Bhagavatatatparyanirnaya/C6/S8: Difference between revisions
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Revision as of 04:42, 9 April 2026
अष्टमोऽध्यायः
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-द्धयशीर्षो मां पथि देवहेलनात् ।
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवात् ।'सनत्कुमारनामा तु ब्रह्मचर्यवपुर्हरिः ।सनत्कुमारमपरं ब्रह्मपुत्रं विवेश यः ।स मां योग्येतरात्कामात्पातु विश्वेश्वरः प्रभुः॥ इति च ।देवर्षिवर्यः पुरुषान्तरार्चनात् । विष्णोरपरिवारत्वदृष्ट्या देवान्तरार्चनात् ।'महिदासो देवऋषिः पातु मां विष्णुरव्ययः ।तदनर्पितकर्मभ्यस्तदस्मरणतस्तथा॥ इति च ॥ १७ ॥
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१ ॥
तथैकात्म्यानुभावेन विकल्परहितः स्वयम् ।भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२ ॥
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३ ॥
यथा हि भगवानेव–'सदसन्नियामकतया सदसद्रूप उच्यते ।सत्येनानेन मां देवः पातु विष्णुश्चतुर्भुजः॥'एक एव परो विष्णुर्भूषाहेतिध्वजेष्वजः ।तत्तच्छक्तिप्रदत्वेन स्वयमेव व्यवस्थितः ।सत्येनानेन मां देवः पातु सर्वेश्वरो हरिः॥ इति ॥ ३१-३३ ॥
एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥ ३६ ॥
न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये षष्ठस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥
'गुरुशिष्ययोरयोग्यत्वाद्गुरुवृत्तेरपूर्तितः ।अप्रसादाद्गुरोर्विद्या न यथोक्तफलप्रदा॥ इति च ॥'विद्याः कर्माणि च सदा गुरोः प्राप्ताः फलप्रदाः ।अन्यथा नैव फलदाः प्रसन्नोक्ताः फलप्रदाः॥ इति च तन्त्रसारे ॥ ४३ ॥