Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S17: Difference between revisions
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Revision as of 06:56, 9 April 2026
कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् ।हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥ १५ ॥
'गुणाः स्वरूपभूताश्च बाह्याश्चेति द्विधा मताः ।स्वरूपभूता व्यज्यन्ते हरेर्बाह्यान् दुहुः पयः। इति ब्राह्मे ॥ १५ ॥
दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् ।विधाय दुदुहुः क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥ १६ ॥
'प्रतिमन्वन्तरं प्रायः प्रह्लादाद्या बभूविरे। इति च ॥ १६ ॥
ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च ।घोषान् व्रजांश्च शिबिरान् नगरान् खेटखर्वटान् ॥ ३१ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे अष्टादशोऽध्यायः ॥
'गोष्ठं घोष इति प्रोक्तो व्रजस्तत्पालसंस्थितिः। इत्यभिधानम् ॥३१॥