Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S30: Difference between revisions
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'हरणाज्ज्ञानरूपत्वाद्धरिमेधा विभुः स्मृतः''॥ इति च ॥ | 'हरणाज्ज्ञानरूपत्वाद्धरिमेधा विभुः स्मृतः''॥ इति च ॥ | ||
Revision as of 09:01, 10 April 2026
मैत्रेय उवाच–प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः ।
'पुरेषु त्वञ्जनाज्जीवः पुरञ्जन इतीरितः ।
पुराणां जननाद्विष्णुर्व्यञ्जकत्वं तयोरपि॥ इति तन्त्रभागवते ॥३॥
दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः ।भौमान् भोक्ष्यथ भोगान् वै दिव्यांश्चानुग्रहान्मम ॥ १७ ॥
दिव्यवर्षसहस्राणामिति सहस्रशब्दो बहुत्ववाची ।
'मानुषाणां वत्सराणां लक्षद्वादशकं पुरा ।
प्रचेतोभिरियं पृथ्वी पालिताऽव्याहतेन्द्रियैः॥ इति ब्रह्माण्डे ॥१७॥न व्यवह्रियते यज्ञो ब्रह्मैतद् ब्रह्मवादिभिः ।न मुह्यन्ति न शोचन्ति न हृष्यन्ति यतो गताः ॥ २० ॥
यज्ञो ब्रह्म विष्ण्वाख्यं ब्रह्म यथानुभवं न व्यवह्रियते ।
'सूक्ष्मेण मनसा विद्मो वाचा वक्तुं न शक्नुमः। इति भारते ॥२०॥
शुद्धाय शान्ताय नमः स्वनिष्ठमनस्यपार्थे विलसद्द्वयाय ।नमो जगत्स्थानलयोदयेषु गृहीतमायागुणविग्रहाय ॥ २३ ॥
सु अनिष्ठमनसि ।
'अनवस्थितबुद्धीनां द्वितीयं दृश्यते हरेः । सम्यक्स्वस्थितबुद्धीनामिदं सर्वं हरेर्वशेइति च । 'नित्यं गृहीताः सत्वाद्या विग्रहाश्च त्रयः सदा । ज्ञानानन्दात्मकास्ते तु विग्रहा निर्गुणास्तथा ।
द्वौ तत्र ब्रह्मरुद्रस्थावेको वैकुण्ठधामगः॥ इति प्रवृत्तसंहितायाम् ॥नमो विशुद्धसत्त्वाय हरये हरिमेधसे ।वासुदेवाय कृष्णाय प्रभवे सर्वसात्वताम् ॥ २४ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे त्रिंशोऽध्यायः ॥
'हरणाज्ज्ञानरूपत्वाद्धरिमेधा विभुः स्मृतः॥ इति च ॥
'हरिः सर्वगुणात्मत्वात्सत्व इत्यभिधीयते। इति षाड्गुण्ये ॥ २४ ॥