Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S1: Difference between revisions
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यदा ददाह । यदा केशाभिमर्शः प्राप्त इति यदाशब्दो हेत्वर्थः । 'यदा तदेति हेत्वर्थे कालार्थे चापि भण्यते''। इत्यभिधानम् ॥ ६,७ ॥ | यदा ददाह । यदा केशाभिमर्शः प्राप्त इति यदाशब्दो हेत्वर्थः । 'यदा तदेति हेत्वर्थे कालार्थे चापि भण्यते''। इत्यभिधानम् ॥ ६,७ ॥ | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥ | ||
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'न देहयोगो हि जनिर्विष्णोर्व्यक्तिर्जनिः स्मृता''इत्याग्नेये । | 'न देहयोगो हि जनिर्विष्णोर्व्यक्तिर्जनिः स्मृता''इत्याग्नेये । | ||
Revision as of 09:00, 10 April 2026
श्रीशुक उवाच–एवमेतत् पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल ।
यदा त्वयं मन्त्रकृद् वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रपुरं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २ ॥
'युद्धकाले तु विदुरस्तीर्थयात्रां गतोऽपि सन् ।
प्राय आस्ते गजपुरे पाण्डवानां व्यपेक्षया॥
इति स्कान्दे ॥ १,२ ॥श्रीशुक उवाच–यदा तु राजा स्वसुतानसाधून्
यदा सभायां कुरुदेवदेव्याःकेशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् ।
यदा ददाह । यदा केशाभिमर्शः प्राप्त इति यदाशब्दो हेत्वर्थः । 'यदा तदेति हेत्वर्थे कालार्थे चापि भण्यते। इत्यभिधानम् ॥ ६,७ ॥
इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षंकालेन यावद् गतवान् प्रभासम् ।
तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिंवनं यथा वेणुजवह्निनाऽऽश्रयम् ।
सुहृद्विनष्टिं यदुकुलविनष्टिमेष्याम् ।
'विदुरस्तु प्रभासस्थः शापं सङ्क्षेपतोऽशृृणोत् । यदूनां विस्तरात्पश्चादुद्धवाद्यमुनामनु॥ इति स्कान्दे ।
भारतविरोधाच्चान्यथा ॥ २०,२१ ॥अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैःकृतानि नानायतनानि विष्णोः ।
प्रत्यङ्कमुख्यो विष्णुः ।
'ब्रह्मा प्रत्यङ्कवान् विष्णुः सम्यग्लक्षणवत्तमःइति तन्त्रमालायाम् ॥२३॥
कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-पद्मानुवृत्त्येह कलावतीर्णौ ।
'पद्मो ब्रह्मा समुद्दिष्टः पद्मा श्रीरपि चोच्यतेइति ब्राह्मे ।
'लोकानां सुखकर्तृत्वमपेक्ष्य कुशलं विभोः ।
पृच्छ्यते सततानन्दात्कथं तस्यैव पृच्छ्यते। इति पाद्मे ॥ २६ ॥कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नोभामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः ।
वरतर्पणेन भर्तृतर्पणेन ॥ २७ ॥
कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज-दाशार्हकाणामधिपः सः आस्ते ।
'आधिर्मनोवरूथं च आत्मा स्वमिति चोच्यतेइत्यभिधानम् ॥ २९ ॥
किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षीभीमोऽहिवद् दीर्घतमं व्यमुञ्चत् ।
अघं व्यमुञ्चत् । पुनरपराधबुद्धिं हित्वाऽऽस्ते ॥ ३७ ॥
अजस्य जन्मोत्पथनाशनायकर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥
'न देहयोगो हि जनिर्विष्णोर्व्यक्तिर्जनिः स्मृताइत्याग्नेये ।
'हरिः कर्ताऽप्यकर्तेति फलाभावेन भण्यतेइति च ॥ ४४ ॥