Jump to content

Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S22: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 1: Line 1:
{{Adhyaya
{{Adhyaya
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id  = BTN_C11
| chapter_num  = 11
| chapter_num  = 11
| chapter_name = एकादशस्कन्धः
| section_id  = BTN_C11_S22
| section_num  = 22
| title        = द्वाविंशोऽध्यायः
| title        = द्वाविंशोऽध्यायः
}}
}}
Line 14: Line 10:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– युक्तयः सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा । मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥
| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– युक्तयः सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा । मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥
Line 24: Line 18:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत् तथा ।
| verse_line1  = नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत् तथा ।
Line 35: Line 27:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम् ।
| verse_line1  = यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम् ।
Line 46: Line 36:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ ।
| verse_line1  = परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ ।
Line 66: Line 54:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च ।
| verse_line1  = एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च ।
Line 77: Line 63:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पौर्वापर्यमथोऽमीषां प्रसङ्ख्यानमभीप्सताम् ।
| verse_line1  = पौर्वापर्यमथोऽमीषां प्रसङ्ख्यानमभीप्सताम् ।
Line 88: Line 72:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।
| verse_line1  = अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।
Line 108: Line 90:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि ।
| verse_line1  = पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि ।
Line 128: Line 108:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः ।
| verse_line1  = प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः ।
Line 148: Line 126:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।
| verse_line1  = सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।
Line 168: Line 144:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिलः ।
| verse_line1  = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिलः ।
Line 179: Line 153:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः । वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५ ॥
| verse_line1  = श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः । वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५ ॥
Line 189: Line 161:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥
| verse_line1  = शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥
Line 199: Line 169:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी । सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्तमीक्षते ॥ १७ ॥
| verse_line1  = सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी । सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्तमीक्षते ॥ १७ ॥
Line 209: Line 177:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥
| verse_line1  = व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥
Line 228: Line 194:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः ।
| verse_line1  = सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः ।
Line 248: Line 212:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः ।
| verse_line1  = चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः ।
Line 268: Line 230:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च ।
| verse_line1  = सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च ।
Line 288: Line 248:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तद्वत् षोडशसङ्ख्यानि आत्मना मन उच्यते ।
| verse_line1  = तद्वत् षोडशसङ्ख्यानि आत्मना मन उच्यते ।
Line 299: Line 257:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् ।
| verse_line1  = इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् ।
Line 319: Line 275:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = उद्धव उवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ । अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः । प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ॥ २५ ॥
| verse_line1  = उद्धव उवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ । अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः । प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ॥ २५ ॥
Line 329: Line 283:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = एतन्मते पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि ।
| verse_line1  = एतन्मते पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि ।
Line 340: Line 292:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः ।
| verse_line1  = त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः ।
Line 360: Line 310:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥
| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥
Line 379: Line 327:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते ।
| verse_line1  = ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते ।
Line 399: Line 345:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = दृग् रूपमर्कश्च परत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति न स्वतोऽसौ । आत्मा यदेषामुपराम आद्यः स्वयाऽनुभूत्याऽखिलसिद्ध्यसिद्धिः ॥ ३० ॥
| verse_line1  = दृग् रूपमर्कश्च परत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति न स्वतोऽसौ । आत्मा यदेषामुपराम आद्यः स्वयाऽनुभूत्याऽखिलसिद्ध्यसिद्धिः ॥ ३० ॥
Line 409: Line 353:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३१ ॥
| verse_line1  = एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३१ ॥
Line 419: Line 361:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलो जगतः प्रसूतिः । अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु- र्वैकारिकः तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥
| verse_line1  = योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलो जगतः प्रसूतिः । अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु- र्वैकारिकः तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥
Line 429: Line 369:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥
| verse_line1  = आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥
Line 448: Line 386:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः ।
| verse_line1  = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः ।
Line 468: Line 404:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि ।
| verse_line1  = ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि ।
Line 488: Line 422:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् ।
| verse_line1  = सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् ।
Line 508: Line 440:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ ।
| verse_line1  = आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ ।
Line 528: Line 458:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ ।
| verse_line1  = तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ ।
Line 548: Line 476:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् ।
| verse_line1  = नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् ।
Line 568: Line 494:
| document_id  = BTN
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C11
| chapter_id    = BTN_C11
| section_id    = BTN_C11_S22
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा ।
| verse_line1  = यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा ।
Line 575: Line 499:
}}
}}


{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C11_S22_V54
| id      = BTN_C11_S22_V54_author-note
| name    = Bhashyam
| text     =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥
}}


{{Commentary
{{Commentary

Revision as of 04:43, 9 April 2026

द्वाविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच– युक्तयः सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा । मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥ ४ ॥


नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत् तथा ।एवं विवदतां हेतुः शक्तयो मे दुरत्ययाः ॥ ५ ॥


यासां व्यतिकरादासीद् विकल्पो वदतां पदम् ।प्राप्ते शमदमे व्येति वादस्तमनु शाम्यति॥ ६ ॥


परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ ।पौर्वापर्यप्रसङ्ख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥ ७ ॥


मायां मदीयां मत्सामर्थ्यम् ।'विष्णोः सामर्थ्यमालम्ब्य तत्त्वसङ्ख्यां मुनीश्वराः ।चक्रुर्हि तदविज्ञाय विवदन्त्यल्पबुद्धयः ॥तत्रापि कारणं विष्णोः शक्तिर्यस्या विकारतः ।अव्यक्तादेर्विकल्पोऽयं मनसः सम्प्रजायते ॥विरुद्धकल्पनं तच्च वासुदेवैकनिष्ठया ।निरहङ्कारया नश्येद्विवादैकाश्रयं हि तत्॥ इति तन्त्रभागवते ॥यासां सकाशादव्यक्तादिव्यतिकराद्विकल्पो विरुद्धकल्पः । स हि विवादाश्रयः । तत्त्वसङ्ख्या विवक्षाभेदेन बहुधा भवति ॥ ४-७ ॥
एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च ।पूर्वस्मिन् वाऽपरस्मिन् वा तत्वे तत्वानि सर्वशः ॥ ८ ॥


पौर्वापर्यमथोऽमीषां प्रसङ्ख्यानमभीप्सताम् ।यथा विविक्तं यद्युक्तं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात् ॥ ९ ॥


अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।स्वतो न सम्भवेद् यस्मात् ततोऽन्यः पुरुषो भवेत् ॥ १० ॥


सर्वथा जीवादन्यः परमेश्वरोऽङ्गीकर्तव्यः । जीवस्य स्वत एव ज्ञानायोगात् ॥ ८-१० ॥
पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि ।तदन्यकल्पनाऽपार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥


स च पुरुषरूपेण तत्स्थितो ज्ञानमुत्पादयति । ईश्वररूपेण बहिःस्थितः फलं ददाति । न च तयोः स्वरूपयोः किञ्चिद्वैलक्षण्यम् । तयोश्चान्यत्वकल्पना तत्स्वरूपादपगमनप्रयोजनाऽनर्थकारिणीत्यर्थः । ज्ञानस्वरूपस्य जीवस्य कथं ज्ञानोत्पादनमित्यतो वक्ति ज्ञानं च प्रकृतेर्गुण इति । जन्यज्ञानं प्रकृतेर्गुणः ।'स्वरूपभूतज्ञानं तु सदा जीवस्य विष्णुना ।नियतं प्राकृतं ज्ञानं भक्त्या तेनैव दीयते॥ इति च ॥ ११ ॥
प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः ।सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२ ॥


जन्यज्ञानस्य प्राकृतत्वं साधयति – प्रकृतेर्गुणसाम्ये त्वित्यादिना ॥अन्तःस्थः पुरुषो नाम ज्ञानदः सर्वदेहिनाम् ।बहिःस्थ ईश्वरो नाम ज्ञानादिफलदो हरिः॥ इति मात्स्ये ॥'पुरुषाख्यो हृद्गतस्तु विष्णुर्जीवविबोधकः ।फलदात्रा तु बाह्येन य ईशेन भिदां वदेत् ॥तथैवान्यस्वरूपेषु विष्णोर्यो भेददर्शकः ।यश्च जीवेश्वराभेदं पश्येत् तेऽनर्थभागिनः॥ इति ब्राह्मे ॥ १२ ॥
सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते ।गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३ ॥


कालो भगवान् ॥ १३ ॥
पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिलः ।ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव ॥ १४ ॥


श्रोत्रं त्वग् दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तयः । वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मनः ॥ १५ ॥


शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातयः । गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धयः ॥ १६ ॥


सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी । सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्तमीक्षते ॥ १७ ॥


व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥


'नवैकादश पञ्च त्रीणिइत्युक्तानि पुरुषः प्रकृतिरित्यादीनि ॥उत्सर्गस्य द्विविधत्वात् पञ्चकद्वयम् ॥त्रीनिति त्रिगुणानिति वक्तुं गुणप्रवृत्तिमाह– सर्गादावित्यादिना ॥कार्यकारणभावादन्योन्यानुप्रवेशो युक्त इति वक्तुं सृष्ट्युक्तिः ।'सृज्यस्रष्टृस्वरूपत्वादन्योन्यानुप्रवेशिनः ।तिष्ठन्ति तात्विका देवा विशेषप्राप्तिकारणात्। इति नैसर्गे ॥'अन्वेकमप्येषुइत्युक्तत्वात् पुरुषो हिरण्यगर्भः ।'यदा पुरुषशब्देन विरिञ्चस्यैव वाच्यता ।परस्य पृथगुक्त्यैव व्यक्तस्तत्र तु शङ्करः ॥तदाऽहङ्कारशब्देन स्कन्दस्यैव वचो भवेत्॥ इति विवेके ॥१४-१८॥
सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः ।ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥


सत्वादीन् गत्यादींश्च विना परमात्मना सह षड्विंशतिः । महदहङ्कारौ ब्रह्मरुद्रौ अङ्गीकृत्य स्कन्दं विना परमात्मना सह पञ्चविंशतिः ।'विषयेन्द्रियप्रकृतिदेवताः परमात्मना ।पञ्चविंशतितत्त्वानि सङ्ख्यातानि विदो विदुः॥ इति च ।'ज्ञानशब्दोदितो ब्रह्मा तदाधारो हरिः स्मृतः। इति च ॥ततो ज्ञानं विना परमात्मानमङ्गीकृत्यैव देहेन्द्रियाण्यसुश्च नव तत्त्वानि ।'सर्वदेहाभिमानी तु देहिनां तु दिवाकरः ।इन्द्रियात्मेन्द्र एवैकः प्राणो नाम प्रजापतिः॥ इति च ॥ १९ ॥
चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः ।जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु ॥ २१ ॥


अवयविनो जन्म तैः खलु ॥ २१ ॥
सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च ।पञ्चपञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः ॥ २२ ॥


'भूतानि मात्राश्च परस्तत्त्वैकादशकं स्मृतम्। इति च । भूतमात्रेत्यारम्भात् तत्सिद्धेरेकादशानां पृथगनुक्तिः ॥ २२ ॥
तद्वत् षोडशसङ्ख्यानि आत्मना मन उच्यते ।भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश ॥ २३ ॥


इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् ।सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम् ॥ २४ ॥


आत्मना सहैव मन उच्यते ।'आत्मनः सन्निधिस्थत्वान्मनसस्तु तदुक्तितः ।उक्तो भवेत्परात्माऽपि तत्त्वषोडशकं यदा॥ इति च ।आत्मशब्देन च ब्रह्मा परमात्मा चोभावुच्येते ।'भूतेन्द्रियाणि च मनो ब्रह्मा विष्णुस्तथैव च ।एवं त्रयोदशैवाऽहुस्तत्त्वानि मुनयो वराः॥ इति च ।'आत्मेति परमात्मा च विरिञ्चश्चापि कथ्यते ।वायुर्मुनश्च देहश्च स्वयमित्यपि कुत्रचित्॥ इति प्रत्यये ॥ २३,२४ ॥
उद्धव उवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ । अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः । प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि ॥ २५ ॥


एतन्मते पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि ।छेत्तुमर्हसि पद्मेश वचोभिस्तत्वनैपुणैः ॥ २६ ॥


त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः ।त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ नचापरः ॥ २७ ॥


यद्यपि परमात्मा प्रकृतिश्च विलक्षणौ तथापि तयोर्वैलक्षण्यं न लक्ष्यते ।'अन्तरं च भिदा चेति वैलक्षण्यं प्रकीर्तितम्। इति च ।तद्वैलक्षण्यं कुतो न दृश्यत इति प्रश्नाभिप्रायः ॥ अन्योन्याधारत्वमेव दृश्यते । न तु परमेश्वरस्यानन्याधारत्वेन प्रकृत्याधारत्वं मन्दमतीनामित्यर्थः ॥'आधारः प्रकृतेर्विष्णुर्नाऽधारस्तु हरेः क्वचित् ।तथाऽप्यव्यक्तगो यद्वद्दृश्यते मन्दचेतसाम्॥ इति पाद्मे ॥ २५-२७ ॥
श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥


प्रकृतिः पुरुषश्चेत्येव अन्योन्यविलक्षणावेव । एष विकल्पः । वैलक्षण्या-दर्शनं विरुद्धकल्पनमेव । यस्माद् गुणव्यतिकरात्मकः सर्गो विकार-निमित्तः । स च गुणव्यतिकरस्त्रिविधः सत्त्वरजस्तमसामेकैकप्राधान्येन । तत्र तमःप्रधानानामेव विरुद्धकल्पनम् । तस्मात् तम एवात्र कारण-मित्यर्थः ॥ २८ ॥
ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते ।वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥२९॥


तत्रापि प्रकृतिरेव कारणम् । ईश्वरेच्छा च । विकाराज्जातत्वाद् वैकारिक इत्युच्यते अहङ्कारस्त्रिविधोऽपि ।'वैकारिको महांश्चैव तथाऽहङ्कार एव च ।तथैव सात्विकश्चांशो वैकारिक इति त्रिधा॥ इति शब्दनिर्णये ॥ २९ ॥
दृग् रूपमर्कश्च परत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति न स्वतोऽसौ । आत्मा यदेषामुपराम आद्यः स्वयाऽनुभूत्याऽखिलसिद्ध्यसिद्धिः ॥ ३० ॥


एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु- र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥ ३१ ॥


योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलो जगतः प्रसूतिः । अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु- र्वैकारिकः तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥


आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥


अध्यात्ममिन्द्रियाणि । तैरेव विपरीतं ज्ञानं जायते ।'अहङ्कारे विद्यमाने भ्रमो भवति नान्यदा ।सम्यज्ज्ञानं हरेः शक्त्या तन्मुक्तस्य विशेषतः ॥देवतानुग्रहो नित्यो मुक्तस्यापि ह्यपेक्ष्यते ।नित्यं तत्प्रतिबिम्बत्वाज्जीवानामेव कृत्स्नशः ॥बाह्यज्ञानं च मुक्तस्य न जडाहङ्कृतेः क्वचिद् ।किन्तु स्वरूपशक्त्यैव देवेभ्यश्चाभिजायते॥ इति ब्रह्मतर्के ॥'पश्यन्नपि जगत् सर्वं चिद्बलेनैव पश्यति ।कुतो मुक्तस्य तु जडं चिद्रूपस्य व्यपेक्ष्यते॥ इति च ।एषामुपरमे मुक्तौ । चक्षुरिति पुनर्वचनमवधारणार्थम् ।योऽसौ भ्रमहेतुर्विकारः स गुणक्षोभकृतः । आत्मा तु परिज्ञानस्वरूपो न गुणक्षोभकृतः ॥भिदा विपर्ययेण विद्यमानं नास्ति अविद्यमानमस्तीति विवादः ।'असदस्ति च सन्नास्तीत्येवं भेदाद्विवादनम् ।सदैव हरिपादाब्जविमुखानां प्रवर्तते॥ इति च ॥ ३०-३३ ॥
विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः ।जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥ ३८ ॥


विषयाभिनिवेशेन उत्तरदेहाभिनिवेशेन पूर्वदेहास्मरणं यत् तन्मृत्युः ॥
ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि ।बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा ॥ ४१ ॥


ईदृशं वर्तमानं आयः एष्यन् सः अतीत इति त्रैविध्यं भाति । विज्ञाय वस्तुनि विज्ञाते सति । दीर्घलोपः 'अत्रा तेइतिवत् ।'क्षैप्रे दीर्घलोपःइति सूत्रात् ।अयमेवाऽत्मानात्मनोर्विशेषहेतुः । यथा प्रायोऽ-सज्जनोऽसज्जनमेव जनयतीति पितृज्ञानात् पुत्रदौरात्म्यं ज्ञायते । एवमनित्य-त्वादनात्मत्वं देहादेरित्यर्थः ॥ ४१ ॥
सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् ।सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्भिर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥


सोऽयमेवेति मृषा ।'स चायमिति तु ज्ञानं न मृषाऽयं स एव तु ।इति ज्ञानं मृषैव स्यात् भेदाभेदौ यतस्तनोः ॥अभेद एव जीवस्य नित्यं प्रत्येकशः पृथक् ।दीपदेहनदीवारिफलादीनां पृथक् स्वतः ॥भेदाभेदौ परिज्ञेयौ कार्यकारणयोरपि ।गुणस्य गुणिनश्चैव जातिव्यक्त्योस्तथैव च ॥तथाऽवयव्यवयवयोः क्रियायास्तद्वतस्तथा ।एवं जडेषु नियमश्चिद्रूपेष्वभिदैव तु॥ इति च ॥'ये धर्मा नियमेनैव धर्मिणो न वियोगिनः ।जडस्था अप्यभिन्नास्ते भिन्नाभिन्ना वियोगिनः॥ इति च ॥४४॥
आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ ।भवाप्ययौ हि भूतानामभिज्ञाद्वयलक्षणौ ॥ ४८ ॥


अभिज्ञाद्वयलक्षणौ अभिमानमात्रौ ॥ ४८ ॥
तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ ।तरोर्विलक्षणो दृष्ट एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥


तरोर्बीजविकारदृष्टान्तेन विद्वान् देहाभिमानं त्यक्त्वा संयमं याति । परमात्मनश्च भेदं जानाति प्रकृत्यादेः ।'बीजाद्यवस्थासंयुक्ताद्वृक्षाद्द्रष्टा यथा पृथक् ।एवं विकारिणो विष्णुर्जीवश्च पृथगेव तु॥ इति च ॥ ४९ ॥
नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् ।एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥ ५२ ॥


'दुःखशोकादयः सर्वे ज्ञेया बुद्धिगुणा इति ।सुखज्ञाने तु जीवस्य भक्तिः स्नेहस्तथैव च ॥विपर्ययेणासुराणां जीवबुद्धिगुणा मताः॥ इति च ॥'आत्मनोऽपि गुणा बुद्धिकृता बुद्धिगुणा इति ।उच्यन्ते सुखदुःखाद्याः परमात्मकृता यथा॥ इति त्रैकाल्ये ॥५२॥
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा ।स्वप्नदृष्टश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥ ५४ ॥


॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥
मृषा वृथा ।'अल्पप्रयोजनं यत्तन्मृषेत्येव तदुच्यते। इति शब्दनिर्णये ।आत्मनः स्वत एव दुःखाद्याः सुखादिवदिति मिथ्याबुद्धिरिति वा ॥