Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S10: Difference between revisions
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स्वतो नास्ति । तदधीनविद्यमानमप्यशुद्धम् । यच्च स्वनानात्वं तदपि स्थानभेदादसदेव भाति ।'एकोऽपि स्थाननानात्वान्नानेव हरिरीयते | स्वतो नास्ति । तदधीनविद्यमानमप्यशुद्धम् । यच्च स्वनानात्वं तदपि स्थानभेदादसदेव भाति । | ||
'एकोऽपि स्थाननानात्वान्नानेव हरिरीयते । | |||
सर्वान्तर्यामिणस्तस्य न भेदो विद्यते क्वचित्''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥१॥ | |||
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यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् । यच्चेदं भगवत्स्वरूपमानन्दमात्रं पश्यामि । यच्चाश्रितोऽस्मि अतः परं नास्ति । अतो न ज्ञायत इति अवद्यमत्युत्तमा-पेक्षया । अनादिगृहीतमेव नेदानीं गृह्यते ।'यत्तद्दिव्यं हरेरूपं क्षीरसागरमध्यगम् | यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् । यच्चेदं भगवत्स्वरूपमानन्दमात्रं पश्यामि । यच्चाश्रितोऽस्मि अतः परं नास्ति । अतो न ज्ञायत इति अवद्यमत्युत्तमा-पेक्षया । अनादिगृहीतमेव नेदानीं गृह्यते । | ||
'यत्तद्दिव्यं हरेरूपं क्षीरसागरमध्यगम् । | |||
ज्ञानानन्दैकमात्रं च न ततः परमं क्वचित् ॥ | |||
अनादिनित्यादव्यक्तात्तस्माज्जज्ञे चतुर्मुखः''॥ इत्यध्यात्मे । | |||
भूतेन्द्रियाणामात्मकम् । 'यच्चाप्नोति''इत्यादेः ॥ २,३ ॥ | |||
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'हृदि व्यक्तं तु यद्रूपं हरेर्गन्धः स उच्यते | 'हृदि व्यक्तं तु यद्रूपं हरेर्गन्धः स उच्यते । | ||
गन्धगन्धवतोर्यस्मान्न भेदः क्वचनेष्यते''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ | |||
'उत्तमानां तु पादेन सर्वं रूपं तु भण्यते । | |||
उत्तमानां स्वरूपं तु पादशब्देन भण्यते ॥ ५ ॥ | |||
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मायाबलं भगवदिच्छाबलम् ।'ज्ञेयत्वं दुर्घटस्यापि घटनाधिकशक्तिता | मायाबलं भगवदिच्छाबलम् । | ||
'ज्ञेयत्वं दुर्घटस्यापि घटनाधिकशक्तिता । | |||
अभेद ईश्वरेणापि सृष्ट्यादावन्तरङ्गता ॥ | |||
उच्येत यस्याः सा माया हरेरिच्छाऽथवा बलम् । | |||
भगवत्तन्त्रता यस्यास्तद्भार्यात्वं सुरूपता ॥ | |||
उच्येत माया सा तु श्रीर्दोषयुक्ता जडा स्मृता । | |||
परिणामिनी च यस्यास्तु दोषाश्चेतनता यथा ॥ | |||
शैवली नाम सा माया जगद्बन्धात्मिका सदा''॥ इति ब्रह्मतर्के । | |||
'ध्याये मंस्ये तथा पश्ये शृृणोमीति विभक्तता । | |||
जीवस्य तु हरेरिच्छाबलादिन्द्रियभुक्तये''॥ इति षाड्गुण्ये । | |||
इन्द्रियाणां भोगार्थम् । व्यर्थापि यज्ञादिक्रियार्था ॥ ९ ॥ | |||
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अर्थैरध्याहृतानि करणानि येषाम् ।'अज्ञानं तु निशा प्रोक्ता दिवा ज्ञानमुदीर्यते''॥ इति स्कान्दे ॥ १० ॥ | अर्थैरध्याहृतानि करणानि येषाम् । | ||
'अज्ञानं तु निशा प्रोक्ता दिवा ज्ञानमुदीर्यते''॥ इति स्कान्दे ॥ १० ॥ | |||
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तत् तद् वपुः तेषां प्रणयसे ।'यादृशोभावितस्त्वीशस्तादृशो जीव आभवेत्''। इति तन्त्रसारे ।'तं यथा यथोपासते तदेव भवति ।''इति च ॥ ११ ॥ | तत् तद् वपुः तेषां प्रणयसे । | ||
'यादृशोभावितस्त्वीशस्तादृशो जीव आभवेत्''। इति तन्त्रसारे । | |||
'तं यथा यथोपासते तदेव भवति ।''इति च ॥ ११ ॥ | |||
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सर्वभूतदयया सुरगणैर्हृद्याराधितस्त्वं बद्धकामैर्जनैरुपचितोपचारैर्नाति-प्रसीदसि ।'आराधितो यो ब्रह्माद्यैर्भक्तिज्ञानदयादिभिः | सर्वभूतदयया सुरगणैर्हृद्याराधितस्त्वं बद्धकामैर्जनैरुपचितोपचारैर्नाति-प्रसीदसि । | ||
'आराधितो यो ब्रह्माद्यैर्भक्तिज्ञानदयादिभिः । | |||
किं तस्य कामुकजनैः कृतया परिचर्यया''। इति सत्यसंहितायाम् ॥ १२ ॥ | |||
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'ईशस्यापूर्णताज्ञानं विष्णोरन्यस्य चेशता | 'ईशस्यापूर्णताज्ञानं विष्णोरन्यस्य चेशता । | ||
भेदस्तस्यावतारेषु जीवस्येशत्वमेव च । | |||
तथा जीवत्वमीशस्य जडाभेदस्तयोरपि । | |||
भेदमोह इति प्रोक्तः स सदा न हरौ क्वचित् । | |||
अन्येषां तत्प्रसादेन शनैर्याति सतामपि''॥ इति स्कान्दे ॥ १४ ॥ | |||
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भक्तिविवशाः ।'ये भक्तिविवशा विष्णोर्नाममात्रैकजल्पकाः | भक्तिविवशाः । | ||
'ये भक्तिविवशा विष्णोर्नाममात्रैकजल्पकाः । | |||
तेऽपि मुक्तिं व्रजन्त्याशु किमुत द्ध्यायिनः सदा''॥ इति व्योमसंहितायाम् ॥ १५ ॥ | |||
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'ब्रह्मादिभावो विष्णोस्तु तन्नियामकता भवेत् | 'ब्रह्मादिभावो विष्णोस्तु तन्नियामकता भवेत् । | ||
मत्स्यादिता स्वभावस्तु नान्यथा क्वचिदिष्यते''॥ | |||
इति वामने । | |||
'अनन्तासनवैकुण्ठक्षीराब्धिस्थो हरिस्त्रिपात्''। इति च ॥ १६ ॥ | |||
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'नित्यज्ञानदृशा नित्यं लवकालमपीश्वरः | 'नित्यज्ञानदृशा नित्यं लवकालमपीश्वरः । | ||
पश्येत्तात्कालिकं चैव तस्मादनिमिषो हरिः । | |||
कालस्यानिमिषत्वं च लवादेर्नित्यवीक्षणात्''॥ इति तन्त्रसारे ॥१७॥ | |||
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अनिरस्तरतिः नित्यरतिः ॥ १९ ॥ | अनिरस्तरतिः नित्यरतिः ॥ १९ ॥ | ||
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'स्वसामर्थ्यात् स्वकर्माणि रमया सह केशवः | 'स्वसामर्थ्यात् स्वकर्माणि रमया सह केशवः । | ||
कुरुते स्वयमेवैष कानिचित्पुरुषोत्तमः''॥ इति नारदीये ॥ २३ ॥ | |||
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'आत्मशब्दस्य मुख्यार्थो विष्णुरेकः सनातनः | 'आत्मशब्दस्य मुख्यार्थो विष्णुरेकः सनातनः । | ||
सन्देहदेहमनसो बुद्धिजीवाः स्वयं तथा । | |||
ब्रह्माप्यमुख्याः क्रमश उत्कर्षो ह्यात्मता भवेत्''। | |||
इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २८ ॥ | |||
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प्रार्थनमपि मत्प््रोरणमेव ॥ २९ ॥ | प्रार्थनमपि मत्प््रोरणमेव ॥ २९ ॥ | ||
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'तप आलोचनं प्रोक्तं विद्या निष्ठा प्रकीर्तिता'' | 'तप आलोचनं प्रोक्तं विद्या निष्ठा प्रकीर्तिता''। | ||
इति कपिलसंहितायाम् ॥ ३० ॥ | |||
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'देहे देहे हरिस्तस्मिंल्लोकाः सर्वे प्रतिष्ठिताः | 'देहे देहे हरिस्तस्मिंल्लोकाः सर्वे प्रतिष्ठिताः । | ||
अङ्गुष्ठमात्रेऽपि परे परशक्तिर्यतो विभुः''॥ इति च । | |||
आत्मनि स्थिते मयि ॥ ३१ ॥ | |||
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स्वरूपेण मयोपेतं, हृदिस्थं जीवरूपं हि परमेश्वरसहितं भवति ।'त्यक्त्वा देहाद्यात्मभावं जीवरूपे हृदि स्थिते | स्वरूपेण मयोपेतं, हृदिस्थं जीवरूपं हि परमेश्वरसहितं भवति । | ||
'त्यक्त्वा देहाद्यात्मभावं जीवरूपे हृदि स्थिते । | |||
दृष्ट्वाऽऽत्मभावं तं चापि हरिपादाब्जसंस्थितम् ॥ | |||
यदा पश्यत्यापरोक्ष्यात्तदा मुक्तिं व्रजत्यसौ''॥ इति दत्तात्रेययोगे ॥ ३३ ॥ | |||
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'भूतेन्द्रियमनोबुद्धित्रिगुणादिषु सर्वशः | 'भूतेन्द्रियमनोबुद्धित्रिगुणादिषु सर्वशः । | ||
युक्तं नियामकतया पश्यञ्जानाति केशवम्''। इति च ॥ ३६ ॥ | |||
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'सार्वज्ञादिगुणैर्युक्तं सत्वादिगुणवर्जितम् | 'सार्वज्ञादिगुणैर्युक्तं सत्वादिगुणवर्जितम् । | ||
यो जानाति हरिं तस्य प्रीतो भवति केशवः''॥ इति व्योमसंहितायाम् । | |||
'आधिकारिकदेवानां स्वाधिकाराधिकामनम् । | |||
भवति प्रीतये विष्णोर्भक्त्यादेरपि यत्सदा''॥ इति च ॥ ३९ ॥ | |||
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निःश्रयेसं राज्यम् । मोक्षेऽपि रञ्जनीया मत्प्रीतिरेव ।'मुक्तस्यापि हरेः प्रीतिः सर्वतोऽप्यनुरज्यते''॥ इति वामने ॥ ४१ ॥ | निःश्रयेसं राज्यम् । मोक्षेऽपि रञ्जनीया मत्प्रीतिरेव । | ||
'मुक्तस्यापि हरेः प्रीतिः सर्वतोऽप्यनुरज्यते''॥ इति वामने ॥ ४१ ॥ | |||
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'सर्वतोऽपि प््रिायो ह्यात्मा तस्यापि प््रिायतां हरिः | 'सर्वतोऽपि प््रिायो ह्यात्मा तस्यापि प््रिायतां हरिः । | ||
आपादयति यत्तस्मात्स्वात्मनोऽपि प््रिायो हरिः''॥ | |||
इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ ४२ ॥ | |||
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Revision as of 16:45, 9 April 2026
'एकोऽपि स्थाननानात्वान्नानेव हरिरीयते ।
सर्वान्तर्यामिणस्तस्य न भेदो विद्यते क्वचित्॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥१॥
'यत्तद्दिव्यं हरेरूपं क्षीरसागरमध्यगम् । ज्ञानानन्दैकमात्रं च न ततः परमं क्वचित् ॥ अनादिनित्यादव्यक्तात्तस्माज्जज्ञे चतुर्मुखः॥ इत्यध्यात्मे ।
भूतेन्द्रियाणामात्मकम् । 'यच्चाप्नोतिइत्यादेः ॥ २,३ ॥
गन्धगन्धवतोर्यस्मान्न भेदः क्वचनेष्यते॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ 'उत्तमानां तु पादेन सर्वं रूपं तु भण्यते ।
उत्तमानां स्वरूपं तु पादशब्देन भण्यते ॥ ५ ॥
'ज्ञेयत्वं दुर्घटस्यापि घटनाधिकशक्तिता । अभेद ईश्वरेणापि सृष्ट्यादावन्तरङ्गता ॥ उच्येत यस्याः सा माया हरेरिच्छाऽथवा बलम् । भगवत्तन्त्रता यस्यास्तद्भार्यात्वं सुरूपता ॥ उच्येत माया सा तु श्रीर्दोषयुक्ता जडा स्मृता । परिणामिनी च यस्यास्तु दोषाश्चेतनता यथा ॥ शैवली नाम सा माया जगद्बन्धात्मिका सदा॥ इति ब्रह्मतर्के । 'ध्याये मंस्ये तथा पश्ये शृृणोमीति विभक्तता । जीवस्य तु हरेरिच्छाबलादिन्द्रियभुक्तये॥ इति षाड्गुण्ये ।
इन्द्रियाणां भोगार्थम् । व्यर्थापि यज्ञादिक्रियार्था ॥ ९ ॥
'यादृशोभावितस्त्वीशस्तादृशो जीव आभवेत्। इति तन्त्रसारे ।
'तं यथा यथोपासते तदेव भवति ।इति च ॥ ११ ॥
'आराधितो यो ब्रह्माद्यैर्भक्तिज्ञानदयादिभिः ।
किं तस्य कामुकजनैः कृतया परिचर्यया। इति सत्यसंहितायाम् ॥ १२ ॥
भेदस्तस्यावतारेषु जीवस्येशत्वमेव च । तथा जीवत्वमीशस्य जडाभेदस्तयोरपि । भेदमोह इति प्रोक्तः स सदा न हरौ क्वचित् ।
अन्येषां तत्प्रसादेन शनैर्याति सतामपि॥ इति स्कान्दे ॥ १४ ॥
'ये भक्तिविवशा विष्णोर्नाममात्रैकजल्पकाः ।
तेऽपि मुक्तिं व्रजन्त्याशु किमुत द्ध्यायिनः सदा॥ इति व्योमसंहितायाम् ॥ १५ ॥
मत्स्यादिता स्वभावस्तु नान्यथा क्वचिदिष्यते॥ इति वामने ।
'अनन्तासनवैकुण्ठक्षीराब्धिस्थो हरिस्त्रिपात्। इति च ॥ १६ ॥
पश्येत्तात्कालिकं चैव तस्मादनिमिषो हरिः ।
कालस्यानिमिषत्वं च लवादेर्नित्यवीक्षणात्॥ इति तन्त्रसारे ॥१७॥
सन्देहदेहमनसो बुद्धिजीवाः स्वयं तथा । ब्रह्माप्यमुख्याः क्रमश उत्कर्षो ह्यात्मता भवेत्।
इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २८ ॥
अङ्गुष्ठमात्रेऽपि परे परशक्तिर्यतो विभुः॥ इति च ।
आत्मनि स्थिते मयि ॥ ३१ ॥
'त्यक्त्वा देहाद्यात्मभावं जीवरूपे हृदि स्थिते । दृष्ट्वाऽऽत्मभावं तं चापि हरिपादाब्जसंस्थितम् ॥
यदा पश्यत्यापरोक्ष्यात्तदा मुक्तिं व्रजत्यसौ॥ इति दत्तात्रेययोगे ॥ ३३ ॥
यो जानाति हरिं तस्य प्रीतो भवति केशवः॥ इति व्योमसंहितायाम् । 'आधिकारिकदेवानां स्वाधिकाराधिकामनम् ।
भवति प्रीतये विष्णोर्भक्त्यादेरपि यत्सदा॥ इति च ॥ ३९ ॥
आपादयति यत्तस्मात्स्वात्मनोऽपि प््रिायो हरिः॥
इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ ४२ ॥