Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S29: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 4: | Line 4: | ||
| title = एकोनत्रिंशोऽध्यायः | | title = एकोनत्रिंशोऽध्यायः | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = BTN_C03_S29_V01 | | verse_id = BTN_C03_S29_V01 | ||
| Line 14: | Line 12: | ||
| verse_line2 = योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे । | | verse_line2 = योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे । | ||
| verse_line3 = मनो येनैव विधिना प्रपन्नं याति सत्पथम् ॥ १ ॥ | | verse_line3 = मनो येनैव विधिना प्रपन्नं याति सत्पथम् ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 32: | Line 31: | ||
| verse_line1 = स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् । | | verse_line1 = स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् । | ||
| verse_line2 = वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 50: | Line 50: | ||
| verse_line1 = तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् । | | verse_line1 = तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् । | ||
| verse_line2 = विलोक्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = विलोक्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 70: | Line 71: | ||
| verse_line3 = मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां | | verse_line3 = मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां | ||
| verse_line4 = चैत्त्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥ २७ ॥ | | verse_line4 = चैत्त्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥ २७ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 90: | Line 92: | ||
| verse_line3 = मीनद्वयश्रियमधिक्षिपदब्जनेत्रं | | verse_line3 = मीनद्वयश्रियमधिक्षिपदब्जनेत्रं | ||
| verse_line4 = ध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ २९ ॥ | | verse_line4 = ध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ २९ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 110: | Line 113: | ||
| verse_line3 = ध्यायेत् स्वहृत्कुहरकेऽवसितस्य विष्णो- | | verse_line3 = ध्यायेत् स्वहृत्कुहरकेऽवसितस्य विष्णो- | ||
| verse_line4 = र्भक्त्याऽऽर्द्रयाऽर्पितमना न पृथग् दिदृक्षेत् ॥ ३२ ॥ | | verse_line4 = र्भक्त्याऽऽर्द्रयाऽर्पितमना न पृथग् दिदृक्षेत् ॥ ३२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 130: | Line 134: | ||
| verse_line3 = औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान- | | verse_line3 = औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान- | ||
| verse_line4 = स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ ३३ ॥ | | verse_line4 = स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ ३३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 150: | Line 155: | ||
| verse_line3 = आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेक- | | verse_line3 = आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेक- | ||
| verse_line4 = मन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः ॥ ३४ ॥ | | verse_line4 = मन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः ॥ ३४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 170: | Line 176: | ||
| verse_line3 = हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्न | | verse_line3 = हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्न | ||
| verse_line4 = स्वात्मन् विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठः ॥ ३५ ॥ | | verse_line4 = स्वात्मन् विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठः ॥ ३५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 188: | Line 195: | ||
| verse_line1 = सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । | | verse_line1 = सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । | ||
| verse_line2 = ईक्षेतानन्यभावेन भूतेषु च तदात्मताम् ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = ईक्षेतानन्यभावेन भूतेषु च तदात्मताम् ॥ ४१ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
| Line 206: | Line 214: | ||
| verse_line1 = तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् । | | verse_line1 = तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् । | ||
| verse_line2 = दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४३ ॥ | | verse_line2 = दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४३ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
}} | }} | ||
Revision as of 06:55, 9 April 2026
भगवानुवाच–योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे ।
'सबीजो वैष्णवो योगो निर्बीजस्त्वन्यदैवतः ।बीजं विष्णुर्हि जगतः शाखाद्याश्चान्यदेवताः॥ इति कौर्मे ॥ १ ॥
स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् ।वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥
'समाधिरप्रयत्नेन मनसः संस्थितिर्भवेत्। इति च ॥ ६ ॥
तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।विलोक्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥
सर्वस्मरणाशक्तावेकाङ्गे ।'यावन्न च्यवते मनइत्युक्तत्वात् ।'सर्वं स्मर्तुमशक्तः सन्नेकाङ्गं चिन्तयेद्बुधः। इति च ॥ २० ॥
कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेतदिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।
'ब्रह्मा चित्ताभिमानेन चैत्यस्तन्नियमाद्धरिः ।स च ब्रह्मा हरेः कण्ठे कौस्तुभत्वेन भासते॥ इति भागवततन्त्रे ॥ २७ ॥
यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानंभूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् ।
'साक्षाच्छ्रीस्तु हरे रूपमिन्दिरा तु तदाश्रयात्॥ इति च ॥ २९ ॥
ध्यानायनं रहसि तद् बहुलाधरोष्ठ-भासाऽरुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति ।
'न पृथग्दिदृक्षेत्। तमेव दिदृक्षेदित्यर्थः ॥ ३२ ॥
एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावोभक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकप्रमोदः ।
चित्तबडिशवियोगो ध्यानानन्तरसमाधिः ॥ ३३ ॥
मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं स्वचित्तंनिर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः ।
मुक्ताश्रयं विष्णुविषयम् । स्वचित्तं जीवचैतन्ये ततम् । निर्वाणमृच्छति शरीराभिमानं जहाति । स्वचिदभिमानेन ॥ ३४ ॥
सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्यातस्मिन् महिम््नयवसितः सुखदुःखबाह्ये ।
'असत्कर्ता तु जीवः स्यात्सत्कर्ता परमेश्वरः। इति शब्दनिर्णये ।'दुर्दुःखमिति विज्ञेयं खं सुखं च तयोर्यतः ।प्रदाता परमो विष्णुस्तस्माद्दुःखादनामवान्॥ इति हरिवंशेषु ॥३५॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।ईक्षेतानन्यभावेन भूतेषु च तदात्मताम् ॥ ४१ ॥
अनन्यभावेन तद्रूपाणामभेदेन । तदात्मतां तस्याऽदानादिकर्तृत्वं च भूतविषये ॥ ४१ ॥
तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् ।दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४३ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥
प्रकृतिं पराभाव्य तदुत्तमत्वेनैव सदावतिष्ठते परः ।'सर्वभूतस्थमीशेशं जेतारं प्रकृतेरपि ।अविशेषं सदैवैकं चिन्तयन्विप्रमुच्यते॥ इति च ॥ ४३ ॥