Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S19: Difference between revisions
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Revision as of 06:55, 9 April 2026
तयोः स्पृधोः स्निग्धगदाहताङ्गयोःक्षतस्रवाघ्राणविवृद्धयुद्धयोः ।
दैत्यस्य यज्ञावयवस्य माययागृहीतवाराहतनोर्महात्मनः ।
आसन्नशौण्डीरमपेतसाध्वसंकृतप्रतीकारमहार्यविक्रमम् ।
अनेककल्पजननेतृत्वात् सहस्रणीः ॥'अक्षतः क्षतवद्विष्णुरसमः समवत्तथा ।अजितो जितवच्चैव ज्ञोऽज्ञवच्च प्रकाशयेत् ॥सर्वरूपेष्वनन्तोऽपि ब्रह्माद्याश्चैव तन्मतेः ।अनुसारितया ब्रूयुः कुर्युश्च स न दुःखभाक्॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ १९-२१ ॥
एषा घोरतमा सन्ध्या लोकशम्बट्करी प्रभो ।उपसर्पति सर्वात्मन् सुराणां जयमावह ॥ २६ ॥
'आदरं तु मुखं विद्याच्छम्बट्कारं तु भक्षणम्इत्यभिधानम् ॥२६॥
अधुनैवाभिजिन्नाम योगो मौहूर्तिकोऽभ्यगात् ।शिवाय नस्त्वं सुहृदामाशु निस्तर दुस्तरम् ॥ २७ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः ॥
'मध्याह्नस्त्वभिजित्प्रोक्त आषाढोत्तर एव च ।श्रवणस्यापि पूर्वार्धो विषुवं चाभिजित्स्मृतम्॥ इति च ॥ २७ ॥