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Brahmasutra/C1/S1: Difference between revisions

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Revision as of 06:54, 9 April 2026

नारायणं गुणैः सर्वैरुदीर्णं दोषवर्जितम् । ज्ञेयं गम्यं गुरूंश्चापि नत्वा सूत्रार्थ उच्यते ॥

द्वापरे सर्वत्र ज्ञान आकुलीभूते तन्निर्णयाय ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिभिरर्थितो भगवान् नारायणो व्यासत्वेनावततार । अथेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छूनां तद्योगमविजानतां तज्ज्ञापनार्थं वेदमुत्सन्नं व्यञ्जयंश्चतुर्धा व्यभजत्। चतुर्विंशतिधैकशतधा सहस्रधा द्वादशधा च । तदर्थनिर्णयाय ब्रह्मसूत्राणि चकार ।

तच्चोक्तं स्कान्दे –

नारायणाद्विनिष्पन्नं ज्ञानं कृतयुगे स्थितम् । किञ्चित् तदन्यथा जातं त्रेतायां द्वापरेऽखिलम् ॥
गौतमस्य ऋषेः शापार्ज्ज्ञाने त्वज्ञानतां गते । सङ्कीर्णबुद्धयो देवा ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ॥
शरण्यं शरणं जग्मुर्नारायणमनामयम् । तैर्विज्ञापितकार्यस्तु भगवान् पुरुषोत्तमः॥
अवतीर्णो महायोगी सत्यवत्यां पराशरात् । उत्सन्नान् भगवान् वेदानुज्जहार हरिः स्वयम् ॥
चतुर्धा व्यभजत् तांश्च चतुर्विंशतिधा पुनः । शतधा चैकधा चैव तथैव च सहस्रधा ॥
कृष्णो द्वादशधा चैव पुनस्तस्यार्थवित्तये । चकार ब्रह्मसूत्राणि येषां सूत्रत्वमञ्जसा ॥
अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥
निर्विशेषितसूत्रत्वं ब्रह्मसूत्रस्य चाप्यतः । यथा व्यासत्वमेकस्य कृष्णस्यान्ये विशेषणात् ॥
सविशेषणसूत्राणि ह्यपराणि विदो विदुः । मुख्यस्य निर्विशेषेण शब्दोऽन्येषां विशेषतः ॥
इति वेदविदः प्राहुः शब्दतत्त्वार्थवेदिनः । सूत्रेषु येषु सर्वेऽपि निर्णयाः समुदीरिताः ॥
शब्दजातस्य सर्वस्य यत्प्रमाणश्च निर्णयः । एवं विधानि सूत्राणि कृत्वा व्यासो महायशाः ॥
ब्रह्मरुद्रादिदेवेषु मनुष्यपितृपक्षिषु । ज्ञानं संस्थाप्य भगवान् क्रीडते पुरुषोत्तमः ।’इत्यादि ।

जिज्ञासाधिकरणम्

ॐ ॐअथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॐ ॥ 01-01 ॥


‘अथ’ शब्दो मङ्गलार्थोऽधिकारानन्तर्यार्थश्च । ‘अतः’ शब्दो हेत्वर्थः।
उक्तं च गारुडे –
अथातः शब्दपूर्वाणि सूत्राणि निखिलान्यपि । प्रारभन्ते नियत्यैव तत् किमत्र नियामकम् ॥
कश्चार्थश्च तयोर्विद्वन् कथमुत्तमता तयोः । एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् यथा ज्ञास्यामि तत्त्वतः ॥
एवमुक्तो नारदेन ब्रह्मा प्रोवाच सत्तमः । आनन्तर्येऽधिकारस्य मङ्गलार्थे तथैव च ॥
अतशब्दस्त्वतः शब्दो हेत्वर्थे समुदीरितः । परस्य ब्रह्मणो विष्णोः प्रसादादिति वा भवेत् ॥
स हि सर्वमनोवृत्तिप्रेरकः समुदाहृतः । सिसृक्षोः परमाद्विष्णोः प्रथमं द्वौ विनिःसृतौ ॥
ओङ्कारश्चाथशब्दश्च तस्मात् प्राथमिकौ क्रमात् । तद्धेतुत्वं वदंश्चापि तृतीयोऽत उदाहृतः॥
अकारः सर्ववागात्मा परब्रह्माभिधायकः । तथौ प्राणात्मकौ प्रोक्तौ व्याप्तिस्थितिविधायकौ ॥
अतश्च पूर्वमुच्चार्याः सर्व एते सतां मताः । अथातःशब्दयोरेवं वीर्यमाज्ञाय तत्त्वतः ॥
सूत्रेषु तु महाप्राज्ञास्तावेवादौ प्रयुञ्जते’ इति॥
अधिकारश्चोक्तो भागवततन्त्रे –
मन्दमध्योत्तमत्वेन त्रिविधा ह्यधिकारिणः । तत्र मन्दा मनुष्येषु य उत्तमगणा मताः ॥
मध्यमा ऋषिगन्धर्वा देवास्तत्रोत्तमा मताः । इति जातिकृतो भेदस्तथाऽन्यो गुणपूर्वकः ॥
भक्तिमान् परमे विष्णौ यस्त्वध्ययनवान् नरः । अधमः शमादिसंयुक्तो मध्यमः समुदाहृतः ॥
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमसारं चाप्यनित्यकम् । विज्ञाय जातवैराग्यो विष्णुपादैकसंश्रयः ॥
स उत्तमोऽधिकारी स्यात् सन्न्यस्ताखिलकर्मवान् इति ।
‘अध्ययनमात्रवतः’ ,’नाविशेषात्’ इति चोपरि ।
‘शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवाऽत्मानं पश्येत्’।
               “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् । नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।।”
"यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् । ”
“ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ।
               तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥”
इत्यादि श्रुतिभ्यश्च ॥
व्योमसंहितायां च –
अन्त्यजा अपि ये भक्ता नामज्ञानाधिकारिणः । स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां तन्त्रज्ञानेऽधिकारिता ॥
एकदेशे परोक्ते तु न तु ग्रन्थपुरस्सरे । त्रैवर्णिकानां वेदोक्ते सम्यग्भक्तिमतां हरौ ॥
आहुरप्युत्तमस्त्रीणामधिकारं तु वैदिके । यथोर्वशी यमी चैव शच्याद्याश्च तथाऽपरा ॥ इति ॥
यतो नारायणप्रसादमृते न मोक्षः, न च ज्ञानं विनाऽत्यर्थप्रसादः, अतो ब्रह्मजिज्ञासाकर्तव्या ।
यत्रानवसरोऽन्यत्र पदं तत्र प्रतिष्ठितम् ।वाक्यं वेति सतां नीतिः सावकाशे न तद्भवेत्इति ब्रह्मसंहितायाम् ।
‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति । नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ ॥
               ‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ ।
               ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः’ ।
               ‘आत्मावाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निधिध्यासितव्यः’
इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः ।
‘कर्मणात्वधमः प्रोक्तः प्रसादः श्रवणादिभिः । मध्यमो ज्ञानसम्पत्त्या प्रसादस्तूत्तमो मतः ॥प्रसादात्त्वधमाद्विष्णोः स्वर्गलोकः प्रकीर्तितः । मध्यमाज्जनलोकादिरुत्तमस्त्वेव मुक्तिधः ॥श्रवणं मननं चैव ध्यानं भक्तिस्तथैव च । साधनं ज्ञानसम्पत्तौ प्रधानं नान्यदिष्यते ॥न चैतानि विना कश्चिज्ज्ञानमाप कुतश्चन’। इति नारदीये ।
ब्रह्मशब्दश्च विष्ण्वावेव –
‘यमन्तः समुद्रे कवयोऽवयन्ति तदक्षरे परमे प्रजाः ।यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान्व्यससर्ज भूम्याम्’ – इत्युक्त्वा’‘तदेवर्तं तदु सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’ इति हि शृतिः ॥
‘तन्नो विष्णुः’ इति वचनाद्विष्णुरेव हि तत्रोच्यते ॥
न चेतरशब्दात् तत्प्राप्तिः –
‘नामानि विश्वाऽभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतिः ॥
‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या’ इत्येवशब्दान्नान्येषां सर्वनामता ।
‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः’ इति विष्णोर्हि लिङ्गम् ।
न च प्रसिद्धार्थं विनाऽन्योऽर्थो युज्यते ॥
‘अजस्य नाभाविति यस्य नाभेरभूच्छ्रुतेः पुष्करं लोकसारम् । तस्मै नमो व्यस्तसमस्तविश्वविभूतये विष्णवे लोककर्त्रे’ इति स्कान्दे ।
‘परो दिवा पर एना पृथिव्या’ इति समाख्याश्रुतौ ॥
‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’ इत्युक्त्वा ‘मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे’ इत्याह ।
उग्रो रुद्रः । समुद्रेऽन्तर्नारायणः । प्रसिद्धत्वात् सूचितत्वाच्चास्यार्थस्य । न चाविरोधे प्रसिद्धः परित्यज्यते । उक्तान्यायेन च श्रुतय एतमेव वदन्ति ।
‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते’ इति हरिवंशेषु ॥
न चेतरग्रन्थविरोधः .
‘एषं मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति । त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय ॥
अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज ।प्रकाशं कुरु चात्मानामप्रकाशं च मां कुरु’ इति वाराह वचनात् ॥
शैव च स्कान्दे –
‘श्वपचादपि कष्टत्वं ब्रह्मेशानादयः सुराः । तदैवाच्युत यान्त्येव यदैव त्वं पराङ्मखः’ इति ॥
ब्राह्मे च ब्रह्मवैवर्ते –
‘नाहं न च शिवोऽन्ये च तच्छक्त्येकांशभागिनः । बालः क्रीडनकैर्यद्वत् क्रीडतेऽस्माभिरच्युतः’ इति ॥
न च वैष्णवेषु तथा । तच्च ‘एष मोहम्’ इत्युक्तम् ॥
॥ इति जिज्ञासाधिकरणम् ॥

जन्माधिकरणम्

ॐ जन्माद्यस्य यतः ॐ ॥ 02-02 ॥


सृष्टिस्थितिसंहारनियमनज्ञानाज्ञानबन्धमोक्षा यतः ।
‘उत्पत्तिस्थितिसंहारा नियतिर्ज्ञानमावृतिः । बन्धमोक्षौ च पुरुषाद्यस्मात् स हरिरेकराट्’ इति स्कान्दे ।
‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्म’ इति ।
‘य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा ।
‘चतुर्भिस्साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तिं व्यतीरँ वीविपत् ।
‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।
‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’।
‘यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा’ इत्यादि च ॥02॥
॥ इति जन्माधिकरणम् ॥

शास्त्रयोनित्वाधिकरणम्

ॐ शास्त्रयोनित्वात् ॐ ॥ 03-03 ॥


अनुमानतोऽन्ये न कल्पनीयाः –
‘नावेदविन्मनुते तं बृहन्तं सर्वानुभूमात्मानं साम्पराये’ ॥ ‘औपनिषदः पुरुषः’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥
न चानुमानस्य नियतप्रामाण्यम् ॥
‘श्रुतिसाहाय्यरहितमनुमानं न कुत्रचित् । निश्चयात् साधयेदर्थं प्रमाणान्तरमेव च ॥
श्रुतिस्मृतिसहायं यत् प्रमाणान्तरमुत्तमम् । प्रमाणपदवीं गच्छेन्नात्र कार्याविचारणा ॥
पूर्वोत्तराविरोधेन कोऽत्रार्थोऽभिमतो भवेत् ।इत्याद्यमूहनं तर्कः शुष्कतर्कं तु वर्जयेत्’ इत्यादि कौर्मे॥
शक्यत्वाच्चानुमानानां सर्वत्र ।
‘सर्वत्र शक्यते कर्तुमागमं हि विनाऽनुमा ।तस्मान्न सा शक्तिमती विनागममुदीक्षितुम् ।’ इति वाराहे ।
‘रेतो धातुर्वटकणिका घृतधूमाधिवासनम् । जातिस्मृतिरयस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम् ॥
प्रेत्य भूताप्ययश्चैव देवताभ्युपयाचनम् । मृते कर्मनिवृत्तिश्च प्रमाणमिति निश्चयः ॥’
-इति मोक्षधर्मवचनान्न नास्तिक्यवादो युज्यते ।
दर्शनाच्च तप आधिफलस्य ॥
‘ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्। मूलरामायणं चैव शास्त्रमित्यभिदीयते ॥यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम् । अतोऽन्यो ग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत्’॥इति स्कान्दे ॥
‘साङ्ख्यं योगः पाशुपतं वेदारण्यकमेव च’। इत्यारभ्य, वेदपञ्चरात्रयोरैक्याभिप्रायेण पञ्चरात्रस्यैव प्रामाण्यमुक्तम्, इतरेषां भिन्नमतत्वं प्रदर्श्य मोक्षधर्मेष्वपि । शास्त्रं योनिः प्रमाणमस्येति शास्त्रयोनि ॥ 03 ॥
॥ इति शास्त्रयोनित्वाधिकरणम् ॥ 03 ॥

समन्वयाधिकरणम्

ॐ तत्तु समन्वयात् ॐ ॥ 04-04 ॥


अज्ञानां प्रतीयमानमपि नेतरेषां शास्त्रयोनित्वम् , कुतः ? ।
अन्वय उपपत्यादि लिङ्गम् ।
उक्तं च बृहत्संहितायाम् –
‘उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये’ इति ॥
‘उपक्रमादितात्पर्यलिङ्गैः सम्यङ् निरूप्यमाणे तदेव शास्त्रगम्यम् ।
‘मां विधत्तेऽभिदत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य इत्यहम् ।इत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन’ इति भागवते ॥ 04 ॥
॥ इति समन्वयाधिकरणम् ॥ 04 ॥

ईक्षत्यधिकरणम्

ॐ ईक्षतेर्नाशब्दम् ॐ ॥ 05-05 ॥


ननु’यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह’, ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्’ ॥ ‘अवचनेनैव प्रोवाच’, ‘यद्वाचाऽनभ्युदितम् । येन वागभ्युद्यते ॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्’ इत्यादिभिर्न तच्छब्दगोचरम् । नेत्याह –
‘स एतस्माज्चीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते’,
               ‘आत्मन्येवात्मनं पश्येत्’ ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत’
इत्यादिवचनैरीक्षणीयत्वाद्वाच्यमेव । औपनिषदत्वान्नावचनेनेक्षणम् ॥
‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति’ ॥
‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्’ इत्यादिशृतिस्मृतिभ्यश्च ॥
अवाच्यत्वादिकं त्वप्रसिद्धत्वात् ॥
‘न तदीदृगिति ज्ञेयं न वाच्यं न च तर्क्यते । पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति मेरो रूपं विपश्चितः’ इतिवत् ॥ अप्रसिद्धेरवाच्यं तद्वाच्यं सर्वागमोक्तितः । अतर्क्यं तर्क्यमज्ञेयं ज्ञेयमेवं परं स्मृतम्’ इति गारुडे ॥
न चाशब्दत्वमितरसिद्धम् ॥05॥
ॐ गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॐ ॥ 06-06 ॥


न च गौण आत्मा दृश्यो वाच्यश्च न निर्गुण इति युक्तम् । आत्मशब्दात्॥
‘यो गुणैः सर्वतोहीनो यश्च दोषविवर्जितः । हेयोपादेयरहितः स आत्मेत्यभिधीयते ॥ एतदन्यस्वभावो यः सोऽनात्मेति सतां मतम् ॥ अनात्मन्यात्मशब्दस्तु सोपचारः प्रयुज्यते’ इति वामने ॥
‘द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे आत्मा चैवानात्मा च । तत्र यः स आत्मा स नित्यः शुद्धः केवलो निर्गुणश्च । अथ ह योऽनीदृशः सोऽनात्मा’ इति तलवकारब्राह्मणम् ।
न च मुख्ये सत्यमुख्यं युज्यते ॥ 06 ॥
ॐ तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॐ ॥ 07-07 ॥


न हि गौणात्मनिष्ठस्य मोक्षः ।
‘यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन् सन्दोहे गहने प्रविष्टः ।
               स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव’
इत्यात्मनिष्ठस्य मोक्ष उपदिश्यते ।
‘अयमात्मा ब्रह्म’॥
‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’।
‘दत्तं दूर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्’॥
‘चेतनस्तु द्विधा प्रोक्तो जीव आत्मेति च प्रभो । जीवा ब्रह्मादयः प्रोक्ता आत्मैकस्तु जनार्दनः ॥
इतरेष्वात्मशब्दस्तु सोपचारोऽभिधीयते ॥ तस्यात्मनो निर्गुणस्य ज्ञानान्मोक्ष उदाहृतः ॥
सगुणास्त्वपरे प्रोक्तास्तज्ज्ञानान्नैव मुच्यते ।परो हि पुरुषो विष्णुस्तस्मान्मोक्षस्ततः स्मृतः’ इति पाद्मे ॥ 07 ॥
ॐ हेयत्वावचनाच्च ॐ ॥ 08-08 ॥


‘तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ । अमृतस्यैष सेतुः’ इत्यन्येषां हेयत्ववचनादस्याहेयत्ववचनान्न गौण आत्मा ॥ 08 ॥
ॐ स्वाप्ययात् ॐ ॥ 09-09 ॥


‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते’॥
‘स आत्मन आत्मानमुद्धृत्यात्मन्येव विलापयत्यथात्मैव भवति’।
स देवो बहुधा भूत्वा निर्गुणः पुरुषोत्तमः। एकीभूय पुनः शेते निर्दोषो हरिरादिकृत्’
इति स्वस्यैव स्वस्मिन्नप्ययवचनात् ।
न हि गौणात्मनि निर्दोषस्य लयः ॥ 09 ॥
ॐ गतिसामान्यात् ॐ ॥ 10-10 ॥


न च कासुचिच्छाखास्वन्यथोच्यते ।
‘सर्वे वेदा युक्तयः सुप्रमाणा ब्राह्मं ज्ञानं परमं त्वेकमेव ।प्रकाशयन्ते न विरोधः कुतश्चिद्वेदेषु सर्वेषु तथेतिहासे’इति पैङ्गिश्रुतेर्गतेर्ज्ञानस्य साम्यमेव ॥ 10 ॥
ॐ श्रुतत्वाच्च ॐ ॥ 11-11 ॥


‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूतादिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’ इति ॥
न ह्यशब्दः श्रूयते । न चाप्रसिद्धं कल्प्यम् । सर्वशब्दावाच्यस्य लक्षणाऽयुक्तेः ॥ 11 ॥
॥ इति ईक्षत्यधिकरणम् ॥

आनन्दमयाधिकरणम्

ॐ आनन्दमयोऽभ्यासात् ॐ ॥ 12-12 ॥


‘तमेव समन्वयं प्रकटयत्यानन्दमयोऽभ्यासादित्यादिना समस्तेनाध्यायेन प्रायेण ।
             प्रायेणान्यत्र प्रसिद्धानां शब्दानां परमात्मनि समन्वयः प्रदर्श्यतेऽस्मिन् पादे । नान्यथा तददृष्टेः ।
ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्येत्युक्तम् । तच्च ब्रह्म ‘ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा’ इत्यानन्दमयावयवरूपं प्रतीयते । न ह्यवयविनं विना अवयवमात्रस्य ज्ञेयतेत्यत आह –
आनन्दमयो ब्रह्मादिः प्रकृतिर्विष्णुर्वा । ब्रह्मशब्दाद्धिरण्यगर्भस्य प्राप्तिः शतानन्दनाम्ना च । अष्टमूर्तित्वात्सूर्ये प्रोक्तत्वाच्च रुद्रस्य । एनमन्येषामपि।’मम योनिर्महद्ब्रह्म’ इति ब्रह्मशब्दाद्बहुभावाच्च प्रकृतेः । ‘बृह जातिजीवकमलासनशब्दराशिषु’ इति ब्रह्मशब्दादेव सर्वजीवानाम्।अन्नमयत्वादेश्च ।
तथाऽपि न त आनन्दमयशब्देनोच्यन्ते । किन्तु विष्णुरेव ।
’तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’ ‘एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते’
‘ब्रह्मशब्दः परे विष्णौ नान्यत्र क्वचिदिष्यते । असम्पूर्णाः परे यस्मादुपचारेण वा भवेत्’ ॥
‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’।
‘वासुदेवात्मकं ब्रह्म मूलमन्त्रेण वा यतिः’॥
इत्यादिषु तस्मिन्नेव प्रसिद्धब्रह्मशब्दाभ्यासात् ॥ 12 ॥
ॐ विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॐ ॥ 13-13 ॥


विकारात्मकत्वात्तदभिमानित्वाच्च युज्यते प्रकृत्यादीनां मयट् शब्दः न तु परमात्मन इति मा भूत् । प्रचुरानन्दत्वाद्द्यानन्दमयः । न तु तद्विकारत्वात् । अन्नादीनां च प्राचुर्यमेव ॥ ‘अद्यतेऽत्ति च’ इति व्याखानात् तत्प्राचुर्यं च युज्यते ॥
उपजीव्यत्वमेवाद्यत्वम् ॥ ‘स वा एषः’ इत्यन्यप्रारम्भात् ॥ ‘योऽन्नं ब्रह्मोपासते’ इत्यादिब्रह्मशब्दाद्बहुरूपत्त्वाच्च न विकारित्वमविरोधश्च । न च पृथक्कल्पना युक्ता । स्वरूपे च युज्यते प्रचुरप्रकाशो रविरितिवत् ॥13॥
ॐ तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॐ ॥ 14-14 ॥


‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्’ इति ॥14॥
ॐ मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॐ ॥ 15-15 ॥


‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इति सूचयित्वा‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इति मन्त्रवर्णलक्षितं परमेव ब्रह्मशब्दानुसन्धानाद्गीयते । न चावयवत्वविरोधः ॥
‘स शिरः स दक्षिणः पक्षः स उत्तरः पक्षः स आत्मा स पुच्छम्’ इति तस्यैवावयवत्वोक्तेश्चतुर्वेदशिखायाम्
शिरो नारायणः पक्षो दक्षिणः सव्य एव च । प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च सन्दोहो वासुदेवकः ॥
नारायणोऽथ सन्दोहो वासुदेवः शिरोऽपि वा । पुच्छं सङ्कर्षणः प्रोक्त एक एव तु पञ्चधा ॥
अङ्गाङ्गित्वेन भगवान् क्रीडते पुरुषोत्तमः ।ऐश्वर्यान्न विरोधश्च चिन्त्यस्तस्मिन् जनार्दने ॥अतर्क्ये हि कुतस्तर्कस्त्वप्रमेये कुतः प्रमा’इति बृहत्संहितायाम् ॥
रसशब्देन विशेषणात् तत्सारभूतं चिन्मात्रमेवोच्यते । इदमिति च दृश्यमानसन्निहितत्वात् ।
‘अनन्योऽप्यन्यशब्देन तथैको बहुरूपवान् । प्रोच्यते भगवान् विष्णुरैश्वर्यात् पुरुषोत्तमः’॥ इति ब्रह्माण्डे ।
न चोक्तप्राप्त्या विरिञ्चादिरुच्यते ॥ 15 ॥
ॐ नेतरोऽनुपपत्तेः ॐ ॥ 16-16 ॥


न ह्यन्यज्ञानान्मोक्ष उपपद्यते । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति ह्युक्तम् ॥16॥
ॐ भेदव्यपदेशाच्च ॐ ॥ 17-17 ॥


‘ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः’
               ‘अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते’
               ‘अथ सोऽभयं गतो भवति’ ।
‘स यश्चायं पुरुषे’ इत्यादिभेदव्यपदेशात् ।
न च’तत्त्वमसि’’अहं ब्रह्मास्मि’ इत्यादिश्रुतिविरोधः ॥ ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’ इति तत्तच्छब्दवाच्यत्वोक्तेः ॥
‘इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः’,
               ‘असर्वः सर्व इत्यपि’,
               ’विद्याऽऽत्मनि भिदाभोधः’,
‘भेददृष्ट्वाऽभिमानेन निस्सङ्गेनापि कर्मणा’ ।
‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ।
‘असर्वः सर्व इवात्मैव सन्ननात्मेव प्रत्यङ् पराङ् वैक ईयते बहुधेयते’ स पुरुषः स ईश्वरः स ब्रह्म’ ।
‘सर्वान्तर्यामको विष्णुः सर्वनाम्नाऽभिधीयते । एषोऽहं त्वमसौ चेति न तु सर्वस्वरूपतः’ ॥
‘नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह’ इत्यादेश्च’ ।
उक्ता च प्राप्तिः ।’ब्रह्मैव सन्’ इत्यपि जीव एव ब्रह्मशब्दः ।
उपपद्यते च विरोधे । प्रमादात्मकत्वाद्बन्धस्य विमुक्तत्वं च युज्यते ।
‘मुक्तिर्हित्वाऽन्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः’ इति हि भागवते ॥17॥
ॐ कामाच्च नानुमानापेक्षा ॐ ॥ 18-18 ॥


न च तत्तदनुमानविरोधः ।
यथाकामं ह्यनुमातुं शक्यते । अतो न तत्त्वे पृथगनुमानमपेक्ष्यते । उक्तं च स्कान्दे –
‘यथाकामाऽनुमा यस्मात् तस्मात् साऽनपगा श्रुतेः ।
पूर्वापराविरोधाय चेष्यते नान्यथा क्वचित्’ इति ॥
‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’ इति च ॥ 18 ॥
ॐ अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॐ ॥ 19-19 ॥


अस्य जीवस्य । युक्तिसमुच्चये चशब्दः ।
‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ ,
               ‘अनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते’ ,
‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति’ इत्यादि ॥19॥
॥इति आनन्दमयाधिकरणम् ॥ 06 ॥

अन्तःस्तत्थ्वाधिकरणम्

ॐ अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॐ ॥ 20-20 ॥


‘अदृश्येऽनात्म्ये’ इत्युक्तम् । तच्चादृष्यत्वम्,‘अन्तः प्रविष्टं कर्तारमेतमन्तश्चन्द्रमसि मनसा चरन्ततम् । सहैव सन्तं न विजानन्ति देवाः’ इत्यन्तःस्थस्य कस्यचिदुच्यते । स च’इन्द्रो राजा’’सप्तयुञ्जन्ति’ इत्यादिभिरन्यः प्रतीयते । तस्मात् स एवानन्दमय इति न मन्तव्यम् ।
अन्तः श्रूयमाणो विष्णुरेव ।
‘अन्तः स्समुद्रे मनसा चरन्तम् । ब्रह्मान्वनिन्दद्दशहोतारमर्णे’ ।
‘समुद्रेऽन्तः कवयो विचक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः’
यस्याण्डकोशं शुष्ममाहुः’ इत्यादि तद्धर्मोपदेशात् ।
स हि क्षीरसमुद्रशायी । तस्य च वीर्यमण्डकोशः ।
‘सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । यस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः ।अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः’ इति व्यासस्मृतेः ।
‘अहं तत्तेजो रश्मीन्नारायणम् पुरुषं जातमग्रतः । ‘पुरुषात् प्रकृतिर्जगदण्डम्’ इति चतुर्वेदशिखायाम् ॥ 20 ॥
ॐ भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॐ ॥ 21-21 ॥


‘इन्द्रस्यात्मानिहितः पञ्च होता’ ,
               ‘वायोरात्मानं कवयो निचिक्युः’,
‘‘अन्तरादित्ये मनसा चरन्तम्, देवानां हृदयं ब्रह्मान्वविन्दत्’ इत्यादिभेदव्यपदेशात् ॥ 21 ॥
॥इति अन्तःस्तत्थ्वाधिकरणम् ॥ 07 ॥

आकाशाधिकरणम्

ॐ आकाशस्तल्लिङ्गात् ॐ ॥ 22-22 ॥


‘को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् इति’ इत्याकाशस्यानन्दमयत्वे हेतुरुक्तः, न तु विष्णोरिति न मन्तव्यम् । यतः –
‘अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच’ इत्यत्र भूताकाशस्य प्राप्तिः । न चासौ युज्यते, किन्तु विष्णुरेव ।
‘स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः’ इत्यादि तल्लिङ्गात् ।
‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रोवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि, परो मात्रया तन्वा वृधान’ इत्यादिना तस्यैव हि तल्लिङ्गम् ।
‘अनन्तो भगवान् ब्रह्म आनन्देत्यादिभिः पदैः ।प्रोच्यते विष्णुरेवैकः परेषामुपचारतः’ इति ब्राह्मे ।
‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति’ इति चोक्तम् ॥ 22 ॥
॥ इति आकाशाधिकरणम् ॥

प्राणाधिकरणम्

ॐ अत एव प्राणः ॐ ॥ 23-23 ॥


‘तद्वैत्वं प्राणो अभवः महान् भोगः प्रजापतेः ।
               भुजः करिष्यमाणः यद्देवान् प्राणयो न वा ॥
               इति महाभोगशब्देन परमानन्दत्वं प्राणस्योक्तम् । स च प्राणः प्रसिद्धेर्वायुरित्यापतति । न चैवं यतो विष्णुरेव प्राणः ।
अत एव ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ अहोरात्रे पार्श्वे’ इत्यादि तल्लिङ्गादेव ॥ 23 ॥
॥ इति प्राणाधिकरणम् ॥ 9 ॥

ज्योतिरधिकरणम्

ॐ ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॐ ॥ 24-24 ॥


‘यो वेद निहितम् गुहायाम्’ इत्युक्तम् । तच्च गुहानिहितम् –
             ‘वि मे कर्णा पतयतो विचक्षुर्वीदं ज्योतिर्हृदय आहितं यत् । विमे मनश्चरति दूर आधीः किंस्विद्वक्ष्यामि किमु नो मनिष्ये’  इति ज्योतिरुक्तम् ।
तच्च ज्योतिरग्निसूक्तत्वात् प्रसिद्धेश्चाग्निरेवेति प्राप्तम् । अत आह –
विष्णुरेव ज्योतिः । कर्णादीनां विचरणाभिधानात् । स हि ‘परो मात्रया तन्वावृधान’ इत्यादिना कर्णादिविदूरः ॥ 24 ॥
॥ इति ज्योतिरधिकरणम् ॥ 10 ॥

गायत्र्यधिकरणम्

ॐ छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम् ॐ॥ 25-25 ॥


‘अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते’ इत्युक्तस्य ज्योतिषो’गायत्री वा इदं सर्वम्’ इति गायत्र्या समारम्भः कृतः । तस्मान्न विष्णुरिति चेन्न ।
तथा चेताऽर्पणार्थं हि निगद्यते अग्नि गायत्र्यादिशब्दार्थरूपोऽसाविति चेतोऽर्पणार्थं हि निगद्यते ।
तथा हि दर्शनं’गायति त्रायति च’ इत्यादि ।
‘सर्वच्छन्दोऽभिधो ह्येषः सर्वदेवाभिधो ह्यसौ । सर्वलोकाभिधोह्येषः तेषां तदुपचारतः’ इति वामने ॥ 25 ॥
ॐ भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॐ ॥ 26-26 ॥


‘तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पुरुषः ।
पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि’ इति ।
‘सुवर्णं कोशं रजसा परीवृतम् देवानां वसुधानीं विराजम् । अमृतस्य पूर्णां तामु कलां विचक्षते पादं षड्ढोतुर्न किलाविवित्स’ इति श्रुतेः । पाद इति एकदेशपरिमितं चतुर्भागबल इतिवद्भिन्नं च शब्दात् । स हि पुरुषसूक्ताभिधेयः’यज्ञेन यज्ञमयजन्त’ इति यज्ञशब्दात् ।
‘यज्ञो विष्णुर्देवता’ इति हि श्रुतिः ।तस्मिन् काले महाराज राम एवाभिधीयते । यथा हि पौरुषे सूक्ते विष्णुरेवाभिधीयते’। इति च स्कान्दे ॥ 26 ॥
ॐ उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॐ ॥ 27-27॥


त्रिपादस्यामृतं दिवि इति पूर्वोपदेशः । ‘परो दिवः’ इति पञ्चम्यन्तः पश्चिमः । तस्मान्नैकं वस्त्वत्रोच्यत इति चेन्न ।
त्रिसप्तलोकापेक्षयोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ 27 ॥
॥इति गायत्र्यधिकरणम् ॥ 11 ॥

पादान्त्यप्राणाधिकरणम्

ॐ प्राणस्तथाऽनुगमात् ॐ ॥ 28-28 ॥


‘प्राणो विष्णुरित्युक्तम् । तत्र ‘ता वा एताः शीर्षन् श्रियः श्रिताश्चक्षुश्र्योत्रं मनो वाक्प्राणः’ इत्यत्र प्राणस्य विष्णुत्वं न विद्यते । इन्द्रियैः सहाभिधानादिति । अत आह-
‘तं देवाः प्राणयन्त’ ‘स एषोऽसुः स एष प्राणः’ ‘प्राण ऋच इत्येव विद्यात्’ ,’तदयं प्राणोऽधिष्ठति’ इत्याद्यनुगमात्, अत्रापि प्राणो विष्णुरेव ।
‘विष्णुमेवानयन् देवा विष्णुं भूतिमुपासते । स एव सर्ववेदोक्तस्तद्रथो देह उच्यते’ इति स्कान्दे । ब्रह्मशब्दानुगमाच्च ॥ 28 ॥
ॐ न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्भन्धभूमा ह्यस्मिन् ॐ ॥ 29-29 ॥


‘प्राणो वा अहमस्मृषे’ इति वक्तरात्मोपदेशादिन्द्र एवेति चेन्न,’प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि’ इति बह्वध्यात्मसम्भन्धो ह्यत्र विद्यते ॥ 29 ॥
ॐ शास्त्रदृष्ट्यातूपदेशो वामदेववत् ॐ ॥ 30-30 ॥


शास्त्रमन्तर्यामि ।‘संविच्छास्त्रं परं पदम्’ इति हि भागवते ।
‘तत्तन्नाम्नोच्यते विष्णुः सर्वशास्त्रत्वहेतुतः ।न क्वापि किञ्चिन्नामास्ति तमृते पुरुषोत्तमम्’इति पाद्मे ।
‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ इत्यादिवत् ॥ 30 ॥
ॐ जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात् ॐ ॥ 31-31 ॥


तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति’ इति जीवलिङ्गम् । प्राणसंवादादि मुख्यप्राणलिङ्गम् । तस्मान्नेति चेन्न । अन्तर्बहिः सर्वगतत्वेनेत्युपासात्रैविध्यादिहाश्रितत्वाच्च ।
‘स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत’
               ‘स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्’
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः’ इत्यादिना ।
‘महिदासाभिधो जज्ञे इतरायास्तपोबलात् ।साक्षात् स भगवान् विष्णुर्यस्तन्त्रं वैष्णवं व्यधात्’ इति ब्रह्माण्डे ।
तत्तदुपासनायोग्यतया च पुरुषाणाम् ।
‘केषाञ्चित् सर्वगत्वेन केषाञ्चिद्धृदये हरिः ।केषाञ्चिद्बहिरेवासावुपास्यः पुरुषोत्तमः’ इति ब्राह्मे ॥
‘अग्नौ क्रियावतां विष्णुर्योगिनां हृदये हरिः । प्रतिमास्वप्रबुद्धानां सर्वत्र विदितत्मानाम्’ इति च ॥ 31 ॥
॥ इति पादान्त्यप्राणाधिकरणम् ॥ 12 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥01-01 ॥