Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S23: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ | ||
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पर्यासे मानुषत्वेनावस्थानेऽपि ॥ ३७ ॥ | पर्यासे मानुषत्वेनावस्थानेऽपि ॥ ३७ ॥ | ||
Revision as of 09:00, 10 April 2026
कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याःपुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः ।
स्वया कान्त्याऽन्याः क्षिपन्ती श्रीर्यथा तद्वत् स्थिताम् ॥ १६ ॥
बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता ।न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्याङ्गं विधुन्वतः ॥ २९ ॥
कुशकाशास्त एवासंल्लसद्धरितवर्चसः ।ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे ॥ ३० ॥
'ज्ञानानन्दस्वरूपेभ्यो रोमभ्योऽस्य कुशादयः ।
विधुन्वतः प्रयागे तु वराहवपुषोऽभवन् । रोमाणि तानि देवस्य रूपाण्यासन्सहस्रशः॥ इति स्कान्दे ।
त एवासन् तेभ्य एवासन् । 'सप्तसु प्रथमाइति सूत्रात् ॥ २९-३० ॥अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः ।शृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः ॥ ३५ ॥
'गतसारं यातयामं यामः सार इहोच्यतेइति नारदीये ॥ ३५ ॥
शारीरा मानसा दिव्याः पर्यासे ये च मानुषाः ।भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥ ३७ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥
पर्यासे मानुषत्वेनावस्थानेऽपि ॥ ३७ ॥