Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S30: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रिंशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रिंशोऽध्यायः ॥ | ||
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'यथायोग्यातिरेकेण न द्वेष्यश्च प््रिायो हरेः'' इति कापिलेये ॥३९॥ | 'यथायोग्यातिरेकेण न द्वेष्यश्च प््रिायो हरेः'' इति कापिलेये ॥३९॥ | ||
Revision as of 09:00, 10 April 2026
देवहूतिरुवाच–लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च ।
यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत् प्रचक्षते ।भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥ २ ॥
यथा साङ्ख्येषूक्तं तथा कथितम् । यत्साङ्ख्यमूलं तल्लक्षणं प्रचक्षते ॥१,२॥
विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव च ।अर्चादावर्चयेद् यो मां पृथग्भावः स राजसः ॥ ९ ॥
तद्रूपाणां पृथग्भावः ॥ ९ ॥
कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् ।यजेद् यष्टव्यमिति वाऽपृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ १० ॥
अपृथग्भावः स सात्विकः ॥ १० ॥
अर्चादावर्चयेत् तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् ।यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५ ॥
'अज्ञोऽर्चयेदेवार्चायामन्यथा दोषवान्भवेत् ।
ज्ञस्त्वर्चयन्सुगुणवानन्यथा दोषवान्न तु॥ इति कापिलेये ॥२५॥
आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् ।तस्य भिन्नदृशो मृत्युर्विधत्ते भयमुल्बणम् ॥ २६ ॥
अन्तरोदरं भिन्नं ब्रह्म । आत्मस्थमन्यस्थं च ब्रह्म यो भेदेन पश्यति । 'उदरं ब्रह्म। इति श्रुतेः ॥ २६ ॥
जीवाः श्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे ।ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः ॥ २८ ॥
अत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः ।तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः ॥ २९ ॥
रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतोदतः ।तेषां बहुपदः श्रेष्ठाश्चतुष्पादस्ततो द्विपात् ॥ ३० ॥
ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः ।ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः ॥ ३१ ॥
अर्थज्ञात् संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वधर्मकृत् ।मुक्तसङ्गस्ततो भूयान् न दोग्धा धर्ममात्मनः ॥ ३२ ॥
तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मरतिर्नरः ।मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि सन्न्यस्तकर्मणः ।
प्राणभृतः चलनयुक्ताः ।
'पशुवृक्षादिभेदेन जीवा एव स्वतः स्थिताः । संसृतौ व्यत्ययस्तेषां मुक्तौ तत्तत्स्वरूपता ॥ तत्र स्थावरमुक्तेभ्यो वरा जङ्गममुक्तकाः । तेभ्यो मानुषमुक्ताश्च विप्रमुक्तास्ततोऽधिकाः ॥ तत्रोपदेशमात्रेण मुक्तेभ्यो वेदवेदिनः । अर्थज्ञा ऋषयस्तेभ्योऽतो देवाः संशयच्छिदः ॥ पूर्णधर्मा ततस्त्विन्द्रो निःसङ्गो गरुडस्ततः । भक्तिपूर्णो हरेर्ब्रह्मा तस्मान्नान्योऽधिकस्ततः ॥
मुक्तौ वा संसृतौ वापि सम्यगेषु हि ते गुणाः ॥ इति कापिलेये ॥ २८-३३ ॥मनसैतानि भूतानि प्रणमेद् बहुमानयन् ।ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ ३४ ॥
जीवकलया सह भूतानि बहुमानयंस्तदालयत्वेनेश्वरं प्रणमेत् ॥ ३४ ॥
भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः ।ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत् ॥ ३५ ॥
एकतरभावेऽन्यतरस्य नियतत्वादेकतरेणैव ॥ ३५ ॥
यत् तद् भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः ।परं प्रधानात् पुरुषाद् दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६ ॥
सर्वकर्माणि यस्य विचेष्टानिमित्तानि तत्कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६ ॥
रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते ।भूतानां महदादीनां यतो भिन्नदृशां भयम् ॥ ३७ ॥
भिन्नदृशां ईश्वरापेक्षयाऽल्पदृशाम् ।
'भिन्नमल्पं विजानीयादभिन्नं पूर्णमिष्यते। इति शब्दनिर्णये ॥३७॥
न चास्य कश्चिद् दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः ।आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रिंशोऽध्यायः ॥
'यथायोग्यातिरेकेण न द्वेष्यश्च प््रिायो हरेः इति कापिलेये ॥३९॥