Brahmasutra/C4/S4: Difference between revisions
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कुतः ? – | |||
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॥ इति श्रीमदानन्ददीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ 04-04 ॥ | |||
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Revision as of 04:40, 9 April 2026
चतुर्थः पादः
भोगमाहास्मिन् पादे-
सम्पद्याधिकरणम्
ॐ सम्पद्याविहाय स्वेन शब्दात् ॐ ॥ 01-542 ॥
॥ इति सम्पद्याधिकरणम् ॥ 01 ॥
‘स य एवंविदेवं मन्वान एवं पश्यन्नात्मनमभिसम्पद्यैतेनात्मना यथाकामं सर्वान् कामाननुभवति’ इति सौपर्णश्रुतिः ।
‘परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति च ।
‘एवं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति’ इति च ।
तत्र तरणं नाम तत्प्राप्तयेऽन्यतरणमेव ।
‘इमां घोरामशिवां नदीं तीर्त्वैतं सेतुमाप्यैतेनैव सेतुना मोदते प्रमोदत आनन्दी भवति’ इति मौद्गल्यश्रुतेः ॥ 01 ॥
मुक्ताधिकरणम्
ॐ मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॐ ॥ 02-543 ॥
॥ इति मुक्ताधिकरणम् ॥ 02 ॥
मुक्त एव चात्रोच्यते ।
‘अहरहरेनमनुप्रविशत्युपसङ्क्रमते च न तत्र मोदते न प्रमोदते न कामाननुभवति बद्धो ह्येष तदा भवत्यथ यदैनं मुक्तोऽनुप्रविशति मोदते च प्रमोदते च कामांश्चैवानुभवति । कामांश्चैवानुभवति’ इति बृहच्छ्रुतौ प्रतिज्ञानात् ॥ 02 ॥
आत्माधिकरणम्
ॐ आत्मा प्रकरणात् ॐ ॥ 03-544 ॥
॥ इति आत्माधिकरणम् (आत्मसम्पद्यधिकरणम्) ॥ 03 ॥
परञ्ज्योतिशब्देन परमात्मैवोच्यते । तत्प्रकरणत्वात् ।
‘परञ्ज्योतिः परं ब्रह्म परमात्मादिका गिरः ।
सर्वत्र हरिमेवैकं ब्रूयुर्नान्यं कथञ्चन’ इति च ब्रह्माण्डे ॥ 03 ॥
अविभागाधिकरणम्
ॐ अविभागेन दृष्टत्वात् ॐ ॥ 04-545 ॥
॥ इति अविभागाधिकरणम् ॥ 04 ॥
ये भोगाः परमात्मना भुज्यन्ते त एव मुक्तैर्भुज्यन्ते ।
‘यानेवाहं श्रुणोमि यान् पश्यामि यान् जिघ्रामि तानेवैत इदं शरीरं विमुच्यानुभवन्ति’ इति दृष्टत्वाच्चतुर्वेदशिखायाम् ।
भविष्यत्पुराणे च –
‘मुक्ताः प्राप्य परं विष्णुं तद्भोगान् लेशतः क्वचित् ।
बहिष्ठान् भुञ्जते नित्यं नानन्दादीन् कथञ्चन’ इति ॥ 04 ॥
चितिमात्राधिकरणम् (ब्रह्माधिकरणम्)
ॐ ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॐ ॥ 05-546 ॥
सर्वदेहपरित्यागेन मुक्ताः सन्तो ब्राह्मेणैव देहेन भोगान् भुञ्जत इति जैमिनिर्मन्यते ।
‘स वा एष ब्रह्मनिष्ठ इदं शरीरं मर्त्यमतिसृज्य ब्रह्माभिसम्पद्य ब्रह्मणा पश्यति ब्रह्मणा श्रुणोति ब्रह्मणैवेदं सर्वमनुभवति’
इति माध्यन्दिनायनश्रुतावुपन्यासात् ।
‘आदत्ते हरिहस्तेन हरिदृष्ट्यैव पश्यति ।गच्छेच्च हरिपादेन मुक्तस्यैषा स्थितिर्भवेत्’ इति स्मृतेः ॥
‘गच्छामि विष्णुपादाभ्यां विष्णुदृष्ट्या च दर्शनम् ।’इत्यादि पूर्वस्मरणान्मुक्तस्यैतद्भविष्यति’ इति बृहत्तन्त्रोक्तयुक्तेश्च ॥ 05 ॥
ॐ चितिमात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॐ ॥ 06-547 ॥
चितिमात्रो देहो मुक्तानां पृथग्विद्यते तेन भुञ्जते ।
सर्वं वा एतदचित् परित्यज्य चिन्मात्र एवैष भवति चिन्मात्र एवावतिष्ठते तामेतां मुक्तिरित्याचक्षते’इत्युद्दालकश्रुतेश्चिदात्मकत्वादित्यौडुलोमिर्मन्यते ॥ 06 ॥
ॐ एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॐ ॥07-548॥
॥ इति चितिमात्राधिकरणम् (ब्रह्माधिकरणम्) ॥ 05 ॥
‘स वा एष एतस्मान्मर्त्याद्विमुक्तश्चिन्मात्रीभवत्यथ तेनैव रूपेणाभिपश्यत्यभिश्रुणोत्यभिमनुतेऽभिविजानाति तामाहुर्मुक्तिः’ इति सौपर्णश्रुतौ चिन्मात्रेणाप्युपन्यासाज्जैमिन्युक्तस्य च भावादुभयत्राप्यविरोधं बादरायणो मन्यते ।
नारायणाध्यात्मे च-
‘मर्त्यं देहं परित्यज्य चितिमात्रात्मदेहिनः ।
चितिमात्रेन्द्रियाश्चैव प्रविष्टा विष्णुमव्ययम् ॥
तदङ्गानुगृहीतैश्च स्वाङ्गैरेव प्रवर्तनम् ।
कुर्वन्ति भुञ्जते भोगांस्तदन्तर्बहिरेव वा ॥यथेष्टं परिवर्तन्ते तस्यैवानुग्रहेरिताः’ इति ॥ 07 ॥
सङ्कल्पाधिकरणम्
ॐ सङ्कल्पादेव च तच्च्रुतेः ॐ ॥ 08-549 ॥
॥ इति सङ्कल्पाधिकरणम् ॥ 06 ॥
न तेषां भोगादिषु प्रयत्नापेक्षा ।
‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’ इत्यादिश्रुतेः ॥ 08 ॥
अनन्याधिपतित्वाधिकरणम्
ॐ अत एव चानन्याधिपतिः ॐ ॥ 09-550 ॥
॥ इति अनन्याधिपतित्वाधिकरणम् ॥ 07 ॥
सत्यसङ्कल्पत्वादेव ।
‘परमोऽधिपतिस्तेषां विष्णुरेव न संशयः ।
ब्रह्मादिमानुषान्तानां सर्वेषामविशेषतः ॥
ततः प्राणादिनामान्ताः सर्वेऽपि पतयः क्रमात् ।आचार्याश्चैव सर्वेऽपि यैर्ज्ञानं सुप्रतिष्ठितम् । एतेभ्योऽन्यः पतिर्नैव मुक्तानां नात्र संशयः’ इति वाराहे ॥ 09 ॥
उभयविधभोगाधिकरणम्
ॐ अभावं बादरिराह ह्येवम् ॐ ॥ 10-551 ॥
चिन्मात्रं विनाऽन्यो देहस्तेषां न विद्यत इति बादरिः ।
अशरीरो वाव तदा भवत्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतो याभ्यां ह्येष उन्मथ्यत’ इत्येवं कौण्ठरव्यश्रुतावाह हि ॥ 10 ॥
ॐ भावं जैमिनिर्विकल्पाम्नानात् ॐ ॥ 11-552 ॥
‘स वा एष एवंवित् परमभिपश्यत्यभिशृणोति ज्योतिषैव रूपेण चिता वाऽचिता वा नित्येन वाऽनित्येन वाऽथानन्दी ह्येवैष भवति नानानन्दं कञ्चिदुपस्पृषति’
इत्यौद्दालकश्रुतौ विकल्पाम्नानादन्यदेहस्यापि भावं जैमिनिर्मन्यते ॥ 11 ॥
ॐ द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॐ ॥ 12-553 ॥
यथा द्वादशाहः क्रत्वात्मकः सत्रात्मकश्च भवति । एवं मुक्तभोगो बाह्यशरीरकृतश्चिन्मात्रकृतश्च भवति इति बादरायणो मन्यते ॥ 12 ॥
ॐ तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ॐ ॥ 13-554 ॥
उपपत्तिश्च-
सन्ध्यं स्वप्नः ।‘सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानम्’ इति श्रुतेः ॥ 13 ॥
ॐ भावे जाग्रद्वत् ॐ ॥ 14-555 ॥
ब्रह्मवैवर्ते च –
‘स्वप्नस्थानं यथा भोगो विना देहेन युज्यते ।
एवं मुक्तावपि भवेद्विना देहेन भोजनम् ॥
स्वेच्छया वा शरीराणि तेजोरूपाणि कानिचित् ।
स्वीकृत्य जागरितवद्भुक्त्वा त्यागः कदाचन’ इति ॥ 14 ॥
ॐ प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ॐ ॥ 15-556 ॥
शरीरमनुप्रविश्यापि तत्प्रकाशयन्तः पुण्यानेव भोगाननुभवन्ति न तु दुःखादीन् । यथा प्रदीपो दीपिकादिषु प्रविष्टस्तत्स्थं तैलाद्येव भुङ्ते न तु तत्कार्ष्ण्यादि ।
‘तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति’ इति हि दर्शयति ॥ 15 ॥
न च स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति इत्यादिना स्वर्गादिस्थस्यैतदिति वाच्यम् । यतः –
ॐ स्वाप्यायसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ॐ ॥ 16-557 ॥
॥ इति उभयविधभोगाधिकरणम्(अभावाधिकरणम्) ॥ 08 ॥
सुप्तौ मोक्षे वा तदुच्यते । ‘अत्र पिताऽपिता भवत्यनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन’ इत्याद्याविष्कृतत्वात् ॥
ब्रह्मवैवर्ते च-
‘ज्योतिर्मयेषु देहेषु स्वेच्छया विश्वमोक्षिणः ।
भुञ्जते सुसुखान्येव न दुःखादीन् कदाचन ॥
तीर्णा हि सर्वशोकांस्ते पुण्यपापादिवर्जिताः ।
सर्वदोषनिवृत्तास्ते गुणमात्रस्वरूपिणः’ इति ॥ 16 ॥
सर्वकामाधिकरणम् (जगद्व्यापाराधिकरणम्)
ॐ जगद्व्यापारवर्जम् ॐ ॥ 17-558 ॥
‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतःसमभवत्’ इत्युच्यते । तत्र सृष्ट्यादिभ्योऽन्यान् व्यापारानाप्नोति ॥ 17 ॥
ॐ प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च ॐ ॥ 18-559 ॥
कुतः ? –
जीवप्रकरणत्वाज्जीवानां तादृक्सामर्थ्यविदूरत्वाच्च । वाराहे च-
‘स्वाधिकानन्दसम्प्राप्तौ सृष्ट्यादिव्यापृतिष्वपि ।
मुक्तानां नैव कामः स्यादन्यान् कामांस्तु भुञ्जते ॥
तद्योग्यता नैव तेषां कदाचित् क्वापि विद्यते ।
न चायोग्यं विमुक्तोऽपि प्राप्नुयान्नच कामयेत्’ इति ॥ 18 ॥
ॐ प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॐ ॥ 19-560 ॥
‘ता यो वेद, स वेद ब्रह्म, सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति’ इति प्रत्यक्षोपदेशाज्जगदैश्वर्यमप्यस्तीति चेन्न ।
आधिकारिकमण्डलाधिपतिर्ब्रह्मा हि तत्रोच्यते ।
गारुडे च-
‘आत्मेत्येव परं देवमुपास्य हरिमव्ययम् ।
केचिदत्रैव मुच्यन्ते नोत्क्रामन्ति कदाचन ॥
अत्रैव च स्थितिस्तेषामन्तरिक्षे तु केचन ।
केचित् स्वर्गे महर्लोके जने तपसि चापरे ॥
केचित् सत्ये महाज्ञान गच्छन्ति क्षीरसागरम् ।
तत्रापि क्रमयोगेन ज्ञानाधिक्यात् समीपगाः ॥
सालोक्यं च सरूपत्वं सामीप्यं योग एव च ।
इमामारभ्य सर्वत्र यावत्सुक्षीरसागरे ॥
पुरुषोऽनन्तशयनः श्रीमन्नारायणाभिधः ।
मानुषा वर्णभेदेन तथैवाश्रमभेदतः ॥
क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः ।
आजानजाः कर्मजाश्च तात्त्विकाश्च प्रजापतिः ॥
रुद्रो ब्रह्मेति क्रमशस्तेषु चैवोत्तरोत्तराः ।
नित्यानन्दे च भोगे च ज्ञानैश्वर्यगुणेषु च ॥
सर्वे शतगुणोद्रिक्ताः पूर्वस्मादुत्तरोत्तरम् ।
पूज्यन्ते चावरैस्ते तु सर्वपूज्यश्चतुर्मुखः ॥
स्वजगद्व्यापृतिस्तेषां पूर्ववत् समुदीरिता ।
सयुजः परमात्मानं प्रविश्य च बहिर्गताः
चिद्रूपान् प्राकृतांश्चापि विना भोगांस्तु कांश्चन ।
भुञ्जते मुक्तिरेवं ते विस्पष्टं समुदाहृताः’ इति ॥ 19 ॥
ॐ विकारावर्ति च तथाहि दर्शयति ॐ ॥ 20-561 ॥
॥ इति सर्वकामाधिकरणम् (जगद्व्यापाराधिकरणम्) ॥ 09 ॥
विकारावर्तिव्यापारो मुक्तानां न विद्यते । ‘इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते’ इति हि श्रुतिः ।
वाराहे च –
स्वाधिकारेण वर्तन्ते देवा मुक्तावपि स्फुटम् ।
बलिं हरन्ति मुक्ताय विरिञ्चाय तु पूर्ववत् ॥
सब्रह्मकास्तु ते देवा विष्णवे च विशेषतः ।
न विकाराधिकारस्तु मुक्तानामन्य एव तु ।विकाराधिकृता ज्ञेया ये नियुक्तास्तु विष्णुना’ इति ॥ 20 ॥
स्थित्य(एकरूपा)धिकरणम्
ॐ स्थितिमाह दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॐ ॥ 21-562 ॥
‘एतत् साम गायन्नास्ते’ इत्युच्यते ।तत्रानन्दादीनां वृद्धिर्ह्रासश्च न विद्यते। एकप्रकारेणैव सर्वदा स्थितिः ।
‘स एष एतस्मिन् ब्रह्मणि सम्पन्नो न जायते न म्रियते न हीयते न वर्धते स्थित एव सर्वदा भवति दर्शन्नेव ब्रह्म दर्शन्नेवात्मानं तस्यैवं दर्शयतो नापत्तिर्न विपत्तिः’ इत्याह जाबालश्रुतौ ।
‘यत्र गत्वा न म्रियते यत्र गत्वा न जायते । न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’ इति मोक्षधर्मे ॥
विद्वत्प्रत्यक्षात् कारणभावल्लिङ्गाच्च । ब्रह्मवैवर्ते च –
‘न ह्रासो न च वृद्धिर्वा मुक्तानां विद्यते क्वचित् ।
विद्वत्प्रत्यक्षसिद्धत्वात् कारणाभावतोऽनुमा ॥
हरेरुपासना चात्र सदैव सुखरूपिणी ।
न तु साधनभूता सा सिद्धिरेवात्र सा यतः’ इति ॥ 21 ॥
ॐ भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॐ ॥ 22-563 ॥
॥ इति स्थित्य(एकरूपा)धिकरणम् ॥ 10 ॥
न च भोगविशेषादिविरोधः ।‘एतमानन्दमयमात्मानमनुविश्य न जायते न म्रियते न ह्रसते न वर्धते यथाकामं चरति यथाकामं पिबति यथाकामं रमते यथाकाममुपरमते’
इति भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् ।
‘अवृद्धिह्रासरूपत्वं मुक्तानां प्रायिकं भवेत् ।कादाचित्कविशेषस्तु नैव तेषां विषिध्यते’ इति कौर्मे ॥
‘प्रवाहतस्तुवृद्धिर्वा ह्रासो वा नैव कुत्रचित् ।
नाप्रियं किञ्चिदपि तु मुक्तानां विद्यते क्वचित् ॥
कुत एव तु दुःखं स्यात् सुखमेव सदोदितम् । भोगानां तु विशेषे तु वैचित्र्यं लभ्यते क्वचित्’
अनावृत्यधिकरणम्
ॐ अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॐ ॥ 23-564 ॥
॥ इति अनावृत्यधिकरणम् ॥ 11 ॥
॥ इति श्रीमदानन्ददीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ 04-04 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्यं समाप्तम् ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
‘न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते’ ,‘सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥ 23 ॥
ज्ञानानन्दादिभिः सर्वैर्गुणैः पूर्णाय विष्णवे ।
नमोऽस्तु गुरवे नित्यं सर्वथाऽतिप्रियाय मे ॥
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुर्-
मध्वो यत् तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि ॥नित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम ।
नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै च विष्णवे ॥