Dwadasha/C3: Difference between revisions
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Revision as of 05:37, 8 April 2026
कुरु भुङ्क्ष्व च कर्म निजं नियतं हरिपादविनम्रधिया सततम् ।हरिरेव परो हरिरेव गुरुः हरिरेव जगत्पितृमातृगतिः ॥1॥
न ततोस्त्परं जगतीड्यतमं परमात् परतः पुरुषोत्तमतः ।तदलं बहुलोकविचिन्तनया प्रवणं कुरु मानसमीशपदे ॥2॥
यततोपि हरेः पदसंस्मरणे सकलं ह्यघमाशु लयं व्रजति ।स्मरतस्तु विमुक्तिपदं परमं स्फुटमेष्यति तत्किमपाक्रियते ॥3॥
श?ृणुतामलसत्यवचः परमं शपथेरितमुच्छ्रितबाहुयुगम् ।न हरेः परमो न हरेः सदृशः परमः स तु सर्वचिदात्मगणात् ॥4॥
यदि नाम परो न भवेत् स हरिः कथमस्य वशे जगदेतदभूत् ।यदि नाम न तस्य वशे सकलं कथमेव तु नित्यसुखं न भवेत् ॥5॥
न कर्मविमामलकालगुणप्रभृतीशमचित्तनु तद्धि यतः ।चिदचित्तनु सर्वमसौ तु हरिर्यमयेदिति वैदिकमस्ति वचः ॥6॥
व्यवहारभिदापि गुरोर्जगतां न तु चित्तगता स हि चोद्यपरम् ।बहवः पुरुषाः पुरुषप्रवरो हरिरित्यवदत् स्वयमेव हरिः ॥7॥
चतुराननपूर्वविमुक्तगणा हरिमेत्य तु पूर्ववदेव सदा ।नियतोच्चविनीचतयैव निजां स्थितिमापुरिति स्म परं वचनम् ॥8॥
आनन्दतीर्थसन्नाम्ना पूर्णप्रज्ञाभिधायुजा ।कृतं हर्यष्टकं भक्त्या पठतः प्रियते हरिः ॥9॥