Brahmasutra/C4/S1: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 20: | Line 20: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V01 | | verse_id = BS_C04_S01_V01 | ||
| id = BS_C04_S01_V01_B1 | | id = BS_C04_S01_V01_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः’ इत्यादीनां नाग्निष्टोमादिवदेकवारेणैव फलप्राप्तिः। किन्त्वावृत्तिः कर्तव्या । | ‘आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः’ इत्यादीनां नाग्निष्टोमादिवदेकवारेणैव फलप्राप्तिः। किन्त्वावृत्तिः कर्तव्या । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V01 | | verse_id = BS_C04_S01_V01 | ||
| id = BS_C04_S01_V01_B3 | | id = BS_C04_S01_V01_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वम्’ इत्याद्यसकृदुपदेशात् ॥ 01 ॥ | ‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वम्’ इत्याद्यसकृदुपदेशात् ॥ 01 ॥ | ||
| Line 45: | Line 43: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V02 | | verse_id = BS_C04_S01_V02 | ||
| id = BS_C04_S01_V02_author-note | | id = BS_C04_S01_V02_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति आवृत्यधिकरणम् ॥ 01 ॥ | ॥ इति आवृत्यधिकरणम् ॥ 01 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V02 | | verse_id = BS_C04_S01_V02 | ||
| id = BS_C04_S01_V02_B1 | | id = BS_C04_S01_V02_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘स तपोऽतप्यत……. पुनरेव वरुणं पितरमुपससार’ इत्याद्यावर्तनलिङ्गाच्च । | ‘स तपोऽतप्यत……. पुनरेव वरुणं पितरमुपससार’ इत्याद्यावर्तनलिङ्गाच्च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V02 | | verse_id = BS_C04_S01_V02 | ||
| id = BS_C04_S01_V02_B3 | | id = BS_C04_S01_V02_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘नित्यशः श्रवणं चैव मननं ध्यानमेव च ।कर्तव्यमेव पुरुषैर्ब्रह्मदर्शनमिच्छुभिः’इत् बृहत्तन्त्रे ॥ 02 ॥ | ‘नित्यशः श्रवणं चैव मननं ध्यानमेव च ।कर्तव्यमेव पुरुषैर्ब्रह्मदर्शनमिच्छुभिः’इत् बृहत्तन्त्रे ॥ 02 ॥ | ||
| Line 80: | Line 75: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V03 | | verse_id = BS_C04_S01_V03 | ||
| id = BS_C04_S01_V03_author-note | | id = BS_C04_S01_V03_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति आत्मोपगमाधिकरणम् ॥ 02 ॥ | ॥ इति आत्मोपगमाधिकरणम् ॥ 02 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V03 | | verse_id = BS_C04_S01_V03 | ||
| id = BS_C04_S01_V03_B1 | | id = BS_C04_S01_V03_B1 | ||
| text = | | text = | ||
आत्येत्युपदेश उपासनं च मोक्षार्थिभिः सर्वथा कार्यमेव ।‘नान्यं विचिन्तय आत्मानमेवाहं विजानीयामात्मनमुपास आत्मा हि ममैष भवति’ इति ह्युपगच्छन्ति । ‘आत्मेत्येवोपास्स्व आत्मेत्येव विजानीहि नान्यं किञ्चन विजानथ आत्मा ह्येवैष भवति’इति ग्राहयन्ति च । | आत्येत्युपदेश उपासनं च मोक्षार्थिभिः सर्वथा कार्यमेव ।‘नान्यं विचिन्तय आत्मानमेवाहं विजानीयामात्मनमुपास आत्मा हि ममैष भवति’ इति ह्युपगच्छन्ति । ‘आत्मेत्येवोपास्स्व आत्मेत्येव विजानीहि नान्यं किञ्चन विजानथ आत्मा ह्येवैष भवति’इति ग्राहयन्ति च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V03 | | verse_id = BS_C04_S01_V03 | ||
| id = BS_C04_S01_V03_B2 | | id = BS_C04_S01_V03_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्मेत्युपासनम् कार्यं सर्वथैव मुमुक्षुभिः ।नानाक्लेशसमायुक्तोऽप्येतावन्नैव विस्मरेत्’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ | ‘आत्मेत्युपासनम् कार्यं सर्वथैव मुमुक्षुभिः ।नानाक्लेशसमायुक्तोऽप्येतावन्नैव विस्मरेत्’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V03 | | verse_id = BS_C04_S01_V03 | ||
| id = BS_C04_S01_V03_B4 | | id = BS_C04_S01_V03_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘आत्मा विष्णुरिति ध्यानं विशेषणविशेष्यतः ।सर्वेषां च मुमुक्षूणामुपदेशश्च तादृशः ॥कर्तव्यो नास्य हानेन कस्यचिन्मोक्ष इष्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 03 ॥ | ‘आत्मा विष्णुरिति ध्यानं विशेषणविशेष्यतः ।सर्वेषां च मुमुक्षूणामुपदेशश्च तादृशः ॥कर्तव्यो नास्य हानेन कस्यचिन्मोक्ष इष्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 03 ॥ | ||
| Line 123: | Line 114: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V04 | | verse_id = BS_C04_S01_V04 | ||
| id = BS_C04_S01_V04_author-note | | id = BS_C04_S01_V04_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति नप्रतीकाधिकरणम् ॥ 03 ॥ | ॥ इति नप्रतीकाधिकरणम् ॥ 03 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V04 | | verse_id = BS_C04_S01_V04 | ||
| id = BS_C04_S01_V04_B1 | | id = BS_C04_S01_V04_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘नाम ब्रह्मेत्युपास्ते’ इत्यादिना शब्दभ्रान्त्या न प्रतीके ब्रह्मदृष्टिः कार्या । किन्तु तत्स्थत्वेनैवोपासनं कार्यम् । | ‘नाम ब्रह्मेत्युपास्ते’ इत्यादिना शब्दभ्रान्त्या न प्रतीके ब्रह्मदृष्टिः कार्या । किन्तु तत्स्थत्वेनैवोपासनं कार्यम् । | ||
| Line 140: | Line 129: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V04 | | verse_id = BS_C04_S01_V04 | ||
| id = BS_C04_S01_V04_B2 | | id = BS_C04_S01_V04_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘नामादिप्राणपर्यन्तमुभयोः प्रथमात्वतः । | ‘नामादिप्राणपर्यन्तमुभयोः प्रथमात्वतः । | ||
| Line 149: | Line 137: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V04 | | verse_id = BS_C04_S01_V04 | ||
| id = BS_C04_S01_V04_B4 | | id = BS_C04_S01_V04_B4 | ||
| text = | | text = | ||
नामादिस्थितिरेवात्र ब्रह्मणो हि विधीयते । | नामादिस्थितिरेवात्र ब्रह्मणो हि विधीयते । | ||
| Line 169: | Line 156: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V05 | | verse_id = BS_C04_S01_V05 | ||
| id = BS_C04_S01_V05_author-note | | id = BS_C04_S01_V05_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति ब्रह्मदृष्ट्यधिकरणम् ॥ 04 ॥ | ॥ इति ब्रह्मदृष्ट्यधिकरणम् ॥ 04 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V05 | | verse_id = BS_C04_S01_V05 | ||
| id = BS_C04_S01_V05_B1 | | id = BS_C04_S01_V05_B1 | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मदृष्टिश्च सर्वथा कार्यैव परमेश्वरे । उत्कृष्टत्वात् । | ब्रह्मदृष्टिश्च सर्वथा कार्यैव परमेश्वरे । उत्कृष्टत्वात् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V05 | | verse_id = BS_C04_S01_V05 | ||
| id = BS_C04_S01_V05_B2 | | id = BS_C04_S01_V05_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘ब्रह्मदृष्ट्या सदोपास्यो विष्णुः सर्वैरपि ध्रुवम् । | ‘ब्रह्मदृष्ट्या सदोपास्यो विष्णुः सर्वैरपि ध्रुवम् । | ||
| Line 195: | Line 179: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V05 | | verse_id = BS_C04_S01_V05 | ||
| id = BS_C04_S01_V05_B5 | | id = BS_C04_S01_V05_B5 | ||
| text = | | text = | ||
आत्मेत्येव यदोपासा तदा ब्रह्मत्वसंयुता ।कार्यैव सर्वथा विष्णोर्ब्रह्मत्वं न परित्यजेत्’ इति ब्रह्मतर्के ॥ 05 ॥ | आत्मेत्येव यदोपासा तदा ब्रह्मत्वसंयुता ।कार्यैव सर्वथा विष्णोर्ब्रह्मत्वं न परित्यजेत्’ इति ब्रह्मतर्के ॥ 05 ॥ | ||
| Line 214: | Line 197: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V06 | | verse_id = BS_C04_S01_V06 | ||
| id = BS_C04_S01_V06_author-note | | id = BS_C04_S01_V06_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति आदित्यादिमत्यधिकरणम् ॥ 05 ॥ | ॥ इति आदित्यादिमत्यधिकरणम् ॥ 05 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V06 | | verse_id = BS_C04_S01_V06 | ||
| id = BS_C04_S01_V06_B1 | | id = BS_C04_S01_V06_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘चक्षोः सूर्यो अजायत’ इत्याद्युपासनं च देवानां कार्यमेव । स्वोत्पत्तिस्थानात् स्वाश्रयत्वान्मुक्तौ तत्र लयस्यापेक्षितत्वाच्चोपपन्नं तथोपासनम् । | ‘चक्षोः सूर्यो अजायत’ इत्याद्युपासनं च देवानां कार्यमेव । स्वोत्पत्तिस्थानात् स्वाश्रयत्वान्मुक्तौ तत्र लयस्यापेक्षितत्वाच्चोपपन्नं तथोपासनम् । | ||
| Line 231: | Line 212: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V06 | | verse_id = BS_C04_S01_V06 | ||
| id = BS_C04_S01_V06_B2 | | id = BS_C04_S01_V06_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘आधिव्याधिनिमित्तेन विक्षिप्तमनसोऽपि तु । | ‘आधिव्याधिनिमित्तेन विक्षिप्तमनसोऽपि तु । | ||
| Line 240: | Line 220: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V06 | | verse_id = BS_C04_S01_V06 | ||
| id = BS_C04_S01_V06_B4 | | id = BS_C04_S01_V06_B4 | ||
| text = | | text = | ||
स्मर्तव्यं सततं तत् तु न कदाचित् परित्यजेत् । | स्मर्तव्यं सततं तत् तु न कदाचित् परित्यजेत् । | ||
| Line 249: | Line 228: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V06 | | verse_id = BS_C04_S01_V06 | ||
| id = BS_C04_S01_V06_B6 | | id = BS_C04_S01_V06_B6 | ||
| text = | | text = | ||
स्वोत्पत्त्यङ्गं च देवानां विष्णोश्चिन्त्यं सदैव तु । | स्वोत्पत्त्यङ्गं च देवानां विष्णोश्चिन्त्यं सदैव तु । | ||
| Line 270: | Line 248: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V07 | | verse_id = BS_C04_S01_V07 | ||
| id = BS_C04_S01_V07_B1 | | id = BS_C04_S01_V07_B1 | ||
| text = | | text = | ||
सर्वदोपासनं कुर्वन्नप्यासीनो विशेषतः कुर्यात् । तदा विक्षेपाल्पत्वेन सम्भवात् ॥ 07 ॥ | सर्वदोपासनं कुर्वन्नप्यासीनो विशेषतः कुर्यात् । तदा विक्षेपाल्पत्वेन सम्भवात् ॥ 07 ॥ | ||
| Line 287: | Line 264: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V08 | | verse_id = BS_C04_S01_V08 | ||
| id = BS_C04_S01_V08_B1 | | id = BS_C04_S01_V08_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘स्मरणोपासनं चैव ध्यानात्मकमिति द्विधा । | ‘स्मरणोपासनं चैव ध्यानात्मकमिति द्विधा । | ||
| Line 296: | Line 272: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V08 | | verse_id = BS_C04_S01_V08 | ||
| id = BS_C04_S01_V07_B3 | | id = BS_C04_S01_V07_B3 | ||
| text = | | text = | ||
नैरन्तर्यं मनोवृत्तेर्ध्यानमित्युच्यते बुधैः । | नैरन्तर्यं मनोवृत्तेर्ध्यानमित्युच्यते बुधैः । | ||
| Line 305: | Line 280: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V08 | | verse_id = BS_C04_S01_V08 | ||
| id = BS_C04_S01_V07_B5 | | id = BS_C04_S01_V07_B5 | ||
| text = | | text = | ||
स्थितस्य गच्छतो वाऽपि विक्षेपस्यैव सम्भवात् ।स्मरणात् परमं ज्ञेयं ध्यानं नास्त्यत्र संशयः’इति च नारायणतन्त्रे। | स्थितस्य गच्छतो वाऽपि विक्षेपस्यैव सम्भवात् ।स्मरणात् परमं ज्ञेयं ध्यानं नास्त्यत्र संशयः’इति च नारायणतन्त्रे। | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V08 | | verse_id = BS_C04_S01_V08 | ||
| id = BS_C04_S01_V07_B7 | | id = BS_C04_S01_V07_B7 | ||
| text = | | text = | ||
अतो ध्यानत्वाच्च ॥ 08 ॥ | अतो ध्यानत्वाच्च ॥ 08 ॥ | ||
| Line 330: | Line 303: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V09 | | verse_id = BS_C04_S01_V09 | ||
| id = BS_C04_S01_V09_B1 | | id = BS_C04_S01_V09_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘अचलं चेच्छरीरं स्यान्मनसश्चाप्यचालनम्।चलने तु शरीरस्य चञ्चलं तु मनो भवेत्’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 09 ॥ | ‘अचलं चेच्छरीरं स्यान्मनसश्चाप्यचालनम्।चलने तु शरीरस्य चञ्चलं तु मनो भवेत्’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 09 ॥ | ||
| Line 347: | Line 319: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V10 | | verse_id = BS_C04_S01_V10 | ||
| id = BS_C04_S01_V10_B1 | | id = BS_C04_S01_V10_B1 | ||
| text = | | text = | ||
‘समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । | ‘समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । | ||
| Line 365: | Line 336: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V11 | | verse_id = BS_C04_S01_V11 | ||
| id = BS_C04_S01_V11_author-note | | id = BS_C04_S01_V11_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति आसनाधिकरणम् ॥ 06 ॥ | ॥ इति आसनाधिकरणम् ॥ 06 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V11 | | verse_id = BS_C04_S01_V11 | ||
| id = BS_C04_S01_V11_B1 | | id = BS_C04_S01_V11_B1 | ||
| text = | | text = | ||
देशकालावस्थादिषु यत्रैकाग्रता भवति तत्रैव स्थातव्यम् । | देशकालावस्थादिषु यत्रैकाग्रता भवति तत्रैव स्थातव्यम् । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V11 | | verse_id = BS_C04_S01_V11 | ||
| id = BS_C04_S01_V11_B2 | | id = BS_C04_S01_V11_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘तमेव देशं सेवेत तं कालं तामवस्थितिम् । | ‘तमेव देशं सेवेत तं कालं तामवस्थितिम् । | ||
| Line 390: | Line 358: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V11 | | verse_id = BS_C04_S01_V11 | ||
| id = BS_C04_S01_V11_B4 | | id = BS_C04_S01_V11_B4 | ||
| text = | | text = | ||
न हि देशादिभिः कश्चिद्विशेषः समुदीरितः ।मनप्रसाधनार्थं हि देशकालादिचिन्तना’ इति वाराहे ॥ 11 ॥ | न हि देशादिभिः कश्चिद्विशेषः समुदीरितः ।मनप्रसाधनार्थं हि देशकालादिचिन्तना’ इति वाराहे ॥ 11 ॥ | ||
| Line 409: | Line 376: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V12 | | verse_id = BS_C04_S01_V12 | ||
| id = BS_C04_S01_V12_author-note | | id = BS_C04_S01_V12_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति प्रायणाधिकरणम् ॥ 07 ॥ | ॥ इति प्रायणाधिकरणम् ॥ 07 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V12 | | verse_id = BS_C04_S01_V12 | ||
| id = BS_C04_S01_V12_B1 | | id = BS_C04_S01_V12_B1 | ||
| text = | | text = | ||
यावन्मोक्षस्तावदुपासनादि कार्यम् ॥ | यावन्मोक्षस्तावदुपासनादि कार्यम् ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V12 | | verse_id = BS_C04_S01_V12 | ||
| id = BS_C04_S01_V12_B2 | | id = BS_C04_S01_V12_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘स यो ह वैतद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत’ इति हि श्रुतिः ॥ | ‘स यो ह वैतद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत’ इति हि श्रुतिः ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V12 | | verse_id = BS_C04_S01_V12 | ||
| id = BS_C04_S01_V12_B4 | | id = BS_C04_S01_V12_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वदैनमुपासीत यावद्विमुक्तिर्मुक्ता अपि ह्येनमुपासते’ इति सौपर्णश्रुतिः ॥ | ‘सर्वदैनमुपासीत यावद्विमुक्तिर्मुक्ता अपि ह्येनमुपासते’ इति सौपर्णश्रुतिः ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V12 | | verse_id = BS_C04_S01_V12 | ||
| id = BS_C04_S01_V12_B6 | | id = BS_C04_S01_V12_B6 | ||
| text = | | text = | ||
‘श्रुणुयाद्यावदज्ञानं मतिर्यावदयुक्तता । | ‘श्रुणुयाद्यावदज्ञानं मतिर्यावदयुक्तता । | ||
| Line 450: | Line 412: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V12 | | verse_id = BS_C04_S01_V12 | ||
| id = BS_C04_S01_V12_B8 | | id = BS_C04_S01_V12_B8 | ||
| text = | | text = | ||
दृष्टतत्त्वस्य च ध्यानं यदा दृष्टिर्न विद्यते।भक्तिश्चानन्तकालीना परमे ब्रह्मणि स्फुटा ।आ विमुक्तेर्विधिर्नित्यं स्वत एव ततः परम्’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 12 ॥ | दृष्टतत्त्वस्य च ध्यानं यदा दृष्टिर्न विद्यते।भक्तिश्चानन्तकालीना परमे ब्रह्मणि स्फुटा ।आ विमुक्तेर्विधिर्नित्यं स्वत एव ततः परम्’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 12 ॥ | ||
| Line 469: | Line 430: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V13 | | verse_id = BS_C04_S01_V13 | ||
| id = BS_C04_S01_V13_B1 | | id = BS_C04_S01_V13_B1 | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मदर्शन उत्तराघस्याश्लेषः पूर्वस्य विनाशश्च । | ब्रह्मदर्शन उत्तराघस्याश्लेषः पूर्वस्य विनाशश्च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V13 | | verse_id = BS_C04_S01_V13 | ||
| id = BS_C04_S01_V13_B2 | | id = BS_C04_S01_V13_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘तद्यथा पुष्करफलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते’।‘तद्यथैषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हैवास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते’ इति तद्व्यपदेशात् ॥ 13 ॥ | ‘तद्यथा पुष्करफलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते’।‘तद्यथैषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हैवास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते’ इति तद्व्यपदेशात् ॥ 13 ॥ | ||
| Line 494: | Line 453: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V14 | | verse_id = BS_C04_S01_V14 | ||
| id = BS_C04_S01_V14_B1 | | id = BS_C04_S01_V14_B1 | ||
| text = | | text = | ||
पुण्यस्याप्येवमसंश्लेषः पाते। तुशब्दोऽनुत्थानवाची । | पुण्यस्याप्येवमसंश्लेषः पाते। तुशब्दोऽनुत्थानवाची । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V14 | | verse_id = BS_C04_S01_V14 | ||
| id = BS_C04_S01_V14_B2 | | id = BS_C04_S01_V14_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘यथाऽश्लेषो विनाशश्च मुक्तस्य तु विकर्मणः ।एवं सुकर्मणश्चापि पततस्तमसि ध्रुवम्’ इति चाग्नेये ॥ 14 ॥ | ‘यथाऽश्लेषो विनाशश्च मुक्तस्य तु विकर्मणः ।एवं सुकर्मणश्चापि पततस्तमसि ध्रुवम्’ इति चाग्नेये ॥ 14 ॥ | ||
| Line 519: | Line 476: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V15 | | verse_id = BS_C04_S01_V15 | ||
| id = BS_C04_S01_V15_B1 | | id = BS_C04_S01_V15_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अनारब्धकार्ये एव पूर्वे पुण्यपापे विनश्यतः । ‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽत सम्पत्स्यते’ इति तदवधेः । तुशब्दः स्मृतिद्योतकः । | अनारब्धकार्ये एव पूर्वे पुण्यपापे विनश्यतः । ‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽत सम्पत्स्यते’ इति तदवधेः । तुशब्दः स्मृतिद्योतकः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V15 | | verse_id = BS_C04_S01_V15 | ||
| id = BS_C04_S01_V15_B4 | | id = BS_C04_S01_V15_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘यदनारब्दपापं स्यात् तद्विनश्यति निश्चयात् । | ‘यदनारब्दपापं स्यात् तद्विनश्यति निश्चयात् । | ||
| Line 536: | Line 491: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V15 | | verse_id = BS_C04_S01_V15 | ||
| id = BS_C04_S01_V15_B6 | | id = BS_C04_S01_V15_B6 | ||
| text = | | text = | ||
‘द्विषतो वा भवेत् पुण्यनाशो नास्त्यत्र संशयः ।तस्याप्यारब्दकार्यस्य न विनाशोऽस्ति कुत्रचित् ॥आरब्धयोश्च नाशः स्यादल्पयोः पुण्यपापयोः’इति च नारायणतन्त्रे ॥ 15 ॥ | ‘द्विषतो वा भवेत् पुण्यनाशो नास्त्यत्र संशयः ।तस्याप्यारब्दकार्यस्य न विनाशोऽस्ति कुत्रचित् ॥आरब्धयोश्च नाशः स्यादल्पयोः पुण्यपापयोः’इति च नारायणतन्त्रे ॥ 15 ॥ | ||
| Line 553: | Line 507: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V16 | | verse_id = BS_C04_S01_V16 | ||
| id = BS_C04_S01_V16_B1 | | id = BS_C04_S01_V16_B1 | ||
| text = | | text = | ||
अग्निहोत्राद्यपि तु मोक्षेऽनुभावायैव । तुशब्दाद्ब्रह्मदर्शनवतः । | अग्निहोत्राद्यपि तु मोक्षेऽनुभावायैव । तुशब्दाद्ब्रह्मदर्शनवतः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V16 | | verse_id = BS_C04_S01_V16 | ||
| id = BS_C04_S01_V16_B2 | | id = BS_C04_S01_V16_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतम् यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्दास्यान्ततः क्षीयत । एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत् तत्सृजते’ इति तद्दर्शनात् ॥ 16 ॥ | ‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतम् यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्दास्यान्ततः क्षीयत । एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत् तत्सृजते’ इति तद्दर्शनात् ॥ 16 ॥ | ||
| Line 578: | Line 530: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V17 | | verse_id = BS_C04_S01_V17 | ||
| id = BS_C04_S01_V17_B1 | | id = BS_C04_S01_V17_B1 | ||
| text = | | text = | ||
मुक्तावनुभवकारणाद्यदन्यत् तत् पुण्यमपि विनश्यति, अप्रारब्दमनभीष्टं च तथा ह्येकेषां पाठ उभयोस्त्यागेन | मुक्तावनुभवकारणाद्यदन्यत् तत् पुण्यमपि विनश्यति, अप्रारब्दमनभीष्टं च तथा ह्येकेषां पाठ उभयोस्त्यागेन | ||
| Line 587: | Line 538: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V17 | | verse_id = BS_C04_S01_V17 | ||
| id = BS_C04_S01_V17_B3 | | id = BS_C04_S01_V17_B3 | ||
| text = | | text = | ||
‘अनभीष्टमनारब्दं पुण्यमप्यस्य नश्यति ।किमु पापं परब्रह्मज्ञानिनो नास्ति संशयः’ इति पाद्मे ॥ 17 ॥ | ‘अनभीष्टमनारब्दं पुण्यमप्यस्य नश्यति ।किमु पापं परब्रह्मज्ञानिनो नास्ति संशयः’ इति पाद्मे ॥ 17 ॥ | ||
| Line 604: | Line 554: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V18 | | verse_id = BS_C04_S01_V18 | ||
| id = BS_C04_S01_V18_B1 | | id = BS_C04_S01_V18_B1 | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मदर्शिकृतमल्पमपि पुण्यं महत्तममनन्तम् च भवति । | ब्रह्मदर्शिकृतमल्पमपि पुण्यं महत्तममनन्तम् च भवति । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V18 | | verse_id = BS_C04_S01_V18 | ||
| id = BS_C04_S01_V18_B2 | | id = BS_C04_S01_V18_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘न हास्य कर्म क्षीयते’ इति च । | ‘न हास्य कर्म क्षीयते’ इति च । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V18 | | verse_id = BS_C04_S01_V18 | ||
| id = BS_C04_S01_V18_B4 | | id = BS_C04_S01_V18_B4 | ||
| text = | | text = | ||
‘अल्पमात्रकृतो धर्मो भवेद् ज्ञानवतो महान् ।महानपि कृतो धर्मो ह्यज्ञानं निष्फलो भवेत्’इति च भारते ॥ 18 ॥ | ‘अल्पमात्रकृतो धर्मो भवेद् ज्ञानवतो महान् ।महानपि कृतो धर्मो ह्यज्ञानं निष्फलो भवेत्’इति च भारते ॥ 18 ॥ | ||
| Line 637: | Line 584: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V19 | | verse_id = BS_C04_S01_V19 | ||
| id = BS_C04_S01_V19_author-note | | id = BS_C04_S01_V19_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति तदधिगमाधिकरणम् ॥ 08 ॥ | ॥ इति तदधिगमाधिकरणम् ॥ 08 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V19 | | verse_id = BS_C04_S01_V19 | ||
| id = BS_C04_S01_V19_author-note | | id = BS_C04_S01_V19_author-note | ||
| text = | | text = | ||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 04-01 ॥ | ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 04-01 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V19 | | verse_id = BS_C04_S01_V19 | ||
| id = BS_C04_S01_V19_B1 | | id = BS_C04_S01_V19_B1 | ||
| text = | | text = | ||
आरब्दपुण्यपापे भोगेन क्षपयित्वा ब्रह्म सम्पत्स्यते । अथेति नियमसूचकः । | आरब्दपुण्यपापे भोगेन क्षपयित्वा ब्रह्म सम्पत्स्यते । अथेति नियमसूचकः । | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V19 | | verse_id = BS_C04_S01_V19 | ||
| id = BS_C04_S01_V19_B2 | | id = BS_C04_S01_V19_B2 | ||
| text = | | text = | ||
‘आरब्धपुण्यपापस्य भोगेन क्षपणादनु । | ‘आरब्धपुण्यपापस्य भोगेन क्षपणादनु । | ||
| Line 670: | Line 613: | ||
}} | }} | ||
{{ | {{Bhashyam | ||
| verse_id = BS_C04_S01_V19 | | verse_id = BS_C04_S01_V19 | ||
| id = BS_C04_S01_V19_B4 | | id = BS_C04_S01_V19_B4 | ||
| text = | | text = | ||
ब्रह्मणां शतकालात् तु पूर्वमारब्दसङ्क्षयः ।नियमेन भवेन्नात्र कार्या काचिद्विचारणा’ इति च नारायणतन्त्रे ॥ 19 ॥ | ब्रह्मणां शतकालात् तु पूर्वमारब्दसङ्क्षयः ।नियमेन भवेन्नात्र कार्या काचिद्विचारणा’ इति च नारायणतन्त्रे ॥ 19 ॥ | ||
Revision as of 08:59, 10 April 2026
फलं निगद्यतेऽस्मिन्नध्याये । कर्मनाशाख्यं फलमस्मिन् पादे ।
नित्यशः कार्यं सर्वथा भाव्यं साधनं प्रथमथ उच्यते ।
प्रायिकत्वाच्छाध्यायानां पादानां च न विरोधः ।
आवृत्यधिकरणम्
ॐ आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॐ ॥ 01-485 ॥
‘आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः’ इत्यादीनां नाग्निष्टोमादिवदेकवारेणैव फलप्राप्तिः। किन्त्वावृत्तिः कर्तव्या ।
‘स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वम्’ इत्याद्यसकृदुपदेशात् ॥ 01 ॥
ॐ लिङ्गाच्च ॐ ॥ 02-486 ॥
॥ इति आवृत्यधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘स तपोऽतप्यत……. पुनरेव वरुणं पितरमुपससार’ इत्याद्यावर्तनलिङ्गाच्च ।
‘नित्यशः श्रवणं चैव मननं ध्यानमेव च ।कर्तव्यमेव पुरुषैर्ब्रह्मदर्शनमिच्छुभिः’इत् बृहत्तन्त्रे ॥ 02 ॥
आत्मोपगमाधिकरणम्
ॐ आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॐ ॥ 03-487 ॥
॥ इति आत्मोपगमाधिकरणम् ॥ 02 ॥
आत्येत्युपदेश उपासनं च मोक्षार्थिभिः सर्वथा कार्यमेव ।‘नान्यं विचिन्तय आत्मानमेवाहं विजानीयामात्मनमुपास आत्मा हि ममैष भवति’ इति ह्युपगच्छन्ति । ‘आत्मेत्येवोपास्स्व आत्मेत्येव विजानीहि नान्यं किञ्चन विजानथ आत्मा ह्येवैष भवति’इति ग्राहयन्ति च ।
‘आत्मेत्युपासनम् कार्यं सर्वथैव मुमुक्षुभिः ।नानाक्लेशसमायुक्तोऽप्येतावन्नैव विस्मरेत्’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥
‘आत्मा विष्णुरिति ध्यानं विशेषणविशेष्यतः ।सर्वेषां च मुमुक्षूणामुपदेशश्च तादृशः ॥कर्तव्यो नास्य हानेन कस्यचिन्मोक्ष इष्यते’ इति ब्राह्मे ॥ 03 ॥
नप्रतीकाधिकरणम्
ॐ न प्रतीके न हि सः ॐ ॥ 04-488 ॥
॥ इति नप्रतीकाधिकरणम् ॥ 03 ॥
‘नाम ब्रह्मेत्युपास्ते’ इत्यादिना शब्दभ्रान्त्या न प्रतीके ब्रह्मदृष्टिः कार्या । किन्तु तत्स्थत्वेनैवोपासनं कार्यम् ।
ब्रह्मतर्के च –
‘नामादिप्राणपर्यन्तमुभयोः प्रथमात्वतः ।
ऐक्यदृष्टिरिति भ्रान्तिरबुधानां भविष्यति ॥
नामादिस्थितिरेवात्र ब्रह्मणो हि विधीयते ।
सर्वार्था प्रथमा यस्मात् सप्तम्यर्था ततो माता’ इति ॥ 04 ॥
ब्रह्मदृष्ट्यधिकरणम्
ॐ ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ॐ ॥ 05-489 ॥
॥ इति ब्रह्मदृष्ट्यधिकरणम् ॥ 04 ॥
ब्रह्मदृष्टिश्च सर्वथा कार्यैव परमेश्वरे । उत्कृष्टत्वात् ।
‘ब्रह्मदृष्ट्या सदोपास्यो विष्णुः सर्वैरपि ध्रुवम् ।
महत्त्ववाची शब्दोऽयं महत्त्वज्ञानमेव हि ।
सर्वतः प्रीतिजनकमतस्तत् सर्वता भवेत् ॥आत्मेत्येव यदोपासा तदा ब्रह्मत्वसंयुता ।कार्यैव सर्वथा विष्णोर्ब्रह्मत्वं न परित्यजेत्’ इति ब्रह्मतर्के ॥ 05 ॥
आदित्यादिमत्यधिकरणम्
ॐ आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ॐ ॥ 06-490 ॥
॥ इति आदित्यादिमत्यधिकरणम् ॥ 05 ॥
‘चक्षोः सूर्यो अजायत’ इत्याद्युपासनं च देवानां कार्यमेव । स्वोत्पत्तिस्थानात् स्वाश्रयत्वान्मुक्तौ तत्र लयस्यापेक्षितत्वाच्चोपपन्नं तथोपासनम् ।
नारायणतन्त्रे च –
‘आधिव्याधिनिमित्तेन विक्षिप्तमनसोऽपि तु ।
गुणानां स्मरणाशक्तौ विष्णोर्ब्रह्मत्वमेव तु ॥
स्मर्तव्यं सततं तत् तु न कदाचित् परित्यजेत् ।
अत्र सर्वगुणानां च यतोऽन्तर्भाव इष्यते ॥
स्वोत्पत्त्यङ्गं च देवानां विष्णोश्चिन्त्यं सदैव तु ।
तेषां तत्र प्रवेशो हि मुक्तिरित्युच्यते बुधैः ॥
तदाश्रिताश्च ते नित्यं ततश्चिन्त्यं विशेषतः’ इति ॥ 06 ॥आसनाधिकरणम्
ॐ आसीनः सम्भवात् ॐ ॥ 07-491 ॥
सर्वदोपासनं कुर्वन्नप्यासीनो विशेषतः कुर्यात् । तदा विक्षेपाल्पत्वेन सम्भवात् ॥ 07 ॥
ॐ ध्यानाच्च ॐ ॥ 08-492 ॥
‘स्मरणोपासनं चैव ध्यानात्मकमिति द्विधा ।
स्मरणं सर्वदा योग्यं ध्यानोपासनमानसे॥
नैरन्तर्यं मनोवृत्तेर्ध्यानमित्युच्यते बुधैः ।
आसीनस्य भवेत् तत् तु न शयानस्य निद्रया ॥
स्थितस्य गच्छतो वाऽपि विक्षेपस्यैव सम्भवात् ।स्मरणात् परमं ज्ञेयं ध्यानं नास्त्यत्र संशयः’इति च नारायणतन्त्रे।
अतो ध्यानत्वाच्च ॥ 08 ॥
ॐ अचलत्वं चापेक्ष्य ॐ ॥ 09-493 ॥
‘अचलं चेच्छरीरं स्यान्मनसश्चाप्यचालनम्।चलने तु शरीरस्य चञ्चलं तु मनो भवेत्’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 09 ॥
ॐ स्मरन्ति च ॐ ॥ 10-494 ॥
‘समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्’ इत्यादि ॥ 10 ॥
ॐ यत्रैकाग्रता तत्रा विशेषात् ॐ ॥ 11-495 ॥
॥ इति आसनाधिकरणम् ॥ 06 ॥
देशकालावस्थादिषु यत्रैकाग्रता भवति तत्रैव स्थातव्यम् ।
‘तमेव देशं सेवेत तं कालं तामवस्थितिम् ।
तानेव भोगान् सेवेत मनो यत्र प्रसीदति ॥
न हि देशादिभिः कश्चिद्विशेषः समुदीरितः ।मनप्रसाधनार्थं हि देशकालादिचिन्तना’ इति वाराहे ॥ 11 ॥
प्रायणाधिकरणम्
ॐ आ प्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम् ॐ ॥ 12-496 ॥
॥ इति प्रायणाधिकरणम् ॥ 07 ॥
यावन्मोक्षस्तावदुपासनादि कार्यम् ॥
‘स यो ह वैतद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत’ इति हि श्रुतिः ॥
‘सर्वदैनमुपासीत यावद्विमुक्तिर्मुक्ता अपि ह्येनमुपासते’ इति सौपर्णश्रुतिः ॥
‘श्रुणुयाद्यावदज्ञानं मतिर्यावदयुक्तता ।
ध्यानं च यावदीक्षा स्यान्नेक्षा क्वचन बाध्यते ॥
दृष्टतत्त्वस्य च ध्यानं यदा दृष्टिर्न विद्यते।भक्तिश्चानन्तकालीना परमे ब्रह्मणि स्फुटा ।आ विमुक्तेर्विधिर्नित्यं स्वत एव ततः परम्’ इति ब्रह्माण्डे ॥ 12 ॥
तदधिगमाधिकरणम्
ॐ तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात् ॐ ॥13-497 ॥
ब्रह्मदर्शन उत्तराघस्याश्लेषः पूर्वस्य विनाशश्च ।
‘तद्यथा पुष्करफलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते’।‘तद्यथैषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हैवास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते’ इति तद्व्यपदेशात् ॥ 13 ॥
ॐ इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु ॐ ॥ 14-498 ॥
पुण्यस्याप्येवमसंश्लेषः पाते। तुशब्दोऽनुत्थानवाची ।
‘यथाऽश्लेषो विनाशश्च मुक्तस्य तु विकर्मणः ।एवं सुकर्मणश्चापि पततस्तमसि ध्रुवम्’ इति चाग्नेये ॥ 14 ॥
ॐ अनारब्दकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ॐ ॥ 15-499 ॥
अनारब्धकार्ये एव पूर्वे पुण्यपापे विनश्यतः । ‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽत सम्पत्स्यते’ इति तदवधेः । तुशब्दः स्मृतिद्योतकः ।
‘यदनारब्दपापं स्यात् तद्विनश्यति निश्चयात् ।
पश्यतो ब्रह्म निर्द्वन्द्वं हीनं च ब्रह्म पश्यतः ॥
‘द्विषतो वा भवेत् पुण्यनाशो नास्त्यत्र संशयः ।तस्याप्यारब्दकार्यस्य न विनाशोऽस्ति कुत्रचित् ॥आरब्धयोश्च नाशः स्यादल्पयोः पुण्यपापयोः’इति च नारायणतन्त्रे ॥ 15 ॥
ॐ अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ॐ ॥ 16-500 ॥
अग्निहोत्राद्यपि तु मोक्षेऽनुभावायैव । तुशब्दाद्ब्रह्मदर्शनवतः ।
‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतम् यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्दास्यान्ततः क्षीयत । एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत् तत्सृजते’ इति तद्दर्शनात् ॥ 16 ॥
ॐ अतोऽन्यदपीत्येकेषामुभयोः ॐ ॥ 17-501 ॥
मुक्तावनुभवकारणाद्यदन्यत् तत् पुण्यमपि विनश्यति, अप्रारब्दमनभीष्टं च तथा ह्येकेषां पाठ उभयोस्त्यागेन
‘तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम्’ इति ।
‘अनभीष्टमनारब्दं पुण्यमप्यस्य नश्यति ।किमु पापं परब्रह्मज्ञानिनो नास्ति संशयः’ इति पाद्मे ॥ 17 ॥
ॐ यदेव विद्ययेति हि ॐ ॥ 18-502 ॥
ब्रह्मदर्शिकृतमल्पमपि पुण्यं महत्तममनन्तम् च भवति ।
‘न हास्य कर्म क्षीयते’ इति च ।
‘अल्पमात्रकृतो धर्मो भवेद् ज्ञानवतो महान् ।महानपि कृतो धर्मो ह्यज्ञानं निष्फलो भवेत्’इति च भारते ॥ 18 ॥
ॐ भोगेन त्वितरे क्षपयित्वाऽथ सम्पत्स्यते ॐ ॥ 19-503 ॥
॥ इति तदधिगमाधिकरणम् ॥ 08 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 04-01 ॥
आरब्दपुण्यपापे भोगेन क्षपयित्वा ब्रह्म सम्पत्स्यते । अथेति नियमसूचकः ।
‘आरब्धपुण्यपापस्य भोगेन क्षपणादनु ।
प्राप्नोत्येव तमो घोरं ब्रह्म वा नात्र संशयः ॥
ब्रह्मणां शतकालात् तु पूर्वमारब्दसङ्क्षयः ।नियमेन भवेन्नात्र कार्या काचिद्विचारणा’ इति च नारायणतन्त्रे ॥ 19 ॥