Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S10: Difference between revisions
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Revision as of 04:42, 9 April 2026
दशमोऽध्यायः
एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥
अशेषभगवत्प्रियाणां निकेतः स एव भरतो मानुषापेक्षया ।'तत्कालस्थितभक्तेषु मानुषेष्वृषभात्मजः ।वरोऽपि धिक्कृतो राज्ञा सुहृदा वैष्णवेष्वपि॥ इति गारुडे ॥ ९ ॥
ब्राह्मण उवाच–त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं
'भरणादिकृद्धरिरिति चिन्तयन्नृपमब्रवीत्॥ इति च ॥ १० ॥
स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्चक्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च ।
देहेन जातस्य देहाभिमानिनः ।'देहमानी देहजातो विदेहो मानवर्जितः। इति च ॥
जीवन्मृतत्वं नियमेन राज-न्नाद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् ।
विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् चपश्यामि यन्न व्यवहारतोऽन्यत् ।
'प्राणयुक्तेररत्या च जडं जीवन्मृतं स्मृतम्। इति च ।'स्वामित्वं तु हरेरेव मुख्यमन्यत्र भृत्यता ।देवेषु तन्नियत्या च त्वदादेर्व्यावहारिकम् ॥मानुषेषु विशेषः को व्यवहारमृते वद ।व्यत्यासान्न हि देवेषु व्यत्यासः स्वामितां गतः॥ इति च ॥ १२-१३ ॥
न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्यसाम्येन वीताभिमतेस्तवापि ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥
।'स्वतो महदवज्ञानाद्रुद्रोऽप्यात्मानमादहेत्। इति च ॥ २६ ॥