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Brahmasutra/C4/S2: Difference between revisions

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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 04-02 ॥}}
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Revision as of 04:40, 9 April 2026

द्वितीयः पादः

देवानां मोक्ष उत्क्रान्तिश्चास्मिन् पाद उच्यते –

वाङ्मनसाधिकरणम्

ॐ वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॐ ॥ 01-504 ॥


वागभिमानिन्युमा मनोऽभिमानिनि रुद्रे विलीयते । वाचो मनोवशत्वदर्शनात् ।‘तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते’ इति शब्दाच्च ।
‘उमा वै वाक् समुद्दिष्टा मनो रुद्र उदाहृतः ।तदेतन्मिथुनं ज्ञात्वा न दाम्पत्याद्विहीयते’ इति स्कान्दे ॥ 01 ॥
ॐ अत एव च सर्वाण्यनु ॐ ॥ 02-505 ॥


॥ इति वाङ्मनसाधिकरणम् ॥ 01 ॥
अत एव चशब्दात् सर्वाणि दैवतानि यथानुकूलं विलीयन्ते ।
‘अग्नौ सर्वे देवा विलीयन्तेऽग्निरिन्द्रे इन्द्र उमायामुमा रुद्रे विलीयते एवमन्यानि दैवतानि यथाऽनुकूलम्’ इति गौपवनश्रुतिः ॥ 02 ॥

मनोऽधिकरणम्

ॐ तन्मनः प्राण उत्तरात् ॐ ॥ 03-506 ॥


॥ इति मनोऽधिकरणम् ॥ 02 ॥
‘मनः प्राण’ इत्युत्तराद्वचनान्मनोभिमानी रुद्रः प्राणे वायौ विलीयते ।
‘वायोर्वाव रुद्र उदेति वायौ विलीयते तस्मादाहुर्वायुर्देवानां श्रेष्ठः’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ॥ 03 ॥

अध्यक्षाधिकरणम्

ॐ सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॐ ॥ 04-507 ॥


॥ इति अध्यक्षाधिकरणम् ॥ 03 ॥
स प्राणः परमात्मनि विलीयते ।
‘सर्वे प्राणमुपगच्छन्ति प्राणः परमुपगच्छति प्राणं देवा अनुप्राणन्ति प्राणः परमानुप्राणिति तस्मादाहुः प्राणस्य प्राण इति’ ‘प्राणः परस्यां देवतायाम्’ ।
‘मुक्ताः सन्तोऽग्निमाविश्य देवाः सर्वेऽपि भुञ्जते ।
‘अग्निरिन्द्रं तथेन्द्रश्च वायुमाविस्य सोऽपि तु । आविश्य परमात्मानं भङ्क्ते भोगांस्तु बाह्यकान् ॥
न ह्यानन्दो निजस्तेषां परैर्लभ्यः कथञ्चन । किमु विष्णोः परानन्दो न ते विष्णुविति श्रुतेः ॥
प्राणस्य तेजसि लयो मार्गमात्रमुदाहृतम् । सर्वेशितुश्च सर्वादेस्तस्यान्यत्र लयः कथम्’ इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः ॥ 04 ॥

भूताधिकरणम्

ॐ भूतेषु तच्छ्रुतेः ॐ ॥ 05-508 ॥


॥ इति भूताधिकरणम् ॥ 04 ॥
भेतेष्वन्येषां देवानां लयः ।
भूतेषु देवा विलीयन्ते भूतानि परे न पर उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता’ इति बृहच्छ्रुतेः ॥ 05 ॥

अनेकलयाधिकरणम् (नैकस्मिन्नधिकरणम्)

ॐ नैकस्मिन् दर्शयतो हि ॐ ॥ 06-509 ॥


॥ इति अनेकलयाधिकरणम् (नैकस्मिन्नधिकरणम्) ॥ 05 ॥
नैकस्मिन् भूते सर्वेषां देवानां लयः ।‘पृथिव्यामृभवॊ विलीयन्ते मरुणेऽश्विनावग्नावग्नयो वायविन्द्रः सोम आदित्यो बृहस्पतिरित्याकाश एव साध्या विलीयन्ते । मृत्यवः पृथिव्यां वरुण आपोऽग्नयस्तेजसि मरुतो मारुत आकाशे विनायका विलीयन्ते’ इति महोपनिषच्चतुर्वेदशिखा च दर्शयतः । अतोऽग्नौ देवा विलीयते इत्यत्र निर्दिष्टानामेव ॥ 06 ॥

समनाधिकरणम्

ॐ समना चासृत्युपक्रमादमृतत्वं चानुपोष्य ॐ ॥ 07-510 ॥


देशतः कालतश्च व्याप्त्या समो ना परमपुरुषो यस्याः सा समना । संसारानुपक्रमात् स्वतः एवामृतत्वं तस्याः । बृहच्छ्रुतिश्च –
‘द्वौवाव सृत्यनुपक्रमौ प्रकृतिश्च परमश्च द्वावेतौ नित्यमुक्तौ नित्यौ च सर्वगतौ चैतौ ज्ञात्वा विमुच्यते’ इति । नैतावता साम्यम् ॥ 07 ॥
ॐ तदपीतेः संसारव्यपदेशात् ॐ ॥ 08-511 ॥


‘समावेतौ प्रकृतिश्च परमश्च नित्यौ सर्वगतौ नित्यमुक्तावसमावेतौ प्रकृतिश्च परमश्च विलीनो हि प्रकृतौ संसारमेति विलीनः परमे ह्यमृतत्वमेति’ इति सौपर्णश्रुतेः ॥ 08 ॥
ॐ सूक्ष्मं प्रमाणतश्च तथोपलब्देः ॐ ॥ 09-512 ॥


सूक्ष्मत्वं चाधिकं ब्रह्मणः प्रकृतेः । ज्ञानानन्दैश्वर्यादिप्रमाणाधिक्यं च ।
‘सर्वतः प्रकृतिः सूक्ष्मा प्रकृतेः परमेश्वरः ।ज्ञानानन्दौ तथैश्वर्यं गुणाश्चान्येऽधिकाः प्रभोः’ इति च तुरश्रुतिः ॥ 09॥
ॐ नोपमर्देनातः ॐ ॥ 10-513 ॥


अतस्तस्ये यो विशेषगुणास्तेषामनुपमर्देनैव साम्यम् ।
‘देशतः कालतश्चैव समा प्रकृतिरीश्वरे ।
               उभयोरप्यबद्धत्वं तदबन्धः परात्मनः ।
स्वत एव परेशस्य सा चोपास्ते सदा हरिम् ॥
प्रकृतेः प्राकृतस्यापि ये गुणास्ते तु विष्णुना ।नियता नैव केनापि नियता हि हरेर्गुणाः’प् इति भविष्यत्पर्वणि ॥ 10 ॥
ॐ अस्यैव चोपपत्तेरूष्मा ॐ ॥ 11-514 ॥


‘द्विधा हीदमवदृष्यते ऊष्मावदनूष्मावच्च । तत्रोष्मावत्परं ब्रह्म यन्न जिघ्रन्ति न पश्यन्ति न शृण्वन्ति न विजानन्ति । अथानूष्मावत्प्रकृतिश्च प्राकृतं च यन्न जिघ्रन्ति जिघ्रन्ति च यन्न पश्यन्ति पश्यन्ति च यन्न शृण्वन्ति शृण्वन्ति च यन्न जानन्ति जानन्ति च’ इति सौपर्णश्रुतेः किञ्चित्साम्योपपत्ते ॥ 11 ॥
ॐ प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात् ॐ ॥ 12-515 ॥


‘असमो वा एष परो न हि कश्चिदेवं दृश्यते सर्वे ह्येतेऽणवो जायन्ते च म्रियन्ते च छिद्रा ह्येते भवन्ति । अथ परो न जायते न म्रियते पूर्णश्चैष भवति’ इति चतुर्वेदशिखायां साम्यप्रतिषेधान्नेति चेन्न । शरीराद्धि साम्यं प्रतिषिध्यते ॥ 12 ॥
ॐ स्पष्टो ह्येकेषाम् ॐ ॥ 13-516 ॥


कुतः ? –
‘अथातः समाश्चासमाश्चाभिधीयन्ते समासमाश्चाथ समानि ब्रह्मणो रूपाणि यैरुत्पत्तिः स्थितिर्लयो नियतिरायतिश्चैकं ह्येवैतद्भवत्यथासमा ब्रह्मेन्द्रो रुद्रः प्रजापतिर्बृहस्पतिर्ये के च देवा गन्धर्वा मनुष्याः पितरोऽसुरा यत्किञ्चेदं चरमचरं चाथ समाऽसमा प्रकृतिर्वाव समाऽसमैषा हि नित्याऽजरा तद्वशा च’
इति स्पष्टो हि माध्यन्दिनायानानां समाधिवादः ॥ 13 ॥
ॐ स्मर्यते च ॐ ॥ 14-517 ॥


॥ इति समनाधिकरणम् ॥ 06 ॥
‘मत्स्यकूर्मवाराहाद्याः समा विष्णोरभेदतः ।ब्रह्माद्यास्त्वमाः प्रोक्ताः प्रकृतिश्च समासमा’ इति च वाराहे ॥ 14 ॥

परा(लया)धिकरणम्

ॐ तानि परे तथा ह्याह ॐ ॥ 15-518 ॥


॥ परा(लया)धिकरणम् ॥ 07 ॥
प्राणद्वारेण सर्वाणि दैवतानि परमात्मनि विलीयन्ते ।
‘सर्वे देवाः प्राणमाविष्य देवे मुक्तालयं परमे यान्त्यचिन्त्ये’ इति कौषारवश्रुतिः ॥ 15 ॥

अविभागाधिकरणम्

ॐ अविभागो वचनात् ॐ ॥ 16-519 ॥


॥ अविभागाधिकरणम् ॥ 08 ॥
‘एते देवा एतमात्मानमनुविश्य सत्याः सत्यकामाः सत्यसङ्कल्पा यथानिकाममन्तर्बहिः परिचरन्ति’ इति गौपवनश्रुतिः ।
तत्परमेश्वरकामाद्यविभागेनैव तेषां सत्यकामत्वम् ।
‘कामेन मे काम आगाद्धृदयाद्धृदयं मृत्योः’ इति वचनात् ।
‘मुक्तानां सत्यकामत्वं सामर्थ्यं च परस्य तु ।कामानुकूलकामत्वं नान्यत् तेषां विधीयते’ इति ब्राह्मे ॥ 16 ॥

हृदयाग्रज्वलना(तदोकोऽ)धिकरणम्

ॐ तदोकोऽग्रज्वलनं तत्प्रकाशितद्वारो विद्यासामर्थ्यात् तच्छेषगत्यनुस्मृतियोगाच्च हार्दानुगृहीतः शताधिकया ॐ ॥ 17-520 ॥


उत्क्रान्तिकाले हृदयस्याग्र ज्वलनं भवति।‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते’ इति श्रुतेः ।
तत्प्रकाशितद्वारो निष्क्रामति । विद्यासामर्थ्यात् ।
‘यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
               तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः’ ॥
इति स्मृतेर्विद्याशेषगत्यनुस्मरणयोगाच्च।
‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’ इति हि लिङ्गम् ।
‘हृदिस्थेनैव हरिणा तस्यैवानुग्रहेण तु ।उत्क्रान्तिर्ब्रह्मरन्द्रेण तमोवोपासतो भवेत्’ इति चाध्यात्मे ।
‘शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायान्नमृतत्वमेति विष्वङ्गन्या उत्क्रमणे भवन्ति’ इति च ॥ 17 ॥
ॐ रश्म्यनुसारी ॐ ॥ 18-521 ॥


निष्क्रामति ।
‘सहस्रं वा आदित्यस्य रश्मय आसु नाडीष्वाततास्तत्र श्वेतः सुषुम्नो ब्रह्मयानः सुषुम्नायामाततस्तत्प्रकाशेनैष निर्गच्छति’ इति हि पौत्रायणश्रुतिः ॥ 18 ॥
ॐ निशि नेति चेन्न सम्बन्धात् ॐ ॥ 19-522 ॥


रश्म्यभावान्निशि ज्ञानिना उत्क्रमणं न युक्तमिति चेन्न। सर्वदा सम्बन्धाद्रश्मीनाम् ॥ 19 ॥
ॐ यावद्देहभावित्वाद्दर्शयति च ॐ ॥ 20-523 ॥


कियत्कालम् ? –
यावद्देहो विद्यते तावद्रश्मिसम्बन्धोऽस्त्येव ।
‘संसृष्टा वा एते रश्मयश्च नाड्यश्च नैषां वियोगो यावदिदं शरीरमत एतैः पश्यत्येतैरुत्क्रामत्येतैः प्रवर्तते’ इति हि माध्यन्दिनायनश्रुतिः ॥ 20 ॥
ॐ अतश्चायनेऽपि हि दक्षिणे ॐ ॥ 21-524 ॥


॥ इति हृदयाग्रज्वलना(तदोकोऽ)धिकरणम् ॥ 09 ॥
‘दक्षिणे मरणाद्याति स्वर्गं ब्रहमोत्तरायणे’ इत्युक्तेऽपि ज्ञानिनो दक्षिणायनोत्क्रान्तिर्युज्यते ।
‘शतं पञ्चैव सूर्यस्य दक्षिणायनरश्मयः । तावन्त् एव निर्दिष्टा उत्तरायणरश्मयः ॥
ते सर्वे देहसम्बद्दा सर्वदा सर्वदेहिनाम् ।
               महर्लोकादिगन्तरा उत्तरायणरश्मिभिः ।
निर्गच्छन्तीतरैश्चापि यैरेष्टव्येतरा गतिः ॥
उत्तरं दक्षिणमिति त एव तु निगद्यते । न तु कालविशेषोऽस्ति ज्ञानिनां नियमात् फलम् ॥
ददाति कालेऽनुगुणे फलं किञ्चिद्विशिष्यते ।अत्युत्तमानां केषाञ्चिन्न विशेषोऽस्ति कालतः’इति नारायणाध्यात्मे ॥ 21 ॥

प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योग्यधिकरणम्)

ॐ योगिनः प्रति स्मर्येते स्मार्ते चैते ॐ ॥ 22-525 ॥


॥ इति प्रतिस्मरणाधिकरणम् (योग्यधिकरणम्) ॥ 10 ॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 04-02 ॥
न केवलं कालादिकृते ब्रह्मचन्द्रगती स्मर्येते । किन्तु ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च ।
‘अग्निर्ज्येतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्मब्रह्मविदो जनाः ॥
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासादक्षिणायनम् ।
               तत्र चान्द्रमासं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते’
इत्यत्र योगीति विशेषणात् स्मरणनिमित्ते चैते गती ।
‘गत्यनुस्मरणाद्ब्रह्म चन्द्रं वा गच्छति ध्रुवम् ।अननुस्मरतः काले स्मरणं प्राप्य वैगतिः’इति हि आध्यात्मे ॥ 22 ॥