Bruhadaranyaka/C5/S6: Difference between revisions
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Revision as of 04:44, 9 April 2026
षष्ठं ब्राह्मणम्
तद्यत्तत् सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मंडले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन् प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन् भवति शुद्धमेवैतन्मंडलं पश्यति नैनमेते रश्मयःप्रत्याययन्ति ॥१॥
॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि सप्तमाध्याये षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये षष्ठं ब्राह्मणम्॥
स वासुदेवो भगवानादित्यस्थो जनार्दनः ।
आदित्यनामा सम्प्रोक्तो आदानाद्धविषां सदा ॥
स एव दक्षिणाक्षिस्थस्तच्च रूपद्वयं हरेः ।
अन्योऽन्यस्मिन् स्थितं नित्यं प्राणैश्च सह रश्मिभिः ॥
दक्षिणाक्षिस्थितो विष्णुर्यदाऽस्मादुत्क्रमिष्यति ।
तदैव म्रियमाणस्तु जीवः पश्येद्विरश्मिकम् ॥
सूर्यस्य मंडलं नास्य प्रतीयन्ते हि रश्मयः ।
तत्क्षणे नियमेनैव केषाञ्चित् सप्तभिर्दिनैः ॥