Brahmasutra/C3/S2: Difference between revisions
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| title = द्वितीयः पादः | | title = द्वितीयः पादः | ||
}} | }}भक्तिरस्मिन् पाद उच्यते। भक्त्यर्थं भगवन्महिमोक्तिः। | ||
भक्तिरस्मिन् पाद उच्यते। भक्त्यर्थं भगवन्महिमोक्तिः। | |||
=== सन्ध्याधिकरणम् === | === सन्ध्याधिकरणम् === | ||
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न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते । ‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ । रथान् रथयोगान् पथः सृजते’ इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥ | न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते । ‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ । रथान् रथयोगान् पथः सृजते’ इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥ | ||
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‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’ इति च । | ‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’ इति च । | ||
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‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥ | ‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥ | ||
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अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात् । ब्रह्माण्डे च – | अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात् । ब्रह्माण्डे च – | ||
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‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः । | ‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः । | ||
प्रदर्शयति जीवाय स्वप्न इति गीयते ॥ | |||
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यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता । | यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता । | ||
अनभिव्यक्तरूपत्वान्नान्यसाधनजं भवेत्’ इति ॥ 03 ॥ | |||
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साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेन चेश्वरो दर्शयति । | साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेन चेश्वरो दर्शयति । | ||
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‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । | ‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । | ||
समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने’ इत्यादिश्रुतेः । | |||
}} | }} | ||
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हिशब्दाद्दर्शनाच्च । | हिशब्दाद्दर्शनाच्च । | ||
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‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद्देवता वृषभोऽपि वा । | ‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद्देवता वृषभोऽपि वा । | ||
स्वप्नस्थमथवा राजा तत् तथैव भविष्यति’ ॥ | |||
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इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥ | इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥ | ||
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बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नतिरस्कर्ता । | बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नतिरस्कर्ता । | ||
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‘स्वप्नादिबुद्धिकर्ता च तिरस्कर्ता स एव च ।तदिच्छया यतो ह्यस्य बन्धमोक्षौ प्रतिष्ठितौ’ इति कौर्मे ॥ 05 ॥ | ‘स्वप्नादिबुद्धिकर्ता च तिरस्कर्ता स एव च ।तदिच्छया यतो ह्यस्य बन्धमोक्षौ प्रतिष्ठितौ’ इति कौर्मे ॥ 05 ॥ | ||
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देहयोगेन वासो जाग्रदपि तत एव । | देहयोगेन वासो जाग्रदपि तत एव । | ||
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‘स एव जागरिते स्थापयति स स्वप्ने स प्रभुस्तुराषाट् स एको बहुधा भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 06 ॥ | ‘स एव जागरिते स्थापयति स स्वप्ने स प्रभुस्तुराषाट् स एको बहुधा भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 06 ॥ | ||
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जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिः नाडीस्थे परमात्मनि । | जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिः नाडीस्थे परमात्मनि । | ||
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‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’ ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेः ॥ 07 ॥ | ‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’ ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेः ॥ 07 ॥ | ||
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यतस्तस्मिन् सुप्तिः ॥ | यतस्तस्मिन् सुप्तिः ॥ | ||
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‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातै ष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥ | ‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातै ष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥ | ||
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न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति कर्मण्यवधारणात् ॥ | न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति कर्मण्यवधारणात् ॥ | ||
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‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु । | ‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु । | ||
परमः पुरुषो विष्णुस्ततोऽन्यो नास्ति कश्चन’ इत्यनुसारिस्मृतेश्च ॥ | |||
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‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयथ्यैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥ | ‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयथ्यैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥ | ||
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आत्मानमेव लोकमुपासीत’ इति च विधिः ॥ 09 ॥ | आत्मानमेव लोकमुपासीत’ इति च विधिः ॥ 09 ॥ | ||
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मोहावस्थायां परमेश्वरेऽर्धप्राप्तिर्जीवस्य । | मोहावस्थायां परमेश्वरेऽर्धप्राप्तिर्जीवस्य । | ||
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‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् ॥ | ‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् ॥ | ||
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यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥ | यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥ | ||
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सोऽपि तत एवेति सिद्धम् । | सोऽपि तत एवेति सिद्धम् । | ||
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‘मूर्च्छा प्रबोधनं चैव यत एव प्रवर्तते ।स ईशः परमो ज्ञेयः परमानन्दलक्षणः’इति हि कौर्मे ॥ 10 ॥ | ‘मूर्च्छा प्रबोधनं चैव यत एव प्रवर्तते ।स ईशः परमो ज्ञेयः परमानन्दलक्षणः’इति हि कौर्मे ॥ 10 ॥ | ||
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स्थानापेक्षयाऽपि परमात्मनो न भिन्नं रूपम् । | स्थानापेक्षयाऽपि परमात्मनो न भिन्नं रूपम् । | ||
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‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति श्रुतिः । | ‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति श्रुतिः । | ||
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‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद्रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥ | ‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद्रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥ | ||
| Line 481: | Line 449: | ||
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‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’ | ‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’ | ||
इति च भागवते ॥ 11 ॥ | |||
}} | }} | ||
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| id = BS_C03_S02_V12_B1 | | id = BS_C03_S02_V12_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ । | ‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ । | ||
प्राज्ञः कारणबद्धस्तुद्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः’ ॥ | |||
इति भेदवचनान्नेति चेन्न । | |||
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| id = BS_C03_S02_V12_B4 | | id = BS_C03_S02_V12_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ । | ‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’ । | ‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’ । | ||
| Line 529: | Line 493: | ||
| id = BS_C03_S02_V12_B6 | | id = BS_C03_S02_V12_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद्ब्रह्मापूपर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥ | ‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद्ब्रह्मापूपर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥ | ||
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| id = BS_C03_S02_V13_B1 | | id = BS_C03_S02_V13_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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एवमभेदेनैव । चशब्दादनन्तरूपत्वं चैके शाखिनः पठन्ति । | एवमभेदेनैव । चशब्दादनन्तरूपत्वं चैके शाखिनः पठन्ति । | ||
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| id = BS_C03_S02_V13_B2 | | id = BS_C03_S02_V13_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः । | ‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः । | ||
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः’ इति । | |||
}} | }} | ||
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| id = BS_C03_S02_V13_B4 | | id = BS_C03_S02_V13_B4 | ||
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अभेदेऽपि भेदव्यपदेशः स्थानभेदादैश्वर्ययोगाच्च युज्यते । | अभेदेऽपि भेदव्यपदेशः स्थानभेदादैश्वर्ययोगाच्च युज्यते । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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ब्रह्मतर्के च- | ब्रह्मतर्के च- | ||
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| id = BS_C03_S02_V13_B6 | | id = BS_C03_S02_V13_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद्भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः । | ‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद्भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः । | ||
निर्दोषाद्वयरूपोऽपि कथ्यते परमेश्वरः’ इति ॥ 13 ॥ | |||
}} | }} | ||
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| id = BS_C03_S02_V14_B1 | | id = BS_C03_S02_V14_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद्ब्रह्म । हि शब्दाद्’अस्थूलमनणु’ इत्यादिश्रुतेश्च । | प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद्ब्रह्म । हि शब्दाद्’अस्थूलमनणु’ इत्यादिश्रुतेश्च । | ||
| Line 630: | Line 587: | ||
| id = BS_C03_S02_V14_B2 | | id = BS_C03_S02_V14_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘भौतिकानि हि रूपाणि भूतेभ्योऽसौ परो यतः ।अरूपवानतः प्रोक्तः क्व तदव्यक्ततः परे’ इति च मात्स्ये॥ 14 ॥ | ‘भौतिकानि हि रूपाणि भूतेभ्योऽसौ परो यतः ।अरूपवानतः प्रोक्तः क्व तदव्यक्ततः परे’ इति च मात्स्ये॥ 14 ॥ | ||
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‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । | ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । | ||
‘श्यामाच्चबलं प्रपद्ये’‘सुवर्णज्योतिः’ इत्यादिश्रुतीनां च न वैयर्थ्यम् । विलक्षणरूपवत्वात् । यथा चक्षुरादिप्रकाशे विद्यमानेऽपि वैलक्षण्यादप्रकाशादिव्यवहारः ॥ 15 ॥ | |||
}} | }} | ||
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वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं’ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’ इति । | वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं’ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’ इति । | ||
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आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं योऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥ | आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं योऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥ | ||
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दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं | दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’ इति ॥ | ‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’ इति ॥ | ||
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‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥ | ‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥ | ||
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यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद्वेदः अतः सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा च शब्देन भेदं दर्शयति । | यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद्वेदः अतः सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा च शब्देन भेदं दर्शयति । | ||
| Line 757: | Line 706: | ||
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‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’। | ‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’। | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले । | ‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले । | ||
एवमेवात्मका लोके परात्मसदृशा मताः’ इत्यादि ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 776: | Line 723: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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अथ एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा, नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥ | अथ एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा, नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥ | ||
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अम्बुवद् स्नेहेन । ग्रहणं ज्ञानम्। भक्तिं विना न तत्सादृश्यं सम्यगभिव्यज्यते । | अम्बुवद् स्नेहेन । ग्रहणं ज्ञानम्। भक्तिं विना न तत्सादृश्यं सम्यगभिव्यज्यते । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ इति हि श्रुतिः। | ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ इति हि श्रुतिः। | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तथैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥ | ‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तथैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥ | ||
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तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् । एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीनन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति। | तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् । एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीनन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति। | ||
| Line 859: | Line 801: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥ | ‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥ | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति’ इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् । चशब्दात् स्मृतिः | ‘अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति’ इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् । चशब्दात् स्मृतिः | ||
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यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे । | यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे । | ||
तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने’ इति ॥ 21 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 939: | Line 878: | ||
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उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति । | उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति । | ||
| Line 948: | Line 886: | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’ इति । | ‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’ इति । | ||
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| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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च शब्दात् स्मृतिश्च । | च शब्दात् स्मृतिश्च । | ||
| Line 966: | Line 902: | ||
| id = BS_C03_S02_V22_B4 | | id = BS_C03_S02_V22_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥ | ‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥ | ||
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| id = BS_C03_S02_V23_B1 | | id = BS_C03_S02_V23_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः । | अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः । | ||
| Line 1,003: | Line 937: | ||
| id = BS_C03_S02_V23_B2 | | id = BS_C03_S02_V23_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्फलम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्’ इति कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥ | ‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्फलम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्’ इति कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥ | ||
| Line 1,021: | Line 954: | ||
| id = BS_C03_S02_V24_B1 | | id = BS_C03_S02_V24_B1 | ||
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आराधनेऽप्यव्यक्तमेव । ज्ञानिप्रत्यक्षेणेतरेषामतिसूक्ष्मत्वलिङ्गादनुमानेन। | आराधनेऽप्यव्यक्तमेव । ज्ञानिप्रत्यक्षेणेतरेषामतिसूक्ष्मत्वलिङ्गादनुमानेन। | ||
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‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद्वक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥ | ‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद्वक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥ | ||
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| id = BS_C03_S02_V25_B1 | | id = BS_C03_S02_V25_B1 | ||
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अग्न्यादिवत् स्थूलसूक्ष्मत्वविशेषाभावात्। | अग्न्यादिवत् स्थूलसूक्ष्मत्वविशेषाभावात्। | ||
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| id = BS_C03_S02_V25_B2 | | id = BS_C03_S02_V25_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परम इति’ इति माण्डव्यश्रुतेः । | ‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परम इति’ इति माण्डव्यश्रुतेः । | ||
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‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥ | ‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥ | ||
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‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥ | ‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥ | ||
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विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति ।‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’इति श्रुतेः ॥ 26 ॥ | विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति ।‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’इति श्रुतेः ॥ 26 ॥ | ||
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उभयत्र प्रमाणभावात् तत्प्रसादादेव प्रकाशो भवति । | उभयत्र प्रमाणभावात् तत्प्रसादादेव प्रकाशो भवति । | ||
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‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’ | ‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’ | ||
इति लिङ्गात् । | |||
}} | }} | ||
| Line 1,162: | Line 1,086: | ||
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युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् । | युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् । | ||
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नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजशक्तितः।तमृते परमात्मानं कः पश्येतामितं प्रभुम्’इति नारायणाध्यात्मे॥27॥ | नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजशक्तितः।तमृते परमात्मानं कः पश्येतामितं प्रभुम्’इति नारायणाध्यात्मे॥27॥ | ||
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‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’ ।’अथैष एव परम आनन्दः’ इत्युभयव्यपदेशादहिकुण्डलवदेव युज्यते । यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥ | ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’ ।’अथैष एव परम आनन्दः’ इत्युभयव्यपदेशादहिकुण्डलवदेव युज्यते । यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥ | ||
| Line 1,217: | Line 1,138: | ||
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यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद्ब्रह्मणः ॥ 29 ॥ | यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद्ब्रह्मणः ॥ 29 ॥ | ||
| Line 1,235: | Line 1,155: | ||
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| text = | | text = | ||
यथैक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः। स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः । | यथैक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः। स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः । | ||
| Line 1,244: | Line 1,163: | ||
| id = BS_C03_S02_V30_B2 | | id = BS_C03_S02_V30_B2 | ||
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‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे। | ‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे। | ||
| Line 1,253: | Line 1,171: | ||
| id = BS_C03_S02_V30_B4 | | id = BS_C03_S02_V30_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद्वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्’ इति ब्राह्मे ॥ 30 ॥ | ‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद्वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्’ इति ब्राह्मे ॥ 30 ॥ | ||
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| id = BS_C03_S02_V31_B1 | | id = BS_C03_S02_V31_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘एकमेवाद्वितीयम्’ ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’ इति भेदस्य ॥ 31 ॥ | ‘एकमेवाद्वितीयम्’ ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’ इति भेदस्य ॥ 31 ॥ | ||
| Line 1,299: | Line 1,215: | ||
| id = BS_C03_S02_V32_B1 | | id = BS_C03_S02_V32_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृति’ ‘य एष आनन्दः परस्य’‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति सेतुत्वं ह्युच्यते.‘यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्युन्मानत्वम् ।‘एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’ इति सम्बन्धः। | न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृति’ ‘य एष आनन्दः परस्य’‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति सेतुत्वं ह्युच्यते.‘यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्युन्मानत्वम् ।‘एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’ इति सम्बन्धः। | ||
| Line 1,308: | Line 1,223: | ||
| id = BS_C03_S02_V32_B2 | | id = BS_C03_S02_V32_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥ | ‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥ | ||
| Line 1,317: | Line 1,231: | ||
| id = BS_C03_S02_V32_B4 | | id = BS_C03_S02_V32_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥ | अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥ | ||
| Line 1,335: | Line 1,248: | ||
| id = BS_C03_S02_V33_B1 | | id = BS_C03_S02_V33_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
दर्शनादेवचान्यानन्दादीनाम् । | दर्शनादेवचान्यानन्दादीनाम् । | ||
| Line 1,344: | Line 1,256: | ||
| id = BS_C03_S02_V33_B2 | | id = BS_C03_S02_V33_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
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‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥ | ‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥ | ||
| Line 1,378: | Line 1,289: | ||
| id = BS_C03_S02_V34_B1 | | id = BS_C03_S02_V34_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा पादशब्देन व्यपदिश्यते’पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति तथा । | जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा पादशब्देन व्यपदिश्यते’पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति तथा । | ||
| Line 1,387: | Line 1,297: | ||
| id = BS_C03_S02_V34_B2 | | id = BS_C03_S02_V34_B2 | ||
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‘अलौकिकोऽपि ज्ञानादिस्तच्छब्दैरेव भण्यते ।ज्ञापनार्थाय लोकस्य यथा राजेव देवराट्’ इति च पाद्मे ॥ 34 ॥ | ‘अलौकिकोऽपि ज्ञानादिस्तच्छब्दैरेव भण्यते ।ज्ञापनार्थाय लोकस्य यथा राजेव देवराट्’ इति च पाद्मे ॥ 34 ॥ | ||
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यथाऽऽदित्यस्य दर्पणादिस्थानविशेषात् प्रतिबिम्बविशेष एवमानन्दादेरपि । | यथाऽऽदित्यस्य दर्पणादिस्थानविशेषात् प्रतिबिम्बविशेष एवमानन्दादेरपि । | ||
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‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दः परमस्य च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥ | ‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दः परमस्य च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥ | ||
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‘ऐश्वर्यात् परमाद्विष्णोर्भक्त्यादीनामनादितः ।ब्रह्मादीनां सूपपन्ना ह्यानन्दादेर्विचित्रता’ इति हि पाद्मे ॥ 36 ॥ | ‘ऐश्वर्यात् परमाद्विष्णोर्भक्त्यादीनामनादितः ।ब्रह्मादीनां सूपपन्ना ह्यानन्दादेर्विचित्रता’ इति हि पाद्मे ॥ 36 ॥ | ||
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यथा जीवानन्दादेरन्यद्ब्रह्म तथोपासाकृतादपि । | यथा जीवानन्दादेरन्यद्ब्रह्म तथोपासाकृतादपि । | ||
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‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ इति प्रतिषेधात् । | ‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ इति प्रतिषेधात् । | ||
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‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम् । | ‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम् । | ||
ब्रह्मैव प्रतिबिम्बे यदतस्तेषां फलप्रदम् ॥ | |||
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तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा ।दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥ | तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा ।दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥ | ||
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सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते । | सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते । | ||
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‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’इति भाल्लवेयश्रुतिः | ‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’इति भाल्लवेयश्रुतिः | ||
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‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतःइति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ | ‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतःइति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ | ||
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आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥ | आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥ | ||
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अत एवेश्वरात् फलं भवति । न ह्यचेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिर्युज्यते ॥ 39 ॥ | अत एवेश्वरात् फलं भवति । न ह्यचेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिर्युज्यते ॥ 39 ॥ | ||
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‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’ इति ॥ 40 ॥ | ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’ इति ॥ 40 ॥ | ||
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यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद्भवति ।’ एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥ | यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद्भवति ।’ एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥ | ||
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परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मप्रवर्तकः ।’पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति हेतुव्यपदेशात् ।’द्रव्यं कर्म च कालश्च’ इति च ॥ 42 ॥ | परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मप्रवर्तकः ।’पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति हेतुव्यपदेशात् ।’द्रव्यं कर्म च कालश्च’ इति च ॥ 42 ॥ | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
भक्तिरस्मिन् पाद उच्यते। भक्त्यर्थं भगवन्महिमोक्तिः।
सन्ध्याधिकरणम्
ॐ सन्ध्ये सृष्टिराह हि ॐ ॥ 01-324 ॥
न स्वप्नोऽपि तं विना प्रतीयते । ‘न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ । रथान् रथयोगान् पथः सृजते’ इत्यादि श्रुतेः ॥ 01 ॥
ॐ निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॐ ॥ 02-325 ॥
‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्ममाणः’ इति च ।
‘एतस्माद्ध्येव पुत्रो जायत एतस्माद् भ्रातैतस्माद्भार्या यदेनं पुरुषमेष स्वप्नेनाभिहन्ति’ इति गौपवनश्रुतिश्च ॥ 02 ॥
ॐ मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्त स्वरूपत्वात् ॐ ॥03-326॥
केन साधनेन ?-
अनादिमनोगतान् संस्कारान् स्वेच्छामात्रेण प्रदर्शयति नान्येन साधनेन, सम्यगनभिव्यक्तत्वात् । ब्रह्माण्डे च –
‘मनोगतांस्तु संस्कारान् स्वेच्छया परमेश्वरः ।
प्रदर्शयति जीवाय स्वप्न इति गीयते ॥
यदन्यथात्वं जाग्रत्त्वं सा भ्रान्तिस्तत्र तत्कृता ।
अनभिव्यक्तरूपत्वान्नान्यसाधनजं भवेत्’ इति ॥ 03 ॥
ॐ सूचकश्च हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः ॐ ॥ 04-327 ॥
॥ इति सन्ध्याधिकरणम् ॥ 01 ॥
साधनान्तराभावेऽपि भावाभावसूचकत्वेन चेश्वरो दर्शयति ।
‘यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति ।
समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने’ इत्यादिश्रुतेः ।
हिशब्दाद्दर्शनाच्च ।
‘यद्वाऽपि ब्राह्मणो ब्रूयाद्देवता वृषभोऽपि वा ।
स्वप्नस्थमथवा राजा तत् तथैव भविष्यति’ ॥
इत्याद्याचक्षते च स्वप्नविदो व्यासादयः ॥ 04 ॥
पराभिध्यानाधिकरणम्
ॐ पराभिध्यानात् तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ॐ ॥05-328॥
॥ इति पराभिध्यानाधिकरणम्॥ 02 ॥
बन्धमोक्षप्रदत्वात् स एव स्वप्नतिरस्कर्ता ।
‘स्वप्नादिबुद्धिकर्ता च तिरस्कर्ता स एव च ।तदिच्छया यतो ह्यस्य बन्धमोक्षौ प्रतिष्ठितौ’ इति कौर्मे ॥ 05 ॥
देहयोगाधिकरणम्
ॐ देहयोगाद्वासोऽपि ॐ ॥ 06-329 ॥
॥ इति देहयोगाधिकरणम् ॥ 03 ॥
देहयोगेन वासो जाग्रदपि तत एव ।
‘स एव जागरिते स्थापयति स स्वप्ने स प्रभुस्तुराषाट् स एको बहुधा भवति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 06 ॥
तदभावाधिकरणम्
ॐ तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि ह ॐ ॥ 07-330 ॥
॥ इति तदभावाधिकरणम् ॥ 04 ॥
जाग्रत्स्वप्नाभावः सुप्तिः नाडीस्थे परमात्मनि ।
‘आसु तदा नाडीषु सुप्तो भवति’ ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति श्रुतेः ॥ 07 ॥
प्रभोधाधिकरणम्
ॐ अतः प्रभोधोऽस्मात् ॐ ॥ 08-331 ॥
॥ इति प्रभोधाधिकरणम्॥ 05 ॥
यतस्तस्मिन् सुप्तिः ॥
‘एष एव सुप्तं प्रभोधयत्येतस्माज्जीव उत्तिष्ठत्येष प्रमातै ष परमः’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 08 ॥
कर्मानुस्मृत्यधिकरणम्
ॐ स एव च कर्मानुस्मृतिशब्दविधिभ्यः ॐ ॥ 09-332 ॥
॥ इति कर्मानुस्मृत्यधिकरणम् ॥ 06 ॥
न च केषाञ्चित् स्वप्नादिकर्ता न तु सर्वेषामिति ।‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति कर्मण्यवधारणात् ॥
‘प्रदर्शकस्तु सर्वेषां स्वप्नादेरेक एव तु ।
परमः पुरुषो विष्णुस्ततोऽन्यो नास्ति कश्चन’ इत्यनुसारिस्मृतेश्च ॥
‘एष स्वप्नान् दर्शयत्येष प्रबोधयथ्यैष एव परम आनन्दः’ इति च श्रुतिः ॥
आत्मानमेव लोकमुपासीत’ इति च विधिः ॥ 09 ॥
सम्पत्त्यधिकरणम्
ॐ मुग्धेऽर्धसम्पत्तिः परिशेषात् ॐ ॥ 10-333 ॥
॥ इति मुग्धप्राप्त्यधिकरणम् (सम्पत्त्यधिकरणम्) ॥ 07 ॥
मोहावस्थायां परमेश्वरेऽर्धप्राप्तिर्जीवस्य ।
‘हृदयस्थात् पराज्जीवो दूरस्थो जाग्रदेष्यति । समीपस्थस्तथा स्वप्नं स्वपित्यस्मिन् लयं व्रजन् ॥
यत एवं त्रयोऽवस्था मोहस्तु परिशेषतः ।अर्धप्राप्तिरिति ज्ञेयो दुःखमात्रप्रतिस्मृतेः’इति वाराहे ॥
सोऽपि तत एवेति सिद्धम् ।
‘मूर्च्छा प्रबोधनं चैव यत एव प्रवर्तते ।स ईशः परमो ज्ञेयः परमानन्दलक्षणः’इति हि कौर्मे ॥ 10 ॥
स्थान(तोऽप्य)भेदाधिकरणम्
ॐ न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं सर्वत्र हि ॐ ॥ 11-334 ॥
स्वानापेक्षया, परमात्मनो भेदादनुग्राह्यानुग्राहकभाव इत्यत आह-
स्थानापेक्षयाऽपि परमात्मनो न भिन्नं रूपम् ।
‘सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति श्रुतिः ।
‘एकरूपः परो विष्णुः सर्वत्रापि न संशयः ।ऐश्वर्याद्रूपमेकं च सूर्यवद्बहुधेयते’ इति मात्स्ये ॥
‘प्रतिदृशमिव नैकधाऽर्कमेकं समधिगतोऽस्मि विधूतभेदमोहः’
इति च भागवते ॥ 11 ॥
ॐ न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात् ॐ॥ 12-335 ॥
‘कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतेजसौ ।
प्राज्ञः कारणबद्धस्तुद्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः’ ॥
इति भेदवचनान्नेति चेन्न ।‘एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ ।
‘अयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्’ ।
‘अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च । तदेतद्ब्रह्मापूपर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयामात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम्’ इति प्रत्येकमभेदवचनात् ॥ 12 ॥
ॐ अपि चैवमेके ॐ ॥ 13-336 ॥
॥ इति स्थान(तोऽप्य)भेदाधिकरणम् ॥ 08 ॥
एवमभेदेनैव । चशब्दादनन्तरूपत्वं चैके शाखिनः पठन्ति ।
‘अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः’ इति ।
अभेदेऽपि भेदव्यपदेशः स्थानभेदादैश्वर्ययोगाच्च युज्यते ।
ब्रह्मतर्के च-
‘बद्धो बन्धादिसाक्षित्वाद्भिन्नो भिन्नेषु संस्थितेः ।
निर्दोषाद्वयरूपोऽपि कथ्यते परमेश्वरः’ इति ॥ 13 ॥
अरूपाधिकरणम्
ॐ अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ॐ ॥ 14-337 ॥
रूपवत्त्वादनित्यत्वमित्यतो वक्ति-
प्रकृत्यादिप्रवर्तकत्वेन तदुत्तमत्वान्नैव रूपवद्ब्रह्म । हि शब्दाद्’अस्थूलमनणु’ इत्यादिश्रुतेश्च ।
‘भौतिकानि हि रूपाणि भूतेभ्योऽसौ परो यतः ।अरूपवानतः प्रोक्तः क्व तदव्यक्ततः परे’ इति च मात्स्ये॥ 14 ॥
ॐ प्रकाशवच्चावैयर्थ्यम् ॐ ॥ 15-338 ॥
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
‘श्यामाच्चबलं प्रपद्ये’‘सुवर्णज्योतिः’ इत्यादिश्रुतीनां च न वैयर्थ्यम् । विलक्षणरूपवत्वात् । यथा चक्षुरादिप्रकाशे विद्यमानेऽपि वैलक्षण्यादप्रकाशादिव्यवहारः ॥ 15 ॥
ॐ आह च तन्मात्रम् ॐ ॥ 16-339 ॥
वैलक्षण्यं चोच्यते रूपस्य विज्ञानानन्दमात्रत्वं’ऐकात्म्यप्रत्ययसारम्’ इति ।
आनन्दमात्रमजरं पुराणमेकं सन्तं बहुधा दृष्यमानम् ।तमात्मस्थं योऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 16 ॥
ॐ दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते ॐ ॥ 17-340 ॥
॥ इति अरूपाधिकरणम् ॥ 09॥
दर्शयति चानन्दस्य रूपत्वं
‘तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति’ इति ॥
‘शुद्धस्फटिकसङ्काशं वासुदेवं निरञ्जनम् ।चिन्तयीति यतिर्नान्यं ज्ञानरूपादृते हरेः’ इति च मात्स्ये॥ 17 ॥
उपमाधिकरणम्
ॐ अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॐ ॥ 18-341 ॥
॥ इति उपमाधिकरणम्॥ 10 ॥
यस्मादेवं परमेश्वरस्वरूपाणां मिथो न कश्चिद्वेदः अतः सादृश्याज्जीवस्यापि तथा स्यादिति तस्य प्रतिबिम्बत्वमुक्त्वा च शब्देन भेदं दर्शयति ।
‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’।
‘बहवः सूर्यका यद्वत् सूर्यस्य सदृशा जले ।
एवमेवात्मका लोके परात्मसदृशा मताः’ इत्यादि ॥
अथ एव भिन्नत्वतदधीनत्वतत्सादृश्यैरेव सूर्यकाद्युपमा, नोपाध्यधीनत्वादिना ॥ 18 ॥
अम्बुवदधिकरणम्
ॐ अम्बुवदग्रहणात् तु न तथात्वम् ॐ ॥ 19-342 ॥
नित्यसिद्धत्वात् सादृश्यस्य नित्यानन्दज्ञानादेर्न भक्तिज्ञानादिना प्रयोजनमित्यतो ब्रवीति-
॥ इति अम्बुवदधिकरणम् ॥ 11 ॥
अम्बुवद् स्नेहेन । ग्रहणं ज्ञानम्। भक्तिं विना न तत्सादृश्यं सम्यगभिव्यज्यते ।
‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्’ इति हि श्रुतिः।
‘महित्वबुद्धिर्भक्तिस्तु स्नेहपूर्वाऽभिधीयते ।तथैव व्यज्यते सम्यग्जीवरूपं सुखादिकम्’ इति पाद्मे ॥ 19 ॥
वृद्धिह्रासाधिकरणम्
ॐ वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम् ॐ ॥20-343॥
तस्य च भक्तिज्ञानदेर्वृद्धिह्रासभाक्त्वं विद्यते । ब्रह्मादीनामुत्तमानां सर्वेषां भक्तत्वेऽन्तर्भावात् । एवं भक्त्यादिविशेषाङ्गीकारादेवेश्वरस्य ब्रह्मादीनन्यान् प्रति च सामञ्जस्यं भवति।
‘साधनस्योत्तमत्वेन साध्यं चोत्तममाप्नुयुः ।ब्रह्मादयः क्रमेणैव यथाऽऽनन्दश्रुतौ श्रुताः’ इति च ब्राह्मे ॥ 20 ॥
ॐ दर्शनाच्च ॐ ॥ 21-344 ॥
कुतः? –
॥ इति वृद्धिह्रासाधिकरणम् ॥ 12 ॥
‘अथात आनन्दस्य मीमांसा भवति’ इत्यारभ्य ब्रह्मपर्यन्तेषु सुखे विशेषदर्शनात् । चशब्दात् स्मृतिः
यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृष्यते पुरुषोत्तमे ।
तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने’ इति ॥ 21 ॥
पालकत्वाधिकरणम्
ॐ प्रकृतैतावत्त्वं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भूयः ॐ ॥ 22-345 ॥
सृष्टिसंहारकर्तृत्वमेवास्य न पालकत्वं स्वतः सिद्धेरित्यत आह-
॥इति पालकत्वाधिकरणम् (प्रकृत्यधिकरणम्) ॥ 13 ॥
उक्तं सृष्टिसंहारकर्तृत्वमात्रं प्रतिषिध्य ततोऽधिकं ब्रवीति ।
‘नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति’ इति ।
च शब्दात् स्मृतिश्च ।
‘सृष्टिं च पालनं चैव संहारं नियमं तथा ।एक एव करोतीशः सर्वस्य जगतो हरिः’इति ब्रह्माण्डे ॥ 22 ॥
अव्यक्ताधिकरणम्
ॐ तदव्यक्तमाह हि ॐ ॥ 23-346 ॥
परमात्मापरोक्ष्यं च तत्प्रसादादेव न जीवशक्त्येति वक्तुमुच्यते-
अव्यक्तमेव तद्ब्रह्म स्वतः ।
‘अरूपमक्षरं ब्रह्म सदाऽव्यक्तं च निष्फलम्।यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरानन्दश्चाक्षयो भवेत्’ इति कौण्ठरव्यश्रुतिः ॥ 23 ॥
ॐ अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॐ ॥ 24-347 ॥
आराधनेऽप्यव्यक्तमेव । ज्ञानिप्रत्यक्षेणेतरेषामतिसूक्ष्मत्वलिङ्गादनुमानेन।
‘न तमाराधयित्वाऽपि कश्चिद्वक्तीकरिष्यति ।नित्याव्यक्तो यतो देवः परमात्मा सनातनः’ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ 24 ॥
ॐ प्रकाशवच्चावैशेष्यम् ॐ ॥ 25-348 ॥
नित्याव्यक्तरूपेण तथैव तिष्ठति। व्यक्तं किञ्चिद्रूपं गृहीत्वा दृश्यते । यधाऽग्न्यादयस्तन्मात्रारूपेणादृश्या अपि स्थूलरूपेण दृश्यन्त एवमिति चेन्न।
अग्न्यादिवत् स्थूलसूक्ष्मत्वविशेषाभावात्।
‘नासौ सूक्ष्मो न स्थूलः पर एव स भवति तस्मादाहुः परम इति’ इति माण्डव्यश्रुतेः ।
‘स्थूलसूक्ष्मविशेषोऽत्र न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्रैकप्रकारोऽसौ सर्वरूपेष्वजो यतः’ इति च गारुडे ॥
‘अव्यक्तव्यक्तभावौ च न क्वचित् परमेश्वरे ।सर्वत्राव्यक्तरूपोऽयं यत एव जनार्दनः’ इति च कौर्मे ॥ 25 ॥
ॐ प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ॐ ॥ 26-349 ॥
तर्हि किं यत्नेनेत्यत आह-
विषयभूते तस्मिन्नेव श्रवाणाध्यभ्यासात् प्रकाशश्च भवति ।‘आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोदव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’इति श्रुतेः ॥ 26 ॥
ॐ अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ॐ ॥ 27-350 ॥
नित्याव्यक्तस्य कथं प्रकाशः इत्यत उच्यते-
॥ इति अव्यक्ताधिकरणम् ॥ 14 ॥
उभयत्र प्रमाणभावात् तत्प्रसादादेव प्रकाशो भवति ।
‘तस्याभिध्यानाद्योजनात् तत्त्वभावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’
इति लिङ्गात् ।
युज्यते च तस्यानन्तशक्तित्वात् ।
नित्याव्यक्तोऽपि भगवानीक्ष्यते निजशक्तितः।तमृते परमात्मानं कः पश्येतामितं प्रभुम्’इति नारायणाध्यात्मे॥27॥
उभयव्यपदेशाधिकरणम्
ॐ उभयव्यपदेशात् त्त्वहिकुण्डलवत् ॐ ॥ 28-351 ॥
स्वरूपेणानन्दादिना कथमानन्दित्वादिरित्यत उच्यते-
‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्’ ।’अथैष एव परम आनन्दः’ इत्युभयव्यपदेशादहिकुण्डलवदेव युज्यते । यथाऽहिः कुण्डली कुण्डलं च । तुशब्दात् केवलश्रुतिगम्यत्वं दर्शयति ॥ 28 ॥
ॐ प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॐ ॥ 29-352 ॥
यथाऽऽदित्यस्य प्रकाशत्वं प्रकाशित्वं च, एवं वा दृष्टान्तः। तेजोरूपत्वाद्ब्रह्मणः ॥ 29 ॥
ॐ पूर्ववद्वा ॐ ॥ 30-353 ॥
यथैक एव कालः पूर्व इत्यवच्छेदकोऽवच्छेद्यश्च भवति। अतिसूक्ष्मत्वापेक्षयैष दृष्टान्तः। स्थूलमतीनां च प्रदर्शनार्थमहिकुण्डलदृष्टान्तः ।
‘प्रकाशवत् कालवद्वा यथाऽङ्गे शयनादिकम् ।ब्रह्मणश्चैव मुक्तानामानन्दोऽभिन्न एव तु’ इति नारायणाध्यात्मे।
‘आनन्देन त्वभिन्नेन व्यवहारः प्रकाशवत्।कालवद्वा यथा कालः स्वावच्छेदकतां व्रजेत्’ इति ब्राह्मे ॥ 30 ॥
ॐ प्रतिषेधाच्च ॐ ॥ 31-354 ॥
॥ इति उभयव्यपदेशाधिकरणम् (अहिकुण्डलाधिकरणम्) ॥ 15 ॥
‘एकमेवाद्वितीयम्’ ।‘नेह नानाऽस्ति किञ्चन’ इति भेदस्य ॥ 31 ॥
परानन्दा(परमता)धिकरणम्
ॐ परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ॐ ॥ 32-355 ॥
न चानन्दादित्वाल्लोकानन्दादिवत् । ‘एष सेतुर्विधृति’ ‘य एष आनन्दः परस्य’‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति सेतुत्वं ह्युच्यते.‘यतो वाचो निवर्तन्ते’ इत्युन्मानत्वम् ।‘एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति’ इति सम्बन्धः।
‘अन्यज्ञानं तु जीवानामन्यज्ज्ञानं परस्य चनित्यानन्दाव्ययं पूर्णं परज्ञानं विधीयते’ इति भेदः ॥
अतोऽलौकिकत्वात् परमेव ब्रह्मानन्दादिकम् ॥ 32 ॥
ॐ दर्शनात् तु ॐ ॥ 33-356 ॥
दर्शनादेवचान्यानन्दादीनाम् ।
‘अदृष्टमव्यवहार्यमव्यपदेश्यं सुखं ज्ञानमोजो बलमिति ब्रह्मणस्तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते तस्माद्ब्रह्मेत्याचक्षते’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 33 ॥
ॐ बुद्ध्यर्थः पादवत् ॐ ॥ 34-357 ॥
अप्रसिद्धस्य कथमानन्द इत्यादिव्यपदेश इत्यतो वक्ति –
॥ इति परानन्दा(परमता)धिकरणम् ॥16॥
जीवेश्वरसम्बन्धज्ञापनार्थमप्रसिद्धोऽपि पादो यथा पादशब्देन व्यपदिश्यते’पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति तथा ।
‘अलौकिकोऽपि ज्ञानादिस्तच्छब्दैरेव भण्यते ।ज्ञापनार्थाय लोकस्य यथा राजेव देवराट्’ इति च पाद्मे ॥ 34 ॥
स्थानविशेषाधिकरणम्
ॐ स्थानविशेषात् प्रकाशादिवत् ॐ ॥ 35-358 ॥
परानन्दमात्रत्वे कथं ब्रह्माद्यानन्दादीनां विशेष इत्यत उच्यते –
यथाऽऽदित्यस्य दर्पणादिस्थानविशेषात् प्रतिबिम्बविशेष एवमानन्दादेरपि ।
‘ब्रह्मादिगुणवैशेष्यादानन्दः परमस्य च ।प्रतिबिम्बत्वमायाति मध्योच्चादिविशेषतः’ इति वाराहे ॥ 35 ॥
ॐ उपपत्तेश्च ॐ ॥ 36-359 ॥
॥ इति स्थानविशेषाधिकरणम् ॥ 17 ॥
‘ऐश्वर्यात् परमाद्विष्णोर्भक्त्यादीनामनादितः ।ब्रह्मादीनां सूपपन्ना ह्यानन्दादेर्विचित्रता’ इति हि पाद्मे ॥ 36 ॥
तथान्यत्वाधिकरणम्
ॐ तथाऽन्यत् प्रतिषेधात् ॐ ॥ 37-360 ॥
ध्यानकाले यच्चित्ते दृष्यते तदेव ब्रह्मरूपम् । अतः कथमव्यक्ततेत्यत आह-
॥ इति प्रतिषेधाधिकरणम् (तथान्यत्वाधिकरणम्) ॥ 18 ॥
यथा जीवानन्दादेरन्यद्ब्रह्म तथोपासाकृतादपि ।
‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ इति प्रतिषेधात् ।
‘पश्यन्ति परमं ब्रह्म चित्ते यत्प्रतिबिम्बितम् ।
ब्रह्मैव प्रतिबिम्बे यदतस्तेषां फलप्रदम् ॥
तदुपासनं च भवति प्रतिमोपासनं यथा ।दृश्यते त्वपरोक्षेण ज्ञानेनैव परं पदम् ।उपासना त्वापरोक्ष्यं गमयेत् तत्प्रसादतः’इति च ब्रह्मतर्के ॥ 37 ॥
सर्वगतत्वाधिकरणम्
ॐ अनेन सर्वगतत्वमायामयशब्दादिभ्यः ॐ ॥ 38-361 ॥
देशकालान्तरेऽन्यतोऽपि सृष्ट्याधिर्युक्तेत्यतो ब्रूते-
॥ इति सर्वगतत्वाधिकरणम् ॥ 19 ॥
सर्वदेशकालवस्तुष्वनेनैव सृष्ट्यादिकं प्रवर्तते ।
‘एष सर्व एष सर्वगत एष ईश्वर एषोऽचिन्त्य एष परमः’इति भाल्लवेयश्रुतिः
‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात् सर्वदा सर्ववस्तुषु ।स्वरूपभूतया नित्यशक्त्या मायाख्यया यतःइति चतुर्वेदशिखायाम् ॥
आदिशब्दादन्यत्र प्रमाणाभावाच्च ॥ 38 ॥
फलदानाधिकरणम्
ॐ फलमत उपपत्तेः ॐ ॥ 39-362 ॥
कर्मापेक्षत्वात् फलदानस्य तदेव ददातीति न वाच्यम् । कुतः ?-
अत एवेश्वरात् फलं भवति । न ह्यचेतनस्य स्वतः प्रवृत्तिर्युज्यते ॥ 39 ॥
ॐ श्रुतत्वाच्च ॐ ॥ 40-363 ॥
‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्’ इति ॥ 40 ॥
ॐ धर्मं जैमिनिरत एव ॐ ॥ 41-364 ॥
यतः फलं तदेव कर्मेश्वराद्भवति ।’ एष ह्येव साधु कर्म कारयति’ इति श्रुतेरिति जैमिनिः ॥ 41 ॥
ॐ पूर्वं तु बादरायणो हेतु व्यपदेशात् ॐ ॥ 42-365 ॥
॥ इति फलदानाधिकरणम् ॥ 20 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्य विरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 03-02
परस्य कर्मणश्चोभयोः फलकारणत्वेऽपि न कर्म परप्रवर्तकम् । पर एव कर्मप्रवर्तकः ।’पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापम्’ इति हेतुव्यपदेशात् ।’द्रव्यं कर्म च कालश्च’ इति च ॥ 42 ॥