Brahmasutra/C2/S4: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 3: | Line 3: | ||
| chapter_num = 2 | | chapter_num = 2 | ||
| title = चतुर्थः पादः | | title = चतुर्थः पादः | ||
}} | }}युक्तिसहितश्रुतिविरोधं श्रुतीनामपाकरोत्यनेन पादेन । | ||
युक्तिसहितश्रुतिविरोधं श्रुतीनामपाकरोत्यनेन पादेन । | |||
‘प्राणा एवेदमग्र आसुस्तेभ्यो भूतानि जज्ञिरे । भूतेभ्योऽण्डमण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः । अथ प्राणा एवानादयः प्राणा नित्याः’ इति काषायणश्रुतौ प्राणानामनुत्पत्तिः श्रूयते । | ‘प्राणा एवेदमग्र आसुस्तेभ्यो भूतानि जज्ञिरे । भूतेभ्योऽण्डमण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः । अथ प्राणा एवानादयः प्राणा नित्याः’ इति काषायणश्रुतौ प्राणानामनुत्पत्तिः श्रूयते । | ||
| Line 30: | Line 29: | ||
| id = BS_C02_S04_V01_B1 | | id = BS_C02_S04_V01_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
यथाऽऽकाशादयः परमात्मन उत्पद्यन्ते तथा प्राणा अपि ॥ 01 ॥ | यथाऽऽकाशादयः परमात्मन उत्पद्यन्ते तथा प्राणा अपि ॥ 01 ॥ | ||
| Line 48: | Line 46: | ||
| id = BS_C02_S04_V02_B1 | | id = BS_C02_S04_V02_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अनादित्वश्रुतिर्गौणानादित्वापेक्षया । मुख्यासम्भवात् । | अनादित्वश्रुतिर्गौणानादित्वापेक्षया । मुख्यासम्भवात् । | ||
| Line 57: | Line 54: | ||
| id = BS_C02_S04_V02_B2 | | id = BS_C02_S04_V02_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘नित्यान्येतानि सौक्ष्म्येण हीन्द्रियाणि तु सर्वशः ।तेषां भूतैरुपचयः सृष्टिकाले विधीयते ।>परेण साम्यसम्प्राप्तेः कस्य स्यान्मुख्यनित्यता’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 02 ॥ | ‘नित्यान्येतानि सौक्ष्म्येण हीन्द्रियाणि तु सर्वशः ।तेषां भूतैरुपचयः सृष्टिकाले विधीयते ।>परेण साम्यसम्प्राप्तेः कस्य स्यान्मुख्यनित्यता’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 02 ॥ | ||
| Line 83: | Line 79: | ||
| id = BS_C02_S04_V03_B1 | | id = BS_C02_S04_V03_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘इदं सर्वमसृजत’ इति ॥ 03 ॥ | ‘इदं सर्वमसृजत’ इति ॥ 03 ॥ | ||
| Line 119: | Line 114: | ||
| id = BS_C02_S04_V04_B1 | | id = BS_C02_S04_V04_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति पूर्वोक्तत्वान्नानुत्पत्तिर्मनसो युज्यते। | ‘मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति पूर्वोक्तत्वान्नानुत्पत्तिर्मनसो युज्यते। | ||
| Line 128: | Line 122: | ||
| id = BS_C02_S04_V04_B2 | | id = BS_C02_S04_V04_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘पूर्वं मनः समुत्पन्नं ततोऽन्येषां समुद्भवः । | ‘पूर्वं मनः समुत्पन्नं ततोऽन्येषां समुद्भवः । | ||
तदनुत्पत्तिवचनमल्पोपचयकारणात्’॥ | |||
इति वायुप्रोक्तवचनं चशब्देन गृहीतम् ॥ 04 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 167: | Line 160: | ||
| id = BS_C02_S04_V05_B1 | | id = BS_C02_S04_V05_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘तस्मान्मन एव पूर्वरूपं वागुत्तररूपम्’ इति मनःपूर्वकत्वाद्वाचो नानुत्पत्तिः । | ‘तस्मान्मन एव पूर्वरूपं वागुत्तररूपम्’ इति मनःपूर्वकत्वाद्वाचो नानुत्पत्तिः । | ||
| Line 176: | Line 168: | ||
| id = BS_C02_S04_V05_B3 | | id = BS_C02_S04_V05_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘वागिन्द्रियस्य नित्यत्वं श्रुतिसन्निधियोग्यता ।उत्पत्तिर्मनसो यस्मान्न नित्यत्वं कुतश्चन’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 05 ॥ | ‘वागिन्द्रियस्य नित्यत्वं श्रुतिसन्निधियोग्यता ।उत्पत्तिर्मनसो यस्मान्न नित्यत्वं कुतश्चन’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 05 ॥ | ||
| Line 206: | Line 197: | ||
| id = BS_C02_S04_V06_B1 | | id = BS_C02_S04_V06_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
ज्ञानेन्द्रियापेक्षया सप्तत्वम् ।’गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त’ इति विशेषणात्। | ज्ञानेन्द्रियापेक्षया सप्तत्वम् ।’गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त’ इति विशेषणात्। | ||
| Line 215: | Line 205: | ||
| id = BS_C02_S04_V06_B2 | | id = BS_C02_S04_V06_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सप्तप्राणास्त्ववगतेः पञ्चप्राणाश्च कर्मणः । | ‘सप्तप्राणास्त्ववगतेः पञ्चप्राणाश्च कर्मणः । | ||
एवं प्राणद्वादशकं शरीरे नित्यसंस्थितम्’ । | |||
}} | }} | ||
| Line 225: | Line 214: | ||
| id = BS_C02_S04_V06_B4 | | id = BS_C02_S04_V06_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
इति भविष्यत्पर्ववचनं चशब्दात् ॥ 06 ॥ | इति भविष्यत्पर्ववचनं चशब्दात् ॥ 06 ॥ | ||
| Line 251: | Line 239: | ||
| id = BS_C02_S04_V07_B1 | | id = BS_C02_S04_V07_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
हस्तादीनां कर्मविषयत्वान्न सहपाठः। | हस्तादीनां कर्मविषयत्वान्न सहपाठः। | ||
| Line 260: | Line 247: | ||
| id = BS_C02_S04_V07_B2 | | id = BS_C02_S04_V07_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘संसारस्थितिहेतुत्वात् स्थितं कर्म विदो विदुः ।तस्मादुद्गतिहेतुत्वाज्ज्ञानं गतिरिहोच्यते’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 07 ॥ | ‘संसारस्थितिहेतुत्वात् स्थितं कर्म विदो विदुः ।तस्मादुद्गतिहेतुत्वाज्ज्ञानं गतिरिहोच्यते’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 07 ॥ | ||
| Line 298: | Line 284: | ||
| id = BS_C02_S04_V08_B1 | | id = BS_C02_S04_V08_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘तद्यथा ह्यणुनश्चक्षसः प्रकाशो व्यातत एवमेवास्य पुरुषस्य प्रकाशो व्याततोऽणुर्ह्येवैष पुरुषो भवति’ इति शाण्डिल्यश्रुतिः॥ 08 ॥ | ‘तद्यथा ह्यणुनश्चक्षसः प्रकाशो व्यातत एवमेवास्य पुरुषस्य प्रकाशो व्याततोऽणुर्ह्येवैष पुरुषो भवति’ इति शाण्डिल्यश्रुतिः॥ 08 ॥ | ||
| Line 329: | Line 314: | ||
| id = BS_C02_S04_V09_B1 | | id = BS_C02_S04_V09_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सौक्ष्म्येण ह वा एषोऽवतिष्ठते स्थूलत्वेनोदेति सूक्ष्मश्चाथो स्थूलश्च प्रकृतितः सूक्ष्मोऽन्यतः स्थूलोऽथैनमाहुः सादिरनादिरिति’ | ‘सौक्ष्म्येण ह वा एषोऽवतिष्ठते स्थूलत्वेनोदेति सूक्ष्मश्चाथो स्थूलश्च प्रकृतितः सूक्ष्मोऽन्यतः स्थूलोऽथैनमाहुः सादिरनादिरिति’ | ||
इति गौपवनश्रुतेः ॥ 09 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 356: | Line 340: | ||
| id = BS_C02_S04_V10_B1 | | id = BS_C02_S04_V10_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘चेष्टायां बाह्यवायौ च मुख्यप्राणे च गीयते । | ‘चेष्टायां बाह्यवायौ च मुख्यप्राणे च गीयते । | ||
प्राणशब्दस्त्रिषु ह्येषु मुखे मुख्यः प्रकीर्तितः’ | |||
}} | }} | ||
| Line 366: | Line 349: | ||
| id = BS_C02_S04_V10_B3 | | id = BS_C02_S04_V10_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
इति वायुक्रिययोरपि व्यपदेशादुत्पत्तिश्रुतिस्तयोर्न स्यात् । | इति वायुक्रिययोरपि व्यपदेशादुत्पत्तिश्रुतिस्तयोर्न स्यात् । | ||
‘स प्राणमसृजत’ …‘खं वायुर्ज्योतिरापः..’, ‘तपो मन्त्राः कर्म’ इति पृथगुपदेशात् । | |||
}} | }} | ||
| Line 376: | Line 358: | ||
| id = BS_C02_S04_V10_B4 | | id = BS_C02_S04_V10_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘भूतानि चेष्टा मन्त्राश्च मुख्यप्राणादिदं जगत् । | ‘भूतानि चेष्टा मन्त्राश्च मुख्यप्राणादिदं जगत् । | ||
मुख्यप्राणः परस्माच्च न परः कारणान्वितः’ | |||
इति वायुप्रोक्ते ॥ 10 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 409: | Line 390: | ||
| id = BS_C02_S04_V11_B1 | | id = BS_C02_S04_V11_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
चक्षुरादिवन्मुख्यप्राणोऽपि परमात्मवश एव । | चक्षुरादिवन्मुख्यप्राणोऽपि परमात्मवश एव । | ||
| Line 418: | Line 398: | ||
| id = BS_C02_S04_V11_B2 | | id = BS_C02_S04_V11_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वं ह्येवैतत् परमेऽवतिष्ठते प्राणश्च प्राणाश्च प्राणिनश्च स ह्येक एवैतान्नयत्युन्नयति वशीकरोति’ | ‘सर्वं ह्येवैतत् परमेऽवतिष्ठते प्राणश्च प्राणाश्च प्राणिनश्च स ह्येक एवैतान्नयत्युन्नयति वशीकरोति’ | ||
| Line 427: | Line 406: | ||
| id = BS_C02_S04_V11_B3 | | id = BS_C02_S04_V11_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
इति गौपवनश्रुतौ चक्षुरादिभिः सह तद्वशत्वेनैव शासनात् । | इति गौपवनश्रुतौ चक्षुरादिभिः सह तद्वशत्वेनैव शासनात् । | ||
| Line 436: | Line 414: | ||
| id = BS_C02_S04_V11_B4 | | id = BS_C02_S04_V11_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वकर्ताऽपि सन् प्राणः परमाधारतः स्थितः । | ‘सर्वकर्ताऽपि सन् प्राणः परमाधारतः स्थितः । | ||
कथमेवान्यथा न स्याद्यतो नैवेश्वरद्वयम् । | |||
}} | }} | ||
| Line 446: | Line 423: | ||
| id = BS_C02_S04_V11_B6 | | id = BS_C02_S04_V11_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अवान्तरेश्वरत्वेन तस्येश्वरवचो भवेत् । | अवान्तरेश्वरत्वेन तस्येश्वरवचो भवेत् । | ||
अतो मध्यमतामाहुस्तस्य वेदेषु वेदिनः । | |||
}} | }} | ||
| Line 456: | Line 432: | ||
| id = BS_C02_S04_V11_B8 | | id = BS_C02_S04_V11_B8 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अनन्येश्वरता प्राणे तदन्येश्वरवर्जनात् । | अनन्येश्वरता प्राणे तदन्येश्वरवर्जनात् । | ||
यतो विशेषवाक्येन ह्रियते समतावचः’ । | |||
}} | }} | ||
| Line 466: | Line 441: | ||
| id = BS_C02_S04_V11_B10 | | id = BS_C02_S04_V11_B10 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा’’नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ’ | ‘नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा’’नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ’ | ||
इत्यादिवचनयुक्तय आदिशब्दोक्ताः ॥ 11 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 493: | Line 467: | ||
| id = BS_C02_S04_V12_B1 | | id = BS_C02_S04_V12_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
इतरेषां प्राणानां करणत्वान्मुख्यस्याकरणत्वात् तस्यानेभ्य उत्तमत्वं युज्यते । | इतरेषां प्राणानां करणत्वान्मुख्यस्याकरणत्वात् तस्यानेभ्य उत्तमत्वं युज्यते । | ||
| Line 502: | Line 475: | ||
| id = BS_C02_S04_V12_B2 | | id = BS_C02_S04_V12_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
माण्डव्यश्रुतिश्च | माण्डव्यश्रुतिश्च | ||
‘तानि ह वा एतानि सर्वाणि करणान्यथ प्राण एवाकरणस्तस्मान्मुख्यस्तस्मान्मुख्य इत्याचक्षते’ इति ॥ 12 ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 542: | Line 514: | ||
| id = BS_C02_S04_V13_B1 | | id = BS_C02_S04_V13_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अथ पञ्चवृत्तैतत्प्रवर्तते प्राणा वाव पञ्चवृत्तिः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्चदासाः प्रजायन्ते । प्राणाद्वाव प्राणेऽपानादपानो व्यानाद्व्यान उदानादुदानः समानादेव समानो यथा ह वै मनः पञ्चधा व्यपदिश्यते मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेतनेति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्च दासाः प्रजायन्ते । मनसो वाव मनो बुद्धेर्बुद्धिरहङ्कारादहङ्कारश्चित्ताच्छित्तं चेतनाया एव चेतनैवमिति’ इति | ‘अथ पञ्चवृत्तैतत्प्रवर्तते प्राणा वाव पञ्चवृत्तिः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्चदासाः प्रजायन्ते । प्राणाद्वाव प्राणेऽपानादपानो व्यानाद्व्यान उदानादुदानः समानादेव समानो यथा ह वै मनः पञ्चधा व्यपदिश्यते मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेतनेति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्च दासाः प्रजायन्ते । मनसो वाव मनो बुद्धेर्बुद्धिरहङ्कारादहङ्कारश्चित्ताच्छित्तं चेतनाया एव चेतनैवमिति’ इति | ||
| Line 581: | Line 552: | ||
| id = BS_C02_S04_V14_B1 | | id = BS_C02_S04_V14_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
स वा एष प्राणोऽणुर्महान्नामाऽन्तर्वाऽणुर्बर्हिर्महान् प्राणो वा ईशितव्येश ईशो ह्यसौ सर्वस्येशितव्यश्च परस्य’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 14 ॥ | स वा एष प्राणोऽणुर्महान्नामाऽन्तर्वाऽणुर्बर्हिर्महान् प्राणो वा ईशितव्येश ईशो ह्यसौ सर्वस्येशितव्यश्च परस्य’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 14 ॥ | ||
| Line 611: | Line 581: | ||
| id = BS_C02_S04_V15_B1 | | id = BS_C02_S04_V15_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
यज्ज्योतिराद्यधिष्ठानं ब्रह्म तदेवैतैः करणैः प्रवर्तयति। ‘यः प्राणे तिष्ठन्’ इत्यादि तदामननात् ॥ 15 ॥ | यज्ज्योतिराद्यधिष्ठानं ब्रह्म तदेवैतैः करणैः प्रवर्तयति। ‘यः प्राणे तिष्ठन्’ इत्यादि तदामननात् ॥ 15 ॥ | ||
| Line 637: | Line 606: | ||
| id = BS_C02_S04_V16_B1 | | id = BS_C02_S04_V16_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
जीवेनैव स्वकरणैः कारयति परमात्मा । अतो न विरोधः । एष ह्यनेनात्मना चक्षुषा दर्शयति श्रोत्रेण श्रावयति मनसा मनयति बुद्ध्या बोधयति तस्मादेतावाहुः सृतिरसृतिरिति’ इति भाल्लवेयश्रुतेः । | जीवेनैव स्वकरणैः कारयति परमात्मा । अतो न विरोधः । एष ह्यनेनात्मना चक्षुषा दर्शयति श्रोत्रेण श्रावयति मनसा मनयति बुद्ध्या बोधयति तस्मादेतावाहुः सृतिरसृतिरिति’ इति भाल्लवेयश्रुतेः । | ||
| Line 646: | Line 614: | ||
| id = BS_C02_S04_V16_B2 | | id = BS_C02_S04_V16_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘करणैः कारणं ब्रह्म पुरुषापेक्षयाऽखिलम् । | ‘करणैः कारणं ब्रह्म पुरुषापेक्षयाऽखिलम् । | ||
श्रोत्रादिभिः कारयति करणानीत्यतो विदुः । | |||
}} | }} | ||
| Line 656: | Line 623: | ||
| id = BS_C02_S04_V16_B4 | | id = BS_C02_S04_V16_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
न जीवापेक्षया मुख्यं कारयेत् परमेश्वरः ।केवलात्मेच्छया तस्मान्मुख्यत्वं तस्य निश्चितम्’ इति वाराहे ॥ 16 ॥ | न जीवापेक्षया मुख्यं कारयेत् परमेश्वरः ।केवलात्मेच्छया तस्मान्मुख्यत्वं तस्य निश्चितम्’ इति वाराहे ॥ 16 ॥ | ||
| Line 682: | Line 648: | ||
| id = BS_C02_S04_V17_B1 | | id = BS_C02_S04_V17_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अनादिनित्यत्वाज्जीवकरणसम्बन्धस्य युज्यते तत्करणत्वश्रुतिः ।’अथावियोगीनि । करणैर्र्वाव न वियुज्यते देहेनैव वियुज्यत इत्येतद्वाव करणानां करणत्वं यद्वाव न वियुज्यते’ इति गौपवनश्रुतिः । | अनादिनित्यत्वाज्जीवकरणसम्बन्धस्य युज्यते तत्करणत्वश्रुतिः ।’अथावियोगीनि । करणैर्र्वाव न वियुज्यते देहेनैव वियुज्यत इत्येतद्वाव करणानां करणत्वं यद्वाव न वियुज्यते’ इति गौपवनश्रुतिः । | ||
| Line 691: | Line 656: | ||
| id = BS_C02_S04_V17_B2 | | id = BS_C02_S04_V17_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
चशब्दः करणसम्बन्धग्राही ॥ 17 ॥ | चशब्दः करणसम्बन्धग्राही ॥ 17 ॥ | ||
| Line 720: | Line 684: | ||
| id = BS_C02_S04_V18_B1 | | id = BS_C02_S04_V18_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
मुख्यप्राणमृते त एवेन्द्रियाणि । | मुख्यप्राणमृते त एवेन्द्रियाणि । | ||
| Line 729: | Line 692: | ||
| id = BS_C02_S04_V18_B2 | | id = BS_C02_S04_V18_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुः प्राणो मुख्यस्त्वनिन्द्रियम् ।द्रवतां हीन्द्रियाणां तु नियन्ता प्राण एकराट्’ इति पौत्रायणश्रुतिः । | ‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुः प्राणो मुख्यस्त्वनिन्द्रियम् ।द्रवतां हीन्द्रियाणां तु नियन्ता प्राण एकराट्’ इति पौत्रायणश्रुतिः । | ||
| Line 738: | Line 700: | ||
| id = BS_C02_S04_V18_B4 | | id = BS_C02_S04_V18_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘श्रोत्रादीनि तु पञ्चैव तथा वागादिपञ्चकम् । | ‘श्रोत्रादीनि तु पञ्चैव तथा वागादिपञ्चकम् । | ||
मनोबुद्धिसहायानि द्वादशैवेन्द्रियाणि तु । | |||
}} | }} | ||
| Line 748: | Line 709: | ||
| id = BS_C02_S04_V18_B6 | | id = BS_C02_S04_V18_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
विषयद्रवणात् तेषामिन्द्रियत्वमुदाहृतम् ।तेषां नियामकः प्राणः स्थित एवाखिलप्रभुः’इति बृहत्संहितायाम् ॥18॥ | विषयद्रवणात् तेषामिन्द्रियत्वमुदाहृतम् ।तेषां नियामकः प्राणः स्थित एवाखिलप्रभुः’इति बृहत्संहितायाम् ॥18॥ | ||
| Line 766: | Line 726: | ||
| id = BS_C02_S04_V19_B1 | | id = BS_C02_S04_V19_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘स्थित एव हीदं मुख्यप्राणः करोति कारयति बलति बालयति धत्ते धारयति प्रभुं वा एनमाहुरथेन्द्रियाणि न स्थितानि न कुर्वन्ति न कारयन्ति न बलन्ति न बालयन्ति न दधते न धारयन्ति तानि ह वा एतान्यबलानि तस्मादाहुरिन्द्रियाणि करणानि’ इति पौत्रायणश्रुतेः ॥ 19 ॥ | ‘स्थित एव हीदं मुख्यप्राणः करोति कारयति बलति बालयति धत्ते धारयति प्रभुं वा एनमाहुरथेन्द्रियाणि न स्थितानि न कुर्वन्ति न कारयन्ति न बलन्ति न बालयन्ति न दधते न धारयन्ति तानि ह वा एतान्यबलानि तस्मादाहुरिन्द्रियाणि करणानि’ इति पौत्रायणश्रुतेः ॥ 19 ॥ | ||
| Line 792: | Line 751: | ||
| id = BS_C02_S04_V20_B1 | | id = BS_C02_S04_V20_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
पुरुषापेक्षया प्रवृत्तिरिन्द्रियाणां दृष्यते न मुख्यस्य । ‘प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति’ इति च श्रुतेः ॥ 20 ॥ | पुरुषापेक्षया प्रवृत्तिरिन्द्रियाणां दृष्यते न मुख्यस्य । ‘प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति’ इति च श्रुतेः ॥ 20 ॥ | ||
| Line 831: | Line 789: | ||
| id = BS_C02_S04_V21_B1 | | id = BS_C02_S04_V21_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
नामरूपक्लृप्तिः परादेव। | नामरूपक्लृप्तिः परादेव। | ||
| Line 840: | Line 797: | ||
| id = BS_C02_S04_V21_B2 | | id = BS_C02_S04_V21_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् य आस्ते’ इति श्रुतेः। | ‘सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् य आस्ते’ इति श्रुतेः। | ||
| Line 849: | Line 805: | ||
| id = BS_C02_S04_V21_B4 | | id = BS_C02_S04_V21_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
त्रिवृत्कुर्वत इति हेतुगर्भः । त्रिवृत्करणापेक्षत्वान्नामरूपयोः ॥ | त्रिवृत्कुर्वत इति हेतुगर्भः । त्रिवृत्करणापेक्षत्वान्नामरूपयोः ॥ | ||
| Line 858: | Line 813: | ||
| id = BS_C02_S04_V21_B5 | | id = BS_C02_S04_V21_B5 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘सर्वनाम्नां च रूपाणां व्यवहारेषु केशवः ।एक एव यतः स्रष्टा ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः’ इति च पाद्मे ॥ | ‘सर्वनाम्नां च रूपाणां व्यवहारेषु केशवः ।एक एव यतः स्रष्टा ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः’ इति च पाद्मे ॥ | ||
| Line 867: | Line 821: | ||
| id = BS_C02_S04_V21_B7 | | id = BS_C02_S04_V21_B7 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया । | ‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया । | ||
रूपापेक्षं तथा नाम व्यवहारस्तदात्मकः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 877: | Line 830: | ||
| id = BS_C02_S04_V21_B9 | | id = BS_C02_S04_V21_B9 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अतो नाम्नश्च रूपस्य व्यवहारस्य चैकराट् ।हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः’इति च ब्रह्माण्डे ॥ 21 ॥ | अतो नाम्नश्च रूपस्य व्यवहारस्य चैकराट् ।हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः’इति च ब्रह्माण्डे ॥ 21 ॥ | ||
| Line 907: | Line 859: | ||
| id = BS_C02_S04_V22_B1 | | id = BS_C02_S04_V22_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘यत् कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं तदापो यदुष्णं तत् तेजः’ इति श्रुतेर्मांसाद्येव भौमं न सर्वशरीरम्। अप्तेजसोश्च कार्यं यथाशब्दमङ्गीकर्तव्यम् ॥ | ‘यत् कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं तदापो यदुष्णं तत् तेजः’ इति श्रुतेर्मांसाद्येव भौमं न सर्वशरीरम्। अप्तेजसोश्च कार्यं यथाशब्दमङ्गीकर्तव्यम् ॥ | ||
| Line 916: | Line 867: | ||
| id = BS_C02_S04_V22_B3 | | id = BS_C02_S04_V22_B3 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘यद्वा वाऽथो विमिश्रं मिश्राद्ध्येतद्भवति मिश्राणि हि भूतानि तस्मादेवैवमाचक्षते भूतानि’ | ‘यद्वा वाऽथो विमिश्रं मिश्राद्ध्येतद्भवति मिश्राणि हि भूतानि तस्मादेवैवमाचक्षते भूतानि’ | ||
इति हि काषायणश्रुतिः । | |||
}} | }} | ||
| Line 926: | Line 876: | ||
| id = BS_C02_S04_V22_B4 | | id = BS_C02_S04_V22_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘पञ्चभूतात्मकं सर्वं तदप्येकविवक्षया । | ‘पञ्चभूतात्मकं सर्वं तदप्येकविवक्षया । | ||
एकभूतात्मकत्वेन व्यवहारस्तु वैदिके । | |||
}} | }} | ||
| Line 936: | Line 885: | ||
| id = BS_C02_S04_V22_B6 | | id = BS_C02_S04_V22_B6 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
भौममित्येव काठिन्याच्छौक्ल्यादौदकमित्यपि ।तेजिष्टत्त्वात् तैजसं च यथाऽस्थ्नां वचनं श्रुतौ’इति वायुप्रोक्ते ॥22॥ | भौममित्येव काठिन्याच्छौक्ल्यादौदकमित्यपि ।तेजिष्टत्त्वात् तैजसं च यथाऽस्थ्नां वचनं श्रुतौ’इति वायुप्रोक्ते ॥22॥ | ||
| Line 986: | Line 934: | ||
| id = BS_C02_S04_V23_B1 | | id = BS_C02_S04_V23_B1 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
भूतानां विशेषसंयोगादेव विशेषव्यवहारः । | भूतानां विशेषसंयोगादेव विशेषव्यवहारः । | ||
| Line 995: | Line 942: | ||
| id = BS_C02_S04_V23_B2 | | id = BS_C02_S04_V23_B2 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘पार्थिवानां शरीराणामर्धेन पृथिवी स्मृताः । | ‘पार्थिवानां शरीराणामर्धेन पृथिवी स्मृताः । | ||
इतरेऽर्धे त्रिभागिन्य आपस्तेजस्तुभागतः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,005: | Line 951: | ||
| id = BS_C02_S04_V23_B4 | | id = BS_C02_S04_V23_B4 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
इति सामान्यतो ज्ञेयं भेदश्च प्रतिपूरुषम् ।स्वर्गस्थानां शरीराणामर्धं तेज उदाहृतम्’इति च ब्रह्मसंहितायाम् ॥ | इति सामान्यतो ज्ञेयं भेदश्च प्रतिपूरुषम् ।स्वर्गस्थानां शरीराणामर्धं तेज उदाहृतम्’इति च ब्रह्मसंहितायाम् ॥ | ||
| Line 1,014: | Line 959: | ||
| id = BS_C02_S04_V23_B7 | | id = BS_C02_S04_V23_B7 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
सर्वाध्यायार्थावधारणार्थऽध्यायान्ते द्विरुक्तिः। | सर्वाध्यायार्थावधारणार्थऽध्यायान्ते द्विरुक्तिः। | ||
| Line 1,023: | Line 967: | ||
| id = BS_C02_S04_V23_B8 | | id = BS_C02_S04_V23_B8 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
गारुडे च- | गारुडे च- | ||
| Line 1,032: | Line 975: | ||
| id = BS_C02_S04_V23_B9 | | id = BS_C02_S04_V23_B9 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
‘अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्याद्वेदे वा वैदिकेऽपि वा । | ‘अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्याद्वेदे वा वैदिकेऽपि वा । | ||
विचारो यत्र सज्ज्येत पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,042: | Line 984: | ||
| id = BS_C02_S04_V23_B11 | | id = BS_C02_S04_V23_B11 | ||
| name = Bhashyam | | name = Bhashyam | ||
| text = | | text = | ||
अनुक्तानां प्रमाणानां स्वीकारश्च कृतो भवेत् । | अनुक्तानां प्रमाणानां स्वीकारश्च कृतो भवेत् । | ||
विनिन्द्य चेतरान् मार्गान् सम्पूर्णफलता तथा ॥ इति ॥ 23 ॥ | |||
}} | }} | ||
[[Category:Brahmasutra]] | [[Category:Brahmasutra]] | ||
Revision as of 16:45, 9 April 2026
युक्तिसहितश्रुतिविरोधं श्रुतीनामपाकरोत्यनेन पादेन ।
‘प्राणा एवेदमग्र आसुस्तेभ्यो भूतानि जज्ञिरे । भूतेभ्योऽण्डमण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः । अथ प्राणा एवानादयः प्राणा नित्याः’ इति काषायणश्रुतौ प्राणानामनुत्पत्तिः श्रूयते ।
‘नोपादानं हीन्द्रियाणामतोऽनुत्पत्तिरिष्यते । उपादानकृता सृष्टिः सर्वलोकेषु दृष्यते’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥
‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति च ।
अत उच्यते –
प्राणाधिकरणम्
ॐ तथा प्राणाः ॐ ॥ 01-272 ॥
यथाऽऽकाशादयः परमात्मन उत्पद्यन्ते तथा प्राणा अपि ॥ 01 ॥
ॐ गौण्यसम्भवात् ॐ ॥ 02-273 ॥
अनादित्वश्रुतिर्गौणानादित्वापेक्षया । मुख्यासम्भवात् ।
‘नित्यान्येतानि सौक्ष्म्येण हीन्द्रियाणि तु सर्वशः ।तेषां भूतैरुपचयः सृष्टिकाले विधीयते ।>परेण साम्यसम्प्राप्तेः कस्य स्यान्मुख्यनित्यता’ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 02 ॥
ॐ प्रतिज्ञानुपरोधाच्च ॐ ॥ 03-274 ॥
॥ इति प्राणाधिकरणम् (प्राणोत्पत्त्यधिकरणम्)
‘इदं सर्वमसृजत’ इति ॥ 03 ॥
मनोधिकरणम्
ॐ तत् प्राक्ष्रुतेश्च ॐ ॥ 04-275 ॥
‘द्विधा हैवेन्द्रियाणि नित्यानि चानित्यानि च । तत्र नित्यं मनोऽनादित्वान्न ह्यमनाः पुमांस्तिष्ठत्यनित्यान्यन्यानि’ इति गौपवनश्रुतौ मनसोऽनुत्पत्तिः सयुक्तिका श्रूयते । अत आह-
॥ इति मनोधिकरणम् (तत्प्रागधिकरणम्)
‘मनः सर्वेन्द्रियाणि च’ इति पूर्वोक्तत्वान्नानुत्पत्तिर्मनसो युज्यते।
‘पूर्वं मनः समुत्पन्नं ततोऽन्येषां समुद्भवः ।
तदनुत्पत्तिवचनमल्पोपचयकारणात्’॥
इति वायुप्रोक्तवचनं चशब्देन गृहीतम् ॥ 04 ॥वागधिकरणम्
ॐ तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॐ॥ 05-276 ॥
‘नित्ययाऽनित्यया स्तौमि परमात्मानमच्युत्तम्’ इति ।
‘वाग्वाव नित्या न ह्येषोत्पद्यतेऽस्यां हि श्रुतिरवतिष्ठते’ इति सयुक्तिकं पौष्यायणश्रुतौ वाचोऽनुत्पत्तिरुच्यते । अतो ब्रवीति –
॥ इति वागधिकरणम् (तत्पूर्वकत्वाधिकरणम्)॥
‘तस्मान्मन एव पूर्वरूपं वागुत्तररूपम्’ इति मनःपूर्वकत्वाद्वाचो नानुत्पत्तिः ।
‘वागिन्द्रियस्य नित्यत्वं श्रुतिसन्निधियोग्यता ।उत्पत्तिर्मनसो यस्मान्न नित्यत्वं कुतश्चन’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 05 ॥
सप्तगत्यधिकरणम्
ॐ सप्तगतेर्विशेषितत्वाच्च ॐ ॥ 06-277 ॥
‘सप्तप्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति श्रुतिः।
‘सप्तैव मारुता बाह्ये प्राणाः सप्त तथाऽऽत्मनि । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे सङ्ख्यासाम्यं विदो विदुः’ इति च स्कान्दे।‘द्वादश वा एते प्राणा द्वादश मासा द्वादशादित्या द्वादशराशयो द्वादशग्रहाः’ इति कौण्डिण्यश्रुतौ द्वादशप्राणादृष्यन्ते । अतो वक्ति-
ज्ञानेन्द्रियापेक्षया सप्तत्वम् ।’गुहाशयां निहिताः सप्त सप्त’ इति विशेषणात्।
‘सप्तप्राणास्त्ववगतेः पञ्चप्राणाश्च कर्मणः ।
एवं प्राणद्वादशकं शरीरे नित्यसंस्थितम्’ ।
इति भविष्यत्पर्ववचनं चशब्दात् ॥ 06 ॥
ॐ हस्तादयस्तुस्थितेऽतो नैवम् ॐ ॥ 07-278 ॥
॥ इति सप्तगत्यधिकरणम् ॥ 04 ॥
हस्तादीनां कर्मविषयत्वान्न सहपाठः।
‘संसारस्थितिहेतुत्वात् स्थितं कर्म विदो विदुः ।तस्मादुद्गतिहेतुत्वाज्ज्ञानं गतिरिहोच्यते’ इति वायुप्रोक्ते ॥ 07 ॥
अण्व(णुत्वा)धिकरणम्
ॐ अणवश्च ॐ ॥ 08-279 ॥
‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्तिः प्रतीयते ।दूरश्रवणदर्शनादियुक्तिश्च।
अणुभिः पश्यत्यणुभिः कृणोति प्राणा वा अणवः प्राणैर्ह्येतद्भवति’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ।अतो वक्ति-
॥ इति अण्व(णुत्वा)धिकरणम् ॥ 05 ॥
‘तद्यथा ह्यणुनश्चक्षसः प्रकाशो व्यातत एवमेवास्य पुरुषस्य प्रकाशो व्याततोऽणुर्ह्येवैष पुरुषो भवति’ इति शाण्डिल्यश्रुतिः॥ 08 ॥
मुख्यप्राणाधिकरणम्
ॐ श्रेष्ठश्च ॐ ॥ 09-280 ॥
‘नैष प्राण उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता । अथैनमाहुर्मध्यम इति’ इति मुख्यप्राणस्यानुत्पत्तिः श्रूयते ।
‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते’ ॥ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
‘आत्मत एष प्राणो जायते’ इति च ।
अत आह‘सौक्ष्म्येण ह वा एषोऽवतिष्ठते स्थूलत्वेनोदेति सूक्ष्मश्चाथो स्थूलश्च प्रकृतितः सूक्ष्मोऽन्यतः स्थूलोऽथैनमाहुः सादिरनादिरिति’
इति गौपवनश्रुतेः ॥ 09 ॥
ॐ न वायुक्रिये पृथुगुपदेशात् ॐ ॥ 10-281 ॥
॥ इति मुख्यप्राणाधिकरणम् (श्रेष्ठाधिकरणम्)
‘चेष्टायां बाह्यवायौ च मुख्यप्राणे च गीयते ।
प्राणशब्दस्त्रिषु ह्येषु मुखे मुख्यः प्रकीर्तितः’
इति वायुक्रिययोरपि व्यपदेशादुत्पत्तिश्रुतिस्तयोर्न स्यात् ।
‘स प्राणमसृजत’ …‘खं वायुर्ज्योतिरापः..’, ‘तपो मन्त्राः कर्म’ इति पृथगुपदेशात् ।
‘भूतानि चेष्टा मन्त्राश्च मुख्यप्राणादिदं जगत् ।
मुख्यप्राणः परस्माच्च न परः कारणान्वितः’
इति वायुप्रोक्ते ॥ 10 ॥चक्षुराद्यधिकरणम्
ॐ चक्षुरादिवत् तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॐ ॥ 11-282 ॥
‘प्राणादिदमाविरासीत् प्राणो धत्ते प्राणे लयमभ्युपैति न प्राणः किञ्चिदाश्रितः’ इत्याग्निवेश्यश्रुतौ ।
‘यदाश्रयादस्य चेष्टा सोऽन्यं कथमुपाश्रयेत् । यथा प्राणस्तथा राजा सर्वस्यैकाश्रयो भवेत्’ इति च युक्तिर्भारते।
‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः । न परः कञ्चिदाश्रित्य वर्तते परमो यतः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
अत आह-चक्षुरादिवन्मुख्यप्राणोऽपि परमात्मवश एव ।
‘सर्वं ह्येवैतत् परमेऽवतिष्ठते प्राणश्च प्राणाश्च प्राणिनश्च स ह्येक एवैतान्नयत्युन्नयति वशीकरोति’
इति गौपवनश्रुतौ चक्षुरादिभिः सह तद्वशत्वेनैव शासनात् ।
‘सर्वकर्ताऽपि सन् प्राणः परमाधारतः स्थितः ।
कथमेवान्यथा न स्याद्यतो नैवेश्वरद्वयम् ।
अवान्तरेश्वरत्वेन तस्येश्वरवचो भवेत् ।
अतो मध्यमतामाहुस्तस्य वेदेषु वेदिनः ।
अनन्येश्वरता प्राणे तदन्येश्वरवर्जनात् ।
यतो विशेषवाक्येन ह्रियते समतावचः’ ।
‘नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा’’नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ’
इत्यादिवचनयुक्तय आदिशब्दोक्ताः ॥ 11 ॥
ॐ अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॐ ॥ 12-283 ॥
॥ इति चक्षुराद्यधिकरणम् ॥ 07 ॥
इतरेषां प्राणानां करणत्वान्मुख्यस्याकरणत्वात् तस्यानेभ्य उत्तमत्वं युज्यते ।
माण्डव्यश्रुतिश्च
‘तानि ह वा एतानि सर्वाणि करणान्यथ प्राण एवाकरणस्तस्मान्मुख्यस्तस्मान्मुख्य इत्याचक्षते’ इति ॥ 12 ॥
पञ्चवृत्त्यधिकरणम्
ॐ पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॐ ॥ 13-284 ॥
‘सर्वे वा एते मुख्यदासाः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । ‘अथ प्राणो वाव सम्राट्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
‘प्राणापानादयः सर्वे मुख्यदासा यतेऽनिशम् ।अतस्तदाज्ञया नित्यं स्वानि कर्माणि कुर्वते’ इति युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
‘मुख्यस्यैव स्वरूपाणि प्राणाध्याः पञ्चवायवः ।स एव प्राणिनां देहे पञ्चधा वर्ततेऽनिशम्’ इति च गौपमश्रुतिः ।
अतो वक्ति-॥ इति पञ्चवृत्त्यधिकरणम् ॥ 08 ॥
‘अथ पञ्चवृत्तैतत्प्रवर्तते प्राणा वाव पञ्चवृत्तिः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्चदासाः प्रजायन्ते । प्राणाद्वाव प्राणेऽपानादपानो व्यानाद्व्यान उदानादुदानः समानादेव समानो यथा ह वै मनः पञ्चधा व्यपदिश्यते मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं चेतनेति । तेभ्यो वा एतेभ्यः पञ्च दासाः प्रजायन्ते । मनसो वाव मनो बुद्धेर्बुद्धिरहङ्कारादहङ्कारश्चित्ताच्छित्तं चेतनाया एव चेतनैवमिति’ इति
प्राणाणुत्वाधिकरणम्
ॐ अणुश्च ॐ ॥ 14-285 ॥
‘प्राण एवाधस्तात् प्राण उपरिष्ठात् प्राणो मध्यतः प्राणः सर्वतः प्राण एवेदं सर्वम्’ इति प्राणस्य व्याप्तिः प्रतीयते ।
‘यतः सर्वं जगद्व्याप्य तिष्ठति प्राण एव तु । अतो धृतं जगत् सर्वमन्यथा केन धार्यते’ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
‘अणुनैतत्सृज्यतेऽणुनैतद्धार्यते अणौ लयमभ्युपैति प्राणो वा अणुः प्राणो ह्येतद्भवति’ इति च सौत्रायणश्रुतिः ॥
अत आह –॥ इति प्राणाणुत्वाधिकरणम् ॥ 09 ॥
स वा एष प्राणोऽणुर्महान्नामाऽन्तर्वाऽणुर्बर्हिर्महान् प्राणो वा ईशितव्येश ईशो ह्यसौ सर्वस्येशितव्यश्च परस्य’ इति हि कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 14 ॥
ज्योतिराद्यधिकरणम्
ॐ ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॐ ॥ 15-286 ॥
करणत्वं प्राणानामुक्तम् ।
‘जीवस्य करणान्याहुः प्राणानेतांस्तु सर्वशः।यस्मात् तद्वशगा एते दृश्यन्ते सर्वदेहिषु’ इति सौत्रायणश्रुतौ सयुक्तिकं जीवकरणत्वं प्रतीयते।‘ब्रह्मणो वा एतानि करणानि चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति तद्ध्येतैः कारयति’ इति काषायणश्रुतौ । अत आह –
यज्ज्योतिराद्यधिष्ठानं ब्रह्म तदेवैतैः करणैः प्रवर्तयति। ‘यः प्राणे तिष्ठन्’ इत्यादि तदामननात् ॥ 15 ॥
ॐ प्राणवता शब्दात् ॐ ॥ 16-287 ॥
कथं जीवकरणत्वश्रुतिरित्यतो वक्ति –
जीवेनैव स्वकरणैः कारयति परमात्मा । अतो न विरोधः । एष ह्यनेनात्मना चक्षुषा दर्शयति श्रोत्रेण श्रावयति मनसा मनयति बुद्ध्या बोधयति तस्मादेतावाहुः सृतिरसृतिरिति’ इति भाल्लवेयश्रुतेः ।
‘करणैः कारणं ब्रह्म पुरुषापेक्षयाऽखिलम् ।
श्रोत्रादिभिः कारयति करणानीत्यतो विदुः ।
न जीवापेक्षया मुख्यं कारयेत् परमेश्वरः ।केवलात्मेच्छया तस्मान्मुख्यत्वं तस्य निश्चितम्’ इति वाराहे ॥ 16 ॥
ॐ तस्य च नित्यत्वात् ॐ ॥ 17-288 ॥
॥ इति ज्योतिराद्यधिकरणम् ॥ 10 ॥
अनादिनित्यत्वाज्जीवकरणसम्बन्धस्य युज्यते तत्करणत्वश्रुतिः ।’अथावियोगीनि । करणैर्र्वाव न वियुज्यते देहेनैव वियुज्यत इत्येतद्वाव करणानां करणत्वं यद्वाव न वियुज्यते’ इति गौपवनश्रुतिः ।
चशब्दः करणसम्बन्धग्राही ॥ 17 ॥
इन्द्रियाधिकरणम्
ॐ त इन्द्रियाण् तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॐ ॥ 18-289 ॥
‘अथेन्द्रियाणि प्राणा वा इन्द्रियाणि प्राणा हीदं द्रवन्ति’ इति सयुक्तिकपौत्रायणश्रुतिः सामान्येन प्राणानामिन्द्रियत्वं वक्ति ।
‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुर्मनोबुद्धी तु द्वादश’ इति च काषायणश्रुतिः ।अतः कस्येन्द्रियत्वं निवार्यत इत्यतो वक्ति-
मुख्यप्राणमृते त एवेन्द्रियाणि ।
‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुः प्राणो मुख्यस्त्वनिन्द्रियम् ।द्रवतां हीन्द्रियाणां तु नियन्ता प्राण एकराट्’ इति पौत्रायणश्रुतिः ।
‘श्रोत्रादीनि तु पञ्चैव तथा वागादिपञ्चकम् ।
मनोबुद्धिसहायानि द्वादशैवेन्द्रियाणि तु ।
विषयद्रवणात् तेषामिन्द्रियत्वमुदाहृतम् ।तेषां नियामकः प्राणः स्थित एवाखिलप्रभुः’इति बृहत्संहितायाम् ॥18॥
ॐ भेदश्रुतेः ॐ ॥ 19-290 ॥
‘स्थित एव हीदं मुख्यप्राणः करोति कारयति बलति बालयति धत्ते धारयति प्रभुं वा एनमाहुरथेन्द्रियाणि न स्थितानि न कुर्वन्ति न कारयन्ति न बलन्ति न बालयन्ति न दधते न धारयन्ति तानि ह वा एतान्यबलानि तस्मादाहुरिन्द्रियाणि करणानि’ इति पौत्रायणश्रुतेः ॥ 19 ॥
ॐ वैलक्षण्याच्च ॐ ॥ 20-291 ॥
॥ इति इन्द्रियाधिकरणम् ॥ 11 ॥
पुरुषापेक्षया प्रवृत्तिरिन्द्रियाणां दृष्यते न मुख्यस्य । ‘प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति’ इति च श्रुतेः ॥ 20 ॥
सङ्ज्ञाधिकरणम्
ॐ सङ्ज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तुत्रि वृत्कुर्वत उपदेशात् ॐ॥ 21-292 ॥
‘विरिञ्चो वा इदं सर्वं विरेचयति विदधाति ब्रह्मा वाव विरिञ्च एतस्माद्धीमे रूपनामानी’ इति गौपवनश्रुतिः ॥
‘यस्माद्विरेचयेत् सर्वं विरिञ्चस्तेन भण्यते ।एको हि कर्ता जगतो ब्रह्मैव च चतुर्मुखः’ इति च युक्तिर्ब्राह्मे ।
अथ कस्मादुच्यते परम इति परमाद्ध्येते नामरूपे व्याक्रियेते तस्मादेनमाहुः परम इति । अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च’ इत्याग्निवेश्यश्रुतिः ।
अत आह-॥ इति सङ्ज्ञाधिकरणम् ॥ 12 ॥
नामरूपक्लृप्तिः परादेव।
‘सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् य आस्ते’ इति श्रुतेः।
त्रिवृत्कुर्वत इति हेतुगर्भः । त्रिवृत्करणापेक्षत्वान्नामरूपयोः ॥
‘सर्वनाम्नां च रूपाणां व्यवहारेषु केशवः ।एक एव यतः स्रष्टा ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः’ इति च पाद्मे ॥
‘त्रिवृत्क्रिया यतो विष्णो रूपं च तदपेक्षया ।
रूपापेक्षं तथा नाम व्यवहारस्तदात्मकः ॥
अतो नाम्नश्च रूपस्य व्यवहारस्य चैकराट् ।हरिरेव यतः कर्ता पिताऽतो भगवान् प्रभुः’इति च ब्रह्माण्डे ॥ 21 ॥
मांसा(ध्य)धिकरणम्
ॐ मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॐ ॥ 22-293 ॥
‘अद्ब्यो हीदमुत्पद्यते आपो वाव मांसमस्थि च भवन्त्यापः शरीरमाप एवेदं सर्वम्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
‘अम्मयं तु यतो मांसमतस्तृप्तिश्च मांसतः’ इति च भारते ।‘पृथिवी शरीरमाकाशमात्मा’ इति च अतो ब्रवीति –
‘यत् कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं तदापो यदुष्णं तत् तेजः’ इति श्रुतेर्मांसाद्येव भौमं न सर्वशरीरम्। अप्तेजसोश्च कार्यं यथाशब्दमङ्गीकर्तव्यम् ॥
‘यद्वा वाऽथो विमिश्रं मिश्राद्ध्येतद्भवति मिश्राणि हि भूतानि तस्मादेवैवमाचक्षते भूतानि’
इति हि काषायणश्रुतिः ।
‘पञ्चभूतात्मकं सर्वं तदप्येकविवक्षया ।
एकभूतात्मकत्वेन व्यवहारस्तु वैदिके ।
भौममित्येव काठिन्याच्छौक्ल्यादौदकमित्यपि ।तेजिष्टत्त्वात् तैजसं च यथाऽस्थ्नां वचनं श्रुतौ’इति वायुप्रोक्ते ॥22॥
ॐ वैशेष्यात् तु तद्वादस्तद्वादः ॐ ॥ 23-294 ॥
कथं तर्हि विशेषवचनमित्यत आह-
इति मांसा(ध्य)धिकरणम् ॥ 13 ॥
॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥ 02-04 ॥
॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायः (अविरोधाध्यायः) ॥ 02 ॥
भूतानां विशेषसंयोगादेव विशेषव्यवहारः ।
‘पार्थिवानां शरीराणामर्धेन पृथिवी स्मृताः ।
इतरेऽर्धे त्रिभागिन्य आपस्तेजस्तुभागतः ॥
इति सामान्यतो ज्ञेयं भेदश्च प्रतिपूरुषम् ।स्वर्गस्थानां शरीराणामर्धं तेज उदाहृतम्’इति च ब्रह्मसंहितायाम् ॥
सर्वाध्यायार्थावधारणार्थऽध्यायान्ते द्विरुक्तिः।
गारुडे च-
‘अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्याद्वेदे वा वैदिकेऽपि वा ।
विचारो यत्र सज्ज्येत पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥
अनुक्तानां प्रमाणानां स्वीकारश्च कृतो भवेत् ।
विनिन्द्य चेतरान् मार्गान् सम्पूर्णफलता तथा ॥ इति ॥ 23 ॥