Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S5: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:42, 9 April 2026
पञ्चमोऽध्यायः
पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥
क्रियाफलं तावदेव । कर्मात्मकं कर्मवशम् ॥ ५ ॥
एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥
अविद्यया प्रयुङ्क्ते ॥ ६ ॥
पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥
'ब्रह्माद्या याज्ञवल्क्याद्या मुच्यन्ते स्त्रीसहायिनः ।बध्यन्ते केचनैतेषां विशेषं च विदो विदुः॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥८॥
हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥
'आत्मनो विहितं कर्म वर्जयित्वाऽन्यकर्मणः ।कामस्य च परित्यागो निरीहेत्याहुरुत्तमाः॥ इति च ॥ १० ॥
सर्वत्र मद्भावविचक्षणेनज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।
'सर्वस्मादुत्तमो विष्णुरिति ज्ञानमुदाहृतम् ।प्रतिजीवं येन मुक्तिस्तद्विज्ञानं विदां मतम्॥ इति च ।'ज्ञानं विष्णोरुत्तमत्वे तदेव प्रतिपूरुषम् ।विशेषेण तु विज्ञानं तच्च जानाति सर्ववित् ॥द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युक्तस्तीक्ष्णदंष्ट्रश्च सौम्यदृक् ।घोररुक्चापि पुरुषः स सर्वज्ञ उदाहृतः॥ इत्यध्यात्मे ॥'षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः ।सप्तपादश्चतुर्हस्तः स देवैरपि पूज्यते॥ इति वायुप्रोक्ते ॥'न्यग्रोधमण्डलो व्यामो बाहू न्यग्रोध उच्यते॥ इति च ॥ १३ ॥
तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥
'नाभिरित्यथ नाम स्याद्धरेः सर्वाश्रयो यतः। इति कौर्मे ।तत्तस्य मम शुश्रूषणम् ॥ २० ॥
देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानोदक्षादयो ब्रह्मसुताश्च तेषाम् ।
द्विजदेवानां देवः ॥ २२ ॥
सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि-श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥
विविक्तदृष्टिर्जीवानां धिष्ण्यतया परमेश्वरस्य भेददृष्टिः ।'उपपादयेत्परात्मानं जीवेभ्यो यः पदेपदे ।भेदेनैव न चैतस्मात्प्रियो विष्णोस्तु कश्चन॥ इति पाद्मे ॥'यो हरेश्चैव जीवानां भेदवक्ता हरेः प्रियः। इति च ॥ २६ ॥