Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S16: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
षोडशोऽध्यायः
वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः ।ये नित्यमनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम् ॥ १४ ॥
अनिमित्तेन विष्ण्वर्पणेन ॥ १४ ॥
वैमानिकाः सललनाश्चरितानि यत्रगायन्ति लोकशमलक्षपणानि भर्तुः ।
'मुक्ताश्चैवाधिकारस्था द्वेधा वैकुण्ठलोकगाः ।अमुक्तानां भ्रमः क्वापि न मुक्तानां क्वचिद्भवेत्॥ इति भविष्यत्पुराणे ।'कृष्णात्मनां न रज आदधुः॥ इति च ॥ १७ ॥
पारावतान्यभृतसारसचक्रवाक-दात्यूहहंसशुकतित्तिरबर्हिणाद्यैः ।
'तिरश्चीनाः स्थावराश्च सर्वे ज्ञानाद्विकुण्ठगाः ।अमुक्ता मुक्तिमायान्ति नियमात्कर्मणः क्षये॥ इति च ॥ १८ ॥
मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकोर्ण-पुन्नागनागबकुलाम्बुजपारिजाताः ।
भक्तैरर्चिते सति भगवता तुलसिकाभरणे कृते तस्या गन्धार्थं तपो बहु मानयन्ति ॥ १९ ॥
यन्न व्रजन्त्यघभिदोरचनानुवादाःशृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः ।
अरचनानुवादाः ॥ २३ ॥
येऽभ्यर्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्नाज्ञानं च तत्त्वविषयं सहधर्म यत्र ।
ये नृगतिं ज्ञानादियोग्यां न प्रपन्नाः ते मोहाद्भगवदाराधनं न कुर्वन्ति । धर्मज्ञानवर्जिता मानुषा एव न भवन्तीत्यर्थः ॥ २४ ॥
मत्तद्विरेफवनमालिकया निवीतौविन्यस्तयाऽसितचतुष्टयबाहुमध्ये ।
वक्त्रस्थया भ्रुवा सह निर्गतेन ॥ २८ ॥
तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान्वृद्धान् दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान् ।
'जयस्य विजयस्यापि कदाचिद्ब्रह्मशापतः ।कृष्णावतारपर्यन्तं प्रातिकूल्यं च जायते॥ इति नारदीये ॥ ३० ॥
को वा इहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै-स्तद्धर्मिणामपि सतां विषमस्वभावः ।
युवयोर्यथा विरुद्धस्वभावत्वं तद्वद्भगवद्विषय इह शङ्कनीयः कः ? तस्मान्निषेधो व्यर्थ इत्यर्थः ॥ ३२ ॥
न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा-वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीराः ।
समस्तकुक्षौ स्थिते भगवति न हि भेदः । अस्मिंल्लोके । अन्तस्थभगवद्रूपं बहिष्ठैक्येन पश्यन्ति नभो नभसीव । तत्र प्रत्युदरभेदनिमित्तं भयं युवाभ्यां व्युत्पादितं किम् सर्वान्तर्यामित्वेनाभयस्य भयमस्तीति भावः कृतः । अन्यथा किमिति निवारणम् ।'सर्वोदरगतं ब्रह्म ये भेदेन विचक्षते ।सर्वत्रापि भयं तेषां मृतानां तम एव च॥ इति तत्त्वविवेके ॥३३॥
तद् वा अमुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुःकर्तुं न युक्तमिति धीमहि मन्दधीभ्याम् ।
त्रयो रिपवो देहत्रये ॥ ३४ ॥
भूयानघाद्धि भगवद्भिरकारि दण्डोयो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम् ।
सुरहेलनस्यापि दण्डो भवति । अत्र स्थितयोः पुनः पूर्ववन्मोहो न स्यादंशिनोः ॥ ३६ ॥
तं त्वागतं प्रतिहृतौपयिकं स्वपुंभि-स्तेऽचक्षताक्षविषयं स्वसमाधिगम्यम् ।
केसरा रश्मयः ॥ ३८ ॥
कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधामस्नेहावलोककलया हृदि संस्पृशन्तम् ।
'कौस्तुभो ब्रह्मणो रूपं प्राणश्चूडामणिस्तथा। इति च ॥ ३९ ॥
अत्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिंदिरायाःस्वानां धिया विरचितं बहुसौष्ठवाढ्यम् ।
'अविद्यमानकरणं विद्यमानस्मृतिस्तथा ।उभयं रचनं प्रोक्तं पूर्वसिद्धेषु तु स्मृतिः॥ इति शब्दनिर्णये ॥४२॥
तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः ।
अक्षरजुषामपि तद्रूपसेवाभ्यासिनामपि ॥ ४३ ॥
नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादंकिं चान्यदर्पितभयं भ्रुव उन्नयैस्ते ।
'भक्तिज्ञानपरीपाकात्किञ्चित्पूर्वं च मुच्यते ।दर्शनेन हरेस्तत्र नानन्दः पूर्णतां व्रजेत्॥ इति ब्रह्मतर्के ॥अतोऽनपेक्षाणामानन्दोद्रेको मोक्षेच्छुभ्यः । तेषां परिपाकतः पूर्वं ब्रह्मदृष्ट्या मुक्तिप्राप्तेः ।'मुमुक्षोः केवलो भक्तो मुक्तावपि सुखी भवेत्। इति च ॥ ४८ ॥
कामं व्रजेम वृजिनैर्निरयेषु नष्टाश्चेतोऽलिवद् यदि नु ते पदयो रमेत ।
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥
'यावत्परमभक्तैस्तु भुज्यते दुःखमुल्बणम् ।तावन्मुक्तौ सुखोद्रेकस्तत्र चेद्भक्तिवर्धनम्॥ इति च ॥ ४९ ॥