Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S13: Difference between revisions
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Revision as of 04:42, 9 April 2026
त्रयोदशोऽध्यायः
द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥
'बहुत्वेनैव वस्तूनां यथार्थज्ञानमुच्यते ।औतज्ञानमित्येतद् द्वैतज्ञानं तदन्यथा ॥यथाज्ञानं तथा वस्तु यथावस्तु तथा मतिः ॥नैव ज्ञानार्थयोर्भेदस्तत एकत्ववेदनम्॥ इति च ॥ १० ॥
दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः ।गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥
'गुरोराज्ञानुरोधेन दूरस्थो वा गृही भवेत्॥ इति च ॥
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् ।भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥
'अप्रविष्टः सर्वगतः प्रविष्टस्त्वनुरूपवान् ।एवं द्विरूपो भगवान् हरिरेको जनार्दनःइति च ॥ १५ ॥
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् ।कारणेषु न्यसेत् सम्यक् सङ्घातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥
'कार्यस्य कारणलयज्ञानमात्रं विलापनम्॥ इति च ॥ २४ ॥अप्सु प्रवेशयेद् जिह्वां घ्रेयैर्घ्राणं क्षितौ न्यसेत् ॥
मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ॥ २८ ॥
परः कविर्बृहस्पतिः ॥ २८ ॥
कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः ।सत्त्वेन चित्तं क्षेत्रज्ञे गुणैर्वैकारिकं परे ॥ २९ ॥
'चित्तं हिरण्यगर्भे तु विलाप्य परमात्मनि ।क्षेत्रज्ञाख्ये लापयेच्च ततो नान्यत्स्मरेद्बुधः॥ इति च ॥ २९ ॥
इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् ।ज्ञात्वाऽद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानिलः ॥ ३१ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥
आत्मानं परमात्मानम् । अद्वयः । ततोऽन्यस्मृतिवर्जितः । दग्धयो-निर्यथानल इति कृत्याभावमात्रम् ।'न हरिं स्मरतः कृत्यं दग्धेन्धनहुताशवत्। इति च ॥