऽऽत्ममानो मम ॥