Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S9: Difference between revisions
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| verse_line1 = उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् । | | verse_line1 = उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् । | ||
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| verse_line1 = स वाच्यवाचकतया भगवान्ब्रह्मरूपधृक् । | | verse_line1 = स वाच्यवाचकतया भगवान्ब्रह्मरूपधृक् । | ||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ | |||
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Revision as of 04:40, 9 April 2026
दशमोऽध्यायः
भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः ।ब्रह्मणो गुणवैषम्याद्विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥ ३ ॥
महदाद्यण्डपर्यन्तः सर्गोऽण्डे ब्रह्मणस्तु यः ।अनुसर्ग इति प्रोक्तः पौरुषश्चेति कथ्यते ॥पञ्चभूतसमूहेन जातः पुरुष उच्यते ।बहुत्वात्तत्र भूतानां तावत्त्वात्तत्त्वमेकजम्॥ इति व्योमसंहितायाम् ॥ ३ ॥
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः ।मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६ ॥
'अनुप्राविश्य परमं जीवस्य शयनं तु यत् ।सहैव शक्तिभिः स्वीयैरिच्छाद्यैरप्राकाशितैः ।सन्निरोध इति प्रक्तो विमुक्तिर्यत्र मोक्षणम्॥ इति नारदीये ॥६॥
आभासश्च निरोधश्च यतस्तत्त्रयमीयते ।स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥ ७ ॥
'सृष्टिस्थित्यप्ययाभासा यद्बलाद्यत्र च स्थिताः ।तद् ब्रह्म जगदाधारं वासुदेवेति तद्विदुः॥ इति भागवततन्त्रे ॥७॥
आध्यात्मिको यः पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः ।यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ ८ ॥
आधिभौतिकेन रूपेण हि चक्षुःप्रकाशयोः सम्यक् परिज्ञानम् ॥ ८ ॥
एतदेकतमाभावे यदा नोपलभामहे ।त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ ९ ॥
सुप्तावपि यः सर्वं वेत्ति जीवानां स परः ।'स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति॥ इति श्रुतेः ।सुष्ट्वाश्रयाणामप्याश्रयः ॥ ९ ॥
पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदाऽसौ स विनिर्गतः ।आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥ १० ॥
तास्ववात्सीत् स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् ।तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११ ॥
विनिर्गतः प्रकाशितः ।'अण्डं प्रविष्टो यो विष्णुः सोऽण्डं भित्त्वा प्रकाशितः ।सोऽपोऽसृजत्ततो नारा नरोऽनाशात्परो यतः॥इति नारायणाध्यात्मे ॥ १०,११ ॥
एको नानात्वमन्विच्छन्योगतल्पात्समुत्थितः ।वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत्त्रिधा ॥ १३ ॥
'तत्तन्नियामकत्वेन बहुत्वं प्राप्तुमीश्वरः ।अण्डं स्ववीर्यं तत्स्थः सन् कामादन्तस्त्रिधा व्यधात्॥ इति च ।'अन्तःस्थितहरेः कामादण्डे ब्रह्मतनोर्जनिः ।तत्र देवाश्च सञ्जाताः पुनस्तत्त्वात्मकाः प्रभोेः॥ इति च ॥ १३ ॥
उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् ।ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥ २७ ॥
'मलादिकं कदाचित्तु ब्रह्मा लोकाभिपत्तये ।आत्मनो निर्ममे कामात्सर्वेषामभवत्ततः ।वशित्वात्तस्य दिव्यत्वादिच्छया भवति प्रभोः॥ इति च ॥ २७ ॥
एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया ।मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३ ॥
'स्थूलं भगवतो रूपं ब्रह्मदेह उदाहृतः ।तत्तन्त्रत्वाच्च सूक्ष्मं च शङ्खचक्रगदाधरम्॥ इति चाध्यात्मे ॥ ३३ ॥
अतःपरं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् ।अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसोः परम् ॥ ३४ ॥
निर्विशेषणं निरतिशयम् । 'अस्य काव्यस्य कवयो न समर्था विशेषणेइतिवत् ॥ ३४ ॥
अमुनी भगवद्रूपे मया ते ह्यनुवर्णिते ।उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टेऽविपश्चितः ॥ ३५ ॥
मायासृष्टे जगति ये अविपश्चितः ॥ ३५ ॥
स वाच्यवाचकतया भगवान्ब्रह्मरूपधृक् ।नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माऽकर्मकः परः ॥ ३६ ॥
'नामैव वाचकत्वेन नामरूपक्रिया अपि ।वाच्यत्वेन हरिर्देवो नियामयति चैकराट्॥ इति च ।'कर्तृत्वात्तु सकर्माऽसौ निष्फलत्वादकर्मकः। इति च ॥ ३६ ॥
प्रजापतीन् मनून् देवानृषीन् पितृगणान् पृथक् ।सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान् ॥ ३७ ॥
प्रजापत्यादीन् धत्ते ॥ ३७ ॥
सत्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः ।तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा ॥ ४१ ॥
तामसास्तामसा दैत्याः प्रधाना देवशत्रवः ।तामसा राजसास्तेषामनुगास्तेषु सात्विकाः ।अनाख्यातासुराः प्रोक्ता मानुषा दुष्टचारिणः ।राजसास्तामसाश्चैव मध्या राजसराजसाः ॥राजसाः सात्विकास्तत्र मानुषेषूत्तमा गणाः ।देवाः पृथगनाख्याताः स्मृताः सात्विकतामसाः ॥अतात्विकास्तथाऽऽख्याताः स्मृताः सात्विकराजसाः ।सात्विकाः सात्विकास्तत्र तात्विकाः परिकीर्तिताः ।तेषां च सात्विकाः शेषगरुत्मद्रुद्रतत्स्त्रियः ॥ततोऽपि देवी ब्रह्माणी ब्रह्मा चैव ततः स्वयम् ॥ ४१ ॥
यदैवैकतमो अन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते ।तदैवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् ।
'सात्विकेषु त्रिषु यदा त्वेकस्य प्रतिबाधनम् ।रजस्तमोभ्यां विष्णुर्हि तदा प्रादुर्भवत्यजः ॥राजसांस्तामसान् हत्वा सात्विकान् वर्धयिष्यति॥इति स्कान्दे ॥ ४२ ॥
ततः कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः ।सन्नियच्छति तत्काले घनानीकमिवानिलः ॥ ४३ ॥
मत्स्यादिरूपी पोषयति नृसिंहो रुद्रसंस्थितः ।विलापयेद्विरिञ्चस्थः सृजते विष्णुरव्ययः ॥ इति वामने ॥ ४३ ॥
इत्थम्भावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः ।नेत्थम्भावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥
भगवत्तमः ना पुरुषः ॥ ४४ ॥
न चास्य जन्मकर्माणि परस्य न विधीयते ।कर्तृत्वं प्रतिषेधार्थं माययाऽऽरोपितं हि तत् ॥ ४५ ॥
जन्मकर्माणि विधीयत इति क्रियाविशेषणम् ।'प्रतिषेधाय बन्धस्य जीवानां परमेशितुः ।स्वेच्छयैव तु कर्तृत्वं नित्यारूढं चिदात्मकम्॥ इति भविष्यत्पुराणे ॥रूप उपरिभाव इति धातुः । 'सुभद्रां रथमारोप्यइत्यादिवच्च ।'स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥ इति च ॥ ४५ ॥
अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः ।विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६ ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
॥ द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः ॥
अन्यकल्पानां साधारणः । यत्रैव प्राकृतवैकृताः सर्वसर्गाः । अन्यब्रह्मकल्पानां च साधारणः ॥ ४६ ॥