Anubhashya/C4: Difference between revisions
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं ब्रह्मसूत्राणुभाष्यं सम्पूर्णम् | इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं ब्रह्मसूत्राणुभाष्यं सम्पूर्णम् | ||
Revision as of 08:59, 10 April 2026
विष्णुर्ब्रह्म तथाऽदातेत्येवं नित्यमुपासनम्।कार्यमापद्यपि ब्रह्म तेन यात्यपरोक्षताम्॥ १॥
प्रारब्धकर्मणोऽन्यस्य ज्ञानादेव परिक्षयः(ज्ञानेन स्यात्परिक्षयः)।अनिष्टस्योभयस्यापि सर्वस्यान्यस्य भोगतः॥ २॥
उत्तरेषूत्तरेष्वेवं(उत्तरेषूत्तरेष्वेव) यावद्वायुं विमुक्तिगाः।प्रविश्य भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा॥ ३॥
वायुर्विष्णुं प्रविश्यैव भोगांश्चैवोत्तरोत्तरम्।उत्क्रम्य मानुषा मुक्तिं यान्ति देहक्षयात् सुराः॥४॥
अर्चिरादिपथा वायुं प्राप्य तेन जनार्दनम्।यान्त्युत्तमा नरोच्चाद्या ब्रह्मलोकात् सहामुना॥ ५॥
यथासङ्कल्पभोगाश्च चिदानन्दशरीरिणः।जगत्सृष्ट्यादिविषये महासामर्थ्यमप्यृते॥ ६॥
यथेष्टशक्तिमन्तश्च विना स्वाभाविकोत्तमान्।अनन्यवशगाश्चैव वृद्धिह्रासविवर्जिताः।दुःखादिरहितं नित्यं मोदन्तेऽविरतं सुखम्॥ ७॥
पूर्णप्रज्ञेन मुनिना सर्वशास्त्रार्थसङ्ग्रहः।कृतोऽयं प्रीयतां तेन परमात्मा रमापतिः॥ ८॥
नमो नमोऽशेषदोषदूरपूर्णगुणात्मने।विरिञ्चिशर्वपूर्वेड्य वन्द्याय श्रीवराय ते॥ ९॥
॥ इति चतुर्थोऽध्यायः॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं ब्रह्मसूत्राणुभाष्यं सम्पूर्णम्