Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S15: Difference between revisions
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Revision as of 07:04, 9 April 2026
अत्र प्रविश्य गरुडो यदि मत्स्यान् स खादति ।सद्यः प्राणैर्वियुज्येत सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ ११ ॥
तत् कालियः परं वेद नान्यः कश्चित् स लेलिहा ।अवात्सीद् गरुडाद् भीतः कृष्णेन च विवासितः ॥ १२ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे पञ्चदशोऽध्यायः ॥
'विष्णुना विष्णुभक्तैश्च ब्रह्मशापोऽनुवर्त्यते ।ब्राह्मणानामपीडायै बलिभिः क्षत्रियादिभिः ॥विष्णोश्च विष्णुभक्तानां शापाद् व्यैति तपोऽखिलम् ।तथापि चासुरावेशाच्छपेयुर्हरिमप्यहो ॥अतस्तु सौभरेः शापं नात्यवर्तत्खगेश्वरः ।अन्यथा तूत्तमानां हि नाधमैः शाप इष्यते ॥वरोऽपि दत्तस्त्वधिकैर्नाधमाधिक्यकारणम् ।विष्णोरपि वरस्तस्मान्नाधिक्यं सम्प्रयच्छति ॥क्रमशः श्रीविरिञ्चादेः कथञ्चित्केनचित्क्वचित् ॥न च दद्याद्धरिस्तादृग्दद्याद्वा बाह्यमेव तु॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ ११ ॥