Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S10: Difference between revisions
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥ | |||
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Revision as of 04:41, 9 April 2026
दशमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच–ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां
स्वतो नास्ति । तदधीनविद्यमानमप्यशुद्धम् । यच्च स्वनानात्वं तदपि स्थानभेदादसदेव भाति ।'एकोऽपि स्थाननानात्वान्नानेव हरिरीयते ।सर्वान्तर्यामिणस्तस्य न भेदो विद्यते क्वचित्॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥१॥
रूपं यदेतदवबोध रसोदयेन शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २ ॥
नातः परं परम यद् भवतः स्वरूपमानन्दमात्रमविकारमविद्धवर्चः ।
यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् । यच्चेदं भगवत्स्वरूपमानन्दमात्रं पश्यामि । यच्चाश्रितोऽस्मि अतः परं नास्ति । अतो न ज्ञायत इति अवद्यमत्युत्तमा-पेक्षया । अनादिगृहीतमेव नेदानीं गृह्यते ।'यत्तद्दिव्यं हरेरूपं क्षीरसागरमध्यगम् ।ज्ञानानन्दैकमात्रं च न ततः परमं क्वचित् ॥अनादिनित्यादव्यक्तात्तस्माज्जज्ञे चतुर्मुखः॥ इत्यध्यात्मे ।भूतेन्द्रियाणामात्मकम् । 'यच्चाप्नोतिइत्यादेः ॥ २,३ ॥
ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धंजिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम् ।
'हृदि व्यक्तं तु यद्रूपं हरेर्गन्धः स उच्यते ।गन्धगन्धवतोर्यस्मान्न भेदः क्वचनेष्यते॥ इति ब्रह्मतर्के ॥'उत्तमानां तु पादेन सर्वं रूपं तु भण्यते ।उत्तमानां स्वरूपं तु पादशब्देन भण्यते ॥ ५ ॥
यावत् पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थंमायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् ।
मायाबलं भगवदिच्छाबलम् ।'ज्ञेयत्वं दुर्घटस्यापि घटनाधिकशक्तिता ।अभेद ईश्वरेणापि सृष्ट्यादावन्तरङ्गता ॥उच्येत यस्याः सा माया हरेरिच्छाऽथवा बलम् ।भगवत्तन्त्रता यस्यास्तद्भार्यात्वं सुरूपता ॥उच्येत माया सा तु श्रीर्दोषयुक्ता जडा स्मृता ।परिणामिनी च यस्यास्तु दोषाश्चेतनता यथा ॥शैवली नाम सा माया जगद्बन्धात्मिका सदा॥ इति ब्रह्मतर्के ।'ध्याये मंस्ये तथा पश्ये शृृणोमीति विभक्तता ।जीवस्य तु हरेरिच्छाबलादिन्द्रियभुक्तये॥ इति षाड्गुण्ये ।इन्द्रियाणां भोगार्थम् । व्यर्थापि यज्ञादिक्रियार्था ॥ ९ ॥
अध्याहृतार्थकरणा निशि निःशयानानानामनोरथधियः क्षणभङ्गनिद्राः ।
अर्थैरध्याहृतानि करणानि येषाम् ।'अज्ञानं तु निशा प्रोक्ता दिवा ज्ञानमुदीर्यते॥ इति स्कान्दे ॥ १० ॥
त्वद्भावयोगपरिभावितहृत्सरोजाये सच्छ्रुतेक्षितपथा ननु नाथ पुंसाम् ।
तत् तद् वपुः तेषां प्रणयसे ।'यादृशोभावितस्त्वीशस्तादृशो जीव आभवेत्। इति तन्त्रसारे ।'तं यथा यथोपासते तदेव भवति ।इति च ॥ ११ ॥
नातिप्रसीदसि तथोपचितोपचारैराराधितः सुरगणैर्हृदि बद्धकामैः ।
सर्वभूतदयया सुरगणैर्हृद्याराधितस्त्वं बद्धकामैर्जनैरुपचितोपचारैर्नाति-प्रसीदसि ।'आराधितो यो ब्रह्माद्यैर्भक्तिज्ञानदयादिभिः ।किं तस्य कामुकजनैः कृतया परिचर्यया। इति सत्यसंहितायाम् ॥ १२ ॥
शश्वत् स्वरूपमहसैव निपीतभेदमोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै ।
'ईशस्यापूर्णताज्ञानं विष्णोरन्यस्य चेशता ।भेदस्तस्यावतारेषु जीवस्येशत्वमेव च ।तथा जीवत्वमीशस्य जडाभेदस्तयोरपि ।भेदमोह इति प्रोक्तः स सदा न हरौ क्वचित् ।अन्येषां तत्प्रसादेन शनैर्याति सतामपि॥ इति स्कान्दे ॥ १४ ॥
यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानिनामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति ।
भक्तिविवशाः ।'ये भक्तिविवशा विष्णोर्नाममात्रैकजल्पकाः ।तेऽपि मुक्तिं व्रजन्त्याशु किमुत द्ध्यायिनः सदा॥ इति व्योमसंहितायाम् ॥ १५ ॥
यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं चस्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलाः ।
'ब्रह्मादिभावो विष्णोस्तु तन्नियामकता भवेत् ।मत्स्यादिता स्वभावस्तु नान्यथा क्वचिदिष्यते॥इति वामने ।'अनन्तासनवैकुण्ठक्षीराब्धिस्थो हरिस्त्रिपात्। इति च ॥ १६ ॥
लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तःकर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे ।
'नित्यज्ञानदृशा नित्यं लवकालमपीश्वरः ।पश्येत्तात्कालिकं चैव तस्मादनिमिषो हरिः ।कालस्यानिमिषत्वं च लवादेर्नित्यवीक्षणात्॥ इति तन्त्रसारे ॥१७॥
तिर्यङ्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि-ष्वात्मेच्छयाऽऽत्मकृतसेतुपरीप्सया यः ।
अनिरस्तरतिः नित्यरतिः ॥ १९ ॥
एष प्रपन्नवरदो रमयाऽऽत्मशक्त्यायद् यत् करिष्यति गृहीतगुणावतारः ।
'स्वसामर्थ्यात् स्वकर्माणि रमया सह केशवः ।कुरुते स्वयमेवैष कानिचित्पुरुषोत्तमः॥ इति नारदीये ॥ २३ ॥
लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः ।तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥ २८ ॥
'आत्मशब्दस्य मुख्यार्थो विष्णुरेकः सनातनः ।सन्देहदेहमनसो बुद्धिजीवाः स्वयं तथा ।ब्रह्माप्यमुख्याः क्रमश उत्कर्षो ह्यात्मता भवेत्।इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ २८ ॥
श्री भगवानुवाच–मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह ।
प्रार्थनमपि मत्प््रोरणमेव ॥ २९ ॥
भूयश्च तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् ।ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान् द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३० ॥
'तप आलोचनं प्रोक्तं विद्या निष्ठा प्रकीर्तिता।इति कपिलसंहितायाम् ॥ ३० ॥
तत आत्मनि योगेन भक्तियुक्तः समाहितः ।द्रष्टासि मां ततं ब्रह्मन् मयि लोकांस्त्वमात्मनि ॥ ३१ ॥
'देहे देहे हरिस्तस्मिंल्लोकाः सर्वे प्रतिष्ठिताः ।अङ्गुष्ठमात्रेऽपि परे परशक्तिर्यतो विभुः॥ इति च ।आत्मनि स्थिते मयि ॥ ३१ ॥
यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः ।स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन् स्वाराज्यमृच्छति ॥ ३३ ॥
स्वरूपेण मयोपेतं, हृदिस्थं जीवरूपं हि परमेश्वरसहितं भवति ।'त्यक्त्वा देहाद्यात्मभावं जीवरूपे हृदि स्थिते ।दृष्ट्वाऽऽत्मभावं तं चापि हरिपादाब्जसंस्थितम् ॥यदा पश्यत्यापरोक्ष्यात्तदा मुक्तिं व्रजत्यसौ॥ इति दत्तात्रेययोगे ॥ ३३ ॥
ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् ।यन्मां त्वं मन्यसे युक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभिः ॥ ३६ ॥
'भूतेन्द्रियमनोबुद्धित्रिगुणादिषु सर्वशः ।युक्तं नियामकतया पश्यञ्जानाति केशवम्। इति च ॥ ३६ ॥
प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया ।यदस्तौषीद् गुणमयं निर्गुणं माऽनुवर्णयन् ॥ ३९ ॥
'सार्वज्ञादिगुणैर्युक्तं सत्वादिगुणवर्जितम् ।यो जानाति हरिं तस्य प्रीतो भवति केशवः॥ इति व्योमसंहितायाम् ।'आधिकारिकदेवानां स्वाधिकाराधिकामनम् ।भवति प्रीतये विष्णोर्भक्त्यादेरपि यत्सदा॥ इति च ॥ ३९ ॥
पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगैः समाधिना ।राज्यं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम् ॥ ४१ ॥
निःश्रयेसं राज्यम् । मोक्षेऽपि रञ्जनीया मत्प्रीतिरेव ।'मुक्तस्यापि हरेः प्रीतिः सर्वतोऽप्यनुरज्यते॥ इति वामने ॥ ४१ ॥
अहमात्मात्मनां धातः प््रोष्ठः सन् प््रोयसामपि ।अतो मयि रतिं कुर्याद् देहादिर्यत्कृते प््रिायः ॥ ४२ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥
'सर्वतोऽपि प््रिायो ह्यात्मा तस्यापि प््रिायतां हरिः ।आपादयति यत्तस्मात्स्वात्मनोऽपि प््रिायो हरिः॥इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ ४२ ॥