Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S23: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
त्रयोविंशोऽध्यायः
तस्यानया भगवतः परिशुद्धकर्म-सत्वात्मनस्तदनु संस्मरणानुपूर्व्या ।
'आविर्भावतिरोभावौ ज्ञानस्य ज्ञानिनोऽपि तु ।अपेक्ष्याज्ञस्तथा ज्ञानमुत्पन्नमिति चोच्यते॥ इति तन्त्रसारे ॥ ११ ॥
छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह-स्तत् तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन ।
'अपरोक्षतया वृत्तिज्ञानभेदनिरीक्षणम् ।स्वरूपज्ञानसंस्थित्या ज्ञानत्याग उदीर्यते ॥स्वरूपज्ञानतः सम्यग्रतिर्विष्णुकथासु च॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १२ ॥
एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि ।ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वकलेवरम् ॥ १३ ॥
ब्रह्मणि भूतः ॥ १३ ॥
उत्सर्पयन्नसुं मूधर्ि्न क्रमेणावेश्य निस्स्पृहः ।वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥
खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः ।क्षितिमम्भसि तत् तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥
इन्द्रियाणि समस्तानि तन्मात्राणि यथोद्भवम् ।भूतादिस्तान् समुत्क्षिप्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥
तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् ।तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् ।
'अस्येदं कारणमिति ज्ञानमेव विलापनम् ।समाधिकाले विज्ञेयं देहादेर्दर्शनात्पुनः॥ इति च ॥ १६ ॥'मायेति प्रकृतिश्चेति मायाजीवश्च कथ्यते ।शेतेऽनुकेशवं यस्मात्तस्मादनुशयोऽपि च ।एतैस्तु नामभिर्वाच्या श्रीर्विष्णोरनपायिनी ॥तयैवानुशयी जीवस्तया बद्धो यतः सदा ।पुरुषः शयनात्पूर्षु तथाऽहानादहं स्मृतः ॥अप्राकृततनुत्वात्तु स्वरूपं हरिरुच्यते ।नित्यचिद्दर्शनान्नित्यं ब्रह्म पूर्णत्वतः सदा॥ इति भागवततन्त्रे ॥ १५-१८ ॥
देव्य ऊचुः –अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥
'अनपेक्षो गुणैः पूर्णो धन्य इत्युच्यते बुधैः॥इति शब्दनिर्णये ॥ २५ ॥