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Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S6: Difference between revisions

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| verse_line1  = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥
| verse_line1  = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥
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| verse_line1  = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥
| verse_line1  = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥
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| verse_line1  = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥
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| verse_line1  = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥
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| verse_line1  = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥
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| verse_line1  = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥
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Revision as of 04:42, 9 April 2026

षष्ठोऽध्यायः

राजोवाच–न नूनं भगवन्नात्मरामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजा-नामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि


ऋषिरुवाच–सत्यमुक्तं किन्त्विह वा एके मनसो विस्रम्भमनवस्थानस्य घटकिराट इव न सङ्गच्छन्ति ॥ २ ॥
तथा चोक्तम्–न कुर्यात्कस्यचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते ।


नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः ।योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥ ४ ॥


कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः ।कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥


'महैश्वर्यस्वरूपो हि भगवान्नृषभो स्वराट् ।नैश्वर्याणि स्वकीयानि ख्यापयामास सर्ववित् ॥उत्तमानां ज्ञापनार्थं धर्मतत्त्वस्य केशवः ।तेषामैश्वर्यभोगे हि मनः सक्तिं व्रजेद्यदि ॥आनन्दो मुक्तिगो ह्रासं विकर्मकरणाद्व्रजेत् ।धर्माधर्मविहीनोऽपि भगवानृषभस्ततः ॥तेषां धर्मस्थापनार्थं नाविश्चक्रे परां स्थितिम् ।देवानां नाशुभाद्ध्रासः शुभात्काचित्सुखोन्नतिः ॥आधिकारिकजीवानामेवमन्येषु तद्द्वयम् ।अल्पाधिकारिणां तत्र ह्रासोऽपि भवति ध्रुवम् ॥अशुभाभावजोन्नाहो महाधीकारिणामपि ।अशुभे कृते न भवति तारतम्याच्च स स्मृतः ॥प्रजापाश्च तथा देवा महाधीकारिणः स्मृताः ।ऋष्यशीतिस्तथा सप्त पितरोऽप्सरसां शतम् ॥गन्धर्वाणां तथा राज्ञां विंशदन्यासु जातिषु ।अल्पाधिकारिणः प्रोक्ता अनधीकरिणः परे॥ इति ब्रह्माण्डे ॥१-५॥
अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनांसाम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं


'विष्णोः कलेवरत्यागो भूत्यागोऽन्यो न विद्यते ।कलेवरत्यागोऽन्येषां पञ्चत्वं समुदीरितम्॥ इति कौर्मे ॥अनर्थान्तरभावेन अर्थान्तरं नास्मीति मनसा ॥ ६ ॥
तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥


अभिमानाभासेन अभितो ज्ञानप्रकाशेन ॥ ७ ॥
एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥


अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥


यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥


येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥


तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥


'ज्ञानानन्दात्मको देह ऋषभस्य महात्मनः ।तादृशेनैव मनसा क्रमंस्तु कुटचाचले ॥दावाग्निमनुविश्याथ तत्रस्थः प्रादहज्जगत् ।एवमग्नेरभिव्यक्तस्तत्स्थो विष्णुः सनातनः ॥ऋषभत्वेन सङ्गोप्य धर्मानद्यापि तत्रगः ।आस्ते स वासुदेवात्मा वासुदेवोऽहमित्यजः ॥सदा स्थितः स्थितिं तां तु शुश्रावार्हो दुरात्मवान् ।पूर्वं तु पौण्ड्रको नाम वासुदेवः सुदुर्मतिः ॥जातिस्मरो द्विधा शास्त्रं पाषण्डं निर्ममे नृपः ।एकं तु वासुदेवाख्यं वासुदेवोऽहमित्यपि ॥कुत्सितं वासुदेवत्वप्रतिपादकमात्मनः ।लोकार्थं चापरमपि चकारार्हतनामकम् ॥'तत्प्रशिष्यः क्रमुर्नाम न जानंस्तन्मतं परम् ।वासुदेवात्मतां सर्वजीवानामवदत्कुधीः ॥क्रम्वाख्यं शास्त्रमकरोदभेदप्रतिपादकम् ।कुशास्त्रं सर्ववेदानां विरुद्धं तामसालयम् ॥तद्दृष्ट्वाऽद्यापि वर्तन्ते वर्तिष्यन्ति कलौ तथा ।अशौचा अव्रताचारा वासुदेवोऽहमित्यपि॥ इति ब्राह्मे ॥८-१२॥
अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्याद्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् ।


'विशेषाद्भारते पुण्यं चरेयुः पापमप्यथ ।तथैव भगवद्भक्तिं पृथिव्यां नान्यवर्षगाः॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ १४ ॥
को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे-न्मनोरथेनाप्यभवाय योगी ।


योगमायां योगमायाफलं बाह्यम् ।'नित्योदस्ता योगशक्तिरनपेक्ष्यं फलं यतः ॥नित्यस्वरूपभूताऽपि बहिःफलविवर्जनात् ।अकर्मेत्युच्यते यद्वन्मोक्षः फलविवर्जनात्॥ इति पाद्मे ॥ १६ ॥
यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥


'नाद्रियन्ते तु ये मोक्षं पूर्वं तेषां परं सुखम् ।स्वयोग्यं व्यज्यते मुक्तौ तच्चोक्तं तारतम्ययुक्॥ इति व्योमसंहितायाम् ॥ १८ ॥
राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनांदेवप्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः ।


॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः ॥
'ब्रह्मणोऽन्यस्य नो पूर्णां दद्याद्भक्तिं जनार्दनः ।मुक्तिं ददाति सर्वेषां उच्चानां को ह्यधीशिता॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १९ ॥