Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S14: Difference between revisions
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
चतुर्दशोऽध्यायः
तद् विधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्विज्यात्मशक्तिषु ।यत् कृत्वेह यशो विष्वगमुत्र च भवेद् गतिः ॥ ८ ॥
इज्या पूजा ।
स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं विलग्नां स उत्थितः संरुरुहे रसायाः ।तत्रापि दैत्यं गदयाऽऽपतन्तं सुनाभसन्दीपिततीव्रमन्युः ॥३३॥
जघान रुन्धानमसह्यविक्रमः सलीलयेभं मृगराडिवाम्भसि ।तद्रक्तपङ्काङ्किततुण्डगण्डो यथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ॥ ३४ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥
'ब्रह्मजस्तु हिरण्याक्षः प्रथमं दंष्ट्रया हतः ।स एव पार्षदाविष्टो द्वितीयं कर्णताडनात् ॥पूर्वं लयोदके मग्नां द्वितीयं तेन मज्जिताम् ।भुवमुद्धरतैवासौ हरिणा क्रोडमूर्तिना॥ इति ब्रह्माण्डे ॥'व्यत्यासेनापि चोच्यन्ते अविवेकेन कुत्रचित् ।दुष्टानां मोहनार्थाय तत्र तत्र कथाः क्वचित्॥ इति स्कान्दे ॥अविवेकेनेत्यस्य विविच्य नोच्यत इत्यर्थः । न तु कर्तुरविवेकः ।'सर्वज्ञस्य कुतोऽज्ञानं व्यासस्योदारकर्मणःइत्युक्तत्वात् ।'दुष्टानां मोहनार्थायइति च ॥ ८,३३,३४ ॥