Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S24: Difference between revisions
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यस्य जीवादिभ्यो भेदबुद्धिः । स दिवा सम्यग्ज्ञानं सम्यग्ज्ञानिविषया सत्यैवेत्यर्थः । | यस्य जीवादिभ्यो भेदबुद्धिः । स दिवा सम्यग्ज्ञानं सम्यग्ज्ञानिविषया सत्यैवेत्यर्थः । | ||
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भूतेन्द्रियान्तःकरणैरुपलक्ष्यते ॥ ६२ ॥ | भूतेन्द्रियान्तःकरणैरुपलक्ष्यते ॥ ६२ ॥ | ||
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'अवधारणे घशब्दःस्यात्सारमात्रं तु सारघम्''।इति शब्दनिर्णये ॥ ६४ ॥ | 'अवधारणे घशब्दःस्यात्सारमात्रं तु सारघम्''।इति शब्दनिर्णये ॥ ६४ ॥ | ||
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अस्मादेतद्भवतीत्युपपत्त्यपेक्षां विनापि स्वभावत एव ॥ ६७ ॥ | अस्मादेतद्भवतीत्युपपत्त्यपेक्षां विनापि स्वभावत एव ॥ ६७ ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ | ||
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अहरहः क्लेशमोक्षः सुप्तौ । तावद्वेदेत्याक्षेपो दौर्लभ्यज्ञापनार्थम् ॥ ६८ ॥ | अहरहः क्लेशमोक्षः सुप्तौ । तावद्वेदेत्याक्षेपो दौर्लभ्यज्ञापनार्थम् ॥ ६८ ॥ | ||
Revision as of 09:01, 10 April 2026
सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्रुतिम् ।यां वीक्ष्य चारुसर्वाङ्गीं किशोरीं सुष्ट्वलंकृताम् ।
विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धमहोरगाः ।विजिताः स्युर्यया दिक्षु क्वणयन्त्यैव नूपुरैः ॥ १२ ॥
'राजपुत्रीं शुकीमग्निरावर्तन्तीं प्रदक्षिणम् ।
आदायान्तरधाद्दानसमये मन्मथातुरः॥ इति ब्राह्मे ॥ ११-१२ ॥
स्वधर्मनिष्ठः शतजन्मभिः पुमान्विरिञ्चतामेति ततः परं हि माम् ।
मां श्रियम् ।
'ऋजवो नाम ये देवा योग्या ब्रह्मपदस्य तु । त एव शतजन्मानि विशेषोपासका हरेः ॥ प्राप्य ब्रह्मपदं पश्चाच्छ्रियं प्राप्यानुमोदिताः । तया ततो हरिं यान्ति वसन्ति हरिसन्निधौ ॥ अनादिकालभक्ताश्च ज्ञानिनस्ते न संशयः । विशिष्टा ज्ञानभक्त्यादौ सर्वजीवनिकायतः ॥ सर्वदापि विशेषेण शतजन्मप्रयत्नतः । स्वपदप्राप्तिरुद्दिष्टा ततो मुक्तिरवाप्यते ॥ तथैव चत्वारिंशद्भिः पदं शैवं च जन्मभिः ।
विंशद्भिरैन्द्रं दशभिरन्येषामप्युदीरितम्॥ इति षाड्गुण्ये ॥ २९ ॥अथ भागवता यूयं प्रियाः स्थ भगवान् यथा ।न मे भागवतानां च प्रेयानन्योऽस्ति कर्हिचित् ॥ ३० ॥
अथ एवमनादिभक्तोऽहं यतः अतः प्रिया यूयम् ॥ ३० ॥
रुद्र उवाच –जितं व आत्मविद्धुर्याः स्वस्तये स्वस्तिरस्तु वः ।
'सर्वान्तर्यामिकत्वात्तु सर्वनामा जनार्दनः ।
न तु सर्वस्वरूपत्वात्सर्वेशोऽसौ हरिर्यतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ ३३ ॥
भवान् भक्तिमतां लभ्यो दुर्लभः सर्वदेहिनाम् ।स्वाराज्यस्याप्यभिमता एकान्तेनात्मविद्गतिः ॥ ५४ ॥
स्वाराज्यस्य इन्द्रादेः ॥ ५४ ॥
क्षणार्धेनाऽपि तुलये न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ ५७ ॥
'सङ्गो भागवतैर्भूयानपुनर्भवमात्रतः ।
यतो विशिष्टमानन्दं मुक्तौ जनयति स्फुटम्॥ इति च ॥ ५७ ॥
अथानघाङ्घ्र्योस्तव कीर्तितीर्थयो-रन्तर्बहिः स्नानविधूतपाप्मनाम् ।
अङ्घ्र्योर्जातयोः कीर्तितीर्थयोः ॥ ५८ ॥
यत्रेदं व्यज्यते विश्वं विश्वस्मिन्नवभाति यत् ।न त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम् ॥ ६० ॥
विश्वस्मिन् स्थितमपि न भात्यज्ञानाम् ॥ ६० ॥
यो माययेदं पुरुरूपयाऽसृजद्बिभर्ति भूयः क्षपयत्यविक्रियः ।
यस्य जीवादिभ्यो भेदबुद्धिः । स दिवा सम्यग्ज्ञानं सम्यग्ज्ञानिविषया सत्यैवेत्यर्थः ।
'रात्रिरज्ञानमुद्दिष्टं सम्यग्ज्ञानं दिवा स्मृतम्। इति शब्दनिर्णये ॥ 'जीवेभ्यो जडतश्चैव भेदज्ञानं हरेः सदा ।
वास्तवं ज्ञानमुद्दिष्टं तेन मुक्तिरवाप्यते॥ इति षाड्गुण्ये ॥ ६१ ॥क्रियाकलापैरिदमेव योगिनःश्रद्धान्विताः साधु यजन्ति सिद्धये ।
भूतेन्द्रियान्तःकरणैरुपलक्ष्यते ॥ ६२ ॥
त्वमेक आद्यः पुरुषः सुप्तशक्ति-स्तया रजः सत्त्वतमो विभिद्यते ।
सुप्तशक्तिः स्वात्मन्येवाप्तशक्तिः ।
'प्रकृतेः स्वाप उद्दिष्टो हर्यन्यस्य त्वदर्शनम् ।
विशेषेण हरौ चापि रतिर्ज्ञानात्मिका यतः॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥ ६३ ॥सृष्टं स्वशक्त्येदमनुप्रविश्यचतुर्विधं पुरमात्मांशकेन ।
'अवधारणे घशब्दःस्यात्सारमात्रं तु सारघम्।इति शब्दनिर्णये ॥ ६४ ॥
कस्त्वत्पदाब्जं विजहाति पण्डितोयत् ते पुमानप्ययमब्जकेतनः ।
अस्मादेतद्भवतीत्युपपत्त्यपेक्षां विनापि स्वभावत एव ॥ ६७ ॥
यत्स्पृष्टोऽहरहर्मुक्तक्लेशः शेतेऽमृताम्बुधौ ।तावद् वेदाथ तत् तेऽङ्घ्रिं जनो नु स्मरते च तत् ॥ ६८ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥
अहरहः क्लेशमोक्षः सुप्तौ । तावद्वेदेत्याक्षेपो दौर्लभ्यज्ञापनार्थम् ॥ ६८ ॥