Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S34: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ | ||
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'जीवोपाधिप्रभृतयः आमुक्तेः सर्वदेहिनाम् । | 'जीवोपाधिप्रभृतयः आमुक्तेः सर्वदेहिनाम् । | ||
Revision as of 09:00, 10 April 2026
देवहूतिरुवाच–अथाप्ययान्ते सलिले शयानं भूतेन्द्रियार्थात्ममयं वपुस्ते ।
भूतेन्द्रियार्थात्ममयं तेभ्यः प्रधानम् ।
'त्वं प्रधानमयो देव प्रधानादधिको यतः॥ इति वाराहे ॥ २ ॥
त्वं देहतन्त्रः प्रशमाय पाप्मनां निदेशभाजां च विभो विभूतये ।यथावतारास्तव सूकरादयस्तथायमप्यात्मपथोपलब्धये ॥ ५ ॥
देहतन्त्रः देहप्रकाशः ।
'ततिः प्रकाशो विस्तारस्तन्त्रं चेत्यभिधीयते।इति तन्त्रमालायाम् ॥ ५ ॥
ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये ।निवृत्तजीवोपाधित्वात् वीतक्लेशाप्तनिर्वृतिः ॥ २६ ॥
नित्यरूढसमाधित्वात् परावृत्तगुणभ्रमा ।न सस्मार तदात्मानं स्वप्नदृष्टमिवोत्थितः ॥ २७ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥
॥ तृतीयः स्कन्धः समाप्तः ॥
'जीवोपाधिप्रभृतयः आमुक्तेः सर्वदेहिनाम् ।
नियमात्सन्त्यभावस्तु निष्फलत्वादुदीर्यते॥ इति वाराहे ॥ २७ ॥