Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S31: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ | ||
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'सर्वोत्तमत्वाद्विष्णुर्हि माय इत्येव शब्द्यते''। इति व्योमसंहितायाम् । | 'सर्वोत्तमत्वाद्विष्णुर्हि माय इत्येव शब्द्यते''। इति व्योमसंहितायाम् । | ||
Revision as of 09:01, 10 April 2026
दीक्षिता ब्रह्मसत्रेण सर्वभूतात्ममेधसा ।प्रतीच्यां दिशि वेलायां सिद्धोऽभूद् यत्र जाजलिः ॥ २ ॥
'पारिव्राज्यं ब्रह्मसत्रं न्यास इत्यभिधीयते। इत्यभिधानम् ॥
सर्वभूतात्मनि हरौ मेधा यत्र तद्ब्रह्मसत्रं सर्वभूतात्ममेधः ।
'हरिमेधास्तु संन्यासो हरौ मेधाऽत्र यद्भवेत्। इति षाड्गुण्ये ॥ २ ॥श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थितः ।सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽत्मदः प्रियः ॥ १३ ॥
तावत्पर्यन्तमेव फलमित्यवधिः ॥ १३ ॥
एतत् परं तज्जगदात्मनः पदंसकृद् विभातं सवितुर्यथा प्रभा ।
'आत्मभावः शरीरे तु द्रव्यभ्रम उदाहृतः ।
क्रियाभ्रमस्त्वहं कर्ता मदीयानीन्द्रियाणि तु ॥ कारकभ्रम इत्युक्तस्त एते विभ्रमा यदा । श्वासादिवृत्तिलोपेन प्राणा उद्योगिनस्तदा ॥ विलीयन्ते प्राणभक्त्या नित्यं स्वापवतां स्फुटम् ।
उद्योग एव जाग्रत्स्याद्योगिनां मुक्तिसिद्धये॥ इत्यध्यात्मे ॥ १६ ॥तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् ।स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहमात्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥ १८ ॥
'पूर्णो विष्णुः स एवैक इति भावो य ईरितः ।
आत्मैकभाव इति तं विदुर्ब्रह्मात्मदर्शिनः॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥
निरस्तसङ्कल्पविकल्पमद्वयंद्वयापवादोपरमोपलम्भनम् ।
'सङ्कल्पश्च विकल्पश्च ऋते विष्णुप्रसादतः ।
नैव सम्भवतो विष्णोः समाभावात्तु सोऽद्वयः॥ इति तन्त्रभागवते ॥
न भजति कुमनीषिणां स इज्यांहरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः ।
अधनाश्च त एवात्मधनाश्चाधनात्मधनाः ॥ २२ ॥
श्रियमनुचरतीं तदर्थिनश्चद्विपदपतीन् विबुधांश्च यः स्वपूर्णः ।
'श्रियं देवांश्च भृत्यत्वान्मनुते बहु केशवः ।
नात्मार्थाय यतस्ते तु भक्तया सर्वोत्तमोत्तमाः॥ इति च ॥ २३ ॥
तत् परं सर्वधिष्ण्येभ्यो मायाधिष्ठितमारुहत् ।मुनयोऽद्याप्युदीक्षन्ते परं नापुरवाङ् नृपाः ॥ २६ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥
॥ चतुर्थः स्कन्धः समाप्तः ॥
'सर्वोत्तमत्वाद्विष्णुर्हि माय इत्येव शब्द्यते। इति व्योमसंहितायाम् ।
'देवानत्युत्तममुनीन्विना के शैंशुमारकम् ।
हरेर्गृहं प्रविष्टास्तु ध्रुवो देवाश्च तद्गताः॥ इति मात्स्ये ॥ २६ ॥