Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S27: Difference between revisions
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| title = सप्तविंशोऽध्यायः | | title = सप्तविंशोऽध्यायः | ||
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स परमो न जायते न म्रियत इति हि प्रसिद्धम् । देहाद्युपाधि-भिरात्तधर्मो जीवोऽपि स्वप्नवद्भ्रान्त्या जायते म्रियते च । भ्रान्तित्वाद्देहात्मत्वस्य । किमु सर्वज्ञत्वस्वतन्त्रत्वादिवैलक्षण्ययुक्त ईश्वरः ।'परस्य जन्ममृत्याद्याः स्युः स्वतन्त्रस्य किं पुनः | स परमो न जायते न म्रियत इति हि प्रसिद्धम् । देहाद्युपाधि-भिरात्तधर्मो जीवोऽपि स्वप्नवद्भ्रान्त्या जायते म्रियते च । भ्रान्तित्वाद्देहात्मत्वस्य । किमु सर्वज्ञत्वस्वतन्त्रत्वादिवैलक्षण्ययुक्त ईश्वरः । | ||
'परस्य जन्ममृत्याद्याः स्युः स्वतन्त्रस्य किं पुनः । | |||
जीवस्यापि यतो भ्रान्त्या जन्ममृत्यादिसङ्गतिः''॥ इति महाकौर्मे ॥ ४ ॥ | |||
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उपगतां समीपस्थाम् ॥ ५ ॥ | उपगतां समीपस्थाम् ॥ ५ ॥ | ||
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मुमुहे मोहयामास । 'तदेतन्मे विजानीहि''। 'कृत्वा विवाहम्''इत्यादिवत् ।'यत्र कारयिताऽतीव स्वतन्त्रस्तत्र कर्तृता | मुमुहे मोहयामास । 'तदेतन्मे विजानीहि''। 'कृत्वा विवाहम्''इत्यादिवत् । | ||
'यत्र कारयिताऽतीव स्वतन्त्रस्तत्र कर्तृता । | |||
प्रच्यते तु यथा ब्रह्म त्वज्ञं संसारभागिति''॥ इति च । | |||
'लये वाप्यथवा सृष्टौ त्वन्तरालेऽपि न क्वचित् । | |||
प्रकृत्या रहितं ब्रह्म कदाचिदपि तिष्ठति''॥ इति कापिलेये ॥ ६ ॥ | |||
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एवं पराभिध्यानेन परमात्मेच्छया । प्रकृतेः कर्तृत्वं जीव आत्मनि मन्यते ॥ ७ ॥ | एवं पराभिध्यानेन परमात्मेच्छया । प्रकृतेः कर्तृत्वं जीव आत्मनि मन्यते ॥ ७ ॥ | ||
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'विष्णोः सुराणां गुरूणां नित्या जीवस्य तन्त्रता | 'विष्णोः सुराणां गुरूणां नित्या जीवस्य तन्त्रता । | ||
यत्तु तस्यान्यतन्त्रत्वं तज्ज्ञानाद्विनिवर्तते''॥ इति च । | |||
अकर्तुरीशस्य सकाशात् । | |||
'अक्लिष्टत्वादकर्तासावकार्यत्वादथापि वा''। इति च । | |||
'एष कर्ता न क्रियते कारणं च जगत्प्रभुः''। इति भारते ॥ ८ ॥ | |||
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'ब्रह्मादिभिः सर्गकरी श्रीर्विष्णुबलसंश्रयात् | 'ब्रह्मादिभिः सर्गकरी श्रीर्विष्णुबलसंश्रयात् । | ||
सुखदुःखप्रदो विष्णुः स्वयमेव सनातनः ॥ | |||
कर्तृत्वं सुखदुःखानामन्येषां च तदाज्ञया । | |||
भोक्तृत्वं सुखदुःखानां करोत्येको हरिः स्वयम् । | |||
भोक्तृत्वमात्रहेतुत्वं जीवे नान्यत्र कुत्रचित्''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ | |||
'प्रकृतिं पुरुषं चैव विध्द्यनादी''इति च ॥ ९ ॥ | |||
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'व्यक्ताव्यक्तात्मकं यत्तद्विद्यात्सदसदात्मकम् | 'व्यक्ताव्यक्तात्मकं यत्तद्विद्यात्सदसदात्मकम् । | ||
असर्गा केवलाव्यक्ता सिसृक्षुरुभयात्मिका ॥ | |||
व्यक्तैव कार्यरूपा तु प्रकृतिस्त्रिविधा मता । | |||
कार्यतः सा प्रधानत्वात्प्रधानमिति कीर्त्यते । | |||
अविशेषा ह्यकार्यत्वात्सा च श्रीर्विष्णुसंश्रया''॥ इति हरिवंशेषु ॥ | |||
'विशेषः कार्यमुद्दिष्टं विशेषाद्दृश्यते यतः''इति पाद्मे ॥ ११ ॥ | |||
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'बुद्धिरध्यवसानाय संशयं कुरुते मनः | 'बुद्धिरध्यवसानाय संशयं कुरुते मनः । | ||
अभिमानो ह्यहङ्कारश्चित्तं स्मरणकारणम्''॥ इति स्कान्दे ॥ १५ ॥ | |||
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'हरिस्तु निर्गुणं ब्रह्म श्रीर्ब्रह्म सगुणं स्मृता | 'हरिस्तु निर्गुणं ब्रह्म श्रीर्ब्रह्म सगुणं स्मृता । | ||
तदङ्गजानि तत्त्वनि तमात्तद्रूपमुच्यते''॥ इति हरिवंशेषु ॥ १६ ॥ | |||
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'पुरुषो हृदिस्थः परमः कालः सर्वगतो हरिः | 'पुरुषो हृदिस्थः परमः कालः सर्वगतो हरिः । | ||
अथवा रुद्रदेहस्थो हरिः काल इतीरितः''॥ इति ब्राह्मे ॥ | |||
पौरुषं प्रभावम् । पुरुषस्य प्रकर्षेण भावं व्याप्तं रूपम् । एके सम्यग्ज्ञानिनः । अप्राकृताः ॥ १७ ॥ | |||
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'प्रकृतेः क्षोभकं रूपं दैवं नारायणात्मकम् | 'प्रकृतेः क्षोभकं रूपं दैवं नारायणात्मकम् । | ||
प्रकृतौ महतः स्रष्टा परमः पुरुषो मतः ॥ | |||
तदेव वासुदेवाख्यं महत्तत्त्वनियामकम् । | |||
सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सूक्ष्माहङ्कारयामकः ॥ | |||
स्थूलाहङ्कारनियमी विष्णुः प्रद्युमन्नामकः । | |||
अनिरुद्धो मनस्तत्त्वनियन्ता भगवान् हरिः ॥ | |||
महत्तत्त्वादिजीवास्तु ब्रह्मशेषाङ्गजास्तथा । | |||
सूक्ष्मस्थूलविभेदेन कामजश्चानिरुद्धकः''॥ इति कापिलेये ॥ २० ॥ | |||
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'ओ रमयते यस्मात्केशवो जगदङ्कुरः | 'ओ रमयते यस्मात्केशवो जगदङ्कुरः । | ||
महान्तं योऽसृजज्जीवमोहकं च तमोऽग्रसत्''॥ इति च ॥ २१ ॥ | |||
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यद्वासुदेवाख्यं भगवद्रूपं ततो महदात्मकं चित्तं जायते ।'सत्वशब्देन चोच्यन्ते पूर्णानन्दादयो गुणाः''॥ इति च ।'महत्तत्त्वगतो योऽसौ वासुदेवाभिधो हरिः | यद्वासुदेवाख्यं भगवद्रूपं ततो महदात्मकं चित्तं जायते । | ||
'सत्वशब्देन चोच्यन्ते पूर्णानन्दादयो गुणाः''॥ इति च । | |||
'महत्तत्त्वगतो योऽसौ वासुदेवाभिधो हरिः । | |||
स चित्तजनकः प्रोक्तः प्राणिनां च पृथक्पृथक्''॥ इति च ॥ २२ ॥ | |||
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चित्तस्य स्वच्छत्वादयः पृथग्गुणा उच्यन्ते स्वच्छत्वमित्यादि ।'स्तिमितोदकचित्तादेरविकारोऽल्पवत्क्रिया''। इति तत्त्वविवेके ।'वृत्तिः स्वभावो वृत्तं च स्थितिरित्यभिधीयते''। इति शब्दनिर्णये ।''वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तम्' इति स्वाभाविकं लक्षणमित्यर्थः ॥ २३ ॥ | चित्तस्य स्वच्छत्वादयः पृथग्गुणा उच्यन्ते स्वच्छत्वमित्यादि । | ||
'स्तिमितोदकचित्तादेरविकारोऽल्पवत्क्रिया''। इति तत्त्वविवेके । | |||
'वृत्तिः स्वभावो वृत्तं च स्थितिरित्यभिधीयते''। इति शब्दनिर्णये । | |||
''वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तम्' इति स्वाभाविकं लक्षणमित्यर्थः ॥ २३ ॥ | |||
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'ज्ञानप्रधानस्तु महानहङ्कारः क्रियाधिकः | 'ज्ञानप्रधानस्तु महानहङ्कारः क्रियाधिकः । | ||
इतरापेक्षया सोऽपि ज्ञानाधिक इतीरितः''॥ इति च ॥ २४ ॥ | |||
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'देवताधिकृतं यत्तदधिदैवमिति स्मृतम्''। इति च | 'देवताधिकृतं यत्तदधिदैवमिति स्मृतम्''। इति च । | ||
वैकारिकोऽधिदैवमित्यादि पञ्चम्यर्थे । | |||
'सप्तसु प्रथमा''तत्र स्वातन्त्र्यं यद्विवक्षितम् । इति शब्दनिर्णये ॥२६॥ | |||
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'मनोरूपेण कर्तृत्वं देहरूपेण कार्यता | 'मनोरूपेण कर्तृत्वं देहरूपेण कार्यता । | ||
इन्द्रियात्मतया चैव करणत्वमहङ्कृतेः ॥ | |||
यतो मनस्यहंभावस्तस्मात्कर्तृ मनः स्मृतम् । | |||
स्वभावकर्तुर्जीवस्य त्वासन्नोपाधि तद्यतः ॥ | |||
कर्मज्ञाने करणता यतः करणमिन्द्रियम् । | |||
कार्यं देहः समुद्दिष्ट उत्पाद्यत्वात्पुनःपुनः''॥ इति तत्त्वविवेके ॥ | |||
'शान्तरूपो देवपिता घोरः करणसृङ्मतः । | |||
तावज्ज्ञानस्याप्रकाशान्मूढो भूतपिता स्मृतः । | |||
त्रिरूपोऽयमहङ्कारः शेष इत्येव तं विदुः''॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ २७-२८ ॥ | |||
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द्रव्यस्फुरणे यद्विशेषज्ञानम् ॥'सामान्यं मनसा जातं विशेषाद्बुद्धिजं भवेत्''॥'अचलः संशयो बुद्धेश्चलो मानस उच्यते | द्रव्यस्फुरणे यद्विशेषज्ञानम् ॥ | ||
'सामान्यं मनसा जातं विशेषाद्बुद्धिजं भवेत्''॥ | |||
'अचलः संशयो बुद्धेश्चलो मानस उच्यते । | |||
चञ्चला तु स्मृतिर्बुद्धेश्चित्तजैव स्थिरा स्मृतिः''॥ इति च ॥ | |||
'येन यज्ज्ञायते वस्तु तत्तल्लक्षणमुच्यते । तत्स्वरूपं पृथक्चेति द्विविधं कवयो विदुः''॥ इति कापिलेये ॥ ३१,३२ ॥ | |||
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'प्रधानवायुः सूत्रात्मा महता सह जायते | 'प्रधानवायुः सूत्रात्मा महता सह जायते । | ||
तैजसश्च खजः स्पर्श इत्याद्यास्तत्सुताः स्मृताः । | |||
तदाविष्टा अन्यजीवास्तदाधाराश्च तद्बलाः''। इति च ॥ ३३ ॥ | |||
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अर्थाश्रयत्वम् अर्थविषयत्वम् ।'शब्देनैव यतो ज्ञेयो हरिर्लिङ्गं तु तस्य तत् | अर्थाश्रयत्वम् अर्थविषयत्वम् । | ||
'शब्देनैव यतो ज्ञेयो हरिर्लिङ्गं तु तस्य तत् । | |||
स्पर्शाद्यभावात्तन्मात्रा नभसश्चेति कीर्त्यते ॥ | |||
स्पर्शादयश्च तन्मात्रा इतरे पूर्वसंस्थितेः । | |||
तिष्ठन्त्येको गुणो भूते प्रत्येकं पञ्चसु स्थितः ॥ | |||
शब्दो वर्णात्मको नित्यो ध्वनिराकाशसम्भवः । | |||
आकाश एव सूक्ष्मस्तु ध्वनिरित्येव शब्द्यते ॥ | |||
स एव व्यज्यमानस्तु भवेत्कर्णैकगोचरः''॥ इति च ॥ ३४,३५ ॥ | |||
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नभसः शब्दतन्मात्राच्छब्दतन्मात्रगुणात् ।'स्पर्शादयोऽपि वाय्वादेः सूक्ष्मावस्था प्रकीर्तिता''इति च ।'सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्त्येव स्युः स्थूलान्यप्यहङ्कृतेः | नभसः शब्दतन्मात्राच्छब्दतन्मात्रगुणात् । | ||
'स्पर्शादयोऽपि वाय्वादेः सूक्ष्मावस्था प्रकीर्तिता''इति च । | |||
'सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्त्येव स्युः स्थूलान्यप्यहङ्कृतेः । | |||
भूतेभ्यश्चोपचीयन्ते पुनर्ब्रह्मशरीरतः''॥ इति च ॥ ३७ ॥ | |||
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'प्राप्नोति वायुः सर्वं तु स्वत एव हरेस्तथा | 'प्राप्नोति वायुः सर्वं तु स्वत एव हरेस्तथा । | ||
अतः प्राप्तिरिति प्राहुर्वायुं भूतपतिं प्रभुम् । | |||
प्रधानवायुरन्येषु नित्याविष्टो यतस्ततः । | |||
तद्गुणास्तेषु चोच्यन्ते नीचता नास्य तत्कृता''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते । | |||
'स्वरूपमपि कर्मेति विषयत्वादुदीर्यते''इति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥ | |||
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व्यक्तिसंस्थात्वं व्यक्तत्वेन स्थितिः । गुणता प्रकाशत्वम् ।'आलोको गुण इत्येव प्रकाशश्चेति कथ्यते''। इत्यभिधानम् ।'तेजस्त्वमथ चोग्रत्वं क्रौर्यमित्यपि चोच्यते''। इत्यभिधानम् ॥ ४१ ॥ | व्यक्तिसंस्थात्वं व्यक्तत्वेन स्थितिः । गुणता प्रकाशत्वम् । | ||
'आलोको गुण इत्येव प्रकाशश्चेति कथ्यते''। इत्यभिधानम् । | |||
'तेजस्त्वमथ चोग्रत्वं क्रौर्यमित्यपि चोच्यते''। इत्यभिधानम् ॥ ४१ ॥ | |||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
'उन्दनं बिन्दुभावः स्यात्स्यन्दनं स्रवणं स्मृतम्''। इत्यभिधानम् | 'उन्दनं बिन्दुभावः स्यात्स्यन्दनं स्रवणं स्मृतम्''। इत्यभिधानम् । | ||
पृथिव्यग्न्यपेक्षया भूयस्त्वं देहे ॥ ४५ ॥ | |||
}} | }} | ||
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| id = BTN_C03_S27_V48_B1 | | id = BTN_C03_S27_V48_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
भावनमुत्पादकत्वम् ।'ब्रह्मस्थानं तु पृथिवी शरीरे ब्रह्मदर्शनात्''। इति कापिलेये | भावनमुत्पादकत्वम् । | ||
'ब्रह्मस्थानं तु पृथिवी शरीरे ब्रह्मदर्शनात्''। इति कापिलेये । | |||
सद्विशेषणं विशेषेण व्यक्तत्वम् । | |||
'असदव्यक्तनाम स्याद्व्यक्तं सदिति चोच्यते''। इति ब्राह्मे । | |||
सर्वसत्वगुणोद्भेदः शरीरे हि सर्वप्राणिनां गुणा व्यज्यन्ते संसारावस्थायाम् । | |||
'शरीरं पार्थिवं ज्ञेयमिन्द्रियाण्यौदकानि तु । | |||
तैजसः कोष्ठगो वह्निश्छिद्रमाकाशसम्भवम् । | |||
प्राणा वायुमयाः सर्वे प्रत्येकं प्रञ्चधा पुनः''॥ इति कापिलेये ॥४८॥ | |||
}} | }} | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
'अचेतनाद्यतस्त्वण्डाद् ब्रह्मा समजनि स्फुटम् | 'अचेतनाद्यतस्त्वण्डाद् ब्रह्मा समजनि स्फुटम् । | ||
अतो ब्रह्माण्डमित्याहुर्विराड् ब्रह्मा प्रकाशनात्''॥ इति च ॥ ५४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 540: | Line 593: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
'यज्ञनामा तु देवोऽन्यो विज्ञेयः पाददेवता | 'यज्ञनामा तु देवोऽन्यो विज्ञेयः पाददेवता । | ||
तदाविष्टो हरिर्नित्यं तमाहुः पाददैवतम् । | |||
तस्येन्द्रियाभिमानित्वं कुतः पूर्णामलात्मनः''॥ इति च ॥ ६१ ॥ | |||
}} | }} | ||
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'चैत्योऽपि भगवान्विष्णुरन्तर्यामी चतुर्मुखात् | 'चैत्योऽपि भगवान्विष्णुरन्तर्यामी चतुर्मुखात् । | ||
स्वेच्छया व्यक्तिमगमत्ततोऽसौ ब्रह्मजः स्मृतः''॥ इति च ॥ ६४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 579: | Line 633: | ||
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'यज्ञान्तस्थः स्वयं पादौ विशन्नोत्थापयद्धरिः | 'यज्ञान्तस्थः स्वयं पादौ विशन्नोत्थापयद्धरिः । | ||
शक्तोऽपि ब्रह्मवाय्वोस्तु बलज्ञप्त्यै जनार्दनः । | |||
तत्स्थ उत्थापयामास ब्रह्मदेहं विशन्प्रभुः''॥ इति च ॥ ७० ॥ | |||
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ब्रह्मा बृहस्पतिः ।'यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति''। इति श्रुतिः ।'बृहस्पतिः पुरोधाश्च ब्रह्मा च ब्रह्मणस्पतिः''। इत्यभिधानम् ॥ ७२ ॥ | ब्रह्मा बृहस्पतिः । | ||
'यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति''। इति श्रुतिः । | |||
'बृहस्पतिः पुरोधाश्च ब्रह्मा च ब्रह्मणस्पतिः''। इत्यभिधानम् ॥ ७२ ॥ | |||
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'अंशेन सुप्तो ब्रह्माऽपि अंशेन निरगात्तथा | 'अंशेन सुप्तो ब्रह्माऽपि अंशेन निरगात्तथा । | ||
स्वदेहाद्वायुसहितो विष्णुना च जगत्प्रभुः ॥ | |||
तमुत्थापयितुं देवास्तानृते त्रीन्महाबलान् । | |||
नाशक्नुवुन् एकसंस्थास्ततस्ते त्वविशंस्त्रयः ॥ | |||
उदतिष्ठद्ब्रह्मदेहस्तदा तेषां प्राभावतः । | |||
विशेषेण हरेरेव प्राभावेन श्रियः पतेः ॥ | |||
चित्ताभिमानी ब्रह्मैव क्षेत्रज्ञस्तद्गतो हरिः । | |||
प्रणो वायुरिति प्रक्तस्तयोरीशो हरिः स्वयम्''॥ इति च ॥ ७३ ॥ | |||
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Revision as of 16:46, 9 April 2026
'परस्य जन्ममृत्याद्याः स्युः स्वतन्त्रस्य किं पुनः ।
जीवस्यापि यतो भ्रान्त्या जन्ममृत्यादिसङ्गतिः॥ इति महाकौर्मे ॥ ४ ॥
'यत्र कारयिताऽतीव स्वतन्त्रस्तत्र कर्तृता । प्रच्यते तु यथा ब्रह्म त्वज्ञं संसारभागिति॥ इति च । 'लये वाप्यथवा सृष्टौ त्वन्तरालेऽपि न क्वचित् ।
प्रकृत्या रहितं ब्रह्म कदाचिदपि तिष्ठति॥ इति कापिलेये ॥ ६ ॥
यत्तु तस्यान्यतन्त्रत्वं तज्ज्ञानाद्विनिवर्तते॥ इति च । अकर्तुरीशस्य सकाशात् । 'अक्लिष्टत्वादकर्तासावकार्यत्वादथापि वा। इति च ।
'एष कर्ता न क्रियते कारणं च जगत्प्रभुः। इति भारते ॥ ८ ॥
सुखदुःखप्रदो विष्णुः स्वयमेव सनातनः ॥ कर्तृत्वं सुखदुःखानामन्येषां च तदाज्ञया । भोक्तृत्वं सुखदुःखानां करोत्येको हरिः स्वयम् । भोक्तृत्वमात्रहेतुत्वं जीवे नान्यत्र कुत्रचित्॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥
'प्रकृतिं पुरुषं चैव विध्द्यनादीइति च ॥ ९ ॥
असर्गा केवलाव्यक्ता सिसृक्षुरुभयात्मिका ॥ व्यक्तैव कार्यरूपा तु प्रकृतिस्त्रिविधा मता । कार्यतः सा प्रधानत्वात्प्रधानमिति कीर्त्यते । अविशेषा ह्यकार्यत्वात्सा च श्रीर्विष्णुसंश्रया॥ इति हरिवंशेषु ॥
'विशेषः कार्यमुद्दिष्टं विशेषाद्दृश्यते यतःइति पाद्मे ॥ ११ ॥
अथवा रुद्रदेहस्थो हरिः काल इतीरितः॥ इति ब्राह्मे ॥
पौरुषं प्रभावम् । पुरुषस्य प्रकर्षेण भावं व्याप्तं रूपम् । एके सम्यग्ज्ञानिनः । अप्राकृताः ॥ १७ ॥
प्रकृतौ महतः स्रष्टा परमः पुरुषो मतः ॥ तदेव वासुदेवाख्यं महत्तत्त्वनियामकम् । सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सूक्ष्माहङ्कारयामकः ॥ स्थूलाहङ्कारनियमी विष्णुः प्रद्युमन्नामकः । अनिरुद्धो मनस्तत्त्वनियन्ता भगवान् हरिः ॥ महत्तत्त्वादिजीवास्तु ब्रह्मशेषाङ्गजास्तथा ।
सूक्ष्मस्थूलविभेदेन कामजश्चानिरुद्धकः॥ इति कापिलेये ॥ २० ॥
'सत्वशब्देन चोच्यन्ते पूर्णानन्दादयो गुणाः॥ इति च । 'महत्तत्त्वगतो योऽसौ वासुदेवाभिधो हरिः ।
स चित्तजनकः प्रोक्तः प्राणिनां च पृथक्पृथक्॥ इति च ॥ २२ ॥
'स्तिमितोदकचित्तादेरविकारोऽल्पवत्क्रिया। इति तत्त्वविवेके । 'वृत्तिः स्वभावो वृत्तं च स्थितिरित्यभिधीयते। इति शब्दनिर्णये ।
वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तम्' इति स्वाभाविकं लक्षणमित्यर्थः ॥ २३ ॥
वैकारिकोऽधिदैवमित्यादि पञ्चम्यर्थे ।
'सप्तसु प्रथमातत्र स्वातन्त्र्यं यद्विवक्षितम् । इति शब्दनिर्णये ॥२६॥
इन्द्रियात्मतया चैव करणत्वमहङ्कृतेः ॥ यतो मनस्यहंभावस्तस्मात्कर्तृ मनः स्मृतम् । स्वभावकर्तुर्जीवस्य त्वासन्नोपाधि तद्यतः ॥ कर्मज्ञाने करणता यतः करणमिन्द्रियम् । कार्यं देहः समुद्दिष्ट उत्पाद्यत्वात्पुनःपुनः॥ इति तत्त्वविवेके ॥ 'शान्तरूपो देवपिता घोरः करणसृङ्मतः । तावज्ज्ञानस्याप्रकाशान्मूढो भूतपिता स्मृतः ।
त्रिरूपोऽयमहङ्कारः शेष इत्येव तं विदुः॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ २७-२८ ॥
'सामान्यं मनसा जातं विशेषाद्बुद्धिजं भवेत्॥ 'अचलः संशयो बुद्धेश्चलो मानस उच्यते । चञ्चला तु स्मृतिर्बुद्धेश्चित्तजैव स्थिरा स्मृतिः॥ इति च ॥
'येन यज्ज्ञायते वस्तु तत्तल्लक्षणमुच्यते । तत्स्वरूपं पृथक्चेति द्विविधं कवयो विदुः॥ इति कापिलेये ॥ ३१,३२ ॥
तैजसश्च खजः स्पर्श इत्याद्यास्तत्सुताः स्मृताः ।
तदाविष्टा अन्यजीवास्तदाधाराश्च तद्बलाः। इति च ॥ ३३ ॥
'शब्देनैव यतो ज्ञेयो हरिर्लिङ्गं तु तस्य तत् । स्पर्शाद्यभावात्तन्मात्रा नभसश्चेति कीर्त्यते ॥ स्पर्शादयश्च तन्मात्रा इतरे पूर्वसंस्थितेः । तिष्ठन्त्येको गुणो भूते प्रत्येकं पञ्चसु स्थितः ॥ शब्दो वर्णात्मको नित्यो ध्वनिराकाशसम्भवः । आकाश एव सूक्ष्मस्तु ध्वनिरित्येव शब्द्यते ॥
स एव व्यज्यमानस्तु भवेत्कर्णैकगोचरः॥ इति च ॥ ३४,३५ ॥
'स्पर्शादयोऽपि वाय्वादेः सूक्ष्मावस्था प्रकीर्तिताइति च । 'सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्त्येव स्युः स्थूलान्यप्यहङ्कृतेः ।
भूतेभ्यश्चोपचीयन्ते पुनर्ब्रह्मशरीरतः॥ इति च ॥ ३७ ॥
अतः प्राप्तिरिति प्राहुर्वायुं भूतपतिं प्रभुम् । प्रधानवायुरन्येषु नित्याविष्टो यतस्ततः । तद्गुणास्तेषु चोच्यन्ते नीचता नास्य तत्कृता॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ।
'स्वरूपमपि कर्मेति विषयत्वादुदीर्यतेइति शब्दनिर्णये ॥ ३९ ॥
'आलोको गुण इत्येव प्रकाशश्चेति कथ्यते। इत्यभिधानम् ।
'तेजस्त्वमथ चोग्रत्वं क्रौर्यमित्यपि चोच्यते। इत्यभिधानम् ॥ ४१ ॥
'ब्रह्मस्थानं तु पृथिवी शरीरे ब्रह्मदर्शनात्। इति कापिलेये । सद्विशेषणं विशेषेण व्यक्तत्वम् । 'असदव्यक्तनाम स्याद्व्यक्तं सदिति चोच्यते। इति ब्राह्मे । सर्वसत्वगुणोद्भेदः शरीरे हि सर्वप्राणिनां गुणा व्यज्यन्ते संसारावस्थायाम् । 'शरीरं पार्थिवं ज्ञेयमिन्द्रियाण्यौदकानि तु । तैजसः कोष्ठगो वह्निश्छिद्रमाकाशसम्भवम् ।
प्राणा वायुमयाः सर्वे प्रत्येकं प्रञ्चधा पुनः॥ इति कापिलेये ॥४८॥
तदाविष्टो हरिर्नित्यं तमाहुः पाददैवतम् ।
तस्येन्द्रियाभिमानित्वं कुतः पूर्णामलात्मनः॥ इति च ॥ ६१ ॥
शक्तोऽपि ब्रह्मवाय्वोस्तु बलज्ञप्त्यै जनार्दनः ।
तत्स्थ उत्थापयामास ब्रह्मदेहं विशन्प्रभुः॥ इति च ॥ ७० ॥
'यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति। इति श्रुतिः ।
'बृहस्पतिः पुरोधाश्च ब्रह्मा च ब्रह्मणस्पतिः। इत्यभिधानम् ॥ ७२ ॥
स्वदेहाद्वायुसहितो विष्णुना च जगत्प्रभुः ॥ तमुत्थापयितुं देवास्तानृते त्रीन्महाबलान् । नाशक्नुवुन् एकसंस्थास्ततस्ते त्वविशंस्त्रयः ॥ उदतिष्ठद्ब्रह्मदेहस्तदा तेषां प्राभावतः । विशेषेण हरेरेव प्राभावेन श्रियः पतेः ॥ चित्ताभिमानी ब्रह्मैव क्षेत्रज्ञस्तद्गतो हरिः ।
प्रणो वायुरिति प्रक्तस्तयोरीशो हरिः स्वयम्॥ इति च ॥ ७३ ॥