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Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S28: Difference between revisions

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| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् । विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥
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| verse_line1  = परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥
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| verse_line1  = तस्मान्न ह्यात्मनोऽमुष्मादन्यो भावो निरूपितः । अनिरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला मतिरात्मनि ॥ ७ ॥
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| verse_line1  = इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ८ ॥
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| verse_line1  = एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणः । न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ९ ॥
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| verse_line1  = प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥
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| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥
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| verse_line1  = शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ।
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| verse_line1  = देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥
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| verse_line1  = अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥
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| verse_line1  = न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥
| verse_line1  = न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥
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| verse_line1  = अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥
| verse_line1  = अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥
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| verse_line1  = नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥
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| verse_line1  = समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि- र्गुणो भवेत् तत्सुविविक्तधाम्नः । विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणं घनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम् ॥ २६ ॥
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| verse_line1  = यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै- र्गतागतैर्वा त्रिगुणैर्न सज्जते । तथाऽक्षरं सत्वरजस्तमोमलै- रसङ्गतं संसृतिहेतुभिः परम् ॥ २७ ॥
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| verse_line1  = तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥
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| verse_line1  = तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥
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| verse_line1  = यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥
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| verse_line1  = पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥
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| verse_line1  = एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥
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Revision as of 04:43, 9 April 2026

अष्टाविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच– परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् । विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ १ ॥


परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति । स आशु भ्रंशते स्थानादसत्याभिनिवेशतः ॥ २ ॥


'न प्रशंसेत निन्द्यांस्तु प्रशंस्यान्नैव निन्दयेत् ।उभयं यः करोत्येतदसत्यात् स पतत्यधः ॥यः प्रशंस्यान्न प्रशंसेन्निन्द्यो येन न निन्द्यते ।सोऽपि तद्वदधो याति यतोऽरिवदुदासकः॥ इति सत्कारे ॥प्रकृत्या पुरुषेण च सह एकेन परमात्मना व्याप्तमेकात्मकम् । तथा पश्यत एव यथार्थज्ञानं भवति ॥ १,२ ॥
तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतनः ।मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्धि नानार्थदं मनः ॥ ३ ॥


'तैजसाहङ्कृतेर्जात इन्द्रियग्रामके परात् ।निद्रया वशमापन्ने जीवः स्यान्नष्टचेतनः ।अतो विष्णोर्वशे सर्वं तेन व्याप्तमिति स्मरेत्॥ इति च ॥'निद्रा चैव सुनिद्रा च द्विधा निद्रा प्रकीर्तिता ।तत्र निद्रा भवेन्नित्या सुनिद्रा मृतिकालगा॥ इति पाद्मे ।'मनोमात्रस्वरूपत्वात् स्वप्नो मायेति कथ्यते। इति च ।तथा नानार्थदं मन एव । मनसा हि विषयाः प्रतीयन्ते ॥ ३ ॥
कि ं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् ।वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ ४ ॥


'एकं तु शुभमुद्दिष्टमशुभं द्वैतमुच्यते ।पुंसोऽशुभस्य किं भद्रं किमभद्रं विशेषतः ।सर्वदाऽशुभरूपत्वाद् विशेषोऽत्यल्प एव हि॥ इति भारते ॥द्वैतस्याशुभस्य पुरुषस्य कियदल्पमेव हि भद्रमभद्रं वा स्वयोग्यादाधिक्येन न भवति यत्नवतोऽपीत्यर्थः । अतस्तद्विषये ध्यातमुक्तं च शुभमनृतमेव ।'उच्यते ध्यायते वापि कुनरं प्रति यच्छुभम् ।असत्यमेव भवति स्वभावोऽसत्त्वमेव यत्॥ इति प्रद्योते ॥ ४ ॥
छायाप्रत्युदकाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिणः ।एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् ॥ ५ ॥


स्वभावतोऽशुभस्याशुभदेहादिकं नाशुभकारणं तर्हीत्यत आह– छाया-प्रत्युदकाभासा इति ।'व्यपेक्ष्य जीवं देहादि निःशक्तत्वादवस्त्वपि ।पुनः शुभाशुभनृणां यच्छेदेव शुभाशुभम् ॥छाया नीहारकाभासा निःशक्ता अपि कार्यदाः ।एवं शुभादिदेहादेर्भवेत् कार्यं शुभादिकम्॥ इति सुमते ॥'नीहारः प्रत्युदं चैव धूम्रमित्यभिशब्द्यते। इति शब्दनिर्णये ॥ ५ ॥
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभुः ।त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वरः ॥ ६ ॥


तस्मान्न ह्यात्मनोऽमुष्मादन्यो भावो निरूपितः । अनिरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला मतिरात्मनि ॥ ७ ॥


इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम् ॥ ८ ॥


एतद् विद्वान् मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणः । न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत् ॥ ९ ॥


प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा । आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा निःसङ्गो विचरेदिह ॥ १० ॥


इदं विश्वं सृजति त्राति हरति च, स्वयं स्वात्मनैव सृज्यते त्रायते ह्रियते च ।'दीपाद् दीपान्तरं यद्वत् सृष्टिरीशस्य कीर्त्यते ।एतावत्कालमाशिष्ये मानुषेष्विति चिन्तनम् ॥विष्णोस्त्राणं समुद्दिष्टं स्वस्यैव स्वेच्छयैव तु ।दीपे दीपान्तरस्येव ह्येकीभावश्च संहृतिः॥ इति च ॥'पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ इति च ॥आत्मनः परमेश्वरस्य तस्मादन्यो भावो नास्ति ।'सृष्टिः स्थितिश्च संहारो भावनं समुदाहृतम् ।तद्यः करोति पुरुषः स भाव इति कीर्त्यते॥ इति विवेके ।अन्येन सृष्टिः स्थितिः संहार इति त्रिविधा मतिर्विद्वद्भिर्नैव निरूपिता निर्मूला प्रमाणवर्जिता ।'अन्यस्मात् सृष्टिसंहारौ स्थितिश्च परमात्मनः ।निरूपिता न विद्वद्भिः प्रमाणाभावतो हरेः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥अन्यतः सृष्टिः स्थितिः संहार इति त्रयं गुणप्रधानं सत्त्वादिगुणाधीनम् ।'गुणसम्बन्धयोग्यानामुत्पत्त्याद्याः स्युरन्यतः ।सर्वदा निर्गुणस्यास्य सर्गाद्याः स्युः कुतोऽन्यतः॥ इति च ॥'असमर्थमसत्प्रोक्तं सत्समर्थं प्रकीर्तितम्। इति च ॥ ६-१० ॥
श्रीभगवानुवाच– यावद् देहेन्द्रियप्राणैरात्मनः सन्निकर्षणम् । संसारः फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिनः ॥ १३ ॥


'फलवान् मोक्षहेतुत्वान्नित्यानन्दादपार्थकः ।जीवात्मनस्तु संसारः स्वप्नवच्चञ्चलत्वतः॥ इति तत्त्वविवेके ॥१३॥
अर्थेऽप्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ १४ ॥


यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थकृत् ।स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ १५ ॥


संसृत्यभावस्यैव फलरूपत्वान्निरर्थ एव संसार इत्यवधारयति– अर्थेऽपीति ।'उच्यते निष्फलत्वेन यदत्यल्पफलं भवेत्। इति च ।अतोऽल्पफलत्त्वावधारणार्थं च पुनर्वचनम् ॥ १४,१५ ॥
शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादयः ।अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नाऽत्मनः ॥ १६ ॥


अहङ्कारस्य सकाशाद् दृश्यन्ते । नाऽत्मनः स्वतः ।'अहङ्कारात्तु संसारो भवेज्जीवस्य न स्वतः ।कुतश्चिदानन्दतनोः स्वरूपेच्छायुतस्य सः॥ इति तन्त्रभागवते ॥ १६ ॥
देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्तिः । सूत्रं महानित्युरुधेह गीतः संसार आधावति कालतन्त्रः ॥ १७ ॥


देहेन्द्रियप्राणमनसामभिमानयुक्तः । सूत्रं महानित्याद्यधिकारनामभिर्युक्तः । प्रधानजीवो हिरण्यगर्भोऽप्याधावति संसारे किमुतान्य इत्याशयः ।'संसारयुग् यो ब्रह्माऽपि सर्वजीवेश्वरेश्वरः ।विष्ण्वधीनः सदा ज्ञानी किमुतान्येऽल्पचित्तिनः॥ इति सत्तत्त्वे ॥
अमूलमेतद् बहुरूपरूपं मनोवचःप्राणशरीरकर्म । ज्ञानासिनोपासनया शितेन च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्णः ॥ १८ ॥


अमूलं विष्णुमूलम् । बहुरूपेण तेनैव रूप्यते । मनआदीनां विषयः ॥१८॥
ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम् ।आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये ॥१९॥


केवलं स्वतन्त्रम् । आद्यन्तयोर्यत्स्वतन्त्रं तदेव मध्येऽपि स्वतन्त्रम् । परं ब्रह्म । ज्ञानविवेकादिस्वरूपम् । परिपूर्णगुणत्वात् । अन्यतो विविक्तत्वाद् विवेकः । सर्वं निगमयति प्रापयतीति निगमः । सर्वैरालोच्यत्वात् तपः । प्रतिप्रत्यक्षेषु स्थितत्वात् प्रत्यक्षम् । आचार्यसम्प्रदायसिद्धत्वात् ऐतिह्यम् । अनुमेयत्वाद् अनुमानम् ॥ १९ ॥
यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात् पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य ।तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं नानापदेशैरहमस्य तद्वत् ॥ २० ॥


हिरण्यखचितत्वेन हिरण्यप्रधानं हिरण्मयम् । शङ्खमञ्चकरथादिषु मध्येऽपि केवलं प्राधान्येन व्यवहार्यमाणं तदेव ।'रथोपस्थे परिष्कारात् पूर्वं दारुमयाद् रथात् ।सुवर्णं व्यवहाराय मुख्यं रथपरिष्कृतम् ॥मध्ये चान्ते रथोपस्थान् निष्कृष्य पृथगास्थितम् ।यद्वदेवं हरिः साक्षाज्जगद्देहात् पृथक् स्थितः ॥पूर्वं जगति संस्थश्च जगदन्ते पृथक् स्थितः ।स एव मुख्यो जगतः स्वातन्त्र्यात् परमेश्वरः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥'सुरपितृमनुजादिकल्पनादिभिःइत्याद्यन्तर्याम्यपेक्षया ।'यथा सुवर्णमकृतं क्रियते कुण्डलादिकम् ।पुनरेकीभवत्यद्धा तद्वद् विष्णुरजोऽपि सन् ॥सुराद्यन्तःस्थितो भूत्वा पुनरेकीभवेद् विभुः॥ इति च ॥'तत्तन्नियामकस्यैव नाम सर्वं सुरादिकम् ।तत्सम्बन्धादुदीर्येत व्यवहृत्यै सुरादिषु॥ इति शब्दनिर्णये ॥'एकलं केवलं चेति स्वतन्त्रमभिधीयते ।स्वतन्त्रस्तु हरिः साक्षात् परिष्कृतहिरण्यवत्॥ इति प्रवृत्ते ।'प्रत्येकं न तु दार्वादि स्वतन्त्रं विक्रियागतम् ।महाफलं स्यात् स्वर्णं तु स्वतन्त्रं विक्रियोपगम् ।तद्वत् स्वतन्त्रो भगवान् प्रवृत्तावन्यदन्यथा॥ इति च ॥ २० ॥
विज्ञानमेतत् त्रिपदस्थमङ्ग गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ ।समन्वयेन व्यतिरेकतश्च येनैव तुर्येण तदेव सत्यम् ॥ २१ ॥


मोक्षदं संसारदं तमःप्रदं चेति त्रिपदस्थं विज्ञानम् । तदिच्छायाः सत्त्व एतत् सर्वमस्ति, अन्यथा नास्तीत्यन्वयव्यतिरेकौ ॥तदेव केवलं सत्यमिति सर्वत्र सम्बध्यते ।'स्वातन्त्र्यमेव सत्यत्वं विष्णोरन्यस्य सत्यता ।प्रवाहतः सदाऽस्तित्वं पुंप्रकृत्योः सदाऽस्तिता॥ इति वस्तुतत्वे ॥ २१ ॥
न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा- न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम् । भूतं प्रसिद्धं च परेण यद्यत् तदेव सत् स्यादिति मे मनीषा ॥ २२ ॥


मध्ये च तत् केवलं नेति सम्बध्यते ।'तत्स्वातन्त्र्येण नैवास्ति यदुत्पत्तिविनाशवत् ।स्वातन्त्र्येणास्तिता तस्य यत् सत्ताज्ञानदं सदा॥ इति वैभवे ।'जगतो नास्तिता सैव या पराधीनता सदा ।अभावस्तु कुतस्तस्य यद्विभातीह सर्वदा॥ इति प्राकाश्ये ॥ २२ ॥
अविद्यमानोऽप्यवभासते यो वैकारिको राजससर्ग एषः । ब्रह्म स्वयञ्ज्योतिरतो विभाति ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम् ॥ २३ ॥


'अविद्यमानता नाम जगतः परतन्त्रता ।यथाऽशक्तस्तु पुत्रादिरसन्नित्युच्यते जनैः॥ इति विवेके ॥अतो ब्रह्मण एव विभाति । द्वितीयं ब्रह्म प्रकृतिः । आत्मा जीवः प्रकृतीन्द्रियविषयजीवादिविचित्रं जगद्ब्रह्मत एव विभातीत्यर्थः ॥ २३ ॥
नात्मा वपुः पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताशः । मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व- महङ्कृतिः स्वं कृतिरर्थसाम्यम् ॥ २५ ॥


'वायुरेव स्वयं प्राणस्तत्रस्थे चोदतेजसी ।उदेन तेजसा चैव प्राणस्य हि कृतं वपुः॥ इति प्रकाशिकायाम् ॥'प्राणस्य वायुरूपस्य भूतत्रयकृतं वपुः ।ततो हि पार्थिवं नात्र खं चात्यल्पमुदाहृतम्॥ इति सन्धारणे ॥सत्वं मूलबुद्धिः । अहं शृृणोम्यहं स्पृशाम्यहं पश्यामीति सर्वार्थेषु समत्वादहङ्कारोऽर्थसाम्यम् ।'न देहो नेन्द्रियप्राणमनोबुद्ध्यहमादयः ।विष्णुश्चिदानन्दतनुः स हि जीवाधिपः सदा॥ इति सत्तत्त्वे ॥२५॥
समाहितैः कः करणैर्गुणात्मभि- र्गुणो भवेत् तत्सुविविक्तधाम्नः । विक्षिप्यमाणैरुत किं नु दूषणं घनैरुपेतैर्विगतै रवेः किम् ॥ २६ ॥


यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै- र्गतागतैर्वा त्रिगुणैर्न सज्जते । तथाऽक्षरं सत्वरजस्तमोमलै- रसङ्गतं संसृतिहेतुभिः परम् ॥ २७ ॥


तथापि सङ्गः परिवर्जनीयो गुणेषु मायारचितेषु तावत् । मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद् रजो निरस्येत तमःकषायम् ॥ २८ ॥


भगवतो गुणदोषाभावेऽपि जीवस्य सङ्गोऽवर्जनीय एव मुक्तिपर्यन्तम् ।'समाहितेऽपि)न जीवेन विक्षिप्ते वा न तु क्वचित् ।विशेषो विद्यते विष्णोस्तथापि तु समाहिते ॥प्रीतो भवति वै नित्यं सर्वधर्मकृतोऽपि च॥ इति पाद्मे ॥ २६-२८ ॥
तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं शयानमुद्यन्तमदन्तमन्नम् । स्वभावमन्यत् किमपीहमान- मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद ॥ ३२ ॥


आत्मस्थमतिः परमात्मस्थमतिः । परमात्मनोऽन्यत् । पारतन्त्र्यादेः॥ ३२ ॥
यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं नानानुमानेन विरुद्धमन्यत् । न मन्यते वस्तुतया मनीषी स्वप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम् ॥ ३३ ॥


'नानामानविरुद्धं हि स्वातन्त्र्यं जगतः सदा ।स्वतन्त्रो भगवान्विष्णुरेक एव न संशयः॥ इति च ॥वस्तुतया स्वतन्त्रत्वेन । विरुद्धं तथा न मन्यते ।'अस्त्येव स्वाप्नमखिलं वासनारूपमात्मनि ।जाग्रदेतदिति ज्ञानं यत्तदेव भ्रमात्मकम् ॥तद्वज्जगदिदं सर्वं विद्यमानं न संशयः ।स्वतन्त्रमेतदिति तु यज्ज्ञानं तद्भ्रमात्मकम्॥ इति च ॥'उत्थितो नैव जाग्रत्त्वं क्वचित् स्वप्नस्य पश्यति ।स्वातन्त्र्यमेवं जगतो ज्ञानवान् नैव पश्यति॥ इति विवेके ॥३३॥
पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र- मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग । निवर्तते तत् पुनरीक्षयैव न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा ॥ ३४ ॥


भगवद्गुणविषयं तत्कर्मविषयं चेति गुणकर्मचित्रम् । आत्मनि परमात्म-विषयम् । एतन्न जानामीत्यप्यविविक्तम् ।'अन्यैर्ज्ञातेऽपि वाऽज्ञाते न विशेषो हरेः क्वचित् ।तेषामेव विशेषः स्यादज्ञानापगमेन तु॥ इति च ॥ ३४ ॥
एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो महानुभूतिः सकलानुभूतिः । एकोऽद्वितीयो वचसां विरामो येनेरिता वाग्रचनाश्चरन्ति ॥ ३६ ॥


'ज्ञानानन्दाद्यभिन्नत्वादेकः सर्वोत्तमत्वतः ।अद्वितीयो महाविष्णुः पूर्णत्वात्पुरुषः स्मृतःइति च ॥ ३६ ॥
एतावानात्मसम्मोहो यद् विकल्पस्तु केवले ।आत्माऽमृते स्वमात्मानमचलं यन्न पश्यति ॥ ३७ ॥


'एतावानात्मसम्मोहो यद्विरुद्धस्य कल्पनम् ।यत्परात्माश्रयान् जीवान् निश्चयेन न पश्यति॥ इति तन्त्रभागवते ।अचलमिति क्रियाविशेषणम् ॥ ३७ ॥
यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम् ।व्यर्थो नाप्यर्थवादोऽयं द्वयं विन्दन्ति सूरयः ॥ ३८ ॥


॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥
अयं व्यर्थवादो न भवति । किन्त्वर्थवादः । जगत् परमेश्वरं च द्वयं विन्दन्ति ज्ञानिनः ।'पञ्चभूतात्मकं विश्वं भ्रान्तिसिद्धमपण्डिताः ।वदन्ति पण्डितास्त्वद्धा जगदाहुरबाधितम् ।प्रवाहरूपेण सदा विष्णोरिच्छावशे स्थितम्॥ इति च ॥ ३८ ॥