Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S20: Difference between revisions
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'अनाम्लं तु दधि क्षीरं क्षीरं सान्द्रं तथा दधि''॥ | 'अनाम्लं तु दधि क्षीरं क्षीरं सान्द्रं तथा दधि''॥ | ||
Revision as of 09:01, 10 April 2026
प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥
'सूर्यसोमाग्निवारीरविधातृषु यथाक्रमम् ।
प्लक्षादिद्वीपसंस्थास्तु स्थितं हरिमुपासते॥ इति च ॥ ५ ॥
एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे विंशोऽध्यायः ॥
'अनाम्लं तु दधि क्षीरं क्षीरं सान्द्रं तथा दधि॥
इति शब्दनिर्णये ॥ २४ ॥